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	<title>मरीजों के अनुभव Archives - न्यूरोज्ञान</title>
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		<title>सत्य के चेहरे (बतायें या न बताएँ ?) &#8211; एकांकी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[न्यूरो ज्ञान]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 Sep 2023 09:27:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मरीज़ कथाएँ]]></category>
		<category><![CDATA[Clinical Tales]]></category>
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		<category><![CDATA[मरीजों के अनुभव]]></category>
		<category><![CDATA[मरीजों पर आधारित कहानियाँ]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>(मिर्गी के मरीजों और परिजनों के साथ डॉक्टर की मीटिंग) मंच पर एक मीटिंग का सेट लगा है। एक पोडियम पर माइक है जहां से डॉक्टर संबोधित कर हे हैं। सामने लगभग दस स्त्री-पुरुष एक गोलाबनाकर कुर्सियों पर बैठे हैं। मिर्गी रोग से सम्बन्धित बैनर और पोस्टर लगे हुए हैं। डॉक्टर – मित्रों आज हमने [&#8230;]</p>
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<figure class="wp-block-image size-large"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="954" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-9-954x400.png" alt="" class="wp-image-2478" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-9-954x400.png 954w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-9-300x126.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-9-768x322.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-9.png 1200w" sizes="(max-width: 954px) 100vw, 954px" /></figure>



<h3 class="wp-block-heading">(मिर्गी के मरीजों और परिजनों के साथ डॉक्टर की मीटिंग)</h3>



<p class="wp-block-paragraph">मंच पर एक मीटिंग का सेट लगा है। एक पोडियम पर माइक है जहां से डॉक्टर संबोधित कर हे हैं। सामने लगभग दस स्त्री-पुरुष एक गोलाबनाकर कुर्सियों पर बैठे हैं। मिर्गी रोग से सम्बन्धित बैनर और पोस्टर लगे हुए हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>डॉक्टर </strong>– मित्रों आज हमने मिर्गी रोग के विभिन्न पहलूओं के बारे में चर्चा करी। यह जाना कि एपिलेप्सी एक कामन बीमारी है। हज़ारों लाखों लोगों को होती है लेकिन हमने पता नहीं पड़ता क्योंकि इन लोगों को कभी कभार कुछ फिट्स या दौरे आने के अलावा, प्राय: अन्य स्वास्थ्य अच्छा होता है। हमने यह भी जाना कि इस रोग का ईलाज अधिकांश मरीजों में (लगभग 70% में) सफल होता है लेकिन अनेक वर्षों तक बिना गेप करे, औषधियां खानी पड़ती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस रोग से पीड़ित व्यक्ति की शादी हो सकती है,&nbsp;उनके यौन संबंध सामान्य होते हैं,&nbsp;वे अच्छे माता-पिता बनेंगे,&nbsp;बच्चों की अच्छी&nbsp;परवरिश कर पाएँगे उनके बच्चों का स्वास्थ्य अच्छा होगा,&nbsp;बच्चों में मिर्गी रोग के होने की आशंका बहुत कम होगी?&nbsp;और कोई प्रश्न हो तो जरूर पूछिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>माँ (1) </strong>&#8211; डॉक्टर साहब, मेरा नाम सुनीता है। मैं स्कूल में प्रिंसिपल हूँ। मेरी बेटी स्वाति 20 वर्ष की है। उसे दस साल से मिर्गी है। इलाज से फायदा है। फिर भी महीने या दो महीने में दौरा आ जाता है। ज्यादातर हल्का-सा। कभी जोर का। बहुत से डाक्टर्स को दिखाया। अनेक बार दवाइयाँ बदली, बाम्बे में दिखाया। कहते हैं कि ऑपरेशन का केस नहीं है। दवाइयाँ ही चलेंगी। स्वाति ने बी.ए. कर लिया है। अभी घर बैठी है। शादी के लिए रिश्ते आ रहे है। हमें समझ में नहीं आता कि सामने वालों को इस बारे में बताएँ कि नहीं?</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर &#8211; यह बहुत कॉमन सवाल है। लगभग प्रति सप्ताह पूछा जाता है। इसका कोई आसान उत्तर नहीं है। नैतिकता,&nbsp;ईमानदारी और सत्य का तकाजा है कि कोई बात छिपाई&nbsp;न जाए। सब कुछ साफ-साफ बताया जाए।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>माँ (1) (सुनीता) &#8211;</strong> ऐसे तो मेरी बेटी स्वाति सदा कुंवारी रह जाएगी। कौन हाँ करेगा?</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>समवेत &#8211;</strong> हाँ, सही है, कोई नहीं करेगा। कोई क्यों अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारेगा?</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>डॉक्टर &#8211;</strong> आप इसे पाँव पर कुल्हाड़ी मारना क्यों कह रहे हो?</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>माँ (2) (नीलिमा) &#8211;</strong> और नहीं तो क्या? कौन अपने बेटे के लिए ऐसी बहू को जानते बूझते स्वीकार करेंगे?</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>डॉक्टर &#8211;</strong> शायद कर सकते हो। एपिलेप्सी के सब मरीज इतने ज्यादा बीमार नहीं होते। ज्यादातर लोग सामान्य होते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>पिता (1) (स्वंयप्रकाश) &#8211;</strong> परन्तु लोग ऐसा कहाँ मानते हैं। उनके दिमाग में मिर्गी की जो छवि है वह बेहद गन्दी और खराब है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>डॉक्टर &#8211;</strong> वही तो हमें बदलना है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>पिता (2) (गंगाधर) &#8211;</strong> लोगों की सोच न जाने कब बदलेगी। पता नहीं बदलेगी भी कि नहीं? हम अभी क्या करें?</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>मरीज (2) (साधना) &#8211;</strong> मेरी शादी बिना बताए कर दी गई थी। मैंने मना किया था। मेरे माता-पिता नहीं माने। ससुराल वाले कम पढ़े लिखे और दकियानूसी थे। मेरी दवाइयाँ  छूट गईं। एक हफ्ते की भीतर एक दिन में दो दौरे आ गए थे। घर में कोहराम मच गया था। सास ने पता नहीं क्या-क्या गन्दा-गन्दा बोला मेरे माँ-पापा के लिए। खाने-पीने के बर्तन अलग कर दिए थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दूसरे दिन पिताजी को बुलवाकर मुझे मायके भेज दिया था। दो साल हो गए।&nbsp;कोई खोज खबर नहीं। सुना है,&nbsp;दूसरी लड़की ढूंढ ली है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>माँ (2) (नीलिमा) &#8211;</strong> उन लोगों ने कोर्ट में तलाक का केस लगाया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>डॉक्टर &#8211;</strong> इस केस में वे हार जाएँगे। अपने देश के कानून में जो कमी थी, उसे हम डॉक्टरों के संघ ने खूब कोशिश करके दूर करवा लिया है। मिर्गी की अवस्था को अब उस सूची में से निकाल दिया गया है जिसके आधार पर तलाक मंजूर किया जा सकता था।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>पिता (3) (केशव) &#8211;</strong> डॉक्टर साहब और दूसरे साहबान! आप जिन्होंने भी बातें की सच बोलने की, विश्वास बनाए रखने की, धोखा न देने की, कुछ भी न छिपाने की, आप सब से कुछ प्रेक्टीकल सवाल पूछना चाहता हूँ, क्या हम पूरी जिन्दगी हमेशा 100 प्रतिशत सच बोलते हैं? कई बार मजबूरी में, अच्छे उद्देश्य के लिए सच के कुछ पहलुओं को छुपाना पड़ता है, चुप रह जाना पड़ जाता है। नियत बुरी नहीं होना चाहिए। किसी का नुकसान नहीं होना चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>माँ (3) (मालती) &#8211;</strong> मिर्गी के अधिकाँश रोगी &#8211; लगभग 70 प्रतिशत में दौरे या तो बंद हो जाते हैं या बहुत कम हो जाते हैं तथा वे लोग लगभग सामान्य जीवन व्यतीत करते हैं। उनमे से अनेक सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचते हैं। ऐसे केसेस में क्यों जबरदस्ती सत्यवादी हरिश्चंद्र बना जाए?</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>डॉक्टर &#8211;</strong> लेकिन 20-30 प्रतिशत मरीज़ ऐसे होते हैं जिनमे दौरे नहीं रुकते और बुद्धि स्वाभाव व कार्य क्षमता में कमी हो सकती हैं। ऐसे मरीज़ों के लिए बात छुपाना गलत है। वैसे भी छुपी नहीं रहती। </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>मरीज़ (2) (साधना) &#8211;</strong> मरीज़ केवल बदनामी की मार झेलते हैं। ‘मिर्गी’ इस शब्द के साथ एक बेहद गन्दी खौफनाक घृणित छवि जुड़ी हैं। जो गलत हैं। इस गलती का खामियाजा मरीज़ क्यों भुगते। एक गलती की काट करने के लिए एक दूसरी छोटी-सी गलती को उतनी ही घृणा की नजर से मत देखो जितना कि अज्ञानी लोग मिर्गी को देखते हैं। </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>मरीज़ (1) (स्वाति) &#8211;</strong> मैं तो कॉलेज में मिर्गी का नाम ही नहीं लेती हूँ। घुमा फिरा देती हूँ। अंग्रेजी में एपिलेप्सी बोल देती हूँ। लोग कहते हैं नाम में क्या धरा है। शेक्सपियर कह गए थे यदि गुलाब को किसी और नाम से पुकारेंगे तो भी उसकी मीठी खुशबू वैसी ही होगी। लेकिन सच्चाई यह है कि नाम में बहुत कुछ धरा हैं। बद अच्छा बदनाम बुरा। एपिलेप्सी रोग अपनी जगह जैसा है ठीकठाक हैं, इलाज़ के काबिल हैं, लेकिन मिर्गी का नाम-तौबा-तौबा।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>पिता (2) (गंगाधर) &#8211;</strong> मिर्गी के बारे में बताना या छुपाना इस सवाल का सामना केवल एक तिहाई मरीजों को करना पड़ता हैं। बाकी में से एक तिहाई तो वे होते हैं जिनमें बीमारी का जोर ज्यादा होने से वह छिपी नहीं रह सकती। एक अन्य तिहाई में बीमारी की तीव्रता कम होती हैं, यदा कदा दौरे आते हैँ, बंद हो चुके होते हैँ। वे लोग इस बारे में चुप रहें तो भी आसानी से थक जाता हैँ। किसी का बुरा नहीं होता। ज्यादातर की दवाइयाँ छूट जाती हैँ या छूट जाएंगी। गाहे, बगाहे,  छटे छमासे एक आध छोटा-मोटा दौरा आ भी जाए तो परिजन ज्यादा चौंकते या चमकते नहीं हैँ। समस्या होती है बीच के तीस प्रतिशत के साथ। बोले तो मुश्किल। न बताएँ तो झूठे बनें। बताएँ तो बात बिगड़े। छुपाएँ तो दांपत्य की नींव में रखे आस्था और विशवास के पत्थर पर चोंट। इनके लिए आपकी क्या सलाह?</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>डॉक्टर &#8211;</strong> ऐसे मरीज़ों और माता-पिताओं को मेरी सलाह रहती है – ‘शादी की जल्दी क्या हैँ?’ ‘अभी पढ़ाई और इलाज पर ध्यान दो।’</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>माँ (2) (नीलिमा) &#8211;</strong> हमारे समाज में जल्दी शादी करते हैँ। फिर बाद में लड़के नहीं मिलते।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर &#8211; कुछ हिम्मत रखो।&nbsp;अपने आप पर और अपनी बच्ची पर भरोसा रखो।&nbsp;समाज धीरे से और देर से बदलता है,&nbsp;पर बदलता जरूर हैँ।&nbsp;उस परिवर्तन का निमित्त बनने का सौभाग्य कुछ ख़ास लोगों को ही मिलता हैँ।&nbsp;शायद आपका परिवार उनमे से एक हैँ।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>माँ (1) (सुनीता) &#8211;</strong> इलाज़ का क्या भरोसा?  क्या गारंटी?  इलाज कराया था।  उसके बाद भी दौरे आ गए। सुना हैँ कि शादी करने और बच्चे होने से रोग मिट जाता हैँ।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>डॉक्टर &#8211;</strong> यह सही है कि बीमारी का स्थाई इलाज नहीं हैं। रोग जड़ से नहीं जाता। दवाइयाँ अनिश्चितकाल तक लेना पड़ती हैं। पर इस भ्रम में मत रहना कि शादी के बाद या बच्चे आने से रोग मिट जाएगा। सच-सच बताना क्या बच्ची के इलाज़ में कभी-कभी नागा नहीं हुई?</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-large is-resized"><img decoding="async" width="961" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-6-961x400.png" alt="" class="wp-image-2481" style="width:613px;height:255px" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-6-961x400.png 961w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-6-300x125.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-6-768x320.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-6.png 1201w" sizes="(max-width: 961px) 100vw, 961px" /></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph"><strong>मरीज़ (1) (स्वाति) &#8211;</strong> बीच-बीच में भूल जाती हूँ। फिर चिढ आ गई थी कि दौरे आ रहे है तो दवाइयाँ बंद कर दी थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>डॉक्टर &#8211;</strong> यह सबसे बड़ी गलती हैं। शादी की बात फिलहाल भूल जाओ। सारा ध्यान केवल दो बातों पर रखों।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>एक &#8211;</strong> पूरा इलाज़। बार बार जाँच। नियमित सावधानियाँ। दौरे न रुकें तो पुनः -पुनः डॉक्टर के पास जाओ खानपान और खेलकूद और आराम पर ध्यान।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>दूसरा &#8211;</strong> पढ़ाई। लिखाई। काम सीखना। हुनर सीखना। जिसमें रुचि में, जिसमे योग्यता हो उसमें आगे बढ़ाना। लक्ष्य है कि बच्ची अपने पैरों पर खड़े होने के काबिल होना चाहिए। अच्छी नौकरी मिलना चाहिए। मरीज़ के मन से इस भावना को कम करना हैं कि</p>



<p class="wp-block-paragraph">‘मैं बीमार हूँ।’</p>



<p class="wp-block-paragraph">मुझमें कमी हैं</p>



<p class="wp-block-paragraph">मैं यह नहीं कर सकती।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">मैं वह नहीं कर सकती।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>माँ (3) (मालती) &#8211; </strong>सच बोलना चाहिए यह एक आदर्श हैं। पर क्या दुनिया आदर्श है? क्या सब लोग आदर्श हैं? क्या सारी परिस्थतियाँ आदर्श हैं? सामने वाले पक्ष को क्या बोलना और कैसे बोलना यह निर्णय अंततः मरीज़ और उसके घर वालों को लेना है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>डॉक्टर &#8211; </strong>नैतिकता का तकाज़ा हम सब जानते हैं परन्तु मैं आपको आदेश नहीं दूँगा कि बताना जरूरी हैं। आप जो भी फैसला करेंगे उसके लिए मैं आपकी आलोचना नहीं करूँगा। मैं आपकी परिस्थितियाँ और मनः स्थिति को समझूँगा। आगे जो भी परिणाम हों, मैं आपकी मदद के लिए सदैव हाज़िर रहूँगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>पिता (2) (गंगाधर) &#8211;</strong> डॉक्टर साहब यदि शादी के बाद इसे पुनः दौरे आए और ससुराल वाले आपके पास इलाज़ के लिए आए तो आप मत बताना कि इसकी पुरानी बीमारी थी। हम सब ऐसे कहेंगे कि पहले तो कुछ न था। यह सब नया शुरू हुआ हैं। </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>डॉक्टर &#8211;</strong> आप मुझे झूठा मत बनाइए।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>माँ (2) (नीलिमा) &#8211;</strong> आपसे कोई पूछने थोड़ी आ रहा हैं कि इसे पहले दौरे आए थे कि नहीं। </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>डॉक्टर &#8211; </strong>यदि ससुराल वालों ने पूछा तो।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नैपथ्य से गूंजता हुआ एकालाप (अलग अलग स्वरों में )</p>



<p class="wp-block-paragraph">यदि पूछा तो*******</p>



<h3 class="wp-block-heading">&#8211; सत्य क्या है?</h3>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211; क्या सत्य क्या झूठ के बीच भूरे रंग (Grey)&nbsp;के अनंत शेड नहीं होते।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211; अनेकांतवाद और स्यादवाद के अनुसार सत्य के अनेक चेहरे,&nbsp;अनेक पहलु होते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211; जरूरी नहीं कि सत्य सदैव निरपेक्ष हो,&nbsp;अब्सोल्युट हो,&nbsp;सत्य सापेक्ष हो सकता हैं।&nbsp;रिलेटिव हो सकता हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211; याद हैं प्रसिद्द जापानी निर्देशक अकोरा कुरोसोवा की फिल्म रोशोमान। एक घटना।&nbsp;सात पात्र।&nbsp;साथ कथाएँ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211; भगवान राम को सुग्रीव की मदद चाहिए थी।&nbsp;इसलिए बाली को मारना था।&nbsp;बाली को आशीर्वाद प्राप्त थे।&nbsp;इसलिए राम ने असत्य का सहारा लिया।&nbsp;सात वृक्षों की ओट से तीर चलाया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211;&nbsp;महाभारत में सत्यवादी धर्मराज युधिष्ठिर से गुरु द्रोणाचार्य ने पूछा था,&nbsp;क्या अश्वत्थामा मारा गया तब उनके असमंजस को&nbsp;‘नरो वा कुंजरो वा’&nbsp;के शोर ने डुबो दिया था।</p>



<h3 class="wp-block-heading">&#8211; अपने यहाँ सूत्र हैं</h3>



<p class="wp-block-paragraph">सत्यं ब्रूयात,&nbsp;प्रियं ब्रूयात</p>



<p class="wp-block-paragraph">सच बोलो (परन्तु) प्रिय बोलो</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211; हर इंसान की निजी जिंदगी में न जाने कितनी सारी छोटी-मोटी बातें होती हैं &#8211; सारी की सारी चादर,&nbsp;मय दाग के उघाड़ के रखना सदैव जरूरी नहीं होता हैं और न ही संभव होता है।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8211; अंग्रेजी में कहावत हैं Skeletons in cubboard</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211; हर किसी की अलमारी में कंकाल मिल सकते हैं।&nbsp;जरूरी नहीं कि सारी दराज़ें उढेल दी जाएँ।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211; महात्मा गाँधी ने भी पूर्ण सत्य कहाँ पाया था।&nbsp;वे सत्य के साथ प्रयोग करते रहे थे।&nbsp;</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-large is-resized"><img decoding="async" width="960" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-5-960x400.png" alt="" class="wp-image-2479" style="width:597px;height:249px" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-5-960x400.png 960w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-5-300x125.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-5-768x320.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-5.png 1200w" sizes="(max-width: 960px) 100vw, 960px" /></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">&#8211; मिर्गी कि अवस्था किसी इंसान के अनेक पहलुओं में से सिर्फ एक होती हैं।&nbsp;वह भी शायद छोटा-सा पहलु। उसका हौआ क्यों बनाएँ?&nbsp;यदि किसी युगल की जिंदगी एक छोटे से अपवाद के कारण भली निभ रही हैं तो क्यों&nbsp;&nbsp;आदर्शवाद की दुहाई दें।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211;&nbsp;मेरी बहन को 17 वर्ष की उम्र में दो दौरे आये थे।&nbsp;पाँच साल गोली चली। फिर छूट गई।&nbsp;कुछ नहीं हुआ।&nbsp;हमने किसी को नहीं बताया था।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>डॉक्टर &#8211;</strong> आप सब ने जो सोचा, महसूस किया, और बोला, साझा किया मैं उस सब का गवाह हूँ। ये सारे संवाद मेरे जेहन में से बार-बार गूंजते हैं। 30 वर्षो से जारी हैं। भूरे रंग के अनेक शेड्स का हवाला हम जरूर दे सकते हैं, अपनी बुद्धि और अपनी मज़बूरी के अनुरूप कोई ऐसा निर्णय भी ले सकते हैं जो श्रेष्ठतम सत्य से कुछ दूर हो। मेरे एक प्रिय लेखक हैं। उनकी यह पतली सी पुस्तक है — Lying — जिसमे उन्होंने बड़े अच्छे से चर्चा करी है कि झूट बोलना न केवल गलत है बल्कि लगभग हमेशा नुकसानदायक हो सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अन्तत: इंसान का लक्ष्य क्या हैं?&nbsp;अच्छे की कसौटी क्या हैं?&nbsp;सत्य की दिशा में सतत अग्रसर रहना।&nbsp;हमारी मंज़िल वही है। छोटे से छोटा झूठ भी कहीं न कहीं नुकसान पहुँचाता हैं।&nbsp;एक झूठ को छिपाने के लिए 10 नए झूठ बोलना पड़ते हैं।&nbsp;मन कचोटता हैं।&nbsp;बुरा लगता हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">फिल्म&nbsp;3 इडियट्स का पात्र याद हैं। नौकरी के इंटरव्यू में उसने सच कहने का साहस किया और मंजिल पाई।</p>



<h3 class="wp-block-heading"><strong>नेपथ्य से क्रमिक एकालाप: एक के बाद एक</strong><strong>,&nbsp;</strong><strong>अलग अलग स्वरों मे</strong></h3>



<figure class="wp-block-table"><table class="has-fixed-layout"><tbody><tr><td class="has-text-align-center" data-align="center"><strong>* ये सूरत बदलनी चाहिए (दुष्यंत कुमार) <br>* एक ही उपाय -शिक्षा और जानकारी <br>* एक और उपाय &#8211; सफल दम्पत्तियों को अपनी कहानी सुनाते आना चाहिए।  <br>* एक और उपाय &#8211; आर्थिक आत्म निर्भरता।<br>* सेलेब्रिटीज़ चाहिए &#8211; ब्रांड एम्बेसेडर के रूप में। <br>* काश लोग आगे आयें और अपनी मिर्गी के बारे में घोषणा करें <br>* हमें संगठित होकर स्वयं सहायता समूह बनाना हैं  &#8211; संख्या में बल हैं। <br>* हमें पैरवी करनी हैं &#8211; शासकीय चिकित्सालयों में श्रेष्ठ और आधुनिकतम इलाज़ मुफ्त या सस्ता उपलब्ध हो। <br>* हमें खुद की और समाज की सोच बदलना हैं। <br>* हम होंगे कामयाब एक दिन &#8211; पूरा है विश्वास।</strong></td></tr></tbody></table></figure>



<p class="has-text-align-center wp-block-paragraph">*&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; *&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; *</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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		<title>कथा &#8211; एक लक्ष्मी</title>
		<link>https://neurogyan.com/katha-ek-lakshmi</link>
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		<dc:creator><![CDATA[न्यूरो ज्ञान]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 Sep 2023 06:22:43 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मरीज़ कथाएँ]]></category>
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		<category><![CDATA[कथा - एक लक्ष्मी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मेरी क्लिनिक में अगली मरीज थी लक्ष्मी। उम्र शायद बीस वर्ष होगी&#160;&#124;&#160;सामान्य कद काठी। सांवला रंग। थोड़ी सी गम्भीर, सहमी और डरी हुई लग रही थी। अपनी मां और भाई के साथ आई थी। कॉलेज में पढ़ती थी। मैंने पूछा- क्या हुआ? मां बोली &#8216;डॉक्टर साहब एक सप्ताह पहले अचानक सुबह नाश्ता करते समय इसे पता नहीं [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="960" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-7-960x400.png" alt="" class="wp-image-2463" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-7-960x400.png 960w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-7-300x125.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-7-768x320.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-7.png 1200w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">मेरी क्लिनिक में अगली मरीज थी लक्ष्मी। उम्र शायद बीस वर्ष होगी&nbsp;|&nbsp;सामान्य कद काठी। सांवला रंग।</p>



<p class="wp-block-paragraph">थोड़ी सी गम्भीर, सहमी और डरी हुई लग रही थी। अपनी मां और भाई के साथ आई थी। कॉलेज में पढ़ती थी। मैंने पूछा- क्या हुआ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">मां बोली &#8216;डॉक्टर साहब एक सप्ताह पहले अचानक सुबह नाश्ता करते समय इसे पता नहीं क्&#x200d;यों और कैसे चक्कर आया। एकदम, अचानक, अपने आप। अच्छी भली उठी थी। हम घबरा गये। ऐसा लगा कि मर जायेगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मैंने पूछा&nbsp;&#8216;और क्&#x200d;या हुआ&#8217;</p>



<p class="wp-block-paragraph">भाई बोला&nbsp;“हम सीधे अस्पताल ले गए। रविवार था। कोई नहीं मिला। हम फोन लगाते रहे&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.. .</p>



<p class="wp-block-paragraph">मैंने रोका&nbsp;“वह सब बाद में&#8217;। पहले ये बताओ कि उस समय और क्&#x200d;या हुआ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मां कहती रही&#8217; “डॉक्टर साहब ने दिमाग का सी.टी. स्कैन कराया। यह देखिये&nbsp;|”</p>



<p class="wp-block-paragraph">मैंने फिर रोका, “इसे अपने पास रखिए। मैं कहीं नहीं जा रहा हूँ। सब देखूँगा। चक्कर वाली उस घटना का विस्तृत वर्णन सुनना चाहता हूँ। आपने क्या देखा?<br>उस समय भाई वहां नहीं था। मां थी। वह बोली “मैं तो घबरा गई थी। हाथ-पांव की मालिश कर रही थी।<br>मुझे कुछ याद नहीं। इसके दादा जी थे।” मैंने दादाजी को फोन लगवाया। आजकल फोन की आसानी हो गईं है। वरना पहले बहुत मुश्किल होती थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बीमारियों के निदान में हिस्ट्री या इतिवृत्त की महती भूमिका है। सब लोग हिस्ट्री अच्छे से नहीं सुना पाते&nbsp;हैं। हम डॉक्टर्स को धैर्यपूर्वक,&nbsp;विनम्रता से,&nbsp;बिना चिढ़े,&nbsp;बार-बार पूछना पड़ता है। मरीज और घर वाले कहानी सुनाते &#8211; सुनाते कूद लगाते है। फास्ट फारवर्ड करते हैं। खास बातें चूक जाते हैं। कम मतलब की बातों पर चले जाते हैं। उनकी कोई गलती नहीं। उन्हें क्या पता कि सार-सार क्&#x200d;या है और थोथा क्&#x200d;या?</p>



<p class="wp-block-paragraph">लक्ष्मी के दादाजी ने उस दिन की घटना का सजीव चित्रण फोन पर बहुत अच्छे से बता दिया।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="400" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-7-400x400.png" alt="" class="wp-image-2461" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-7-400x400.png 400w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-7-300x300.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-7.png 740w" sizes="auto, (max-width: 400px) 100vw, 400px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp;“हाथ में पकड़ी पोहे की चम्मच हवा में स्थिर हो गई थी। आंखे खुली रह गई थी। कुछ अस्पष्ट सा बुदबुदाई&nbsp;“वो लेलो वो ले लो&#8221;। चम्मच गिर गई,&nbsp;हाथ टेढ़ा हो गया,&nbsp;गर्दन मुड़ गई,&nbsp;मुंह से लार व पोहा टपकने लगा,&nbsp;शरीर झुक गया,&nbsp;हम चिल्लाए&nbsp;“लक्ष्मी-लक्ष्मी क्या हुआ&#8221;,&nbsp;वह कुछ न बोली। एक साइड का हाथ व पांव कड़क को गये,&nbsp;आंखे एक दिशा में टकटकी लगाकर देख रही थी,&nbsp;गिलास से पानी दुल गया था। यह सर लगभग आधा एक मिनिट रहा होगा। फिर शान्त और निढाल हो गई। बेहोश थी&nbsp;|&nbsp;आंखें बंद । मुंह और गले में शायद कफ जम गया था,&nbsp;श्वांस में खर-खर की आवाज थी,&nbsp;पेशाब से सलवार गिली हो गई थी। एक और मिनिट बाद आंखें खुली,&nbsp;थोड़ा हिली,&nbsp;कस मसाई&nbsp;|&nbsp;सबको देखा पर समझ नहीं पा रही थी। हम पुकारे जा रहे थे। फिर बोली&nbsp;&#8216;कुछ नहीं,&nbsp;कुछ नहीं&#8217;&nbsp;मुझे क्या हुआ&#8217;। पांच मिनिट में पूरी चेतना आ चुकी थी। परन्तु अभी याद न आया था कि उस समय क्&#x200d;या कर रही थी,&nbsp;क्&#x200d;या कर रही थी,&nbsp;क्&#x200d;या खा रही थी।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">काश सभी घर वाले दादाजी के समान इतने अच्छे से हिस्ट्री सुना पायें तो हम डॉक्टर्स का समय बचें और बीमारियों का निदान आसान और सटीक हो जाये। खैर जो भी हो। जिन्दगी का हर पहलू सरल होना जरुरी नहीं है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह वर्णन सुनकर मैं जान गया था कि यह मिर्गीनुमा दौरा था। एपिलेप्सी जैसा एक दौरा। परन्तु मैं इसे मिर्गी या एपिलेप्सी का नाम अभी नहीं दूंगा। मेंने और भी अधिक जानकारियां प्राप्त करी। बचपन से अभी तक ऐसी तकलीफ पहले हुई क्या? कोई अन्य बीमारी कभी हुई क्या? परिवार में कौन-कौन हैं? प्रत्येक का स्वास्थ्य कैसा है? लक्ष्मी की दिनचर्या, गतिविधियां, पढ़ाई, खेलकूद, अच्छी बुरी आदतें, खाना-पीना सब जाना।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp;जन्म के समय कैसी थी?&nbsp;बचपन में विकास कैसा था?<br>“दुबली पतली थी। ठीक से खाती न थी।&#8217;मैंने कहा&nbsp;“अनेक बच्चे दुबले होते हैं। विकास का मतलब है बैठना कब किस उम्र में शुरु किया,&nbsp;खड़े होना चलना कब करा,&nbsp;बोलना कब सीखा&#8217;।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“वह सब सामान्य औसत उम्र में हुए थे।“<br>“विकास इसे कहते हैं ।“</p>



<p class="wp-block-paragraph">फिर मैंने लक्ष्मी का शारीरिक न्यूरोलॉजी परीक्षण किया जिसमें कोई कमी न थी। मैंने अब उसके इलाज की फाईल व जांच रिपोर्ट मांगी, जिन्हें सौंपने के लिये मां और भाई के हाथ पिछले 5 मिनिट से कुलबुला रहे थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भाई ने मेरे पास आकर धीमी आवाज में फुसफुसाते हुए पूछा&nbsp;“डॉक्टर साहब इसे वह तो नहीं है न?&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">मैं समझ गया कि&nbsp;“वह”&nbsp;क्या है। भाई और मां उस&nbsp;“वह”&nbsp;का नाम जुबान पर भी नहीं लाना चाह रहे थे।<br>जैसे भारतीय पत्नियां अपने पति का नाम नहीं लेती है। हालांकि सन्दर्भ एकदम अलग होता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मैंने कहा&nbsp;“चिन्ता न करों।&nbsp;&#8216;वह&#8217;&nbsp;नहीं है।&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">उन्हें पूरा भरोसा नहीं हुआ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“पर रिपोर्ट में तो लिखा है?”</p>



<p class="wp-block-paragraph">“हो सकता है लिखा हो। मुझे देखने दो।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">लोगों का यह व्यवहार मुझे अजीब लगता है। मानों किसी गन्दी बीमारी नाम न बोलने से वह शायद टल जायेगी ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अपने यहां मान्यता है- शुभ-शुभ बोलो। मीठा-मीठा बोलो। अशुभ बातें जुबान पर मत लायों | प्रिय बोलो। लेकिन सत्य यदि अप्रिय हो तो? कभी-न-कभी तो बोलना पड़ता है। खून-पेशाब की जांच रिपोर्ट्स अच्छी थी। दिमाग के एम.आर.आई स्केन में कोई खराबी न थी। ई.ई.जी. रिपोर्ट के निष्कर्ष में लिखा था “एपिलेप्सी जैसे &#8216;डस्थाजेस देखे गये&#8221;। मैंने ई३जी आलेख (ग्राफ) के सारे पेज दो बार ध्यान से देखे। एक दो जगहों पर दिमाग की बिजली का ग्राफ थोडा सा अनियमित था। परन्तु मुझे लगा कि वह सामान्य की सीमा के अन्दर है। एक दूसरे डॉक्टर ने उसे &#8216;मिर्गीः का सबूत मान कर रिपोर्ट किया था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मेडिकल साइंस की यही मुश्किल है कि वह गणित या न्यूटन की भौतिकी&nbsp;जैसा नही होता। हालाँकि उसकी&nbsp;कुछ तुलना मैक्स प्लांक के क्वांटम सिद्धान्त और आइन्सटाइन&nbsp;सापेक्षतावाद की फिजिक्स से कर सकते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अर्थशास्त्रियों के बारे में कहावत है कि देश की माली हालत पर पांच इकोनॉमिस्ट से पूछों तो छः राय मिलेगी। इसी तरह चिकित्सा व्यवस्था में दो या अधिक डॉक्टर्स के बीच सोच व निष्कर्ष अलग-अलग होना बहुत आम बात है। वे डॉक्टर्स न तो निकम्मे हैं और न बेईमान।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मैंने फिर भरोसा दिलाया।<br>“वह चीज नहीं है।” पर उस डॉक्टर ने कहा था कि यह गोली तीन साल तक बिना चूके लेना। एक दिन भी बन्द नहीं होना चाहिए।&#8217;</p>



<p class="wp-block-paragraph">मैंने कहा कि&nbsp;“इस गोली को आप बन्द कर सकते हैं।&#8221; ऐसा कहते समय मेरे मन में थोड़ा सा डर या दुविधा जरुर थे। क्&#x200d;या मैं अपना सारा सोच मरीज के साथ साझा करुं?&nbsp;सारी उहापोह,&nbsp;समस्त पक्ष-विपक्ष बताऊं या केवल अन्तिम निर्णय,&nbsp;मानों इस तरह से कि वहीं एक मात्र सत्य है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“मिर्गी नहीं है। इलाज की जरुरत नहीं&nbsp;|”<br>लक्ष्मी,&nbsp;उसकी मां और भाई शिक्षित,&nbsp;समझदार लगे थे। मुझे लगा कि वे सत्य के अनेकान्त होने की प्रकृति को महसूस करते होंगे।</p>



<h2 class="wp-block-heading">लक्ष्मी और उसके भाई ने क्या निर्णय लिया?</h2>



<p class="wp-block-paragraph">मैंने कहना शुरु किया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“सौ लोगों में से पांच को जीवन में कभी न कभी, किसी कारण से या बिना कारण के, एक न एक बार बेहोशी का मिर्गी जैसा दौरा आ सकता है। उन सबको मिर्मी होना नहीं कहते। केवल एक घटना को मिर्गी रोग नहीं कहते। दो या दो से अधिक दौरे स्वतः, बिना कारण के आवें तो मिर्गी की परिभाषा पूरी होती है। जिस व्यक्ति को एक अटैक आ गया है उसे दूसरा और तीसरा आयेगा या नहीं और कब आयेगा, कितनी जोर का अयेगा, यह सब जानना आसान नहीं है।*</p>



<p class="wp-block-paragraph">फिर भी कुछ सूचक हैं,&nbsp;जो थोड़ा-थोड़ा इशारा करते है। फाइनल उत्तर नहीं मिलता। संभावनाओं का प्रतिशत घटता बढ़ता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लक्ष्मी के मामले में सारे कारक इंगित करते हैं कि आगे और अटैक आने की आशंका कम है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211; जन्म से अभी तक का शारीरिक और बौद्धिक विकास अच्छा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211; पहले कभी ऐसी मिलती-जुलती अवस्था नहीं हुई।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211; परिवार में किसी को यह रोग नहीं है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211; न्यूरोलॉजिकल शारीरिक जांच सामान्य है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211; एम.आर.आई. ब्रेन तथा ई.ई.जी. में खराबी नहीं है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ऐसी स्थिति में क्यों न, “प्रतीक्षा करो और देखो” की नीति अपनाएं। क्&#x200d;यों न एक काव बवाल के रास्ते पर चलें। कोई औषधि न लें। शायद दूसरा दौरा कभी न आवें। यदि आता है तो देखा जायेगा। तब सोचेंगे। तब इलाज शुरु करेंगे। अभी मत करो।</p>



<p class="wp-block-paragraph"> लक्ष्मी और उसका भाई असहज महसूस कर रहे थे। </p>



<p class="wp-block-paragraph">“यह भी कोई बात हुई। दूसरा दौरा कैसा आने दें?”</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमें नहीं चाहिए ऐसी अनिश्चितता। आप तो पक्का इलाज करों। एक और अटैक बर्दाश्त नहीं कर सकते। ना बाबा ना। कुछ हो गया तो? ज्यादा लोगों के सामने, कॉलेज में, पार्टी में, सड़क पर आ गया तो सारे जगत में खबर हो जायेगी। “मुझे तो इलाज चाहिये।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">मैंने कहा- मैं इलाज लिख सकता हूँ। मेरा कुछ नहीं जाता। आमतौर पर मानते हैं कि यदि इलाज शुरु करें तो दो-तीन साल लेना चाहिये। हालांकि कुछ डॉक्टर्स केवल एक साल के लिये देते हैं, क्योंकि दूसरा दौरा आने की आशंका प्रथम छः माह से एक वर्ष के बीच अधिक रहती है। यदि तब तक न आया तो फिर बहुत कम रह जाती है। दवाइयों का अपना खर्चा है, कुछ दुष्प्रभाव (साइड इफेक्ट्स) हो सकते हैं। रोज याद रखना पड़ता है। जब आपके केस में सारे फेक्टर अच्छे हैं तो क्या अनावश्यक इलाज करें। बस थोड़ी सी सावधानियां रखना कि नींद पूरी लें, देर रात जागरण न करें,, भूखे प्यासे रखने वाले कठिन निर्जला व्रत उपवास न करें, किसी प्रकार का नशा न करें।</p>



<p class="wp-block-paragraph"> वे तीनों कुछ क्षण सोचते रहे। उनके चेहरे पर संतुष्टि का भाव था। गोलियां लेना मिर्गी का लेबल लगने के समान था जो उन्हें अच्छा न लग रहा था। उन्होंने निर्णय लिया कि वे सावधानियां बरतेंगे ओर इलाज न लेगें।</p>



<h2 class="wp-block-heading">लक्ष्मी की कजिन विनिता की शादी</h2>



<p class="wp-block-paragraph">लगभग छः: महीने बाद लड़की का परिवार लखनऊ आया हुआ था। बुआ की बेटी, लक्ष्मी की कजिन विनिता की शादी थी। विनिता, बहन से अधिक सहेली थी। बचपन से साथ खेले बढ़े थे। ढेर सारे रिश्तेदार आये थे। देर रात तक संगीत और नाचगाना चलता रहा। फेरों का मुहूर्त रात्रि दो बजे का था। और फिर वही घटना दोबारा हुई। वैसे ही चक्कर, गिरना, बेहोशी, हाथ-पांव अकड़ना, गले की चीख, मुंह से थूक। सिर्फ दो मिनिट। चारों और कोहराम मच गया। क्&#x200d;या हुआ, क्&#x200d;या हुआ, दौड़ो, आओ, फोन करो, अस्पताल ले जाओ | लक्ष्मी के माता-पिता भाई धक्क थे | मुंह लटका कर छिपा रहे थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">फूफाजी डॉक्टर थे। उन्होने अपने मित्र के नर्सिंग होम से एम्बुलेंस बुलवाई। आई.सी.यू. में दाखिल करवाया। हालांकि रास्ते में ही लक्ष्मी को होशा आ गया था और वह बिल्कुल सामान्य महसूस कर रही थी। अनेक बार हॉस्पीटलाइजेशन अनावश्यक होता है। घर वाले बेचारे क्या जाने? वे घबराए हुए होते है? डॉक्टर्स क्यों रिस्क ले? कहीं कुछ और हो गया तो उन पर जिम्मेदारी आयेगी। बिजनेस मिले तो किसे बुरा लगता है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">यहां&nbsp;&#8216;बिजनेस&#8217;&nbsp;शब्द को गलत अर्थ में न व्यवसाय (Profession)&nbsp;के मूलभूत आर्थिक आधार&nbsp;एक जैसे होते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शिराओं के इन्ट्रावीनस इंजेक्शन लगाये गये, ग्लूकोज सलाइन आदि की बोतलें लगीं एण्टीबायोटिक्स दी गई। तमाम जांचे दुहराई गई। सब की सब पुनः सामान्य | इसमें से कितना ठीक था कितना नहीं इसका निर्णय कौन कर सकता है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">लखनऊ के वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट ने मिर्मी विरोधी औषधि का नुस्खा लिखा जो तीन वर्ष या अधिक तक जारी रहना था। फिर उन्होंने कुछ और कहा जो वे न कहते तो उचित होता ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“कौन डॉक्टर था आपका?&nbsp;जब इतना बड़ा दौरा आ चुका था तथा ई.ई.जी. में मिर्गी थी तो उसी समय इलाज शुरु क्&#x200d;यों न कर दिया?&nbsp;वरना आज यह नौबत न आती&nbsp;|&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">लक्ष्मी और परिजनों को अपने डॉक्टर की आलोचना अच्छी नहीं लगी। उसने सारे पहलू विस्तार से समझाए थे। निर्णय थोपा नहीं था बल्कि मिलजुल कर सम्मति से लिया गया था। यदि ऐसा न हुआ होता तो लक्ष्मी का परिवार उसके फूफाजी व लखनऊ के न्यूरोलॉजिस्ट की बातों में आकर जरुर मन में गुस्सा, कुण्ठा, चिढ़ भर करके अपने डॉक्टर के खिलाफ उपभोक्ता न्यायालय में दावा लगाते। इस तरह की दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियों को कम करने के लिये जरुरी है कि चिकित्सक व मरीज के बीच खुल कर सवाद हो, ढेर सारी बातें हो, समस्त प्रश्न पूछे जायें और तफसील से उत्तर दिये जायें। मुश्किल यह है कि डॉक्टर्स के पास समय कम होता है या उनका सोच ऐसा होता है कि उनके पास समय कम है। मेडिकल प्रेक्टिस में शार्टकट की कोई जगह नहीं होना चाहिये। &#8216;लेकिन कई बार मजबूरी में ऐसा होता है। कई बार डॉक्टर के स्वाभाव के कारण होता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुछ डॉक्टर्स को लगता है कि इतनी सारी बातचीत,&nbsp;इतने सारे सड़े-पिड़े मूर्खता भरे सवाल,&nbsp;जबरजस्ती&nbsp;मेरा टाइम बर्बाद करते हैं। समय ही पैसा हे। मुझे क्या अतिरिक्त मिलता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ऐसा सोच गलत है। चिकित्सक का काम केवल नुस्खा लिखना या ऑपरेशन करना नहीं है। मरीज को तमाम जानकारी देना और समस्त शंकाओं को दूर करके एक टीम भावना के साथ मिलजुल कर साझा निर्णय लेना उसकी भूमिका और कर्तव्य का अभिन्&#x200d;न अंग हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर्स और मरीज के रिश्तों को बिगाड़ने का काम लखनऊ के वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट जैसे लोग भी करते हैं जिन्हें अपने साथियों की बुराई करके तथा खुद को ऊंचा दिखाने में आनन्द मिलता है। वे ये नहीं सोचते कि दूसरे डॉक्टर ने किन परिस्थितियों में,&nbsp;क्या सोचबूझ कर,&nbsp;कैसे निर्णय लिया था।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>कथा </strong><strong>2</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>दीपिका</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">इस कथा को थोड़ा संक्षेप में बयां कर सकते हैं। जैसी लक्ष्मी वैसी दीपिका। वही उम्र वही, पृष्ठभूमि, वैसा ही प्रथम दौरा जो मिर्गी जैसा प्रतीत होता है। लेकिन अनेक चीजें जुदा हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दीपका अपनी बहन और पिता के साथ आई थी। जीन्स और टी शर्ट में। खुशनुमा, बिन्दास, सदा मुस्कुराती, चहचहाती हुई थी। पिछली घटना ने सब को हिला कर रख दिया था। केवल दीपिका को छोड़कर । वह मानती थी कि उसे कुछ नहीं है। घर वाले खामख्वाह चिन्ता कर रहे हैं। रात को नींद में एक बड़ा दौरा आया था। वही तीन मिनट रहा होगा। पूरा शरीर, चारों हाथ पांव में झटके, भिचें हुए दातों के बीच जीभ का कटना। अगले दिनभर सिरदर्द, बदनदर्द, थकान और चक्कर रहे थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">जन्म और बचपन के विकास की हिस्ट्री से मालूम पड़ा कि समय से पूर्व आठवें माह में पैदा हुई थी। जन्म के समय वजन कम था (2.0 किलोग्राम)। दो दिन नर्सरी में,&nbsp;ऑक्सीजन लगा कर रखा था। शारीरिक और बौद्धिक विकास के मील के पत्थर यू तो सामान्य सीमा में थे,&nbsp;परन्तु थोड़ा सा लेट। पढ़ने में तेज नहीं थी परन्तु पूरक परीक्षाओं और कृपांको के सहारे कॉलेज तक आ गई थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक चाचा और उनके बेटे (चचेरे कजिन) को मिर्गी का रोग था । एम.आर.आई. स्केन में मस्तिष्क के दायें गोलार्द्ध में एक छोटा सा दाग था जो शायद जन्म या बचपन के समय से रहा होगा- उक्त भाग में रक्&#x200d;तप्रवाह व ऑक्सीजन सप्लाय में रुकावट के कारण रहा होगा । ई.ई.जी. ग्राफ में मस्तिष्क के उसी हिस्से पर मामूली खराबी थी (धीमी तरंगें लेकिन पर मिर्गी जैसी नुकीली तरंगे नहीं)।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मैंने सोचा कि दीपिका को पुन: मिर्गी जैसे दौरे आने की आशंका अधिक है इसलिये इलाज शुरु कर देना चाहिये,&nbsp;जो कि दो-तीन वर्ष चलेगा। दीपिका की बहन और पिताजी इंटरनेट से पढ़कर आये थे कि मिर्गी की परिभाषा में दो या अधिक दौरे आना जरुरी हे तथा यह भी कि एक अकेले अटैक के बाद औषधियां शुरु नहीं करते हैं। दीपिका की भी ऐसी ही इच्छा थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमारा सामना अनेक प्रकार के परिवारों से पड़ता है। आज से कुछ दशक पूर्व तक ज्यादातर लोग चिकित्सक को माईबाप और सर्वज्ञानी मानते थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“जो भी निर्णय लेना है,&nbsp;वही लें। हमारा काम तो आपके निर्देशों का पालन करना है। क्&#x200d;या बीमारी है,&nbsp;क्या जांचे करना है,&nbsp;क्या इलाज करना है,&nbsp;यह सब आप जानों&nbsp;|&nbsp;हमें क्या पड़ी है। हमें तो बस अच्छे होना है।&#8217;</p>



<p class="wp-block-paragraph">उस जमाने में लोगों की शिक्षा का स्तर कम था। डॉक्टर मरीज का रिश्ता वन-वे-ट्रेफिक जैसा था। एक प्रदाता- दूसरा ग्रहीता। अब हालात बदले हैं और अच्छे के लिये बदले हैं। लोगों में ज्ञान की ललक बढ़ी है। खुद के स्वास्थ्य और जिंदगी से संबंधित निर्णयों में अपना पक्ष, अपनी सोच व इच्छा रखी जाने लगी है। हालांकि कुछ मरीज कभी-कभी बोर करते हैं, चिढ़वाते हैं। अधूरा ज्ञान परेशान करता है। पर ठीक है। यह हम डॉक्टर्स का काम है कि हम सब प्रकार की परिस्थितियों में श्रेष्ठ सलाहकार की भूमिकाएं निभाएं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक तरफ मुझे खुशी होती है जब मैं देखता हूँ कि मेरे लेखन व वीडियो आदि  के कारण तथा परामर्श के दौरान न पूछें जाने के बावजूद मेरे द्वारा जानकारी दिये जाने के कारण, धीरे-धीरे लोगों का स्वाभाव बदल रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दुसरी तरफ धैर्य रख हुए मरीजो अधकचरी जानकारी को ठीक करना पड़ता है, मिथ्याधारणाओं को दूर करना पड़ता है, गलत यकीनों को काटना पड़ता है। दीपिका के घरवाले कह रहे थे कि “अभी क्यों दवाई शुरु करे? क्या आपको पक्का लगता हैं यह मिर्गी ही है? आप कैसे कह सकते हैं कि अगले दौरे आ ही जायेंगे। एलोपैथीक दवाइयो के कितने साइड-इफेक्ट होते हैं। हमारे दादाजी के टाइम से हम लोग आयुर्वेदिक या होम्योपेथिक इलाज में ज्यादा भरोसा रखते हैं।“</p>



<p class="wp-block-paragraph">मैंने कहा कि “मै सिर्फ आघुनिक चिकितसा विज्ञान को जानता हूँ। मैं उसे ऐलोपैथी नहीं कहता। और मान कर चलो हर औषधी के दुश्प्रभाव हो सकते हैं। कभी कम कभी ज्यादा। यदि किसी औषधि के बारे में दावा किया जावे कि उसके कोई साइड इफेक्ट नहीं है तो जान लो कि उसके कोई इफेक्ट्स भी नही होंगे । वह शायद प्लोसीबो जैसी होगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मैने उन्हें दवाई का नुस्खा लिख कर दिया। उस औषधि की जानकारी का एक पुर्जा (पैकेज इन्सर्ट) भी दिया जिसमें तमाम साइड-इफेक्ट गिनाए गये थे- कुछ कॉमन तो कुछ दुर्लभ। इन पुर्जों से डर कर चलें तो कोई मरीज,&nbsp;कभी कोई औषधि न खाए। थोडी झिञ्क और असंशय के साथ दीपिका ने वह नुस्खा लेना स्वीकार किया और वादा किया कि बताए गये अन्तरालों पर निर्दिष्ट प्रयोगशाला जाचें करवाती रहेगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दीपिका के घर की आर्थिक हालत अच्छी न थी। पिताजी को रिटायरमेंट के बाद छोटी सी पेंशन मिलती थी। मां की बीमारी के इलाज का कर्जा उतारना था। बडी वहन स्कूल में पढ़ा कर घर चला रही थी। उसकी शादी कैसे होगी और जब होगी उसके बाद क्या होगा यह सोचकर पिताजी का दिल डूबता रहता था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मेरे द्वारा लिखी गई औषधि का मासिक खर्च रु. 3000,/- था। पिछले वर्ष एक नई औषधि मार्केट में आई थी जिसका मासिक खर्च 40,000 था। उसके बारे में कम्पनी दावा करती थी (कुछ शोध प्रबन्धों का हवाला देकर) कि साइड-इफेक्ट कम हैं। दीपिका के घरवालों के लिये 3,000 रु. भारी था। शायद वह भी कारण रहा हो इलाज से मना करने का। नयी महंगी दवा का प्रसार करने वाले मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव पर कम्पनी का दबाव था कि बिक्री बढ़ नहीं रही है। डॉक्टर्स को नाना प्रकार की भेंट दी जाती थी। इस दवाव में आकर, कभी शोध पत्रिकाओं में पढ़ करके कि नर्द दवा वास्तव में खूब अच्छी है तथा कभी-कभी मरीजों के झूठे आश्वासन पर (साहब बेस्ट इलाज करिये, पैसे की चिन्ता नहीं) डॉक्टर्स महंगी दवा लिख देते हैं। थोडे ही दिनों में मरीज चीं बोल जाते हैं। शर्म के मारे दुबारा नहीं आते। इलाज बंद हो जाता है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">फिर आचानक क्या हुआ ?</h2>



<p class="wp-block-paragraph">यही सब सोचकर और समझ कर दीपिका को पुरानी जानी पहचानी कम महंगी औषधि का नुस्खा लिखा गया था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दीपिका गोलियां लेती रहीं। उसने न जांच करवाई, न अनुगमन परामर्श (फालो-अप) के लिये आई। सब ठीक चल रहा था। गर्मी की छुट्टियों में पूरा परिवार मामाजी के घर एक सप्ताह के लिये देहरादून आया था। दो दिन मसूरी घूमने जाने का का कार्यक्रम था। प्रवास के पहले दिन से दीपिका को हल्की हरारत और बदन दर्द था| पर यात्रा के उत्साह में ध्यान न दिया। मसूरी पहुंचते की बुखार व दर्द बढ़ गये। दोपहर तक शरीर पर लाल दाने उभर आये । हिल स्टेशन के छोटे अस्पताल में जनरल प्रेक्टीशनर ने कुछ इलाज दिया व आराम करने को कहा। सब लोग साइटसीइंग पर गये थे। दीपिका अकेली कॉटेज में तपती रही। पीड़ा असहनीय हो चली। पूरे शरीर में खुजली चल रही थी। मुंह में छाले हो गये थे। पेशाब मार्ग में जोर से जलन होने लगी। मूत्र का रंग कुछ लाल सा था। खाते नहीं बन रहा था। बाथरुम तक जाने में चक्कर आ रहे थे। देर शाम अंधेरा पड़ने पर जब सब लौटे तो दीपिका सन्निपात में थी। बदन तप रहा था। शरीर पर चकते और फफोले थे। बोल अस्पष्ट था। सब घबरा गये। मसूरी के डॉक्टर ने हाथ खडे कर दिये।</p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-5-400x400.png" alt="" class="wp-image-2460" style="width:353px;height:353px" width="353" height="353" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-5-400x400.png 400w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-5-300x300.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-5.png 740w" sizes="auto, (max-width: 353px) 100vw, 353px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">ताबडतोड़ अर्जेण्ट टेक्सी किराए पर लेकर,&nbsp;नीचे उतरे,&nbsp;देहरादून के बड़े अस्पताल लाये। तीन दिन आई.सी.यू. में रखा। डॉक्टर ने बताया कि&nbsp;“स्टीवेन्स जान्सन”&nbsp;नामक गम्भीर रोग है जो कभी-कभी जानलेवा हो सकता है। प्रायः किसी औषधि की रिएक्शन के कारण होता है। खतरनाक किस्म की एलर्जी है। धीरे-धीरे हालत सुधरी। चौथे दिन पुनः मिर्गी का दौरा आ गया। पुरानी औषधि बन्द कर दी गई थी। न्यूरोलॉजिस्ट को बुलाया गया। उसने सारे पेपर्स देख छूटते ही कहा&nbsp;“यह दवाई का रिएक्शन है। आपकी बच्ची मुश्किल से बची है। कौन डॉक्टर था। केवल एक दौरे के बाद इलाज क्यों शुरु करा। प्रतीक्षा करो और देखो की नीति क्&#x200d;यों नहीं अपनाई। यह पुरानी वाली दवाई क्&#x200d;यों लिखी?&nbsp;पैसे देखता है कि मरीज का स्वास्थ्य?&nbsp;अब बेहतर दवाईयां मार्केट में आ गई हैं।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">दीपिका के घर वालों को भी अपने डॉक्टर की आलोचना में दम लग रहा था। जब आने नगर लौटे तो&nbsp;&nbsp;कर्जा बढ़ चुका था। इलाज का मासिक खर्च बढ़ गया था। पिताजी के एक घनिष्ठ वकील मित्र ने बिना फीस लिये उपभोक्&#x200d;ता फोरम में दावा ठुंकवाया। लालच था कि मोटी राशि मिलगी,&nbsp;तो कर्जा पट जावेगी। वे कोर्ट में केस हार गये। भला हो मेरी आदत का कि मैं समस्त व उपचार व परामर्श का रिकार्ड रखता हूँ जिसमें मय तारीख के लिखा था कि औषधि के साइड इफेक्ट के बारे में बताया गया है। डॉक्टर्स को मेडिकल रिकार्ड रखने में बहुत आलस आता है,&nbsp;कोफ्त होती है,&nbsp;पैसे और समय की बर्बादी लगती है। परन्तु ऐसा करना जरुरी है। मेडिको लीगल कारणों से,&nbsp;बेहतर सेवा करने की दृष्टि से और शोध के उद्देश्य से भी।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong><u>Post Script 1</u></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"><br>लक्ष्मी ने 3 वर्ष इलाज लिया। सारी जांचें दुहराई गई और सामान्य पाई गई। औषधि धीरे-धीरे कम करके,&nbsp;6 माह में बन्द करी गई। कभी भी अचानक से बन्द नहीं करते। बाद में कभी दौरा नहीं आया। शादी हुई।&nbsp;नौकरी करी। बच्चे हुएं सब ठीक रहा।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong><u>Post Script 2</u></strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">दीपिका के घर वाले महंगा इलाज जारी न रख पाये। डॉक्टर्स बदलते रहे। दवाइयां बदलते रहे। दौरे आते&nbsp;रहे। पांच वर्ष बाद सकुचाते हुए,&nbsp;माफी मांगते हुए मेरे पास पुनः आये। मैंने उन्हें एम्स,&nbsp;दिल्ली रेफर किया,&nbsp;जहां कम खर्च में शल्य उपचार हुआ। औषधि की खुराक कम करते-करते छुड़वा दी गई। दीपिका का भी&nbsp;विवाह हुआँ और सानन्द रही।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लक्ष्मी को केवल एक दौरा आया था। सब जांचों की रिपोर्ट अच्छी थी। उसे मिर्गी नहीं थी। शादी की&nbsp;&nbsp;बातचीत&nbsp;चलाते समय घर वालों ने उस एक हादसे के बारे में कुछ न बता कर,&nbsp;गलत नहीं किया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दीपिका को बहुत सारे दौरे आते रहे थे|&nbsp;लम्बा इलाज़ चला था&nbsp;|&nbsp;बहुत लोगो को पता चल चुका था। इस सच्चाई को छुपाना संभव नही था।<br>लेकिन लक्ष्मी और दीपिका के अलावा भी मिर्गी के बहुत सारे रोगी होते है जिनके लिये यह निर्णय आसान नही होता।</p>
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		<title>नकलची हाथ</title>
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		<dc:creator><![CDATA[न्यूरो ज्ञान]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 Sep 2023 05:58:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मरीज़ कथाएँ]]></category>
		<category><![CDATA[Clinical Tales]]></category>
		<category><![CDATA[clinical tales in hindi]]></category>
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		<category><![CDATA[नकलची हाथ]]></category>
		<category><![CDATA[मरीज़ कहानियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[मरीज़ कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[मरीजों के अनुभव]]></category>
		<category><![CDATA[मरीजों पर आधारित कहानियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[रोचक मरीज कहानियाँ]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मोहम्मद सादिक का स्कूटर चलाते समय एक्सीडेन्ट हो गया था। सिर के बल गिरा था। मामूली&#160;चोंट आई थी। तब से हल्का सिरदर्द और चक्कर बने रहते थे। लगभग एक हफ्ते पहले की बात थी। दुर्घटना के मरीजों की हिस्ट्री लेते समय महत्वपूर्ण होता है यह पूछना और जानना कि कैसे हुआ?&#160;क्यों हुआ?&#160;क्‍या परिस्थितियाँ थीं?&#160;वकील डॉक्टर,&#160;जासूस [&#8230;]</p>
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<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="954" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-5-954x400.png" alt="" class="wp-image-2449" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-5-954x400.png 954w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-5-300x126.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-5-768x322.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-5.png 1200w" sizes="auto, (max-width: 954px) 100vw, 954px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">मोहम्मद सादिक का स्कूटर चलाते समय एक्सीडेन्ट हो गया था। सिर के बल गिरा था। मामूली&nbsp;चोंट आई थी। तब से हल्का सिरदर्द और चक्कर बने रहते थे। लगभग एक हफ्ते पहले की बात थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दुर्घटना के मरीजों की हिस्ट्री लेते समय महत्वपूर्ण होता है यह पूछना और जानना कि कैसे हुआ?&nbsp;क्यों हुआ?&nbsp;क्&#x200d;या परिस्थितियाँ थीं?&nbsp;वकील डॉक्टर,&nbsp;जासूस और कहानी लेखक के काम में अनेक&nbsp;समानताएँ होती हैं। कोई टक्कर नहीं हुई। स्पीड कम थी। सड़क पर गढडा या टिबड्डा नहीं था। कोई कुत्ता सामने नहीं आ गया था। नशा नहीं किया था।<br>सादिक ने कहा मैंने बायें हाथ से क्लच जोर से दबाया तो अपने आप दायें हाथ से ब्रेक भी कस कर दब गया। गाड़ी धड़ाम से रुकी,&nbsp;मैंने संतुलन खोया और गिर पड़ा। मेरे कान अगर खरगोश के होते तो सचमुच तन खड़े हो गए होते। एक हाथ से क्लच दबाया तो दूसरे से ऑटोमेटिक ब्रेक लग गया?&nbsp;&nbsp;मिरर मूवमेन्ट। नकलची हरकत!</p>



<p class="wp-block-paragraph">न्यूरोलोजी की किताबों और शोधपत्रों में मैंने मिरर मूवमेन्ट (दर्पण गति) के बारे में पढ़ा था परन्तु ऐसी कहानी मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी। सादिक ने बताया कि बचपन से उसने देखा है कि जब भी वह एक हाथ से कोई काम करता है तो दूसरे हाथ में वैसी ही हरकत होती है। सीधे हाथ की नकल उल्टा हाथ करेगा। बायें हाथ की गति का दर्पण-बिम्ब दायें हाथ द्वारा बनेगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मैंने पूछा “तुम्हें इससे कोई दिक्कत नहीं होती”?<br>सादिक ने कहा “कोई खास नहीं। कामकाज तो सब हो जाते हैं।&#8217;<br>“स्कूटर चलाते समय ऐसा पहले कभी हुआ?”<br>“अभी नया नया चलाना सीखा है। पहले ऐसा कभी नहीं हुआ।“<br>&#8220;तुम्हारे अलावा किसी और को पता है?”<br>“हाँ, मेरे घर वालों को और दोस्तों को मालूम है। वे हँसते हैं, मजे से देखते है।”<br>“किसी डॉक्टर को नहीं दिखाया?<br>“कभी जरुरत ही नहीं समझी।”<br></p>



<h2 class="wp-block-heading">जाने क्&#x200d;या तूने कही, जाने क्या मैंने सुनी</h2>



<p class="wp-block-paragraph">यह संवाद मेरे साथ रेसीडेन्ट्स भी ओ.पी.डी. में सुन रहे थे। मैंने सादिक को दोनों हाथ सामने सीधे लम्बे रखने को कहा। फिर एक हाथ की मुट्ठी खोलने-बन्द करने को कहा। दूसरे हाथ में भी वैसी हरकत स्वतः, उसी चाल से होने लगी, जो कि उसकी तीव्रता कम थी।<br>विपरीत दिशा में भी वैसा ही हुआ। एक कागज कलम देकर सादिक को कुछ लिखने को कहा गया। दूसरे हाथ की अँगुलियों में भी हूबहू वही गतियां होने लगी जो लिखते समय होती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">छात्रों के सामने एक टीचर क्&#x200d;या माँगे?</p>



<p class="wp-block-paragraph">कोई अनूठा ज्ञानवर्धक प्रसंग- जो मुझे अनायास मिल गया। चालीस वर्ष की न्यूरोलॉजी प्रेक्टिस में मैने यह पहली बार डायग्नोसिस किया था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ऐसा करना सदैव सम्भव नहीं होता। आपकी बुद्धि और स्मृति में&nbsp;&#8216;मिरर मूवमेन्ट&#8217;&nbsp;के बारे में जानकारी भरी होना चाहिए। समय रहते याद आ जाना चाहिए। कहावत है कि आपके कान वही सुनते हैं जो दिमाग जानता है (या व्यंग्यकार के शब्दों में जो दिमाग सुनना चाहता है)</p>



<p class="wp-block-paragraph">‘जाने क्&#x200d;या तूने कही, जाने क्या मैंने सुनी, बात कुछ बन ही गई ।’&nbsp;लेकिन सदैव बात बनना इतना आसान नहीं होता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">रेसीडेन्ट डॉक्टर्स को काम मिल गया था। इन्टरनेट-गूगल के जमाने में ढेर सारा पढ़ डाला। सादिक के हाथों की गति के अनेक वीडियो रिकार्ड कर लिए। सादिक के मन में कौतूहल था “मेरे अन्दर ऐसा क्&#x200d;या खास है जो डॉक्टर साहेबान इतनी खोज खबर कर रहे हैं। वरना हम गरीबों की कहाँ पूछ-परख होती है।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="956" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-6-956x400.png" alt="" class="wp-image-2450" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-6-956x400.png 956w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-6-300x126.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-6-768x321.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-6.png 1200w" sizes="auto, (max-width: 956px) 100vw, 956px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">हमारा मस्तिष्क पूरे शरीर की गतियों को संचालित करता है। जैसा आस्तिक लोग मानते हैं कि ईश्वर की इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता,&nbsp;वैसे ही मस्तिष्क के माध्यम से हम फुटबाल पर जोर से किक मारते हैं या एक अँगुली से हल्का सा इशारा करते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमारा शरीर दो समरूप आधे-आधे भागों में बंटा होता है, दायां और बायां, लेफ्ट और राइट । अधिकांश भाग डबल होते हैं। दो-दो आँख,&nbsp;कान,&nbsp;हाथ,&nbsp;पाँव।&nbsp;दिमाग की अंदरूनी रचना में भी एक जोड़ा होता है। दो गोलार्ध्द- दायां और बायां।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मजेदार बात यह है कि दायां गोलार्ध्द (हेमीस्फीयर) शरीर के बायें भाग की गतियों को संचालित करता है। तथा बायां गोलार्ध्द दाहिने साइड के हाथ पैरों को।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुछ करने की, कुछ हिलाने की इच्छा या निर्णय (फ्री विल) सेरीब्रल गोलार्ध्द के मोटर कार्टक्स (प्रेरक क्षेत्र) में पैदा होती है| अभी हम नहीं जानते कि इसे&nbsp;‘इच्छा’&nbsp;या हमारी&nbsp;‘चेतना’&nbsp;के अधीन माने|<br>हमारी चेतना”&nbsp;जिसके बारे में हम सोचते हैं कि हम उसके मालिक हैं। कौन जाने हम महज पुतले या पपेट हैं,&nbsp;जिनको कोई अदृश्य डोर द्वारा एक अबूझ प्रणाली द्वारा संचालित करती है। खैर इस विषय पर किसी अन्य लेख में&nbsp;|</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह अजीब बात है कि दिमाग के दो अर्ध्द-गोलों के दूसरे अर्धांगों को कण्ट्रोल करने का जिम्मा दिया गया है | प्राणियों के नर्वस सिस्टम के डार्विनियन विकास की गाथा में इस व्यवस्था के बीज पड़ने और पुख्ता होने का ब्यौरा मिलता है।&nbsp;दिमाग के कण्ट्रोल एरिया से जो वायरिंग नीचे की दिशा में निकलती है,&nbsp;वह कुछ दूरी तक अपनी ही लेन में रहती है| फिर अचानक नोटिस बोर्ड आता है की पथ बदलना है क्योंकि तुम्हे शरीर के विपरीत भाग को चलायमान रखने का जिम्मा दिया गया है|</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस वायरिंग के तारो को एक्सान तंतु कहते है| कण्ट्रोल एरिया अर्थात मोटर कोर्टेक्स से निकलने वाले सन्देश विद्युत् तरंगो के रूप में होते हैं| दोनों ओर का क्रोसिंग आपस में नहीं टकराता मानो फ्लाय ओवर बना हो|</p>



<p class="wp-block-paragraph">दिमाग की एम.आर.आई. जाँच&nbsp;30&nbsp;वर्षों से ऊपर । पिछले पाँच वर्षो में एम.आर.आई. जाँच में एक नया साफ्टवेयर विकसित हुआ है जिसके नीचे रीढ़ की हड्डी के अन्दर स्थित मेरुतंत्रिका&nbsp;(स्पाइनल कार्ड) तक,&nbsp;आने और जाने वाले तंतु बण्डलों के रंगीन चित्र प्राप्त किए जा सकते हैं। ब्रेन ट्यूमर के न्यूरोसर्जरी उपचार में तथा अन्य अनेक शोध प्रकल्पों में एम.आर.आई. की इस नवीन विधि,&nbsp;डी.टी.आई. ट्रेक्टाग्राफी का उपयोग होने लगा है।<br><br>इन्दौर नगर में शायद पहली बार इसको काम में लिया गया। मोहम्मद सादिक को एक छोटी सकरी सुरंगनुमा एम.आर.आई. मशीन में लेटा दिया गया।&nbsp;45&nbsp;मिनिट तक धड़-धड़ करने वाली आवाजो के अनेक क्रम के बाद, जाँच पूरी हुई। कन्द्रोल या तुलना के रूप में एक अन्य/व्यक्ति का एम.आर,आई. भी इस विधि से करा गया जिसे मिरर मूवमेन्ट नहीं थे। इस स्वस्थ व्यक्ति के ब्रेन के मेड्यूला नामक भाग में स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि ऊपर से नीचे की ओर,&nbsp;स्पाइनल कार्ड को जाने वाले तन्तुओं के दोनों तरफ के बण्डल क्रासिंग करके विपरीत दिशा में जा रहे हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मोहम्मद सादिक के एम.आर.आई. के चित्र में साफ नजर आ रहा था कि यह लेन-परिवर्तन नहीं हो रहा है। दोनों ओर के बण्डल में मौजूद अधिकांश तंतु बिना मार्ग बदले,&nbsp;अपनी ही दिशा में नीचे की ओर उतरते जा रहे थे। बहुत&nbsp;&nbsp;थोडा-सा क्रासिंग हो रहा था |<br>सोचने की बात है &#8211; दाहिने हाथ की अँगुलियों को चलाने वाला जो आदेश दिमाग के बायें गोलार्द्ध से निकलता है वह न केवल दायें हाथ को बल्कि बायें हाथ को भी चलाने लगता है। आदेश की एक प्रति के बजाय दो प्रतियाँ डिस्पेच हो कर दो जगह पहुँच जाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भ्रम की स्थिति बनती है पर ज्यादा नहीं। मोहम्मद सादिक जैसी दुर्घटना का वाकिया पहले पढ़ने में नहीं आया। आमतौर पर ये दर्पण गतियाँ छोटे आकार की होती है। नकल का आभास होता है। हूबहू कॉपी नहीं होती। हाथों के अलावा अन्य भागों में ये मूवमेन्ट और भी बिरले ही देखे जाते हैं। क्या यह सम्भव है कि एक आँख मारने की कोशिश की तो दूसरी भी बन्द हो गई। शायद नहीं। या मुँह एक दिशा में बिचकाया तो दोनों तरफ से ओंठ खिचकर बत्तीसी दिख गई। या एक पाँव से थप-थप किया तो दूसरा भी करने लगा। मोहम्मद सादिक के साथ ऐसा कुछ नहीं था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यदि हम जानबूझ कर दोनों हाथों या पैरों की एक जैसी गतियाँ करना चाहें तो कुछ थोड़ी-सी सामान्य किस्म की कर सकते हैं जैसे ताली बजाना,&nbsp;मुट्ठी बनाना। अभ्यास के बाद नर्तक या अभिनेता अनेक जटिल किस्म की एक जैसी गतियां एक साथ दोनों हाथ से कर पाते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमारे जमाने में एनाटॉमी के एक प्रोफेसर ब्लेकबोर्ड पर चाक से दोनों हाथों से समरूपी (सिमिद्रीकल) चित्र बनाते थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उपरोक्त सभी उदाहरणों में दोनों गोलार्ध्दों को दीर्घ अभ्यास के साथ हुनर हासिल करना पड़ता है। अपने आप नहीं होता। इसके विपरीत किसी नृत्य या अभिनय में यदि दोनों हाथों की अँगुलियों से बिल्कुल अलग प्रकार की जटिल गतियाँ करना हों तो कभी दोनों हाथ एक जैसा करने लगते हैं। उसे रोकने के लिये भी अभ्यास चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">DCC नामक जीन द्वारा एक विशेष प्रोटीन की रचना निर्देशित की जाती है जो न्यूरॉन कोशिकाओं से निकलकर लम्बाई में बढ़ने वाले और नियत दिशाओं में जाने वाले एक्सान तंतुओं के लिए गाइडेन्स प्रणाली का काम करता है। मस्तिष्क के दोनों फ्रोन्टल खण्डों (दायां व बायां) में स्थित मोटर कॉर्टेक्स से&nbsp;“पिरामिडल ट्रेक्ट” (तन्तुओं के बण्डल) निकलता है और गर्भावस्&#x200d;था के दौरान तथा जन्म के बाद के आरम्भिक महीनों और वर्षों में विकसित होता है। शुरू में ये तार नंगे होते हैं,&nbsp;उन पर कोई आवरण नहीं होता। धीरे-धीरे माईलिन नाम के प्रोटीन व वसायुकत पदार्थ. की सर्पिलाकार परत चढ़ने लगती है। विद्युत विज्ञान की भाषा में हम इसे तारों का इंसुलेशन कहते हैं। इंसुलेशन का मतलब है बिजली के लिये असंचालक (नॉन-कन्डटिंग) पदार्थ द्वारा (2)&nbsp;इंन्सुलेटेड तारों में विद्युत का प्रवाह तीव्र गति से और ज्यादा सुचारु |</p>
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		<title>चेहरा ये खो जायेगा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[न्यूरो ज्ञान]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 Sep 2023 11:13:32 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[रोचक मरीज कहानियाँ]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>जाने पहचाने अजनबी डॉक्टर्स की मीटिंग में सैंकड़ों लोगों से मिलना हो रहा है । “नमस्ते सर ! आप कैसे हैं” एक युवक ने मुझसे पूछा । “बहुत अच्छा, तुम कैसे हो?” “फाइन सर” मेरे चेहरे का भाव उसने पढ़ा । “सर, आपने पहचाना नहीं मुझे ?” “हाँ..हाँ..पहचान तो रहा हूँ&#8230;” इतने में तीसरे ने [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<h2 class="wp-block-heading">जाने पहचाने अजनबी</h2>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="960" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-4-960x400.png" alt="" class="wp-image-2443" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-4-960x400.png 960w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-4-300x125.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-4-768x320.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-4.png 1200w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर्स की मीटिंग में सैंकड़ों लोगों से मिलना हो रहा है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“नमस्ते सर ! आप कैसे हैं” एक युवक ने मुझसे पूछा ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“बहुत अच्छा, तुम कैसे हो?”</p>



<p class="wp-block-paragraph">“फाइन सर”</p>



<p class="wp-block-paragraph">मेरे चेहरे का भाव उसने पढ़ा ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“सर, आपने पहचाना नहीं मुझे ?”</p>



<p class="wp-block-paragraph">“हाँ..हाँ..पहचान तो रहा हूँ&#8230;”</p>



<p class="wp-block-paragraph">इतने में तीसरे ने आकर उस युवक को कहा “अरे! उस लीवर वाले केस का क्या हुआ जिसे कल तुमने अपोलो में ऑपरेट किया था ?” मेरी जान में जान आई । यह डॉ. मंजुल भागवत हैं, पेट रोग विशेषज्ञ ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“अरे मंजुल! मैं तुम्हें क्यों न जानूँगा? तुम्हारे बेटे ने कौन-सा आई.आई.टी चुना, कानपुर या जादवपुरा ? वह तो एस्ट्रोफिजिक्स में जाना चाहता था न ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">“वाह सर! क्या याददाश्त है आपकी ।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">70 के दशक में रेसीडेन्सी के दिनों में बनारस, एक कांफ्रेंस में गया था। मेरे काका के यहाँ रुका था । उन दिनों होटल की क्षमता और रिवाज नहीं था । शाम को काका उनके एक मित्र के यहाँ भोजन पर ले गए । खूब बातें हुईं । उन मित्र का जूतों का बड़ा शो रूम था। उन्होंने एक महँगा जोड़ा मुझे भेंट किया। दो दिन बाद काका मुझे रेलवे स्टेशन पर छोड़ने आए। उन दिनों हवाई यात्रा कल्पना से परे होती थी और रिश्तेदार स्टेशन पर लेने और छोड़ने आते थे। तभी एक दम्पत्ति ने प्लेटफार्म पर, काका से नमस्ते की और मुझसे बातें करने लगे। कैसी रही मीटिंग, बनारस में और कहाँ घूमे, अगली बार आए तो फिर मिलिएगा। मेरा चेहरा भाव शून्य था। काका भाँप गए| वे मेरी कमजोरी मेरे बचपन से जानते थे। उन्होंने पूछा –“क्यों बच्चू | तुम्हें नए जूते पाँव में ठीक से फिट हुए या नहीं ?”मेरी ट्यूबलाईट जल गई। मैंने कहा –“धन्यवाद श्रीवास्तव अंकल!जूते एकदम आरामदायक और फिट हैं । आंटी के हाथों का अखरोट का हलवा, कमल ककड़ी की सब्जी, पंचभेल का दाल और बनारस का मटर चिवड़ा &#8211; सारी चीजों का स्वाद नायाब था। और आपके चाईना वाले आर्डर का क्या हुआ ?”</p>



<p class="wp-block-paragraph">श्रीवास्तव दंपति गदगद थे । बच्चे ने कितनी सारी बातों पर ध्यान रखा ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">रोटरी अंतर्राष्ट्रीय के सम्मेलन में मेलबोर्न गया था। हमारे समूह की मीटिंग शुरू हुई। लगभग 25 लोग होंगे। रोटरी द्वारा भारत में स्वास्थ्य सम्बन्धी प्रकल्पों पर निगरानी रखना मेरी जिम्मेदारी थी। एक दूसरे से बार-बार परिचय हुआ, बातें हुई, बहसें हुई, निष्कर्ष निकले । मैंने सोचा था कि मेरा संकोची, एकाकी, आत्मरत्‌ स्वभाव बदल कर खूब लोगों से सम्बन्ध बनाउँगा, नेटवर्किंग से बड़ा फायदा होता है। कुछ देर बाद सहम कर धीमा होना पड़ा। तीन लोगों ने कहा &#8211; हाँ, हाँ हम आपको जानते हैं, अभी थोड़ी देर पहली ही आपने अपना परिचय दिया था और विजिटिंग कार्ड भी दिया था। मैं बार-बार उन्हीं उन्हीं लोगों को पुनः पुन: इंट्रड्यूस करता था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मेरी क्लिनिक में भीड़ के कारण और मरीजो को विस्तार से देखने की मेरी धीमी गति के कारण, प्रतीक्षा की अवधि प्राय: लम्बी हो जाती है| दो घंटा &#8211; तीन घंटा| कभी कभी बीच-बीच में , बाहर एम्बूलेंस या कार में किसी मरीज को देखने जाना पड़ता है, जिसे अन्दर नहीं लाया जा सकता। पूरा वेटिंग हॉल पार करता हूँ। अनेक मरीज व घरवाले खड़े हो जाते हैं। नमस्ते करते हैं। कुछ आदरस्वरूप। अनेक इस आशा में कि मै उन्हें पहचान कर वी. आई.पी. का दर्जा दूँगा और जल्दी अन्दर बुला लूँगा। वे निराश होते हैं। मै नज़रें नहीं मिलाता। मेरी नज़रें लोगों के चेहरों पर से फिसल कर इधर-उधर भटकती हैं। यूँ मेरी आंखों की दृष्टि, चश्मे के साथ अच्छी है, परन्तु चेहरा-मोहरा मेरे दिमाग में पहुँचता नहीं, रजिस्टर नहीं होता, वहाँ के स्टोर में रखे हुए फोटो एल्बम से मेचिंग का काम नहीं होता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मै बगले झाँकता हूँ| खींसे निपोरता हूँ। पतली गली से निकल भागने की जुगत लगाता हूँ। हाँ.. हाँ&#8230; हूँ.. हूँ.. ठीक है, फिर मिलेंगे जैसी खाली-पीली बातें करते हुए, दिमाग पर खूब जोर देता हूँ &#8211; कौन है ? कौन है? काश कोई थोड़ी-सी हिंट मिल जाए, कभी अंदाज़ से कोई नाम उछाल देता हूँ जो अक्सर गलत निकलता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उस एम्बुलेंस में मरीज़ को देखने के बाद मेरे कक्ष में तीन पेशेंट देख चुका था | आधा घंटा गुजर गया था | एक व्यक्ति ने दरवाजा धकेल कर मुझे टोकने की धृष्टता की| “सर माँ बहुत बीमार है, उनसे बैठते नहीं बन रहा | आपने समय दिया था आज दो बजे का| दो घंटे हो चुके है|” मैंने कहा “ आई.एम.सॉरी.,प्लीज़ थोड़ी प्रतीक्षा और कर लीजिये। मैं सबको नम्बर से ही देखता हूँ। शायद अब जल्दी ही आ जाएगा। ”मैं सदैव ऐसे ही उत्तर देता हूँ। मेरे मित्र मुझे समझाते हैं, अपूर्व इतने सिद्धांतवादी बनने की जरूरत नहीं है। थोड़ा बहुत आगे पीछे करना पड़ता है। </p>



<p class="wp-block-paragraph">२-3 मिनिट बाद, मरीज की हिस्ट्री सुनते-सुनते, मेरा मन विचलित होने लगा। धीमी गति के समाचार बुलेटिन के समान चेहरों की स्मृति के मेरे कोश से कुछ जानकारी उभर कर ऊपर आने लगी । अरे, यह तो रतलाम का कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर आशीष मल्होत्रा है, पत्नी नीरजा का बेच मेट, हमारा घनिष्ठ पारिवारिक मित्र, मैंने ही समय दिया था उसकी माताजी के लिए। मैं आत्मग्लानि और शर्म में डूब गया। तुरन्त बाहर निकलकर आशीष से माफी माँगी। अब बहाना क्या बनाऊं। तुरन्त नीरजा को अंदर सूचना दी। वह आशीष व माताजी को ड्राईंग रूम में ले गई। चाय पानी दिया। मैंने जल्दी ही अन्दर पहुँचकर परीक्षण व परामर्श किया। ऐसा डेमेज कन्ट्रोल न जाने कितनी बार करना पड़ता है।<br>न्यूरोलॉजी पढ़ते-पढ़ते मुझे लग आ गया था मुझे प्रोसेपोग्रोसिया के लक्षण हैं। प्रोसेपो अर्थात्‌ चेहरा। एग्रोसिया अर्थात न जानना | फेस ब्लाइण्डनेस | लगभग 2% लोगों में शुरू से होता है। किसी में कम किसी में ज्यादा । मस्तिष्क के दोनों गोलार्ध्दों की निचली पेंदी वे भाग में टेम्पोरल और आस्सीपिटल खण्ड के मिलन स्थल पर एक उभार होता है जिसे फ्यूजीफार्म गायरस कहते हैं | इस रचना के जन्मजात विकास में या फिर बाद की उम्र में अनेक प्रकार के रोगों में यदि यहां पेथालॉजी हो तो, बाकी सब काम तेज तर्राट होते हुए भी चेहरा देखना, याद रखना, मिलान करना, तुलना करना, पहचानना, नाम के साथ उसेजोड़ना आदि काम गड़बड़ा जाते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मुखान्धता यदि किसी परवर्ती बीमारी के कारण हुई तो ठीक होने की आंशिक सम्भावना रहती है &#8211; जैसे कि ब्रेंन अटैक (पक्षाघात), सिर की चोटें, मस्तिष्क ज्वर आदि। अपवाद है दिमाग की क्षयकारी, गलनकारी (डीजनरेटिव) बीमारियों क्षण धीरे-धीरे बिगड़ते जाते हैं।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="960" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-5-960x400.png" alt="" class="wp-image-2441" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-5-960x400.png 960w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-5-300x125.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-5-768x320.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-5.png 1200w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">मेरे प्रिय प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट लेखक डॉ. आलीवर सेक्स को भी स्वयं यह अवस्था थी और मरीज कथाओं की उनकी पहली लोकप्रिय पुस्तक का शीर्षक जिन मिस्टर पी की कहानी पर आधारित है &#8211; द मेन हू मिस्टुक हिस वाईफ फॉर हेट &#8211; (आदमी जो अपनी पत्नी को गलती से टोप समझ बैठा), उन मिस्टर पी को एल्ज़ीमर डिमेन्शिया के एक असामान्य स्वरूप के कारण प्रोसेपोम्रोसिया की अत्यन्त गम्भीर अवस्था पैदा हो गई थी मेरे मामले में यह समस्या मद्धिम दर्जे की है। मैं अभी सैंकड़ों चेहरों को आसानी से पहचान लेता हूँ। कौन सा भूल जाऊंगा कौन सा याद आ जायेगा इसे जानने की कोई तरकीब नहीं है। एक बार मेरे मन में स्थानीय मेडिकल असोसिएशन के अध्यक्ष का चुनाव लड़ने की इच्छा जाग्रत हो गई थी। मेरे दो घनिष्ठ मित्रों ने बैठा दिया । बोले तुझे चेहरे तो याद रहते नहीं, केनवार्सिग कैसे करेगा ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमारे जैसे लोगों को अनेक प्रकार की तरकीबें आजमाना पड़ती हैं। किसी तरह से सामने वाले को बातों में उलझाओ, उसके चेहरे को गौर से देखते रहो, यदि वह खुद का नाम पूछे तो बातचीत में घुमा दो, यदि आपकी पत्नी या कोई मित्र साथ में हो तो गुमनाम व्यक्ति का परिचय अपनी पत्नी से करवाओ, इस उम्मीद में कि वह खुद अपना परिचय देने लग जाए| &#8216;कुछ लोग अपनी खास आवाज से पहचाने जा सकते हैं, या फिर उनकी प्रिय विशिष्ट वेष भूषा, मूंछे, आभूषण केश विन्यास आदि।</p>



<p class="wp-block-paragraph">जिन लोगों को भूल गए और जिनसे पुन: मिलने पर भूलने का डर हो उनका छोटा एलबम अपने मोबाईल में रखो और दुहराओ, चेहरे की किसी खासियत (तिल, दाग आदि) का उस व्यक्ति के नाम से जोड़कर यादगिरी का कोई फार्मूला बनाओ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ये समस्त उपाय एक सीमा तक ही काम आते हैं। कभी-कभी तो सोचता हूँ कि अपनी शर्ट या कोट पर एक बिल्ला (बेज) चिपकाकर चला करूँ जिस पर लिखा हो- मुझे प्रोसेपोम्रोसिया (मुखान्धता) है, बाकी सब ठीक हूँ। हमारे बारे में लोग क्या-क्या नहीं सोचते &#8211; डॉक्टर साहब खोए-खोए से रहते हैं | मेरी तरफ देखते ही नहीं | नज़रें चुरा लेते हैं | घमण्डी हैं | अपनी धुन में रहते हैं | भुलक्कड़ हैं | दिमाग जा रहा है | सठिया गये हैं।<br>जन्मजात पी. पी. में एम. आर. आई. में मस्तिष्क का फ्युजिफार्म गायरस हिस्सा थोड़ा अधिक मोटा पाया जाता है। यदि एल्जीमर्स जैसेडिमेन्शिया (बुद्धिक्षय) रोग में पी.पी. हो रहा हो तो वही उभार पतला पाया जाता है। मोटा होना तो अच्छा होना चाहिए न ? लेकिन वह भी पेथालाजिकल है। गर्भ में तथा जन्म के बाद के कुछ वर्षों में मस्तिष्क में कार्टेक्स (प्रांत्स्था – भूरा पदार्थ ग्रे मैटर) के अनेक हिस्से मोटेपन से पतलेपन की दिशा में अग्रसर होते हैं। वहाँ स्थित लाखों न्यूरॉन कोशिकाओं की छँटाई जरूरी होती है। मानों किकोई माली गुलाब के पौधों की प्रूनिंग कर रहा हो । विकासात्मक (डेब्हलपमेंटल) पी.पी. में यह छँटाई का काम अटक जाता है । फंक्शनल न्यूरोइमेजिंग, (जिसमें मस्तिष्क की रचना के बजाय उसके चप्पे की फिजियोलॉजी के सक्रिय चित्र प्राप्त किए जाते हैं,) से ज्ञात हुआ है कि चेहरों को पहचानने के परीक्षण के दौरान उनके दिमाग की कार्यविधि, सामान्य लोगों की तुलना में अलग प्रकार से चलती हैं।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="960" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-3-960x400.png" alt="" class="wp-image-2442" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-3-960x400.png 960w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-3-300x125.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-3-768x320.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-3.png 1200w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">जन्मजात मुखान्धता में आनुवंशिकी (जिनेटिंक्स) का भी उमर है। क्लीनिकल डायग्रोसिस तथा पी.पी. की तीव्रता मापने के लिए न्यूरोसायकोलॉजिस्टस्‌ द्वारा अनेक परीक्षण विधियाँ की गई हैं &#8211; फेमस फेसेस टेस्ट, प्रसिद्ध और जान पहचाने चित्रों का एलबम जिसमें फोटोशॉप द्वार चेहरा ऐसे क्रॉप कर दिया जाता है कि बाल, कान, गला आदि कट जाए और एक अण्डाकार खिड़की से केवल मध्यभाग दिखे | मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं और जिन्दा रहने के लिए डार्विनियन विकास यात्रा में जरूर वही जिनेटिक वेरियेशन सफल रहा होगा जिसने चेहरे पहचानने की क्षमता को बढ़ाया होगा। हमारा फेस हमारी व्यक्तिगत पहचान होता है वरना फेस-लेस इन्सान का क्या काम?<br>हयवदन की कथा में दो युवकों के सिर कट कर धड़ से अलग हो गए हैं । विलाप कराती हुई नायिका शिवजी से कहती है “आपने वर तो दे दिया कि दोनों को जोड़ने से वे पुनर्जीवित हो जाएँगे, हड़बड़ी में मैंने उल्टा-पुल्टा जोड़ दिया अब मेरे पति को कैसे जानूँ”| स्पष्ट उत्तर था –“धड़ को मत देखो चेहरा देखो।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">पी.पी. के तीव्रतम स्वरूप में ऐसे भी लोग होते हैं जो काँच में आपना खुद का चेहरा भी पहचान नहीं पाते | एक व्यक्ति रेस्तोरेंट में बैठा आश्चर्य कर रहा था कि पास की टेबलवाला कस्टमर लगातार उसकी नकल क्यों उतार रहा है। जैसी गतियाँ वह स्वयं कर रहा है हूबहू वही क्यों कर रहा है। पत्नी ने समझाया कोई दूसरा व्यक्ति नहीं है, काँच में आप की छाया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पी.पी. की विपरीत दिशा में कुछ लोगों में चेहरा पहचानने की योग्यता आम औसत से अनेक दर्ज बेहतर होती है। दूर से, हल्की-सीक्षणिक झलक पाकर, साईड पोज़ में, अनेक दशकों के अन्तराल के बाद, अत्यन्त छोटी -सी मुलाकात कभी हुई तो भी, मेरी पत्नी नीरजा उन्हें पहचानती हैं जोकि उसकी नामों की स्मृति अच्छी नहीं है और मेरी अच्छी है। कितना शुभंकर है कि हमें सदैव साथ-साथ रहने का एक और कारण मिला हुआ है।</p>
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		<title>माँ यह हंसने का समय नहीं है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[न्यूरो ज्ञान]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 Sep 2023 09:51:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मरीज़ कथाएँ]]></category>
		<category><![CDATA[clinical-tales]]></category>
		<category><![CDATA[maa ye hasne ka samay nhi hai]]></category>
		<category><![CDATA[मरीज़ कहानियाँ]]></category>
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		<category><![CDATA[मरीजों के अनुभव]]></category>
		<category><![CDATA[मरीजों पर आधारित कहानियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[माँ यह हंसने का समय नहीं है]]></category>
		<category><![CDATA[रोचक मरीज कहानियाँ]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>“है भगवान, मैंने पहले ही कहा था, वही हुआ, माँ को नहीं लाना चाहिए था, वो हंस रही है, मैं उनका हाथ दबाकर, कान में फुसफुसाकर कहे जा रही हू, माँ यह हँसने का समय नहीं है, उसे रोको” लेकिन माँ की हंसी&#160;&#8216;कुछ&#160;क्षण रुक कर बार बार आने लगी। बहु सुनीता ने गायत्री देवी का [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="960" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-3-960x400.png" alt="" class="wp-image-2435" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-3-960x400.png 960w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-3-300x125.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-3-768x320.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Featured-Image-3.png 1200w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“है भगवान, मैंने पहले ही कहा था, वही हुआ, माँ को नहीं लाना चाहिए था, वो हंस रही है, मैं उनका हाथ दबाकर, कान में फुसफुसाकर कहे जा रही हू, माँ यह हँसने का समय नहीं है, उसे रोको”</em></p>



<p class="wp-block-paragraph">लेकिन माँ की हंसी&nbsp;&#8216;कुछ&nbsp;क्षण रुक कर बार बार आने लगी। बहु सुनीता ने गायत्री देवी का हाथ पकड़ कर खींच कर उन्हें खड़ा कर दिया और सब लोगों से बोली कि मैं इन्हें बाथरूम ले जा रही हूँ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बाथरूम से लगे बेडरूम में उन्हें लेटा दिया और कहा माँ अभी कुछ देर यहीं रहना। बाहर आकर सुनीता शोक सभा में फिर बैठी और धीरे-धीरे आसपास की महिलाओं को बताया कि मेरी सास ऐसा क्&#x200d;यों कर रही है और मैं उनकी तरफ से माफी मांगती हूँ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">गायत्री देवी की जिद थीं कि बहु सुनीता के दादाजी स्वर्ग सिधर गये हैं तो ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं बैठने न जाऊं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वे क्&#x200d;यों हंस रही थीं ? मूर्ख नहीं थीं। पागल नहीं थीं। दार्शनिक नहीं थीं जो कहना चाह रही हो कि मृत्यु तो मुक्ति का मार्ग है जिस पर आनंदित होना चाहिये। पिछले पांच वर्षों से उन्हें लकवा पक्षाघात के तीन अटैक आये थे। एक बार दायीं तरफ, दूसरी बार बायीं तरफ और तीसरा अभी छः: महीने पहले जिसमें आवाज तुतला गई थीं, चाल असन्तुलित हो गयी थीं और थोड़ा भूलने लगी थीं। शुरू के दो ब्रेन अटैक में धीरे-धीरे लगभग पूरा सुधार आ गया था। तीसरे स्ट्रोक के बाद नयी समसस्&#x200d;्याऐँ बढ़ गई थीं। फिर भी अपना दैनिक कार्य स्वयं कर लेती थीं, चल फिर लेती थीं। प्रत्येक अटैक के बाद ब्रेन की एम.आर.आई. रिपोर्ट में आता कि छोटे छोटे ढेर सारे इन्फार्कशन (मस्तिष्क की लघु धमनियों द्वारा रक्&#x200d;त प्रवाह में रूकावट के अनेक बिन्दु और उसके कारण ब्रेन के गूदे में मृत उत्तक के छोटे-छोटे क्षेत्र) भरे हुए हैं, उनकी संख्या बढ़ती जा रही है, पूरे मस्तिष्क में स्वस्थ टिशु का आकार घट रहा है, उस खाली स्थान की पूर्ति के लिये पानी (सी.एस.एफ.) से भरे पोखरों की संख्या व आयतन ज्यादा हो रहा है। इसे लेक्यूनर अवस्था कहते हैं। लेक्यून अर्थात छिद्र | मरणोपरान्त मस्तिष्क का विच्छेदन करने पर ऐसे दिखते हैं कि मानों ज्यादा पके हुए फल को काटने पर उसमें सड़ने वाले अनेक दाग जगह जगह बन गये हों।</p>



<h2 class="wp-block-heading">वे क्&#x200d;यों हंस रही थीं ?</h2>



<p class="wp-block-paragraph">इस बहुरोधगलन अवस्था (मल्टी इन्फार्क्ट स्टेट) के कारण गायत्री देवी को स्यूडो बल्बर पाल्सी नामक रोग हो गया था। जिसके लक्षण हैं &#8211; भावनाओं की अभिव्यक्ति पर नियंत्रण खत्म हो जाना, अचानक बिना कारण या छुद्र कारण में हंसना और रोना, बोलचाल में आवाज का उच्चारण खराब होना (डिस आर्थिया) (कुच्चारण), भोजन पानी निगलने में दिक्कत होना (डिस्फेजिया, कुगुटकन) ।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="400" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/image-16-400x400.png" alt="" class="wp-image-2430" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/image-16-400x400.png 400w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/image-16-300x300.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/image-16.png 740w" sizes="auto, (max-width: 400px) 100vw, 400px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">गायत्री देवी खुद शर्मिन्दा महसूस करती थीं। रूलाई और हंसी रूकने के बाद वे कहती- मैं क्या करूं,&nbsp;जरा-जरा सी बात पर मेरे साथ ऐसा हो जाता है। मैं जान बूझ कर ऐसा नहीं करती। चाहूं तो भी रोक नहीं पाती।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मनोरोग विशेषज्ञ (सायकिएट्रिस्ट) ने मरीज व घरवालों से देर तक पूछताछ करी। मानसिक स्वास्थ अच्छा है। मन में अवसाद,&nbsp;उदासी या डिप्रेशन नहीं है। जब रोती है तो उन क्षणों में ऐसा नहीं कि अन्दर से सच में मूड खराब हो गया है। मन की अवस्था (खुशी या दुःख) और चेहरे पर उसकी अभिव्यक्ति का आपस में कोई तालमेल नहीं होता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मन और मूड के उतार-चढाव हम सब में उमड़ घुमड़ कर आते रहते हैं,&nbsp;कभी धीमे,&nbsp;कभी तेज,&nbsp;कभी वाजिब,&nbsp;कभी गैर वाजिब। जरूरत पड़े तो हम उन्हें कभी कभी रोक पाते हैं,&nbsp;आंसू पी जाते हैं,&nbsp;लब सी लेते हैं। रूंधा गला छिपा लेते हैं,&nbsp;मुस्कान दबा लेते हैं,&nbsp;और कभी ये भावभिव्यक्तियां रुक नहीं सकती,&nbsp;सैलाब बह निकलता है। बांध फूट जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ब्रेन के दोनों गोलार्धों की अन्दरूनी मीडियन सतह पर अनेक रचनाएँ एक सर्पिलाकार रूप में जमी रहती हैं जिन्हें लिम्बिक तंत्र कहते हैं। लिम्बस अर्थात वृत्ताकार। इसके अन्तर्गत आते हैं- हायपोथेलेमस, मेमिलरी बॉडी, सिंग्यूलेट गायरस, फार्निक्स, इन्सुला, एमिग्डेला, हिप्पोकेम्पस व अन्य | हायपोथेलेमस प्रमुख है। दिमाग की पेंदी में मध्यरेखा के अधबीच, इस रचना द्वारा अनेक गतिविधियां नियंत्रित होती हैं- भूख, प्यास, नींद, यौन इच्छा, शरीर का तापमान, वजन और इमोश्न्स |</p>



<p class="wp-block-paragraph">फ्रान्टल खण्ड ऊपर है। लिम्बिक तंत्र नीचे। दोनों फ्रान्टल खण्ड से, दायें और बायें तन्तुओं के अनेक बण्डल निकल कर नीचे की ओर जाते हैं तथा सिर-चेहरा-भुजाऐं, पैर &#8211; पूरे शरीर की मांसपेशियों का प्रेरक (मोटर) नियंत्रण करते हैं। उन्हीं में से कुछ तन्तु लिम्बिक सिस्टम पर ब्रेक का काम करते हैं। धीर गम्भीर स्थिप्रज्ञ व्यक्तित्व के धनी लोगों के मस्तिष्क के दोनों फ्रान्टल खण्ड की गतिविधि मजबूत होती है जो हमारे दिमाग के तुलनात्मक रूप से आदिम भाग लिम्बिक सिस्टम पर लगाम कसी रहती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ब्रेन मे पक्षाघात के अनेक घावों के सम्मिलित प्रभाव के अतिरिक्त कुछ दूसरी बीमारियों में भी स्यूडोबल्बर अफेक्ट होता है। तरीका वही है &#8211; फ्रान्टल खण्ड से निकलने वाले ब्रेक फाइबर्स का टूटना। मोटर न्यूरॉन रोग,&nbsp;मल्टीपल स्क्&#x200d;्लीरोसिस,&nbsp;पार्किन्सोनिज़्म एल्जीमर डिमेन्शिया आदि में भी ऐसे लक्षण पाये जाते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसके अतिरिक्त मिर्गी का रोग यदि किसी ऐसी पेथालॉजी के कारण है जिसमें हायपोथेलेमस में ट्यूमर या गांठ हो तो अचानक हर कभी हंसी का विस्फोट आता है,&nbsp;कुछ मिनट रहता है,&nbsp;जिसके साथ मिर्गी के अन्य लक्षण कभी-कभी हो सकते हैं। रोने का ऑटोमेटिज्म (स्वचलन) वाले मिर्गी के केस दुर्लभ रूप् में देखे जाते हैं</p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-4-960x400.png" alt="" class="wp-image-2433" style="width:749px;height:312px" width="749" height="312" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-4-960x400.png 960w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-4-300x125.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-4-768x320.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-4.png 1200w" sizes="auto, (max-width: 749px) 100vw, 749px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">गायत्री देवी के मस्तिष्क में ढेर सारे लेक्यूनर रोधगलन छिद्रों के कारण अधोगामी तन्तु बन्डल कमजोर पड़ गये हैं और उनका लिम्बिक सिस्टम गाहे-बगाहे बेलगाम हो जाता है। आवाज और निगलने की तकलीफें भी इसी वजह से हैं। दिमाग में जो नाड़ियां दूट गई हैं उन्हें जोड़ने की कोई दवाई नहीं होती। अपने आप,&nbsp;धीरे-धीरे थोड़ी बहुत जुड़ जायें तो जुड़ जायें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सुनीता ने डाक्टर्स से गुहार लगाई- सर कुछ कीजिये। ये हंसना रोना,&nbsp;सुनने में कुछ नहीं पर रोज की जिन्दगी दूभर हो गई । थक जाती हैं,&nbsp;शरीर से और मन से&nbsp;|&nbsp;जबड़े और गला दुखते रहते हैं। किसी भी अनजान व्यक्ति की मौत या बीमारी की खबर सुन लेंगी तो आधे घंटे तक रोती रहंगी। पोते के साथ कार्टून फिल्&#x200d;म देखने का शौक था। हम सोचते थे,&nbsp;अच्छा टाईमपास है। अब बंद करवा दिया। किन्&#x200d;्हीं-किन्हीं दृश्यों को याद कर दिनभर बार-बार हंसती रहेंगी। बाहर आना जाना मिलना जुलना बंद हो गया है,&nbsp;उसका रंज खूब करती हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सायकोथेरपिस्ट ने छोटी मोटी अनेक टिप्स बताई जो कभी कभी काम कर जाती हैं। ऐसा दौरा आने पर वे खुद अपने कमरे में या बाथरूम में चली जाती हैं। हम उन्हें ढाढ़स बंधाते हैं। कहते हैं- कोई बात नहीं,&nbsp;धीरज रखो। अभी थोड़ी देर में रूक जावेगा। प्रायः मिलने वाले रिश्तेदार,&nbsp;मित्र,&nbsp;पड़ौसी जानते हैं कि ऐसे क्षणों में माँ की तरफ लगातार घूर कर नहीं देखना है,&nbsp;कोई रिएक्शन नहीं देना है,&nbsp;कमेन्ट नहीं करना है। घरवालों के साथ-साथ अब माँ भी बिना संकोच के अपनी अवस्था के बारे में बिना पूछे शुरू में ही सब कुछ बता देती हैं,&nbsp;वह भी बड़े विश्वास के साथ,&nbsp;वैज्ञानिक तरीके से।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8216;मुझे यह है,&nbsp;आपको जो सोचना हो,&nbsp;सोचो,&nbsp;जो कहना हो कहो,&nbsp;मैं तो ऐसी ही हूँ।‘<br>‘मुझे मत बोलो कि मैं हंसना या रोना रोक दूँ- क्योंकि यह मैं नहीं कर सकती।‘<br>‘ये मत सोचो कि मैं ऐसा लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिये करती हूं। अकेले में भी उतनी ही बार होता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ये मत सोचना कि मुझे पागलपन का दौरा पड़ा है या कि मैंने शराब पी है या भांग खाई है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मुझे अकेला छोड़ दो,&nbsp;मुझे सम्भालने की कोशिश न करो।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बहु सुनीता कहती है एक तरफ गायत्री देवी हैं जिनका अभिनय ऐच्छिक नहीं है,&nbsp;इच्छा शक्ति से नहीं होता। दूसरी तरफ अनेक महान अभिनेता हैं,&nbsp;जैसे कि दिलीप कुमार,&nbsp;जो कथानक और पात्र के चरित्र में गहरे डूब कर बिना ग्लीसरीन के सचमुच के आंसू बहा लेते हैं। उनके फ्रान्टल खण्ड में सिस्टम को कंट्रोल करने के लिये सिर्फ ब्रेक ही फिट नहीं है,&nbsp;बल्कि एक्सलरेटर भी फिट है जो बिरलों में ही होता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">गायत्री देवी को अनेक दवाईयाँ भी दी गई। डिप्रेशन नहीं है फिर भी एन्टीडिप्रेसेन्ट (फ्लाक्सीटीन) से कुछ लाभ देखा गया । पिछले कुछ वर्षों से दो औषधियों के काम्बीनेशन के अच्छे परिणाम देखे गये हैं। डेक्स्ट्रोमेथॉफेन 30 मि.ग्रा. (पुरानी खांसी की दवा) और क्वीनिडीन 40 मि.ग्रा. (पुरानी मलेरिया के दवा) का संयुक्त रूप भारत में उपलब्ध नहीं है। विदेश से मंगवाई। गायत्री देवी की अवस्था में सुधार हुआ है। आज भी उन दिनों को याद कर वे कहती हैं- रोना और हंसना जब हद से गुजर जाते हैं तो उनमें फर्क नहीं रह जाता। आपस में मिल जाते हैं&nbsp;|&nbsp;बहुत अधिक खुशी में आंसुओं का अनुभव कामन है। बहुत दुःख में कभी-कभी अपने हालात पर हंसी आती है। तभी तो लोग कहते हैं- मुझे समझ में नहीं आता कि हँसू या रोऊं&nbsp;|&nbsp;मेरे साथ में रियल की एक्टिंग हो जाती थी&nbsp;|&nbsp;वह एक्टिंग मैं नहीं करती थी। जाने कौन सी ताकत है जो हम सबको कठपुतलियों के समान नचाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">********************************</p>
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		<title>आधी दुनिया गायब</title>
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		<dc:creator><![CDATA[न्यूरो ज्ञान]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 Sep 2023 06:47:14 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मरीज़ कथाएँ]]></category>
		<category><![CDATA[aadhi duniya gayab]]></category>
		<category><![CDATA[aphasia]]></category>
		<category><![CDATA[clinical-tales]]></category>
		<category><![CDATA[अफेजिया]]></category>
		<category><![CDATA[आधी दुनिया गायब]]></category>
		<category><![CDATA[मरीज़ कहानियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[मरीज़ कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[मरीजों के अनुभव]]></category>
		<category><![CDATA[मरीजों पर आधारित कहानियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[रोचक मरीज कहानियाँ]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>द्वारका प्रसाद जी को 73 वर्ष की उम्र में दिल का दौरा पड़ा था । एन्जियोप्लास्टी या बायपास की जरुरत नहीं समझी गयी थी। डॉट व डर के कारण कुछ सप्ताहों तक सावधानियां बरती,&#160;बीडी बन्द करी,&#160;शुगर व ब्लडप्रेशर नियंत्रण में रखें,&#160;मुश्किल से ही सही,&#160;रोज (सिर्फ) 4 कि.मी. चलने लगे, रुखा-सुखा बेस्वाद भोजन (बिना शक्कर,&#160;नमक-मसाला,&#160;तेल,&#160;घी के [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="960" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/आधी-दुनिया-गायब-960x400.jpg" alt="" class="wp-image-2896" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/आधी-दुनिया-गायब-960x400.jpg 960w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/आधी-दुनिया-गायब-300x125.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/आधी-दुनिया-गायब-768x320.jpg 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/आधी-दुनिया-गायब.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">द्वारका प्रसाद जी को 73 वर्ष की उम्र में दिल का दौरा पड़ा था । एन्जियोप्लास्टी या बायपास की जरुरत नहीं समझी गयी थी। डॉट व डर के कारण कुछ सप्ताहों तक सावधानियां बरती,&nbsp;बीडी बन्द करी,&nbsp;शुगर व ब्लडप्रेशर नियंत्रण में रखें,&nbsp;मुश्किल से ही सही,&nbsp;रोज (सिर्फ) 4 कि.मी. चलने लगे, रुखा-सुखा बेस्वाद भोजन (बिना शक्कर,&nbsp;नमक-मसाला,&nbsp;तेल,&nbsp;घी के और कैसा बनेगा?)&nbsp;खाने लगे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">3-4 महीनों बाद धीरे-धीरे,&nbsp;कब कैसे ढील होते गई और फिर वही बेढंगी चाल,&nbsp;फिर<a></a> वही ढाक&nbsp;के तीन पान।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक वर्ष बाद कर्म फल मिला (इस जन्म के कर्म,&nbsp;पिछला जन्म कुछ नहीं होता)</p>



<p class="wp-block-paragraph">सुबह-सुबह पेशाब करने के लिये उठे तो गिर पड़े। बड़ी मुश्किल से उठे,&nbsp;फिर गिर पड़े। कुहनी पर लगी और दर्द हुआ। पत्नी को पुकारा- शारदा,&nbsp;शारदा&nbsp;|&nbsp;वह चाय बनाना छोड़ दौड़ती आई और देखा कि पतिदेव का मुंह टेड़ा है,&nbsp;आवाज तुतला रही है,&nbsp;बदहवास है,&nbsp;घबराए हुए है,&nbsp;उठने के लिये दायें हाथ व दायें पांव पर जोर लगा रहे हैं पर बायां हाथ व पांव ढीले पड़े है।</p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="754" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/attack-754x400.png" alt="" class="wp-image-2401" style="width:509px;height:270px" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/attack-754x400.png 754w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/attack-300x159.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/attack-768x408.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/attack.png 1057w" sizes="auto, (max-width: 754px) 100vw, 754px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“अरे बेटा, प्रकाश, जल्दी डॉक्टर को फोन लगा, बापू को शायद लकवा आया है”</em>| शारदा को पता था लकवे में ऐसा ही कुछ होता है क्योंकि छोटी बहन को तीन माह पहले हुआ था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अस्पताल में डॉक्टर ने पूछा- <em>नमस्ते जी, आप कैसे हैं?</em></p>



<p class="wp-block-paragraph">द्वारका प्रसाद जी ने कहा- <em>मैं ठीक हूँ</em>।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211; <em>आपको यहाँ क्&#x200d;यों लाए?</em></p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211; <em>मुझे बी.पी. हो गया।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211; <em>बी.पी. अर्थात्‌ ब्लडप्रेशर तो सबको होता है, किसी का कम या ज्यादा।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>&#8211; मेरा मतलब हाई बी.पी.</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>&#8211; हाई बी.पी. के कारण आपको क्या हुआ?</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>&#8211; मुझे हाई बी.पी. हुआ और कुछ नहीं।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph">अनेक मरीजों की आदत होती है कि वे बी.पी., शुगर जैसे उत्तर देते है, जबकि उन्हें जो हो रहा है वह नहीं बोलते | कायदे से तो द्वारकाप्रसाद जी को कहना चाहिये था कि आज सुबह मुझसे उठते नहीं बना। मैं गिर पड़ा।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>&#8211; और कुछ नहीं।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>&#8211; नहीं।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>&#8211; आप उठ सकते हैं</em><em>,</em><em>&nbsp;</em><em>चल सकते हैं</em><em>?</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>&#8211;</em><em>&nbsp;</em><em>“हाँ मैं कर सकता हूँ।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“सुबह गिर क्&#x200d;यों गये थे।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“शायद चक्कर आ गये थे। पिछले सप्ताह तीर्थ से लौटा था। थकान थी।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“दायां हाथ व दायां पैर उठाओ</em>&nbsp;(दोनों उठाए गए)</p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“बायां हाथ व बायां पैर उठाओ</em>&nbsp;(दोनों टस से मस नहीं हुए)</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर-&nbsp;<em>उठाओ न।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph">मरीज-&nbsp;<em>उठा तो रहा हूँ</em>&nbsp;(फिर से दायां हाथ व पांव उठा दिये)</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर &#8211; (बायें हाथ से छूकर) <em>इसे उठाइये न</em>।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मरीज &#8211; <em>उसमें दर्द है, पर उठ तो रहा है</em>।</p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="1046" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-1-1046x400.png" alt="" class="wp-image-2402" style="width:633px;height:242px" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-1-1046x400.png 1046w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-1-300x115.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-1-768x294.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-1.png 1200w" sizes="auto, (max-width: 1046px) 100vw, 1046px" /></figure>



<h2 class="wp-block-heading">आभास तक नही&#8230; ऐसा क्या हुआ ?</h2>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर &#8211; (मुस्कुराते हुए घरवालों से)<em>&nbsp;इन्हें अहसास नहीं है कि इनके बायें अंग पर लकवा आया है। मस्तिष्क के दायें गोलार्ध में स्ट्रोक (ब्रेन अटैक) के कारण जब शरीर के बायें आधे भाग में पेरेलेसिस आती है तो अनेक मरीजों को इस अवस्था का आभास नहीं रहता है,&nbsp;बार-बार बताने पर भी वे भूल जाते हैं,&nbsp;यहाँ तक कि मना करते हैं,&nbsp;ध्यान दिलाने पर कोई बहाना बनाते हैं</em>।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पत्नी:&nbsp;<em>कितने दिन में ठीक हो जायेंगे</em>?</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर: <em>लगभग छः माह में 50-70 प्रतिशत अच्छे होंगे, दवाइयों से नहीं, अपने आप और थेरापी द्वारा। अपना काम खुद करेंगे, आत्मनिर्भर होंगे। पर कुछ कमी रह जायेंगी</em>।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुत्र: <em>कैसी कमियाँ?</em></p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर: <em>बायां पांव थोड़ा घिसटकर या धीमे चलेगा, बायें हाथ की पूरी ताकत नहीं आयेगी, अनेक बारीक काम, सुघढ़ता से नहीं कर पायेंगे।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph">पत्नी, बेटा व घरेलू सेवक अत्यन्त तन्&#x200d;मयता और नियमितता के साथ फिजियोथेरापी विशेषज्ञ के निर्देशन में अभ्यास कराने लगे। स्वयं द्वारका प्रसाद जी समझ चुके थे। परहेज वे साथ-साथ व्यायाम चिकित्सा में पूरा सहयोग करते, अकेले भी करते रहते।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर की उम्मीद से अधिक तेजी से सुधार हो रहा था। लेकिन कुछ अजीब सी बातों पर घरवालों का ध्यान जा रहा था। बेटे ने अपनी डायरी में लिखा –</p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“पापा के पास पलंग के बांयी ओर खड़े होकर आवाज लगाओ तो तुरन्त पहचाल लेंगे- &#8216;हाँ बेटा, बोलो&#8217; &#8211; लेकिन गर्दन व आँखें दांयी ओर घूम कर मुझे ढूंढेगी। बायीं तरफ नहीं देखते&#8221;</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“बायीं तरफ आकर बैठे तो उसकी तरफ ध्यान नहीं।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“दायीं तरफ कोई दबे पांव चुपचाप आये तो झट उससे बात करेंगे।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“ठंड लग रही हो तो चादर ओढ़ने पर, बायां पांव यदि बाहर रह जावे तो भी ध्यान नहीं जावेगा।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“अंगोछे से चेहरा साफ करते समय भोजन के कण, दूध की बूंदें, ललाट पर पसीना, बायें भाग पर बिना पुंछे रह जायेंगे।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“सिर के आधे बायें भाग पर कंघा नहीं करेंगे, आधे बाल बने होंगे, आधे नहीं।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“हमें टी.वी. और दीवाल घड़ी उनकी दायीं साईड की दीवाल पर रखना पड़े हैं,</em><em>&nbsp;</em><em>वरना वे ध्यान नहीं देते थे।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“अखबार पढ़ने का खूब शौक रहा है। आजकल प्रत्येक पंक्ति का बायां आधा भाग छोड़कर केवल दायां आधा भाग पढ़ते हैं, भ्रमित होते हैं, शेष वाक्य, का अनुमान कभी सही, कभी गलत होता है।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“दांतों को साफ करते समय केवल दाहिने भाग में ब्रुश चलाते हैं।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“खाने की थाली में सारे आइटम दायें आधे हिस्से में रखना पड़ते हैं या थाली थोड़ी-थोड़ी देर में घुमानी पड़ती है।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“शरीर के बायें भाग पर मक्खी बैठे, मच्छर काटे तो ध्यान नहीं जाता।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“एक दिन तो गजब हो गया। दो तीन बार बिस्तर के बाई ओर गिर पड़े। समझा नहीं पाये कैसे। उठना चाहते थे क्&#x200d;या? हमेशा तो दायीं करवट लेकर उठने का प्रयास करते थे। फिर धीरे से बोले “पता नहीं कौन मेरे बिस्तर में बायीं बगल में आकर लेट जाता है- मैं उसे दूर धकेलता हूँ, पर जाता ही नहीं। अपने ही शरीर के बायें आधे भाग को भूलकर, किसी दूसरे का शरीर समझ बैठे थे।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“थेरापिस्ट जब उनका बायां हाथ उठा कर पूछता तो कभी-कभी उस शरीर का अंग मानने से इनकार कर देते हैं।</em></p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8220;कपड़े उल्टे-पुल्टे पहनते हैं। एक बांह बाहर उलट दो तो समझ नहीं पाते| बटन ऊपर निचे हो जाते थे। समय के साथ पिताजी की बायीं ओर की दृष्टि (बायीं आँख नहीं, वह तो अच्छी है, वरन्‌ दोनों आँखों द्वारा देखे जाने वाले परिदृश्य का बायां भाग) अच्छी होने लगी है, फिर भी ऐसा लगता है कि उनके मन में बायीं ओर ध्यान देने की इच्छाशक्ति या इरादा ही नहीं है। ऐसा वे जानवूझ कर नहीं करते, अपने आप हो रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर की सलाह पर हम पिताजी को “क्लीनिकल सायकोलॉजिस्ट” (नैदानिक मनोवैज्ञानिक) को दिखाने ले गये। उन्होंने कागज पर एक आड़ी लाईन खींची और पिताजी से उसे अधबीच में काटने को कहा- पिताजी ने उसे दायें भाग में 3,/4 व 4,/4 के अनुपात में काटा। फूल और चेहरा बनाने को कहा तो रेखाचित्र में बायां आधा-भाग गायब था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">घड़ी का चित्र बनाते समय 4 से 42 तक की गिनती, दायें भाग में दूँस दी गई थी। और भी अनेक छोटे-छोटे टेस्ट। बुद्धि के अन्य पहलू अच्छे थे जैसे स्मृति भाषा गणित आदि। क्लीनिकल  साय्कोलोजिस्ट व् आक्युपेशन थेरेपिस्ट ने अनेक सलाहे दी &#8211; जब दैनिक कामकाज समय के साथ करवाने हो तो मरीज के दांयी ओर खड़े रहें, जब लम्बी अवधि में धीरे-धीरे ठीक होने के लिये रोज अभ्यास करवाने हों तो बायीं तरफ से करवाएं, याद दिलाएं, उपयोग करवाएं। छोटी छोटी सफलताओं व प्रयासों के लिये सांकेतिक इनाम दें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">तीन-चार महीनों बाद पिताजी को अपनी काफी समझ आने लगी थी। उन्हें ध्यान रहता था कि वे बायीं ओर की चीजें चूक जाते हैं,&nbsp;टकरा जाते हैं,&nbsp;इसलिये बार-बार अपनी गर्दन और नजर बायीं ओर घूमा कर परिदृश्य को रिफ्रेश करते रहते थे। लेकिन जैसे ही नजरें सामने कराते,&nbsp;बायीं तरफ की आधी दुनिया फिर गायब,&nbsp;न केवल शरीर की आँखों से,&nbsp;बल्कि मन की आँखों से भी।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“आँख ओट पहाड़ ओट”</em></p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="956" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-2-956x400.png" alt="" class="wp-image-2403" style="width:693px;height:290px" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-2-956x400.png 956w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-2-300x126.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-2-768x321.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-2.png 1200w" sizes="auto, (max-width: 956px) 100vw, 956px" /></figure>



<h2 class="wp-block-heading">क्यों करना पड़ा ? &#8220;थाट एक्सपीरिमेन्ट&#8221;</h2>



<p class="wp-block-paragraph">एक दिन क्लीनिकल सायकोलॉजिस्ट ने अनोखा&nbsp;“थाट एक्सपीरिमेन्ट” (“विचार प्रयोग”)&nbsp;करवाया,&nbsp;जिसे इन्दौर का भूगोल जानने वाले ज्यादा अच्छे से समझ पायेंगे। उन्होंने द्वारका प्रसाद जी से कहा- आँखें बन्द करें और सोचिये कि आप राजबाड़ा में एम.जी.एम. रोड़ पर खड़े होकर गाँधी हॉल की दिशा में देख रहे हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ठीक है। आप तैयार हैं? अब बताइये सड़क पर एक के बाद आपको कौनसी दुकानें मिलेंगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">द्वारका प्रसाद जी की दुकान एम.जी. रोड़ पर ही थी जहाँ वे रोज पैदल गुजरते थे। उन्होंने गिनाना शुरु किया- गणेश केप मार्ट, बोझांकेट मार्केट की गली, ननन्&#x200d;्दलालपुरा जाने वाली सड़क, कृष्णपुरा की छतरियां, कान्ह नदी का पुल, मृगनयनी एम्पोरियम, श्री कृष्ण सिनेमा टाकिज खातीपुरा&#8230; आदि आदि&#8230; से रामपूरावाला बिल्डिंग गिनाना भूल गये।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अब उनसे कहा गया कि उनसे कहा कि कल्पना करो आप एम.जी. रोड़, गाँधी हॉल पर राजबाड़ा जाने की दिशा में मुह करके खड़े है और फिर से बताइये इस बार उन्होंने याद किया जिला कोर्ट, गुरुद्वारा, जेल रोड आदि को | दिमाग सोचता ही नहीं, ध्यान ही नहीं देता बायीं तरफ की दुनिया पर।.</p>



<p class="wp-block-paragraph">पत्नी शारदा ज्यादा पढ़ी लिखी न थी, परन्तु बुद्धिमान और उत्सुक प्रव्रती की थी| डॉक्टर व थेरेपिस्ट से खूब बाते कराती थी, सवाल पूछती, टिप्पणियां करती, बेटे की डायरी में एंट्रिया करवाती, थेरेपी में लगी रहती|</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक दिन डॉक्टर से पूछने लगी- मेरी बहन को भी लकवा हुआ और उनकी बोली-भाषा पर असर पड़ा, लेकिन जा और दुनिया के दोनों भागों का पूरा ध्यान रहा, इनको भी दिमाग के, क्&#x200d;या बोलते हैं , आधे गोले में अटैक आया, भगवान ने इनकी जुबान बचा ली, लेकिन आधी दुनिया का ध्यान गायब करवा दिया, ऐसा क्&#x200d;यों?</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर: मुझे पता है। मैं उनका भी इलाज कर रहा हूँ। उन्हें शरीर के दायें भाग पर पक्षाघात हुआ और साथ में भाषा-बोली चली गई जिसे वाचाघात या अफेजिया कहते हैं। इन मरीजों में मस्तिष्क आघात ब्रेन के बायें गोलार्ध में आता है। उन्हें अपने रोग का पूरा ध्यान रहता है, भले ही बोलने व समझने में दिक्कत हो।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ऐसे इन्टेलिजेन्ट सवाल पूछने वाले मरीज और परिजन मुझे सदैव भाते हैं। रमेश जैसे डायरी लिखने वालों की तलाश में मैं हमेशा रहता हूँ। मैंने उन्हें खुशी से समझाया और हिन्दी में न्यूरोविज्ञान की पुस्तिकाएं पढ़ने को दी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">धरती पर आज से लाखों साल पहले, जब मनुष्य के पूर्वज प्राणियों (चिम्पान्जी, गोरिलला, ओरांग उटांग) आदि का अविर्भाव और विकास हो रहा था तब मस्तिष्क में कार्य विभाजन (डिवीजन ऑफ लेबर) की शुरुआत हुई- जैसे-जैसे प्राणियों और अन्त में इन्सान ने एक के बाद एक जटिल काम करना सीखे वैसे-वैसे, मस्तिष्क में उन कार्यों को सम्पादित करने का जिम्मा दायें या बायें गोलार्ध में से एक को दिया जाने लगा- पूर्णतः: नहीं, आंशिक रुप से। </p>



<p class="wp-block-paragraph">आज एक साल बाद द्वारका प्रसाद जी पुराने हुनर से दुकान चलाते हैं,&nbsp;पैदल आते+जाते हैं,&nbsp;धन्धे का हिसाब रखते हैं। उन्होंने खोई हुई आधी दुनिया को आंशिक रुप से पा लिया है। शेष कमी को वे अपनी बुद्धि व तरकीबों से पूरा करना सीखते जा रहे हैं- सदैव अहसास रखना कि जो दिखता है,&nbsp;उसके अलावा भी संसार है- उसे ढूंढते रहो,&nbsp;उसका अंदाज लगाते रहो।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp;यूं तो हम सबको भी हमेशा यही तो करते रहना पड़ता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">************************************</p>
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		<title>चाँद का मुँह टेढ़ा है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[न्यूरो ज्ञान]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 12 Sep 2023 09:55:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मरीज़ कथाएँ]]></category>
		<category><![CDATA[Bell's Palsy]]></category>
		<category><![CDATA[chhand ka muh tedha hai]]></category>
		<category><![CDATA[Clinical Tales]]></category>
		<category><![CDATA[चाँद का मुँह टेढ़ा है]]></category>
		<category><![CDATA[बेल्स पाल्सी]]></category>
		<category><![CDATA[मरीज़ कहानियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[मरीज़ कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[मरीजों के अनुभव]]></category>
		<category><![CDATA[मरीजों पर आधारित कहानियाँ]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>कविराज और नाट्य लेखक अभिमन्यु&#160;‘अकेला’&#160;की पत्नी योशा अनिंदय सुंदरी व रंगमंच अभिनेत्री हैं।&#160;अपनी नायिका के सौंदर्य की तारीफ में चन्द्रमा की उपमा का बहुतायत साईं&#160;उपयोग होना स्वाभाविक है। योशा को तीन दिन से बांयी तरफ कान के पीछे सिर में दर्द हो रहा था। क्रोसीन खा-खा कर रिहर्सल जारी थी। चौथे दिन सुबह उठी तो [&#8230;]</p>
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<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="950" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/feature-image-1-950x400.png" alt="" class="wp-image-2373" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/feature-image-1-950x400.png 950w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/feature-image-1-300x126.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/feature-image-1-768x323.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/feature-image-1.png 1200w" sizes="auto, (max-width: 950px) 100vw, 950px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">कविराज और नाट्य लेखक अभिमन्यु&nbsp;‘अकेला’&nbsp;की पत्नी योशा अनिंदय सुंदरी व रंगमंच अभिनेत्री हैं।&nbsp;अपनी नायिका के सौंदर्य की तारीफ में चन्द्रमा की उपमा का बहुतायत साईं&nbsp;उपयोग होना स्वाभाविक है। योशा को तीन दिन से बांयी तरफ कान के पीछे सिर में दर्द हो रहा था। क्रोसीन खा-खा कर रिहर्सल जारी थी। चौथे दिन सुबह उठी तो कुल्ला करते समय पानी होठों के बाये किनारे से ढुलक रहा था। चेहरे के बायें भाग पर हल्का भारीपन महसूस हो रहा था। पलटकर बेडरूम में आई और पतिदेव को देखकर मुस्कुराई,&nbsp;पर अभिमन्यु ने मुस्कुरा कर जवाब नही दिया – उनके चेहरे पर विस्मय और भय का भाव था।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“योशा तुम्हारे चेहरे को क्या हो गया है&nbsp;?”</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“</em><em>हाँ</em><em>,</em><em>&nbsp;</em><em>मुझे भी कुछ लग तो रहा है </em>।<em>”</em></p>



<p class="wp-block-paragraph">काँच में देखा। बायीं आँख ज्यादा खुली थी,&nbsp;बड़ी लग रही थी। नाक के दोनों साईंड पर गाल के फोल्ड असमान थे।&nbsp;बायाँ फोल्ड कम गहरा और चपटा था। कान के पीछे दर्द जारी था। इतनी सुबह डॉक्टर नहीं मिलेंगे सोचकर पहले चाय नाश्ता किया। पराठा चबाते समय मुँह का ग्रास बार-बार बेकेन कक गाल के कोटर में फंसा रह जाता था। कोशिश करके&nbsp;उसी जीभ या अंगुली से मुँह बीच लाना पड़ता था। जैसे तैसे केक वक्त से चबाकर नाश्ता पूरा किया। चाय पीते समय बार-बार ध्यान रखना पड़ रहा था कि मुँह के बायें कोने से बाहरन निकल जाए।&nbsp;दोनों फटाफट नहा कर तैयार हुए। साधारण से मेकअप में साड़ी पहले योशा को देखकर रोज की भाँति कवि अकेला बोले&nbsp;“बहुत सुन्दर लग रही हो। लेकिन योशा की मुस्कान रोज की तरह नहीं थी। दोनों गाल पर बनने वाले हसीन गड्डों में से एक,&nbsp;बायां वाला अनुपस्थित था। मुस्कान की चमक आँखों सें भी बयां होती है,&nbsp;वह भी कुछ फीकी थी। शायद बीमारी की चिन्ता थी। न जाने क्या होगा ? शायद लकवा का अटैक है।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="950" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-950x400.png" alt="" class="wp-image-2368" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-950x400.png 950w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-300x126.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-768x323.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1.png 1200w" sizes="auto, (max-width: 950px) 100vw, 950px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“</em><em>मैं</em><em>&nbsp;</em><em>जो यहाँ दबा रहा हूँ तो</em><em>&nbsp;</em><em>?”</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“</em><em>उफ</em><em>,</em><em>&nbsp;</em><em>ज्यादा दुख रहा है।</em><em>“</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“</em><em>दूसरी तरफ</em><em>,</em><em>&nbsp;</em><em>दायीं तरफ</em><em>&nbsp;</em><em>?”</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>“</em><em>नहीं</em><em>”</em></p>



<p class="wp-block-paragraph">न्यूरोलॉजिस्ट अमिताभ शाह,&nbsp;अभिमन्यु के मित्र व थिएटर के प्रेमी थे। आज उनकी व्यस्तताएँ अधिक थी। फोन पर हिस्ट्री सुनकर उन्होंने अनुमान लगा लिया कि&nbsp;“बेल्स पाल्सी&#8217;&nbsp;रोग है। अभिमन्यु को समझाने लगे – “घबराने की कोई बात नहीं है&nbsp;,&nbsp;सिर्फ चेहरे का लकवा है। गम्भीर रोग नहीं है। खतरा नहीं है। जल्दी ही ठीक हो जाएगा। मुझे आज सुबह समय नहीं है। शाम को आ जाना&nbsp;|&nbsp;कोई फर्क नहीं पड़ेगा । घर पर आराम करने दें । एक गोली क्रोसीन की ले लेवे।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">अभिमन्यु आग्रह करता रहा&nbsp;।&nbsp;डॉक्टर ने फिर समझाया &#8211; पूरे आधे शरीर पर जब लक्षण आते हैं या जब ब्रेन अटैक के चेतावनी चिन्ह नज़र आते हैं तो मैं स्वयं या मेरा फिजिशियन असिस्&#x200d;टेंट मरीज को तत्काल बुलाकर भर्ती करते हैं,&nbsp;सी.टी. स्कैन करवाते हैं। अन्तत: मित्र के लगातार आग्रह को मंजूर करना पड़ा। डॉ. शाह अपने रेसीडेन्ट्स के साथ भीड़ भरी ओ.पी.डी. में व्यस्त थे। योशा को वी.आय.पी. प्रवेश मिला। अनुभवी निपुण आँखों ने चेहरे को देखा,&nbsp;मरीज की बातें सुनी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“और कुछ बताना है&nbsp;?”</p>



<p class="wp-block-paragraph">“कल हम दोनों मोटर बाईक पर नदी किराने घूमने चले गए थे। शायद ठण्डी हवा लग गई थी। वायु रोग या वात रोग कहते हैं ना इसे&nbsp;।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">“हवा लगने से नहीं हुआ है। और कुछ&nbsp;?”</p>



<p class="wp-block-paragraph">“नहीं,&nbsp;बस मैं तो डर गई हूँ&nbsp;”</p>



<p class="wp-block-paragraph">“डरने की बात नहीं है।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">फिर रेसीडेन्ट्स से कहा &#8211; न्यूरोलॉजिकल डायग्नोंसिस की दृष्टि से यह शायद सामान्य व आसान केस है,&nbsp;फिर भी हमारी हिस्ट्री व परीक्षण पूरा होना चाहिए&nbsp;।&nbsp;आपको बताना है कि मैंने कोई प्रश्न पूछा तो क्यों पूछा? चेहरे की जाँच में कोई चीज देखी तो क्यों देखी&nbsp;?&nbsp;मैं आपको पहले भी बता चुका हूँ कि न्यूरोलॉजिकल निदान में हम सदैव एनाटॉमी जानना चाहते हैं एनाटॉमी अर्थात्‌ शरीर रचना विज्ञान&nbsp;।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“क्या आपको कान के पीछे बांयी ओर दर्द हुआ&nbsp;?”</p>



<p class="wp-block-paragraph">“हाँ,&nbsp;हुआ।”</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="898" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-898x400.png" alt="" class="wp-image-2369" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-898x400.png 898w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-300x134.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-768x342.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2.png 1122w" sizes="auto, (max-width: 898px) 100vw, 898px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">(रेसीडेन्ट्स से ) “स्टायलो &#8211; मेस्टाईड नामक एक छोटा-सा छेद यहाँ होता है जिसमें से सातवें नम्बर की क्रेनियल नाड़ी बाहर निकलती है,&nbsp;वहाँ इन्फेक्शन के कारण सूजन आती है,&nbsp;नर्व या नाड़ी दबती है,&nbsp;उस में विद्युत संचार रुक जाता है,&nbsp;अत: उस फेशियल नर्व द्वारा संचालित की जाने वाली माँसपेशियाँ काम करना बन्द कर देती हैं।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">(योशा ने पूछा) “फिर ठीक कैसे होती हैं&nbsp;?”</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर &#8211; एक दो सप्ताह में इन्फेक्शन अपने आप ठीक होता है,&nbsp;कभी-कभी वायरस के खिलाफ काम करने वाली&nbsp;एंटीबॉयोटिक तथा इन्फेक्शन की सूजन उतारने वाली स्टीराईड औषधियाँ-2 सप्ताह के लिए देते हैं। हम नहीं जानते कि कितना फायदा होता है&nbsp;।&nbsp;बहुत से मरीज अपने आप ठीक हो जाते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर शाह ने और भी कुछ सवाल पूछे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“आँखों से कैसा दिख रहा है? वस्तुएं एक की दो तो नहीं दिख रही हैं&nbsp;? चेहरे पर झुनझुनी,&nbsp;सुन्नपना या दर्द हो रहा है क्या&nbsp;? कान से कैसा सुनाई पड़ रहा है,&nbsp;कम,&nbsp;ज्यादा या सामान्य। कान के अन्दर से दुख रहा है क्या&nbsp;?&nbsp;कान में पस तो नहीं आया। “आँख से पानी ज्यादा आ रहा है क्या&nbsp;? मुँह के स्वाद में कोई परिवर्तन है क्या&nbsp;?”</p>



<p class="wp-block-paragraph">रेसीडेन्ट्स से उक्त प्रश्न पूछे जाने के कारण पूछे गए व बताये गए&nbsp;।&nbsp;फिर संक्षिप्त शारीरिक परीक्षण किया।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="897" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-1-897x400.png" alt="" class="wp-image-2370" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-1-897x400.png 897w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-1-300x134.png 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-1-768x342.png 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-1.png 1200w" sizes="auto, (max-width: 897px) 100vw, 897px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर शाह &#8211; एनॉटामी याद करो सातवें नम्बर की नाड़ी (फेशियल नर्व) मस्तिष्क के पान्स नामक भाग से निकल कर खोपड़ी की टेम्पोरल हड्डी के अन्दर एक संकरे घुमावदार बोगदे नुमा मार्ग से गुजर कर बाहर आती है मध्य कर्ण से गुजरती है। इस पूरे मार्ग में किसी भी बिन्दु पर खराबी हो तो नाड़ी का काम बिगड़ जाएगा । डॉक्टर को एक जासूस की तरह क्राइम का सीन ढूँढना पड़ता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसमें एनाटॉमी का ज्ञान काम आता है। नाना प्रकार के वायरस इन्फेक्शन और उन्हें कंट्रोल करने के लिए रक्त मे पैदा होती एंटीबाडी हमारे शरीर मे हर समय बनती रहती है। यह संयोग की बात है कि किसी इंसान मे कौन-सी वायरस या एंटीबाडी शरीर के किस कोने में इन्फेक्शन व सूजन पैदा करेगी। अभिमन्यु ने कहा– “डॉक्टर बन्धु&nbsp;!&nbsp;इलाज में कोई कसर न छोड़ना। पैसों की चिन्ता न करना। सारी जाँच करवा लो सिर का स्कैन जरूर करवाओ।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">हम डॉक्टर वैसे ही बदनाम है कि हम स्वार्थ के खातिर अनावश्यक जाँचें करवाते हैं। ऐसा नहीं है। भाभीजी को सी.टी. या एम.आर.आई. जाँच में कोई खराबी नहीं आएगी। अनेक बीमारियों मे रोग विकृत (पेथालॉजी) इतनी सूक्ष्म होती है कि जाँच में कुछ नहीं आता। हमें कोई आश्चर्य नहीं होता। कभी-कभी,&nbsp;यदि हमें शक हो कि कहीं कोई अन्य रोग या अन्य कारण तो नहीं तभी अतिरिक्त जाँचे करवाते हैं। करें तो बुरे,&nbsp;न करें तो बुरे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp;सप्ताह के बाद सप्ताह गुजरने लगे। औषधियाँ 15 दिन मे बंद हो गई। अभिमन्यु बार-बार कहता- “डॉक्टर कोई और दवाई दो।&nbsp;इंजेक्शन लगवाओ।&nbsp;मालिश का बढ़िया तेल बताओ।” डॉक्टर सोचते कि ऐसा&nbsp;क्यों है कि नुस्खे में जब तक कोई औषधि,&nbsp;खासकर के विटामीन या ताकत&nbsp;की दवाई न लिखो,&nbsp;मरीजों को सन्तोष क्यों नहीं होता&nbsp;?&nbsp;डॉक्टर ने दवाई नही लिखी इसका मतलब यह नहीं कि आपका साथ-सम्बन्ध समाप्त हो गया और आप नये डॉक्टर की शॉपिंग शुरू कर दो। डॉक्टर को टॉनिक लिखने में कितने सेकण्ड लगते हैं। दसियों मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव,&nbsp;सैकड़ों&nbsp;प्रकार की दवाइयाँ लिखवाने के लिए डॉक्टर के पीछे लुभावने लालच लेकर लगे रहते हैं,&nbsp;पाँच सेकण्ड में दवा लिखने के बजाय ।5 मिनिट यह समझाने में लगाता है कि रोग कैसे हुआ ?&nbsp;कैसे ठीक होगा ?&nbsp;अपने आप होगा।&nbsp;फिजियोथेरापी का कितना महत्व है,&nbsp;समय क्यों लगता है,&nbsp;क्यों कुछ लोग देर से व कम ठीक होते हैं ? तो भी मरीज एप्रीशिएट नहीं <strong>करते </strong><strong>(</strong><strong>वश</strong><strong>)</strong><strong>न </strong><strong>80 </strong><strong>प्रतिशत</strong> मरीजों में नहीं थी जो लगभग 2 माह में लगभग पूरी तरह ठीक हो जाते हैं और मामूली सी-कमी रह जाती है। उन्हें हम कहते हैं कि रोज काँच में चेहरा देखते समय थोड़ी सी असमानता पर ध्यान न दो&nbsp;।&nbsp;वह या तो धीरे-धीरे कम होगी या ऐसी ही रहेगी। इस अवस्था को स्वीकारो&nbsp;।&nbsp;स्थाई&nbsp;&nbsp;कमी रह जाए तो उसे स्वीकार करते हुए जिन्दगी को संशोधित रूप में स्वीकारो,&nbsp;लेकिन बड़ा मुश्किल होता है कुछ मरीजों के लिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">योशा की बायीं आँख अब ठीक ठाक बन्द होने लग गई थी । दोनों आँखों के आकार का फर्क कम हो गया था। बायीं आँख से आंसू गिरते थे,&nbsp;विशेषकर खुली तेज हवा में या धूल,&nbsp;धुएं के वातावरण में । ऐसा इसलिए कि बायीं&nbsp;आँख कम झपकती थी,&nbsp;ज्यादा खुली थी। आँख की आंसू ग्रन्थि से बनने वाला पानी एक पतली नली के माध्यम से नाक के अंदर बुहारने का काम शिथिल था। प्रत्येक झपकन एक पोंछे का या एक वाईप का काम करती है। पति पर&nbsp;गुस्से में बनने वाली भृकुटी पूरे स्वरूप में आ गई थी मुस्कान के समय यदि चेहरे के केवल ऊपरी आधे भाग पर गौर करें तो,&nbsp;आँख के चारों ओर सिकुड़ने वाली माँसपेशी के चलायमान हो जाने से,&nbsp;मुस्कान की चमक वापस आ गई&nbsp;थी।<br>शुरू के दिनों में आवाज-उच्चारण में हल्का सा तुतलापन था। होठों की गति से उच्चारित होने वाली ध्वनियां&nbsp;प,फ,&nbsp;ब,&nbsp;भ,&nbsp;म सफाई से नहीं निकलती थीं। डायलॉग डिलीवरी अभी भी परफेक्ट नहीं हुई थी। और हँसने-रोने का क्या करें&nbsp;?&nbsp;एक अभिनेत्री का काम कैसे लेगा&nbsp;?&nbsp;हँसू या रोऊँ&nbsp;?</p>



<p class="wp-block-paragraph">योशा चेहरे का निचला आधा भाग टस से मस नहीं हो रहा था । होठों के बायें कोने से दाना पानी टपक पड़ते हैं। बेटे के पहले जन्मदिन की पार्टी में मोमबत्ती बुझाने के लिये फूंकते नहीं बना,&nbsp;सारी हवा पहले ही बायीं तरफ से बाहर निकल गई। कुल्ला करते समय पानी की पिचकारी फुस्स हो जाती है और तिरछी दिशा में जाती है। आदत हो गई है,&nbsp;हमेशा दायें&nbsp;साईड से भोजन चबाने की / क्यों कि बायें गाल में रोटी का कौल यापानका बीड़ा चला जाए तो वहीं रह जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">योशा जब मुस्कुराती या क्रोध का भाव लाती तो होठों के दोनों किनारों में से एक ऊपर उठ जाता तो दूसरा नीचे खिंच&nbsp;जाता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अभिमन्यु के विरोध के बाद भी योशा ने रिहर्सल्स के लिए जाना शुरू कर दिया,&nbsp;ठण्डी हवा के थपेड़ों में,&nbsp;मोटरबाईक&nbsp;पर बिना मफलर या स्कार्फ के।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर घोष की बात पर भरोसा था &#8211; वायु रोग कुछ नहीं होता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">स्टेज पर परेशानियाँ थी। अभिनय की अनेक मुद्राएँ जो योशा पात्र के व्यक्तित्व व कहानी में डूब कर आसानी से अभिव्यक्त कर लेती थी,&nbsp;अब नहीं हो पा रही थीं। अनेक दृश्यों के लिए क्लोजअप के बजाय लांग शॉट से काम&nbsp;चलाया गया। गर्दन झुकाकर,&nbsp;चेहरा झुकाकर,&nbsp;मुस्कुराहटें दी गई ताकि चेहरे का तिरछा भाग थोड़ा दब जाए तथा&nbsp;समरूपी ऊपरी चेहरा अधिक उभरे। अनेक दृश्यों में पार्श्व (साईड पोज़) का सहारा लिया गया &#8211; दायां हिस्सा दर्शकों&nbsp;की तरफ हो या बायां हिस्सा किसी अन्य पात्र द्वारा बगल में खड़े होकर छिपा दिया गया हो। दीपिका पादुकोन (छपाक),&nbsp;जीनत अमान (सत्यम्‌,&nbsp;शिवम,&nbsp;सुन्दरम्‌) ने चेहरे के आधे भाग को छिपाने के लिए जो जतन किए वे भी आजमाए गए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लेकिन दुनिया के बड़े रंगमंच पर क्या करें ? मुस्कान और हँसी तथा अन्य भावभंगिमाऐँ हमारे दैनिक संवाद का अभिन्न अंग हैं। आपसी परिचय, गर्मजोशी, स्वीकार्यता,नकारना, सहकार, आनन्द &#8211; सब के लिये चेहरा बोलता है। जो योशा को लम्बे समय से जानते हैं और बेल्स पाल्सी के बाद अनेक वर्षों में मिलते रहे हैं, उनके साथ तो ठीक&nbsp; हैं, पर नये लोगों, अजनबियों का सामना मुश्किल होता है। मन में कॉम्प्लेक्स रहता है, झेंप रहती है। कितनी ही फिलासफी झाड़ लो, असहजता बनी रहती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोलते समय आवाज की मौलिकता व स्पष्टता बनाए रखने के लिए योशा तरकीब से होठों के बांयें शिथिल किनारे के नीचे अपनी अँगुली या हथेली टिका लेती मानों यह उसकी खास अदा हो। अनजान लोगों के बीच योशा ने सीख&nbsp;लिया था,&nbsp;चेहरे के भावों को जानबूझ कर दबा कर रखना,&nbsp;मौका मिलने पर ढील देना,&nbsp;छूट देना या छिपा लेना।&nbsp;अनेक वर्षों बाद एक राष्ट्रीय नाट्य समारोह में योशा और अभिमन्यु का मिलना हुआ एक पुराने कुशल अभिनेता से&nbsp;जिन्हें एक्टिंग छोड़कर स्क्रिप्ट राईटिंग का काम अपना लिया था। उसे चेहरे का लकवा एक तरफ नहीं,&nbsp;दोनों तरफ&nbsp;हुआ था,&nbsp;और ठीक नहीं हुआ था। ऐसा बिरले ही होता है। उस मित्र ने बताया किस नाट्यशास्त्र के अनुसार रसों की&nbsp;निष्पत्ति भले ही मन से शुरू होकर चेहरे तक आती हो परन्तु यह ट्राफिक एक मार्गी नहीं है।&nbsp;चेहरे की माँसपेशियों पर यदि गति न हो रही हो तो मस्तिष्क तक फीडबैक नहीं पहुँचता और रस उत्पत्ति और&nbsp;अनुभूति में कमी रह जाती है। योशा अवाक्‌ थी। वह खुद कभी-कभी ऐसा महसूस करती थी पर संकोच और&nbsp;संशय से कभी कह न पाई। उसने प्रकृति को धन्यवाद दिया कि सपाट चाँद से टेढ़ा चाँद बेहतर है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">*************************************<a></a></p>
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		<title>आप लिखें, खुदा बांचे</title>
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		<dc:creator><![CDATA[न्यूरो ज्ञान]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 08 Sep 2023 08:19:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मरीज़ कथाएँ]]></category>
		<category><![CDATA[brain attack]]></category>
		<category><![CDATA[clinical tales in hindi]]></category>
		<category><![CDATA[clinical-tales]]></category>
		<category><![CDATA[treatment of neurological diseases]]></category>
		<category><![CDATA[ब्रेन अटैक]]></category>
		<category><![CDATA[भाषा चिकित्सक]]></category>
		<category><![CDATA[मरीज़ कहानियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[मरीज़ कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[मरीजों के अनुभव]]></category>
		<category><![CDATA[मरीजों पर आधारित कहानियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[रोचक मरीज कहानियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[स्पीच लेंग्वेज पेथालॉजिस्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मैं अनपढ़ तो न था,&#160;काला अक्षर भैंस बराबर मालवा केसरी के प्रधान सम्पादक नृपेन्द्र कोहली गजब के पढ़ाकू हैं। उनकी लाइब्रेरी में हिन्दी,&#160;पंजाबी और अंग्रेजी की लगभग 10000 किताबें हैं। दसियों अखबार और पत्रिकाएँ रोज पढ़ते हैं । सम्पादकीय व अन्य लेख लिखते हैं। पांच पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। पढ़ने की गति इतनी तेज कि [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="951" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/4-5-951x400.jpg" alt="" class="wp-image-2269" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/4-5-951x400.jpg 951w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/4-5-1536x646.jpg 1536w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/4-5-2048x862.jpg 2048w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/4-5-1320x555.jpg 1320w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/4-5-300x126.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/4-5-768x323.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 951px) 100vw, 951px" /></figure>



<h2 class="wp-block-heading">मैं अनपढ़ तो न था,&nbsp;काला अक्षर भैंस बराबर</h2>



<p class="wp-block-paragraph">मालवा केसरी के प्रधान सम्पादक नृपेन्द्र कोहली गजब के पढ़ाकू हैं। उनकी लाइब्रेरी में हिन्दी,&nbsp;पंजाबी और अंग्रेजी की लगभग 10000 किताबें हैं। दसियों अखबार और पत्रिकाएँ रोज पढ़ते हैं । सम्पादकीय व अन्य लेख लिखते हैं। पांच पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। पढ़ने की गति इतनी तेज कि मानों एक एक पंक्ति बायें से दायें न पढ़ते हुए पूरा पेज व एक नजर में ऊपर से नीचे पढ़ जाते हैं। वर्टिकल रीडिंग। प्रत्येक पृष्ठ एक चेहरे के समान। हजारों पृष्ठ,&nbsp;हजारों चेहरों के समान स्मृति में भरे हुए। कहां किस पेज पर कौन से पेराग्राफ के किस कोने में क्या लिखा है,&nbsp;सब याद रहता है।</p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="960" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-4-960x400.jpg" alt="" class="wp-image-2264" style="width:839px;height:350px" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-4-960x400.jpg 960w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-4-300x125.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-4-768x320.jpg 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-4.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">सुबह पांच बजे उठकर घर के लॉन में अखबारों के बण्डल रोज की तरह आज भी उठा कर लाये और अध्ययन कक्ष की&nbsp;टेबल पर लेम्प की जगमग रोशनी में फैला दिया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अरे यह क्या?&nbsp;ये अखबार कौन सी भाषा में है । अखबारों के नाम पहचान में आ रहे हैं। फोटोग्राफ्स में पोलिटीशिन्स के चेहरे समझ आ रहे हैं। लेकिन लिखा क्या है&nbsp;? ;</p>



<p class="wp-block-paragraph">आंखें मसली। चश्मा साफ किया। प्रकाश बढ़ाया। पत्रिकाएँ भी पढ़ने में नहीं आ रही। आगे पीछे पन्ने पलटे&nbsp;।&nbsp;उल्टा सीधा घुमाया। मानों चीनी या अरबी लिपि में छपा हुआ हो या कम्प्यूटर के वर्ड प्रोसेसर में वायरस लग गई हो या उस फान्ट को सपोर्ट करने वाला साफ्टवेयर डलने से रह गया हो।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उठ कर खिड़की से बाहर नज़र फैलाई। उषा की लालिमा पूरब में उभर रही थी। चिड़ियाऐं फुदक रही थीं,&nbsp;चहचहाने लगी थी,&nbsp;टेसू का वृक्ष उनके आंगन में चैत्र की बहार पर था। दुनिया हसीन है पर कागज की दुनिया पर छपे काले अक्षरों को क्या हो गया &#8211; भैंस बराबर हो गये । कीड़े मकोड़े बन गये।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सम्पादक महोदय शहर के वी.आई.पी. होते हैं। आज की समस्या गहन गम्भीर दिख पड़ रही है। उनके लिये पढ़ना तो सांस लेने के समान है। नेत्र विशेषज्ञ ने पहले जांच करी। आंखें 100% सलामत हैं। कहीं से कहीं तक कोई खराबी नहीं। आंख के पर्दे पर जो चित्र पल पल बनते रहते हैं वे आंख के पीछे के भाग में स्थित दोनों आस्सीपिटल खण्ड में पहुंचते हैं। देखने! का असली काम आंखों में नहीं,&nbsp;दिमाग में होता है। आंखें सेवक हैं। मालिक ब्रेन है। कोहली जी बोले मेरा दिमाग बाकी सब चीजे भली भांति देख रहा है लेकिन लिपि क्यों नहीं&nbsp;?&nbsp;न देवनागरी,&nbsp;न रोमन,&nbsp;न गुरूमुखी । उन्हें तीनों भाषाओं पर पूरा अधिकार था।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="954" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-4-954x400.jpg" alt="" class="wp-image-2266" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-4-954x400.jpg 954w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-4-1536x644.jpg 1536w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-4-2048x859.jpg 2048w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-4-1320x554.jpg 1320w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-4-300x126.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-4-768x322.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 954px) 100vw, 954px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">न्यूरोलॉजिस्ट ने अनुमान लगा लिया कि पिछली रात उन्हें गुपचुप ब्रेन अटैक आया होगा । सी.टी. व एम.आर. आई. के लिये तुरन्त भेजा । शारीरिक न्यूरोलॉजिकल व प्रयोगशाला जांचों में और कोई खराबी न थी । दृष्टक्षेत्र (विज़्युअल फील्ड) में थोड़ी सी कमी थी। एक एक करके,&nbsp;दूसरी खुली आंख के सामने अंगुली दिखाकर पूछते कि दिख रही है क्या,&nbsp;और फिर उस अंगुली को ऊपर नीचे दायें बायें चारों कोनों में ले जाकर फिर पूछते दोनों आंखों से बायीं ओर की दिशा में कम दिख रहा था। जो जल्दी ही ठीक हो गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नृपेन्द्र जी की स्मृति व अन्य बौद्धिक क्षमताएँ अक्षुण्ण थीं। ‘स’&nbsp;आकार पहचान रहे थे,&nbsp;मिलान कर रहे थे। भाषा प्रवाह,&nbsp;शब्दावली,&nbsp;व्याकरण तीनों भाषाओं में उत्तम रूप था। गुनगुनाने व गाने का स्वर अच्छा था। किसी धुन का राग तुरन्त पहचान लेते थे। एक लम्बा जटिल पेराग्राफ पढ़कर सुनाया तो उसे सर-सर एक वाक्य में बोल दिया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">तीनों लिपियों का एक भी अक्षर नहीं पहचाना,&nbsp;शब्द और वाक्य की बात दूर थी। उन अक्षरों के रूप का वर्णन अटक अटक कर करा। दो खड़ी डंण्डियाँ हैं,&nbsp;उन्हें बीच में एक छोटी आड़ी डण्डी जोड़ रही है।&#8217;&nbsp;परन्तु यह कहते न बना कि अंग्रेजी का&nbsp;&#8216;एच&#8217;&nbsp;अक्षर है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मैंने उन्हें अनेक शब्द अनुशब्द युग्म बोल कर सुनाये और पूछा कि दोनों एक है या मामूली अंतर है – घर-घर, प्यार-व्यार, चाय-जाय, कोला-कोला। ध्वनियों के थोड़े से फर्क की पहचान ठीक थी। इसी प्रकार इसे जोड़े कागज़ पर छपे थे, जिन्हें बोल कर पढना नहीं था, उन्हें देखकर सिर्फ यह बताना था कि दोनों आक़ृतियों में कोई भेद है या नहीं। रोज-रोंन, चूक-चूक, थन–यन। अक्षर व् शब्दों/अन शब्दों को बोलकर पढ़ नहीं पाए। लेकिन बता दिया की कौन सा जोड़ा हुबहू एक है तथा कौन से में बारीक सा अंतर है । प्रथम पायदान सलामत थी। अगली पेडिया – अक्षर – चित्रों से ध्वनियाँ और फिर उनके अर्थ तक पहुचना-अवरुद्ध था।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="953" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-3-953x400.jpg" alt="" class="wp-image-2267" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-3-953x400.jpg 953w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-3-1536x645.jpg 1536w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-3-2048x860.jpg 2048w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-3-1320x554.jpg 1320w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-3-300x126.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-3-768x322.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 953px) 100vw, 953px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">इस तरह के मरीजों में अपने आप सुधार होता है। किसी में जल्दी,&nbsp;किसी में देर से&nbsp;।&nbsp;किसी में थोड़ा सा,&nbsp;किसी में ढेर सारा। रोग विकृति इलाके में सूजन (इडिमा) 2 सप्ताह में उतर जाता है। आसपास सोई पड़ी छोटी छोटी धमनियाँ और केपीलरिज़ सहायक रक्त प्रवाह (कोलेटरल सर्वयुलेशन) के रूप में खुल जाती हैं। खून सप्लाय यकायक रुकने से हजारों न्यूरॉन कोशिकाएँ जो मरी नहीं थीं,&nbsp;परन्तु सन्न रह गई थीं,&nbsp;शॉक या सदमे में थीं,&nbsp;फिर काम करना शुरू कर देती हैं ।</p>



<h2 class="wp-block-heading"><strong> मरता क्या न करता</strong></h2>



<p class="wp-block-paragraph">प्रथम माह में इन्हीं विधियों के चलते नृपेन्द्रजी के न केवल आक़ृतियों को पहचान (त्रिभुज,&nbsp;चतुभुर्ज,&nbsp;घन,&nbsp;सर्पिल,&nbsp;आवी) बल्कि तीनों लिपियों की पृथक पहचान बनी,&nbsp;कुछ अक्षरों की ध्वनियों का सम्बन्ध पुनर्स्थापित हुआ।&nbsp;&#8216;म&#8217;&nbsp;अक्षर को ऐसे बोलते हैं,&nbsp;किसी ने&nbsp;&#8216;स&#8217;&nbsp;ध्वनि बोली तो उसका अक्षर &#8211; ये लो,&nbsp;यहाँ रहा। अक्षरों से शब्द और शब्द में वाक्य,&nbsp;वाक्य से पेराग्राफ,&nbsp;पेराग्राफ से कहानी। बहुत लम्बी यात्रा है। बचपन में प्राथमिक शाला में पढ़े पाठ पुनः दोहराये गये। उतना ही समय,&nbsp;उतनी ही मेहनत फिर लगती है। निरक्षर से साक्षर,&nbsp;साक्षर से ड्रुतगामी पाठक की यात्रा में नृपेन्द्रजी का साथ दिया अतुलाजी,&nbsp;उनकी पत्नी ने। अतुला सान्याल कोहली,&nbsp;अंग्रेजी साहित्य में प्रोफेसर तथा उपन्यास लेखिका हैं। लिखने और पढ़ने की क्षमता को विज्ञान सम्मत और सबूत आधारित अभ्यासों की सघन श्रृंखला के समय बद्ध कोर्स द्वारा पुनः सुधारने का काम वाणी भाषा चिकित्सक (स्पीच लेंग्वेज पेथालॉजिस्ट &#8211; एस.एल.पी.) करते हैं। यामिनी रोज दो घण्टा प्रेक्टीस करवाती। अतुला के रूप में यामिनी को एक बड़ी दीदी और अंग्रेजी भाषा की कोच मिल गई। यामिनी की सगाई हो चुकी थी। फियांसी अमेरिका में था। बीसा में एक वर्ष की प्रतीक्षा थी। अंग्रेजी परीक्षा पास करने में वहां जॉब मिल जायेगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आश्चर्यजनक रूप से नृपेन्द्र कोहली तीनों भाषाओं में बिना गलती के पहले जैसे लिख लेते थे। किसी ने कुछ बोला तो श्रुतलेख सही था। मन में विचार कौंधे तो कागज पर अवतरित हो गये। लाईन ऊपर नीचे हो जाती थी। अभी का लिखा अभी पढ़ने को दो तो कुछ नहीं पढ़ पायेंगे आप लिखें खुदा बाचें । अक्षर मोती जैसे लेकिन सब भैंस बराबर ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमारे दिमाग का सिस्टम सच में जटिल है। जैसे जैसे पन्ने खुलते हैं,&nbsp;गजब का संतोष और आनन्द मिलता है। जैसे जैसे पज़ल का एक एक टुकड़ा अपनी अपनी जगह फिट होता जाता है,&nbsp;यूरेका के अनेक क्षण प्राप्त होते हैं। पढ़ने का केन्द्र और लिखने का केन्द्र दूर-दूर है। हालांकि आपस में जुड़े हुए हैं। किसी बबूला या बवण्डर के लिये सम्भव है कि उसके मार्ग में आने वाली एक झोंपड़ी उड़ जावे और पड़ौस के खेत वाली जगह बच जावे&nbsp;।&nbsp;इस जंगी मशीन का फलां स्क्रू गिर गया इसलिये वह वाला काम बंद हो गया और फलां गीयर गिस गया इसलिये यह फंक्शन चला गया। हम न्यूरोविज्ञानियों की भाषा मेकेनिकों जैसी होती है। प्रयोगशाला में बन्दर व अन्य प्राणियों के दिमाग में कंटाई छंटाई करके उनकी बदली बदली सी हरकतों का अवलोकन करते हैं। मनुष्यों में कुदरत ये क्रूर प्रयोग करती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">श्री नृपेन्द्र कोहली ने प्रेस से एक माह की छुट्टी ली। उसे तीन महीने तक बढ़ाया। पत्रकार जगत अचम्भित था। क्या हो गया है&nbsp;?&nbsp;ऊपर से ठीक दिखते हैं। पार्टी आदि में आते हैं। अतुला सान्याल का पूरा कण्ट्रोल था इनर सर्कल पर। इन्टरव्यू,&nbsp;भाषण,&nbsp;समूहचर्चा सब जारी रहे। एक छाया की तरह साथ रहती,&nbsp;जहां कोई कागज का पुर्जा या फाईल किसी ने बढ़ाई,&nbsp;उसे अपने हाथ में ले लेती। या कहलवा देती &#8211; धन्यवाद,&nbsp;सर इसे बाद में देख लेंगे।</p>



<figure class="wp-block-table"><table><tbody><tr><td><strong>तीनों लिपियों के अक्षरों की बार-बार नकल करवाई जाती है। शब्दों की स्पेलिंग मुंह से दोहराते हैं। कुछ ही दिनों में कोहली साहब अक्षरों की आकृतियां,&nbsp;कागज पर लिखने के अलावा हवा में ऊंगलियाँ फेर कर बनाने लगे। धुन के पक्के प्रोफेशनल करियर दांव पर लगा था। मरता क्या न करता।</strong></td></tr></tbody></table></figure>



<p class="wp-block-paragraph">अगले महीनों से लिप्यान्तरण के अभ्यास शुरू हुए। तीन भाषाएँ&nbsp;।&nbsp;तीन लिपियाँ । घोड़ा शब्द हिन्दी में कैसे लिखेंगे। घ में ओ की मात्रा। ड के नीचे बिन्दु और आ की मात्रा। इसी को रोमन लिपी में &#8211; जी.एच. यानि&nbsp;&#8216;घ&#8217;&nbsp;,&nbsp;फिर ओ,&nbsp;डी,&nbsp;आ। इसे अंग्रेजी में क्या कहते है &#8211; हार्स। देवनागरी में ह में आ की मात्रा,&nbsp;आधा र,&nbsp;जो कि बाद वाले अक्षर स के ऊपर लगाया जावेगा। सुधार की गति अच्छी थी। लिपि के रूपान्तरण के साथ,&nbsp;अनुवाद भी जारी था। अक्षरों और ध्वनि के अन्तरसम्बन्ध का टू- वेमार्ग पुख्ता हो रहा था। मनुष्य के डार्विनियन विकास की यात्रा में भाषा का अविर्भाग स्वतः स्फर्त रुप से दूनिया के कोने-कोने में स्वतंत्र रुप से प्रस्फुटीत&nbsp;&nbsp;हुआ। लिखित रुप बाद का विकास है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अंग्रेजी भाषा के अनेक शब्दों की स्पेलिंग उल्टी-पुल्टी होती है। नियम आधारित नहीं होती। कितने चुटकुले चलते हैं। बी.यू.टी. बट है फिर पी .यु.टी. पुट क्यों&nbsp;?&nbsp;कठिन हिज्जे वाले अनेक अंग्रेजी शब्द, अक्षर चित्र और उसकी ध्वनि सम्बन्धी नियमों का हवाला देकर नहीं पढ़े जा सकते हैं। ऐसे शब्दों को अक्षरों के समूह के बिम्ब के रूप में याद रखना पड़ता है। बहुभाषी और बहुलिपि निपुण होने का फायदा नृपेन्द्रजी को मिल रहा था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक के बाद एक मोटे रजिस्टर व नोट बुक्स भरते चले गये&nbsp;।&nbsp;प्रत्येक पृष्ठ पर तारीखें अंकित रहती।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अतुला सान्याल धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। प्रत्येक कापी के प्रथम पेज पर शुभंकर के रूप में&nbsp;&#8216;श्री&#8217;&nbsp;लिखती और एक मंत्र &#8211; वागर्थो स्प्रक्तौ उमा महेश्वरो: (कालीदास के रघुवंश से) वाणी और अर्थ आपस में उसी प्रकार जुड़े हुए हैं कि उमा (पार्वती) और महेश्वर (शिव)।</p>



<p class="has-text-align-center wp-block-paragraph">******</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong><em><mark style="background-color:rgba(0, 0, 0, 0)" class="has-inline-color has-vivid-red-color">आप लिखें, खुदा बांचे &#8211; English version (AI Generated) begins below:”</mark></em></strong></p>



<h1 class="wp-block-heading"><strong>You write, only God can read.</strong></h1>



<h3 class="wp-block-heading">I was not illiterate, yet the written word had become entirely incomprehensible to me.</h3>



<p class="wp-block-paragraph">Nripendra Kohli, the Editor-in-Chief of <em>Malwa Kesari</em>, is an avid reader. His library houses around 10,000 books in Hindi, Punjabi, and English. He reads dozens of newspapers and magazines daily, writes editorials and other articles, and has published five books. His reading speed is so fast that, instead of reading line by line from left to right, he seems to scan the whole page top to bottom in a single glance—vertical reading. Every page is like a face to him. Thousands of pages, like thousands of faces, are etched into his memory. He remembers exactly what is written on which page, in which paragraph, and in which corner.</p>



<p class="wp-block-paragraph">Waking up at 5:00 AM, he brought the bundles of newspapers from the front lawn as usual and spread them out on the study table under the bright light of the lamp.</p>



<p class="wp-block-paragraph">But what was this? What language were these newspapers in? He could recognize the names of the newspapers. He could make out the faces of the politicians in the photographs. But what was written?</p>



<p class="wp-block-paragraph">He rubbed his eyes. He cleaned his glasses. He turned up the light. Even the magazines were completely unreadable. He flipped the pages back and forth. He turned them upside down. It was as if everything was printed in Chinese or Arabic script, or a virus had infected a word processor, or the software supporting a specific font was missing.</p>



<p class="wp-block-paragraph">He got up and looked out the window. The redness of dawn was emerging in the east. Birds were hopping about and beginning to chirp; the Palash tree in their courtyard was blooming in the spring. The world was beautiful, but what had happened to the black letters printed on paper? They had become completely unintelligible, looking like scattered bugs and insects.</p>



<p class="wp-block-paragraph">The editor was a VIP in the city, and today&#8217;s problem appeared profoundly serious. For him, reading was like breathing. An eye specialist examined him first. His eyes were 100% fine; there was absolutely no defect. The images that constantly form on the retina are transmitted to both occipital lobes located at the back of the brain. The actual job of seeing doesn&#8217;t happen in the eyes, but in the brain. The eyes are merely the servants; the brain is the master.</p>



<p class="wp-block-paragraph">Kohli ji said, &#8220;My brain is seeing everything else perfectly fine, but why not the script? Neither Devanagari, nor Roman, nor Gurmukhi.&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">He had full command over all three languages.</p>



<p class="wp-block-paragraph">A neurologist deduced that he must have suffered a silent &#8220;brain attack&#8221; (stroke) the previous night. He was immediately sent for a CT and MRI. Physical, neurological, and laboratory tests showed no other abnormalities. There was a slight deficit in his visual field. When the doctor showed a finger in front of his open eye and moved it up, down, left, and right to all four corners, his vision was slightly reduced towards the left side in both eyes. However, this resolved quickly.</p>



<p class="wp-block-paragraph">Nripendra ji&#8217;s memory and other intellectual capabilities remained entirely intact. He could recognize and match the shape of the letter &#8216;S&#8217;. His language fluency, vocabulary, and grammar were excellent across all three languages. His humming and singing voice was good, and he could immediately recognize the melody of any tune. When a long, complex paragraph was read out to him, he effortlessly summarized it in a single sentence.</p>



<p class="wp-block-paragraph">Yet, he couldn&#8217;t recognize a single letter of the three scripts, let alone words and sentences. He haltingly described the shapes of the letters: &#8220;There are two vertical sticks, and a small horizontal stick joins them in the middle.&#8221; But he couldn&#8217;t identify it as the English letter &#8216;H&#8217;.</p>



<p class="wp-block-paragraph">I read out many word and non-word pairs to him and asked if they were identical or slightly different: <em>ghar-ghar</em>, <em>pyar-vyar</em>, <em>chai-jai</em>, <em>cola-cola</em>. His ability to detect slight differences in sound was perfect. Similarly, pairs were printed on paper—which he wasn&#8217;t asked to read aloud—but simply by looking at them, he had to tell if there was any difference in the shapes: <em>roz-ron</em>, <em>chuk-chuk</em>, <em>than-yan</em>. He couldn&#8217;t read the letters or words aloud, but he could point out which pair was exactly identical and which had a minute difference. The first step was intact. The subsequent steps—translating letter-images into sounds and then reaching their meaning—were blocked.</p>



<p class="wp-block-paragraph">Patients with this condition often improve on their own. Some quickly, some slowly. Some a little, some a lot. The swelling (edema) in the affected area usually subsides in two weeks. Nearby dormant small arteries and capillaries open up to provide collateral circulation. Thousands of neurons that were stunned or in shock due to the sudden halt in blood supply—but not dead—begin to function again.</p>



<p class="wp-block-paragraph">During the first month, thanks to these healing processes, Nripendra ji not only began to recognize shapes (triangle, square, cube, spiral, etc.) but also regained the ability to distinguish between the three scripts. The connection between some letters and their sounds was re-established. &#8220;This is how the letter &#8216;M&#8217; is pronounced&#8221;; if someone made the &#8216;S&#8217; sound, he could point and say, &#8220;Here is its letter.&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">From letters to words, words to sentences, sentences to paragraphs, and paragraphs to a story—it is a very long journey. Lessons learned in primary school had to be repeated. It takes the exact same amount of time and hard work all over again. In this journey from being rendered illiterate to becoming literate again, and then returning to a fast reader, Nripendra ji was supported by his wife, Atula. Atula Sanyal Kohli is a professor of English literature and a novelist.</p>



<p class="wp-block-paragraph">The task of systematically restoring reading and writing abilities through an intensive, time-bound course of science-based and evidence-backed exercises is carried out by a Speech-Language Pathologist (SLP).</p>



<p class="wp-block-paragraph">Yamini would make him practice for two hours daily. In Atula, Yamini found an older sister and an English language coach. Yamini was engaged; her fiancé was in America. She had a one-year wait for her visa and needed to pass an English exam to get a job there.</p>



<p class="wp-block-paragraph">Surprisingly, Nripendra Kohli could write in all three languages flawlessly, just like before. If someone dictated something, his transcription was completely accurate. If a thought flashed in his mind, it manifested perfectly on paper. His writing lines would sometimes drift up or down, but if you handed him what he had just written and asked him to read it, he wouldn&#8217;t be able to decipher a single word. &#8220;You write, only God can read.&#8221; The letters were beautifully formed like pearls, but to him, they were entirely incomprehensible.</p>



<p class="wp-block-paragraph">The system of our brain is truly complex. As its mysteries unfold, one experiences immense satisfaction and joy. As each piece of the puzzle fits into its rightful place, there are many &#8216;Eureka&#8217; moments. The center for reading and the center for writing are located far apart in the brain, even though they are interconnected. It is entirely possible for a tornado to blow away a hut in its path while leaving the neighboring field completely untouched. If a specific screw of this massive machine falls out, that particular function stops; if a certain gear wears out, another function is lost. The language of neuroscientists often sounds like that of mechanics. In the laboratory, we observe the altered behaviors of monkeys and other animals by carefully making changes to their brains. In humans, nature conducts these cruel experiments.</p>



<p class="wp-block-paragraph">Mr. Nripendra Kohli took a month&#8217;s leave from the press, which was later extended to three months. The journalistic world was bewildered. What had happened? Outwardly, he looked perfectly fine. He attended parties and gatherings. However, Atula Sanyal maintained complete control over his inner circle. Interviews, speeches, and group discussions all continued. She stayed with him like a shadow; whenever someone handed him a slip of paper or a file, she would smoothly take it into her own hands, or have it announced, &#8220;Thank you, Sir will look at this later.&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">He was made to copy the letters of all three scripts repeatedly. He would repeat the spellings of words aloud. Within a few days, Kohli Sahab started tracing the shapes of letters with his fingers in the air, in addition to writing them on paper. He was fiercely determined. His professional career was at stake. Desperate times call for desperate measures.</p>



<p class="wp-block-paragraph">In the following months, transliteration exercises began. Three languages. Three scripts.</p>



<p class="wp-block-paragraph">How do you write the word &#8216;Ghoda&#8217; (horse) in Hindi? &#8216;Gha&#8217; with an &#8216;O&#8217; vowel mark. &#8216;Da&#8217; with a dot underneath and an &#8216;Aa&#8217; vowel mark. The same in the Roman script: G-H (for Gha), then O, D, A. What is it called in English? <em>Horse</em>. In Devanagari: &#8216;Ha&#8217; with an &#8216;Aa&#8217; vowel mark, a half &#8216;Ra&#8217;, placed over the following letter &#8216;Sa&#8217;. The pace of his improvement was good. Along with script transliteration, translation exercises continued. The two-way street connecting letters and sounds was solidifying.</p>



<p class="wp-block-paragraph">In the journey of human Darwinian evolution, language spontaneously and independently blossomed in every corner of the world. The written form was a much later development.</p>



<p class="wp-block-paragraph">The spelling of many words in the English language is chaotic and doesn&#8217;t follow strict rules. There are so many jokes about it: If B-U-T is &#8216;but&#8217;, then why is P-U-T &#8216;put&#8217;? Many difficult English words cannot be read simply by applying the rules of letter-shapes and their corresponding sounds. Such words have to be memorized as complete visual images of letter clusters. Nripendra ji was now reaping the benefits of being multilingual and proficient in multiple scripts.</p>



<p class="wp-block-paragraph">Thick registers and notebooks filled up one after another. Dates were marked on every single page.</p>



<p class="wp-block-paragraph">Atula Sanyal was a deeply spiritual woman. On the first page of every notebook, she would write &#8216;Shri&#8217; for an auspicious beginning, followed by a mantra from Kalidasa&#8217;s <em>Raghuvamsha</em>:</p>



<p class="wp-block-paragraph"><em>Vagarthaviva sampriktau&#8230;</em></p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8220;Speech and its meaning are as inextricably united as Goddess Uma (Parvati) and Lord Maheshwara (Shiva).&#8221;</p>



<p class="has-text-align-center wp-block-paragraph">******</p>
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		<title>प्रति सेकण्ड दस बार &#8211; कम्पन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[न्यूरो ज्ञान]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 06 Sep 2023 06:47:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मरीज़ कथाएँ]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>देवादित्य सक्सेना (69 वर्ष) को आज भी याद है,&#160;हाथों के कम्पन पर उनका ध्यान पहली बार हा गया कि&#160;&#124;&#160;शायद दस वर्ष की उम्र रही होगी जब वह बड़े भैया और उनके दोस्तों के साथ टाकीज में डरावनी फिल्‍म&#160;&#8216;बीस साल बाद&#8217;&#160;देख रहे थे। अनेक दृश्यों के समय वह जोर से कांपा और बहुत देर तक कांपता [&#8230;]</p>
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<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1040" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/4-3-1040x400.jpg" alt="" class="wp-image-2257" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/4-3-1040x400.jpg 1040w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/4-3-1536x591.jpg 1536w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/4-3-2048x788.jpg 2048w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/4-3-1320x508.jpg 1320w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/4-3-300x115.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/4-3-768x295.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1040px) 100vw, 1040px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">देवादित्य सक्सेना (69 वर्ष) को आज भी याद है,&nbsp;हाथों के कम्पन पर उनका ध्यान पहली बार हा गया कि&nbsp;|&nbsp;शायद दस वर्ष की उम्र रही होगी जब वह बड़े भैया और उनके दोस्तों के साथ टाकीज में डरावनी फिल्&#x200d;म&nbsp;&#8216;बीस साल बाद&#8217;&nbsp;देख रहे थे। अनेक दृश्यों के समय वह जोर से कांपा और बहुत देर तक कांपता रहा। कम्पन सबसे ज्यादा हाथों में था। डर-डर के बाथरुम जाते समय पांव भी कांप रहे थे। मां के बिस्तर में घुस कर जैसे-तैसे नींद आई। पिताजी ने सोचा- बेटा ज्यादा ही डरपोक है।<a></a></p>



<p class="wp-block-paragraph">इसके बाद अनेक अवसरों पर हाथ कांपते और थोड़ी देर में ठीक हो जाते- स्कूल में मौखिक परीक्षा में,&nbsp;खेल के मैदान में विरोधी टीम के कप्तान से गुस्से में बहस करते समय और किशोरावस्था में प्रिय लगने वाली सुन्दर लड़की से शर्मा कर बात करते समय।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बड़े भैया के एक डॉक्टर दोस्त से उनके घर पर देवादित्य ने सकुचाते हुए अपनी बात बताई। भैया ने कहा- इसको मजबूत बनने की दवा दो न। हर कभी डर जाता है,&nbsp;गुस्से में होता है तो बस थर-थर कांपता ही रहता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर भैया बोले यह तो नॉर्मल है। यह फिजियोलॉजिकल ट्रेमर का अतिरंजित रुप है,&nbsp;जो तनाव पूर्ण परिस्थितियों में थोड़ी देर रहता है,&nbsp;चला जाता है। इसके लिये कोई इलाज की जरुरत नहीं। इसका इलाज है भी नहीं। मन से मजबूत होने के लिये रोज योग और प्राणायाम कर लिया करो। देवादित्य को योगाभ्यास बोर लगता था। मन मान कर एक महीने तक किया। उसे कोई फर्क नजर नहीं आया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद दो बार इन्टरव्यूह में नौकरी से चूक गया। सारी तैयारी की थी,&nbsp;मन को शान्त रखने के लिये। गायत्री मंत्र का जाप किया था। हनुमान चालीसा बुदबुदा रहा था। पिछली रात नींद गहरी आए इसलिए एक गोली भी खा ली थी। इन्टरव्यूह के सवालों के अच्छे उत्तर दिये थे। ऊपरी तौर पर मन में व्यग्रता अधिक प्रतीत नहीं हो रही थी। दिल की धक-धक बढ़ी हुई महसूस नहीं हो रही थी। हथेलियों व ललाट पर पसीना नहीं आया था। फिर भी हाथों का कम्पन ज्यादा हो रहा था। बोर्ड के सदस्यों को अपनी डिग्रियां सौंपते समय,&nbsp;कागज फड़फड़ा रहे थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक अन्डरटेकिंग पर हस्ताक्षर के समय तो इंतिहा हो गये- लिखते बना ही नहीं। पूर्ववर्ती दस्तखतों से मिलान नहीं हो पाया। देवादित्य उदास रहने लगा। माँ और पिताजी हौसला बढ़ाते&nbsp;|&nbsp;माँ ने बोला कि थोड़ा बहुत कम्पन तो तुम्हारे पिताजी को भी होता है,&nbsp;पर वो जैसे तैसे मेनेज कर लेते हैं। मैंने अनेक बार गौर किया था कि चाय कॉफी ज्यादा पीने के बाद उनकी धूजनी बढ़ जाती थी। इसलिये पिछले बीस सालों से हमने घर में चाय-कॉफी रखना बन्द करवा दी थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हां,&nbsp;तुम्हारे दादाजी को बुढ़ापे की उम्र में न केवल हाथों में बल्कि पूरे शरीर में लगभग लगातार कम्पन होता रहता था। तुम छोटे थे जब वे गुजर गये थे। इसलिये तुम्हें ध्यान नहीं होगा। दादाजी तो हर काम के लिये मोहताज हो गये थे। खाना,&nbsp;पीना,&nbsp;कुछ देना या लेना,&nbsp;नहाना,&nbsp;कपड़े पहनना- हर पल उन्हें असिस्टेंट लगता था। गांव का पुराना भक्त सेवक मोनू उनका सहारा था। दादी तो बहुत पहले चली गई थी। उस समय गांव के बैदराज ने बताया था कि कम्पवात रोग खानदानी होता है। किसी दवा ने असर नहीं किया था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बीस के दशक में देवादित्य के कम्पन अब प्रतिदिन नजर आने लगे थे। धीमी गति से ही सही,&nbsp;साल-दर-साल उनकी तीव्रता बढ़ने लगी थी। मोहल्ले के लोकल जनरल प्रेक्टीशनर ने चार माह तक बदल-बदल कर अनेक प्रकार की विटामिन व टॉनिक दिये। शायद कमजोरी के कारण यह तकलीफ है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“कमजोरी”&nbsp;एक लोकप्रिय आसान उत्तर है। नानाबिध लक्षणों के लिये। कौन सा रोग,&nbsp;कौन सा लक्षण,&nbsp;कौन सी मनः स्थिति नहीं है जिसे&nbsp;“कमजोरी”&nbsp;का हवाला देकर समझाया न जा सके&nbsp;|&nbsp;डॉक्टर यदि पशोपेश में हो,&nbsp;पता नहीं क्या रोग है,&nbsp;क्यों है,&nbsp;तो मरीज के घर वाले खुद सुझाव देते हैं, “डॉक्टर साहब लगता है&nbsp;“कमजोरी से है”, “थकान से है“, “सीत (ठण्डक) से है”, “बद्दलों से है”, “मौसम से है“, “टेंशन लेने से है” &#8211;&nbsp;डॉक्टर इस छोर को लपक कर पकड़ता है।&nbsp;“हाँ-हाँ,&nbsp;इसी से है”। मरीज भी संतुष्ट। डॉक्टर भी संतुष्ट। क्या सच में संतुष्ट?&nbsp;डॉक्टर के लिये यह एक आसान सा पलायन हैं। उसे तो सत्य अन्वेषक की कठिन डगर पर चलना है।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="959" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-3-959x400.jpg" alt="" class="wp-image-2251" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-3-959x400.jpg 959w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-3-1536x641.jpg 1536w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-3-2048x855.jpg 2048w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-3-1320x551.jpg 1320w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-3-300x125.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-3-768x320.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 959px) 100vw, 959px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">फेमिली फिजिशियन ने टेंशन कम करने के लिये नींद जैसी गोलियां,&nbsp;लो डोज में लेने को कहा। कम्पन कम नहीं हुए पर साईड इफेक्ट थे। दिन भर सुस्ती बनी रहती थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">गर्लफ्रेन्ड शैलजा मस्त लड़की थी। धूजने के ऊपर तरह-तरह के जोक बना लेती,&nbsp;देव को चियरअप करने के लिये गाने गाकर सुनाती,&nbsp;पिक्चरें ले जाती। एक दिन बोली,&nbsp;मैंने पांच-छः बार नोटिस किया है कि जब तुम ड्रिंक कर लेते हो तो ज्यादा सोबर दिखते हो,&nbsp;मतलब कि तुम्हारे हाथ स्थिर और सधे हुए रहते हैं। ऐसा करते हैं कि कल के महत्वपूर्ण इन्टरव्यू के लिये दो छोटे पेग लेकर जाना।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सच में कम्पन बन्द थे। परन्तु दुर्भाग्य से इन्टरव्यूह बोर्ड के एक सदस्य को शराब की गन्ध के प्रति बेहद संवेदनशीलता,&nbsp;एलर्जी और घृणा थी। सब कुछ गुड़ गोबर हो गया। देवादित्य को वैसे भी शराब में आनन्द नहीं मिलता था। पता नहीं ये&nbsp;&#8216;हाय&#8217;&nbsp;क्&#x200d;या होता है?&nbsp;उसमें क्&#x200d;या “फिल गुड” होता है? शराब का कड़वा स्वाद नहीं भाता, छाती और पेट में गैस और एसिडिटी बढ़ जाती है,&nbsp;खड़े होने,&nbsp;चलने पर असंतुलन महसूस होता है|, चेहरा गरम व् लाल हो जाता है| चाहे मेरे कम्पन कुछ देर के लिये कम हो जावें,&nbsp;इस रास्ते मुझे नहीं जाना। वैसे भी पूरे घर परिवार में अनेक पीढ़ियों से किसी ने शराब को छुआ भी नहीं था। बचपन से वही संस्कार मिले थे। देवादित्य और शैलेजा को अगले सप्ताह राज्य राजधानी में लोक सेवा आयोग की बड़ी परीक्षा में जाना था। सुबह जायेंगे,&nbsp;शाम को लौट आयेंगे। शैलजा ने वहां के प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अक्षय जौहरी से अपाइन्टमेंट ले लिया था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर के सामने ज्यादातर हिस्ट्री शैलजा ने बताई&nbsp;“सर,&nbsp;इनके हाथ उस समय नहीं कांपते जब ये शान्त,&nbsp;हाथ पर हाथ धरे बैठे हों। जब हाथों को उठाकर कुछ देर हवा से स्थिर रखते हैं तो चालू हो जाते हैं। जब तक बने रहते हैं तब तक कि हाथ ऊपर हों। यदि उनसे कोई काम कर रहे हों तो भी नहीं कांपते। फिर उन्हें टेबल या कुर्सी के हत्थे पर रख दो तो गायब। बिस्तर पर लेटे में या नींद में नहीं रहते। चाय की प्याली,&nbsp;पानी का ग्लास,&nbsp;हाथ में कलम,&nbsp;चाय की केतली,&nbsp;हाथों में अखबार या पुस्तक,&nbsp;मूंछ के बाल काटने की कैंची,&nbsp;पेंटिंग करते समय ब्रुश- इन सब परिस्थितियों में कम्पन रहता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">और मजेदार बात है कि शराब का असर रहने तक धूजना बन्द। पर इन्हें शराब पसन्द नहीं। सुना है कि इनके दादाजी का 70 वर्ष की उम्र के बाद कम्पन बहुत ज्यादा हो गया था,&nbsp;जबकि पिताजी को 55 की उम्र में इनसे कम है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉ. जौहरी के बारे में प्रसिद्ध था कि वे मरीज व परिजनों से हिस्ट्री सुनते समय कभी टोकते नहीं थे,&nbsp;रोकते नहीं थे,&nbsp;पूछते नहीं थे। बस इतनी आवाज निकलती- हूँ&#8230;&#8230; हूँ&#8230;. हाँ&#8230;. और क्या&#8230;&#8230;&#8230;फिर&#8230;..और आगे&#8230;&#8230;] जब मरीज के तरफ से बन्द हो जाये तो कुछ स्पष्टीकरण प्राप्त करते,&nbsp;छूटी हुई रिक्त स्थानों की पूर्ति के सवाल पूछते,&nbsp;उल्टी-पुल्टी कहानी को सिलसिले से जोड़कर मरीज को सुनाते,&nbsp;पुष्टि करवाते कि ऐसा ही हुआ है न। इसके बाद भी मरीज को समय देते कि कुछ और कहना हो तो कह दें। वे शैलजा से बोले काश अधिकांश मरीज और परिजन आप के समान,&nbsp;एक रौ में सारी बातें,&nbsp;बिना अनावश्यक डिटेल के सुना देवें तो हम डॉक्टरों का न केवल समय बचेगा बल्कि निदान और इलाज भी बेहतर होगा ।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">देवादित्य ने अपना डर बताया- मुझे लगता है मैं बूढ़ा होने के पहले ही दादाजी की हालत में पहुंच जाऊंगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉ. जौहरी- सही है कि यह अवस्था आनुवांशिक है,&nbsp;परन्तु आपके दादाजी का वक्त अलग था। उन्हें कोई इलाज नहीं मिला होगा। अब अनेक औषधियां और दूसरे उपाय है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शैलजा- कहीं यह पार्किन्सन रोग का कम्पन तो नहीं?&nbsp;मैंने अखबार में पढ़ा था कि पार्किन्सन में ऐसे ही कम्पन होते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर- पार्किन्सन रोग का कम्पन अलग प्रकार का होता है। उसे रेस्टिंग ट्रेमर कहते हैं। आराम की अवस्था में कम्पन।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आपके पति को &#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</p>



<p class="wp-block-paragraph">शैलजा- पति नहीं फ्रेन्ड हैं</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर- आई एम सॉरी..</p>



<p class="wp-block-paragraph">देवादित्य- सॉरी की कोई बात नहीं। लगभग फियान्सी ही समझो। इस परीक्षा में पास होकर अच्छी नौकरी लग जावे तो अगले वर्ष शादी की योजना है। पर इस रोग के कारण यदि मैं अपाहिज हो गया तो शैलू की जिन्दगी बर्बाद नहीं करना चाहूँगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शैलजा- मेरी जिन्दगी तुम्हारे बिना बर्बाद रहेगी। मैं दुनिया के किसी भी कौने में जाकर तुम्हारा इलाज करवाऊँगी।</p>



<h2 class="wp-block-heading">पोश्चरल ट्रेमर या इसेन्शियल ट्रेमर</h2>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर- आमतौर पर इस अवस्था में- जिसे पोश्चरल ट्रेमर या इसेन्शियल ट्रेमर कहते हैं,&nbsp;व्यक्ति लगभग सामान्य जीवन व्यतीत करता है। इसका कारण जिनेटिक है पर जीन में म्यूटेशन विकृति क्यों आई,&nbsp;इसका उत्तर नहीं है। पोश्चरल ट्रेमर का मतलब है कि कम्पन उन्हीं पोश्चर या उद्रा या अदा में होता है जब हाथ या अन्य अंग गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध ऊपर उठे हुए हो। जहाँ सहारा मिला,&nbsp;ग्रेविटी का जोर खत्म और कम्पन गायब।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1036" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-3-1036x400.jpg" alt="" class="wp-image-2255" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-3-1036x400.jpg 1036w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-3-1536x593.jpg 1536w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-3-2048x790.jpg 2048w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-3-1320x509.jpg 1320w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-3-300x116.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-3-768x296.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1036px) 100vw, 1036px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">देवादित्य- क्या रोग को आगे बढ़ने से रोका नहीं जा सकता?</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर- बहुत सारे मरीजों बीमारी खुद ही रुकी रहती है या अत्यन्त धीमी गति से आगे बढ़ती है। हमारे साइन्स में अभी कोई उपाय नहीं है। कम्पन को दबाये रखने के लिये लगातार गोलियां खाना पड़ेगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दो मुख्य औषधियाँ है- प्रोप्रेनोलॉल और प्रिमिडान।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शुरु में कोई एक और बाद में शायद दोनों। दैनिक खुराक धीरे-धीरे बढ़ाते हैं। आमतौर पर साइड इफेक्ट कम है। फिजियोथेरापिस्ट ने सलाह दी कि कलाई पर वजनदार कड़ा या वेट-कफ बाँधे रहो तो कम्पन कुछ दब जाते हैं। अपनी कोहनी को सहारा देकर रखोगे तो हाथों का कम्पन कम होगा। चाय की प्याली या अन्य वस्तुएं दोनों हाथों से पकड़ो। बैंक रिकार्ड में नये आसान हस्ताक्षरों का नमूना दर्ज करवाओ। याद रखो कि व्यग्रता,&nbsp;क्रोध,&nbsp;भय जैसी भावनाओं से कम्पन बढ़ेगा। जहां तक बने,&nbsp;उनसे बचो और कंट्रोल करो। चाय,&nbsp;कॉफी,&nbsp;कोकाकोला,&nbsp;वे सभी पदार्थ जिनमें केफीन रहता है,&nbsp;कम्पन को बढ़ाते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नौकरी लगने और शादी के बाद बीस वर्षों तक दवाइयों और अन्य सावधानियों के बल पर जिन्दगी अच्छी चली। कम्पन था और अन्दर ही अन्दर हौले-हौले बढ़ रहा था। देवादित्य को पेन्टिंग और गिटार का शौक था जो धीरे-धीरे कम करना पड़ रहा था,&nbsp;क्योंकि अच्छे से हो नहीं पाता था। गाने की रियाज बखूबी जारी थी। दो बच्चे हुए। गर्भधारण करते समय प्रश्न उठा था- रोग होने की 50 प्रतिशत आशंका किसी बच्चे में आयेगी या नहीं,&nbsp;क्या उसे भ्रूण की आरम्भिक अवस्था में पता कर सकते हैं कि खराब जीन आई है या नहीं?&nbsp;क्या भ्रूण अवस्था में जीन ठीक कर सकते हैं?&nbsp;क्या उस डिम्ब का गर्भपात करवा लेना चाहिये। देवादित्य उहापोह में था। अन्ततः शैलजा ने अन्तिम निर्णय सुनाया- बच्चे जैसे भी होंगे,&nbsp;हमारे होंगे,&nbsp;प्यारे होंगे,&nbsp;अच्छे होंगे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">साठ वर्ष की उम्र तक आते आते देवादित्य को खड़े रहते समय पैरों में हल्का कम्पन महसूस&nbsp;होने लगा था। दफ्तर में उसने हाई बेकरेस्ट (ऊंची पीठ) वाली की कुर्सी रखी थी,&nbsp;क्योंकि&nbsp;यदि सिर पीछे आहिस्ता से टिका हुआ न हो तो मुन्डी-खोपड़ी भी हिलती दिखती थी। सामने&nbsp;वाला व्यक्ति यदि पहली बार मिले तो सोचता रहे कि ये बन्दा हाँ कर रहा है या ना।</p>



<h2 class="wp-block-heading">पोश्चरल / इसेन्शियल ट्रेमर मरीजों की सोसायटी </h2>



<p class="wp-block-paragraph">डॉ. जौहरी की सलाह व प्रेरणा से देवादित्य और शैलजा ने शहर और सम्भाग भर के&nbsp;पोश्चरल / इसेन्शियल ट्रेमर मरीजों की एक सोसायटी का गठन किया जिसमें एक वर्ष में&nbsp;सदस्य संख्या&nbsp;400&nbsp;के पार पहुँच गई। त्रैमासिक मीटिंग होती,&nbsp;न्यूजलेटर छपता,&nbsp;ऑनलाईन&nbsp;सोशल मीडिया पर समूह बन गये।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक से एक अनूठी अजीब दास्तानें बयां हुई।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक डॉक्टर साहब इंग्लैण्ड में बच्चों के हृदय रोग के सर्जन थे। बीमारी के कारण शल्य क्रिया&nbsp;छोड़ना पड़ी। अब भारत आकर वन्य जीवों के संरक्षण हेतु काम करने वाले एन.जी.ओ. के&nbsp;साथ जुड़े हैं। सुरेन्द्र ने संस्था के फेसबुक पेज पर अपनी कहानी,&nbsp;चित्र और वीडियो शेयर&nbsp;किये । &#8216;मुझे कक्षा&nbsp;6-7&nbsp;में समझ आ गया था कि मैं कादूनिस्ट बनना चाहूंगा। मेरा करियर&nbsp;ठीक ठाक चल रहा था कि&nbsp;30&nbsp;वर्ष की उम्र में इसेन्शियल ट्रैमर तीव्रता के साथ प्रकट हुई।&nbsp;मेरी कला पर असर पड़ा,&nbsp;लेकिन मैं काम करता रहा। समय ज्यादा लगता,&nbsp;मेहनत बढ़ गई,&nbsp;बार-बार ड्राईंग बनाना पड़ती। गोलियों से लाभ है,&nbsp;मैं सामाजिक कीड़ा हूँ,&nbsp;लोगों के बीच&nbsp;झेंपना कैसा?&nbsp;सीधे-सीधे कह डालो,&nbsp;मुझे यह है और मैं नॉर्मल हूँ। जेब में एक छोसा कार्ड&nbsp;रखता हूँ जिसमें ट्रेमर के बारे में संक्षिप्त जानकारी छपी है। उसे बांटता रहता हूँ।&nbsp;“लो पढ़&nbsp;लो। कोई बड़ी बात नहीं है। कृपया अब आगे से मेरे कम्पन की तरफ मत घूरना,&nbsp;मैं सुरेन्द्र हूँ,&nbsp;मैं कम्पन नहीं हूँ। यदि मीटिंग के पहले से लोगों को मेरी अवस्था के बारे में बता दूँ तो&nbsp;अच्छा रहता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">60 वर्षीय निर्मला जी हायर सेकेण्डरी स्कूल में प्राचार्या हैं। रिटायरमेन्ट के पांच साल बचे हैं। घर में कमाने वाली एक मात्र सदस्य है। उन्होंने बताया कि दिमाग का डी.बी.एस. ऑपरेशन (डीप ब्रेन स्टीम्युलेशन) एक साल पहले श्री चित्रा अस्पताल त्रिवेन्द्रम में करवाया और बहुत लाभ है। महंगा जरुर है (रु. दस लाख)। पर मेरे लिये जरुरी था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">39 वर्षीय सुशील ट्रान्सजेंडर है,&nbsp;जो खुले आम अपना यौन पहलू सबको बताते हैं। उन्होंने मीटिंग में आव्हान किया कि स्थानीय मेडिकल कॉलेज के न्यूरोलॉजी विभाग में बीमारी के इलाज हेतु एक नयी औषधि पर शोध शुरु हुई है। मैं उसमें शरीक हुआ है,&nbsp;आप लोग भी हो सकते हैं। देखते ही देखते दस परिवार खड़े हो गये। शोध के बिना नयी बेहतर औषधियां कैसे विकसित होंगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉ. जौहरी ट्रेमर सोसायटी के वार्षिक सम्मेलन में इस बार लॉस एंजिलेस के विश्व प्रसिद्ध मूवमेन्ट डिसऑर्डर विशेषज्ञ डॉ. लारेन्स स्मिथ को बुला लाये जो संयोगवश किसी मीटिंग में भारत आये हुए थे। डॉ. लारेन्स ने अद्यानुतन शोध व भविष्य की संभावनाओं के बारे में बताया।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1040" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-2-1040x400.jpg" alt="" class="wp-image-2254" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-2-1040x400.jpg 1040w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-2-1536x591.jpg 1536w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-2-2048x788.jpg 2048w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-2-1320x508.jpg 1320w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-2-300x115.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-2-768x295.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1040px) 100vw, 1040px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">उनके अनुसार सभी प्राणियों के मस्तिष्क में सेरीबेलम,&nbsp;बेसल गेंगलिया,&nbsp;थेलेमस और कार्टेक्स के मध्य एक परिपथ (सर्किट) में 8-42 बार प्रति सेकण्ड के दर से सतत्‌ विद्युतीय तरंग बहती रहती है। यह ताल हमारे अंगों की गति के लिये एक स्थिर आधार बनाती है,&nbsp;संगत देती है। उत्तेजना के क्षणों में यह अनुनाद उभर कर सतह पर आता है और फिर डूब जाता है। इसेन्शियल ट्रेमर के मरीजों में उक्त परिपथ में असन्तुलन आ जाता है और बढ़ता जाता है। डी.बी.एस. ऑपरेशन द्वारा परिपणथ की एक भुजा को आंशिक रुप से काट कर सन्तुलन पुनः स्थापित करते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉ. लॉरेन्स के भाषण का हिन्दी अनुवाद सुनाते-सुनाते,&nbsp;डॉ. जौहरी अपने समूह के सदस्यों से कहने लगे&#8211; कितनी अजीब बात है न कि एक तबला या तम्बूरा दिन रात एक चाल से हमारे शरीर में गुप्त रुप से कम्पायमान रहता है। कुछ तार ढीले हो जाते हैं तो कैसा परिणाम मिलता है?&nbsp;शुक्र है विज्ञान का कि इतना कुछ मालूम पड़ा है। इसी के बाद तो उपचार की शोध शुरु हुई है।</p>



<figure class="wp-block-table"><table><tbody><tr><td><strong>डॉ.&nbsp;लॉरेन्स स्मिथ ने देवादित्य को लॉस एंजेल्स आने का एपाइन्टमेंट दिया। बिना खोपड़ी में छेद किये या तार डाले,&nbsp;ध्वनि तरंगों की एक अत्यन्त सटीक (फोकस्ड) बीम (अल्टासाउण्ड) द्वारा दिमाग के केन्द्रीय भाग में थेलेमस नामक रचना में चीरा लगाकर कम्पन ठीक कर दिया गया।</strong></td></tr></tbody></table></figure>



<p class="wp-block-paragraph">शैलजा शिकायत करती हैं कि ऑपरेशन के बाद में,&nbsp;उनके किचन में बिजली का खर्च बढ़ गया है,&nbsp;क्योंकि पहले मिक्सी का काम देव के दोनों हाथ ही कर देते थे। निर्मलाजी के डीप ब्रेन स्टीमुलेशन ऑपरेशन में खोपड़ी में छेद कर के मस्तिष्क की गहराई में दो तार स्थाई रूप से फिट कर दिये गये थे और बाहर एक छोटी सी पेस मेकर बेटरी से 24&#215;7 लगातार लघु विद्युत प्रवाह जारी रहता था।</p>



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		<title>भटका हुआ दुध वाला (कल आज और कल)</title>
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		<pubDate>Sat, 02 Sep 2023 10:53:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मरीज़ कथाएँ]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>घनश्याम दूध वाले का धंधा अच्छा चलता था। मदनपुर के अनेक मोहल्लों और आसपास के गांव का चप्पा चप्पा मोटर बाइक पर घूमना और दूध बांटना था। गोरा चिट्टा गोल चेहरा,&#160;घुंघराले बाल,&#160;चमकीली आंखें,&#160;घनी मूँछे,&#160;गठीला कसरती बदन,&#160;मुख पर सदा मुस्कान रहती थी। उसके ग्राहक, ग्राहक कम दोस्त ज्यादा थे। खूब हंसी मजाक करता था।&#160;20&#160;वर्ष की उम्र [&#8230;]</p>
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<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="960" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/featured2-960x400.jpg" alt="" class="wp-image-2892" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/featured2-960x400.jpg 960w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/featured2-300x125.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/featured2-768x320.jpg 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/featured2.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">घनश्याम दूध वाले का धंधा अच्छा चलता था। मदनपुर के अनेक मोहल्लों और आसपास के गांव का चप्पा चप्पा मोटर बाइक पर घूमना और दूध बांटना था। गोरा चिट्टा गोल चेहरा,&nbsp;घुंघराले बाल,&nbsp;चमकीली आंखें,&nbsp;घनी मूँछे,&nbsp;गठीला कसरती बदन,&nbsp;मुख पर सदा मुस्कान रहती थी। उसके ग्राहक, ग्राहक कम दोस्त ज्यादा थे। खूब हंसी मजाक करता था।&nbsp;20&nbsp;वर्ष की उम्र से पिताजी का व्यवसाय संभाल रहा था, क्योंकि रीड की हड्डी की चोट के कारण उसके पिताजी का चलना फिरना बंद हो गया था। दुकान बड़ी कर ली थी।&nbsp;&nbsp;डेयरी के सब पदार्थ उच्च क्वालिटी के रखता था।3&nbsp;लोडिंग रिक्शा चलते थे जो कुछ दूर के गांव में थोक सप्लाई करते थे। लेकिन अपनी बाइक से रोज सुबह&nbsp;5:00&nbsp;से&nbsp;8:00&nbsp;बजे फेरी लगाना उसने ना छोड़ा था। अपने साथ किसी को ना रखता था। ज़िद थी अकेले जाने की। ज्यादा पढ़ा लिखा ना था पर सब ग्राहकों के नाम व घर के रास्ते दिमाग में याद थे,&nbsp;&nbsp;किसी कॉपी में लिखे न ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">फ​​रवरी&nbsp;2013&nbsp;में मस्तिष्क ज्वर हुआ। हर्पीस सिंपलेक्स नामक एक वायरस ने दिमाग में इंफेक्शन करा। बुखार,&nbsp;सिरदर्द,&nbsp;उल्टियां,&nbsp;फिर सन्निपात [डिलिरियम],&nbsp;मिर्गी जैसे लगातार दौरे,&nbsp;गहरी बेहोशी।<br>दो&nbsp;सप्ताह आईसीयू में रहा। धीरे-धीरे होश आ गया। शुरू में बातचीत,&nbsp;उल्टी पुल्टी बहकी बहकी सी थी। किसी को पहचानना,&nbsp;किसी को नहीं। एक माह बाद सब कुछ ठीक-ठाक लगने लगा था। घरवाले खुश और कृतज्ञ थे। डॉक्टर साहब ने हमारे घनश्याम की जान बचा ली। परिजनों,&nbsp;पड़ोसियों और मित्रों को पहचानता था,&nbsp;&nbsp;कुछ अटक अटक कर बात कर लेता था। लेकिन सब कुछ ठीक-ठाक नहीं था। शुरू के उत्साह में ध्यान नहीं गया था,&nbsp;परंतु दिमाग में गोबर गड़बड़ी थी।</p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="1016" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/meningitis-1016x400.jpg" alt="" class="wp-image-2230" style="width:686px;height:auto" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/meningitis-1016x400.jpg 1016w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/meningitis-1536x605.jpg 1536w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/meningitis-2048x806.jpg 2048w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/meningitis-1320x520.jpg 1320w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/meningitis-300x118.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/meningitis-768x302.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1016px) 100vw, 1016px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">घर पर आने के बाद पहली रात,&nbsp;को मां माधुरी ने एक नन्हा शिशु घनश्याम की गोद में रखा और चहक कर बोली “लो जी,&nbsp;लाड़ कर लो,&nbsp;ये अपना गुड्डू आया है। आप जब आईसीयू में थे,&nbsp;उन्हीं दिनों डिलीवरी हुई। एक साथ सब हो गया। नॉर्मल हुआ।&nbsp;3&nbsp;किलो का था। सब कहते हैं मेरे ऊपर गया है”। घनश्याम ने बच्चे को गोद में लिया मुस्कुराया सिर पर हाथ फेरा,&nbsp;बोला “बहुत प्यारा है,&nbsp;किसका है”?&nbsp;&nbsp;माधुरी किसका क्या, अपना है।&nbsp;आप बीमार पड़े जब मेरे को नवा महीना पूरा होने वाला था। घनश्याम – “तुम प्रेग्नेंट कब हुई,&nbsp;कैसे हो गई?&nbsp;तुमने तो&nbsp;copper-t&nbsp;लगवा रखी थी ना?&nbsp;अपनी साक्षी के बाद से? माधुरी&nbsp;&#8211;&nbsp;&nbsp;“क्या हो गया है,&nbsp;आपको?&nbsp;कैसी बातें कर रहे हो?&nbsp;पिछले साल साक्षी के पांचवे जन्मदिन के बाद अपने सोचा था कि अब दूसरा बच्चा प्लान कर लेते हैं। </p>



<p class="wp-block-paragraph">घनश्याम भ्रमित और चुप था। माधुरी सिर पकड़े बैठी थी । बच्चा रोने लगा था। माधुरी ने उसे दूध से लगा लिया और सोचने लगी शायद कमजोरी बहुत आ गई है या दिमाग में टेंशन ज्यादा ले लिया है। फिर बोली बच्चा रात में बार-बार उठता है,&nbsp;इसलिए मैं उसे लेकर दूसरे कमरे में सोती हूं। आपको आराम की जरूरत है । लो यह दूध पी लो। घनश्याम को नींद नहीं आ रही थी। जोर की आवाज के साथ बड़े हॉल में टीवी देख रहा था। </p>



<p class="wp-block-paragraph">“माधुरी ने पूछा –&nbsp;&nbsp;“दूध पी लिया” । </p>



<p class="wp-block-paragraph">“घनश्याम&nbsp; “कौन सा दूध?&nbsp;कब दिया?” </p>



<p class="wp-block-paragraph">“माधुरी &#8211; “अपने हाथों से तुम्हें पकड़ा&nbsp;&nbsp;कर आई थी।“ झुंझला के अंदर गई। दूध का गिलास खाली था। बुद्बुदाती रही “पीं तो लिया है पर बनते हैं।“ </p>



<p class="wp-block-paragraph">“इतने में माँ आई।“ </p>



<p class="wp-block-paragraph">“घनश्याम को गले लगाया और बलैन्या लेते हुए बोली – “देखो मेरे पोते को,&nbsp;कितना सुंदर बेटा जना है हमारी बहू ने। इधर तेरा अस्पताल जाना हुआ उधर यह नए मेहमान आ टपके।“ </p>



<p class="wp-block-paragraph">“घनश्याम&nbsp; &#8211; “कौन सा पौता?&nbsp;कौन सा बेटा?&nbsp;हमारी साक्षी अभी&nbsp;3&nbsp;साल की है। माधुरी ने&nbsp;copper-t&nbsp;लगा रखी है। हमारी प्लानिंग नहीं है अभी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“मां &#8211; “ हाय दैया ! शुभ शुभ बोल। बड़ी मन्नतो के बाद पूरे खानदान में बैटा हुआ है,&nbsp;क्यों बहू तुमने गुड्डू इस की गोद में नहीं दिया क्या? </p>



<p class="wp-block-paragraph">“माधुरी &#8211; “माजी,&nbsp;दिया था लेकिन इन्हें कुछ याद नहीं। उस बच्चे को मानते ही नहीं। </p>



<p class="wp-block-paragraph">“घनश्याम -“ कौन सा बच्चा,&nbsp;तुमने मेरी गोद में दिया?&nbsp;कब दिया?”&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">ऐसे अनेक वाक्य अगले दिन,&nbsp;हर पल होने लगे। सबका माथा ठनका। यह तो ठीक नहीं है। अनेक अजीब बातें हो&nbsp;&nbsp;रही थी। स्मृति थी और नहीं थी। पज़ल के कुछ पीस थे कुछ नहीं थे। उसी दिन शाम को वॉलीबॉल टीम की टोलि आ धमकी।&nbsp;&nbsp;पिछले&nbsp;10&nbsp;वर्षों से रोज शाम को&nbsp;2&nbsp;घंटे मैच चलता था। घनियारी थी। सब को पहचाना,&nbsp;पुरानी यादें ताजा करी। उनमें से&nbsp;2&nbsp;नए मेंबर जो साल भर पहले जुड़े थे और जिनके साथ खूब जमती थी,&nbsp;उन्हें नहीं पहचाना । यह भी याद नहीं था कि&nbsp;6&nbsp;माह पहले उनकी टीम डिस्ट्रिक्ट टूर्नामेंट में फाइनल में हार गई थी। दो&nbsp;&nbsp;साल के पहले तक का लगभग सब कुछ ठीक-ठाक याद था। थोड़ी बहुत चुंक तो उसमें भी थी पर यूं शायद किसी का ध्यान न जावे। यहां तक तो सहन हो सकता था।&nbsp;2&nbsp;साल का गुड्डू है तो है,&nbsp;काम धक जाएगा। अधिक विकराल समस्या&nbsp;दो थी ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">1. पुरानी यादों में भी एक खास चीज पर चुन चुन कर पोछा फिर गया था। भूगोल की यादें। दुनिया जहान का कॉपी-किताब,&nbsp;नक्शेवाला भूगोल नहीं। खुद की कोठी,&nbsp;गांव और मुहल्लो का भूगोल। बाथरूम की जगह चौके में पहुंच जाना। अगवाडे की जगह पिछवाड़ा। पिताजी ने बुलाया है तो सोचता रहता. किधर जाऊं,&nbsp;कैसे जाऊं, कोई इशारा ना करें तो भटकता रहता था। मोहल्ले का मंदिर,&nbsp;अली की दरगाह,&nbsp;संस्कृत पाठशाला,&nbsp;पुरानी बावडी,&nbsp;बनिये की दुकान&nbsp;,&nbsp;मोटर मैकेनिक का गैरेज,.&nbsp;सब के बारे में बातें खूब याद थी लेकिन वहां जाऊं तो जाऊं कैसे?&nbsp;&nbsp;कोई ले जाने वाला लगता।<br>मॉर्निंग वॉक शुरू करी थी &#8211;&nbsp;&nbsp;बिटिया साक्षी,&nbsp;माधुरी और भतीजा पिंटू के साथ। रोज एक घंटा। अनेक महीनों के बाद भी,&nbsp;कभी बीच रास्ते में रुक कर&nbsp;&nbsp;पूछते कि अब किधर मुड़ना है,&nbsp;&nbsp;नही&nbsp;तो वही भटकना।</p>



<p class="wp-block-paragraph">घनश्याम अब रोज ज़िद करने लगा कि मुझे सुबह दूध बांटने जाना है और सब ने समझाया तुम्हें रास्ते याद नहीं है। गली के पहले ही मोड पर भ्रमित हो गया।&nbsp;&nbsp;इधर उधर बाइक घुमाता रहा। कहीं कहीं रुक कर पूछता पर समझ नहीं आता। माधुरी ने पीछे से भतीजे को साइकिल पर भेज दिया कहा कि दूर से नजर रखना। वापस घर चलने को कहा तो मानने को तैयार नहीं। “मुझे याद आ जाएगा,&nbsp;थोड़ी कोशिश करने दो”। अगली सुबह फिर वही उपक्रम। मोटर बाइक पर दूध की टंकीया टाँग कर निकलने की तैयारी। क्या-क्या नाटक किए थे &#8211; याद नहीं। तीन-चार दिन बाद,&nbsp;बाइक और दूध की कोठियां पड़ोस में ताऊ जी के घर रखवाना पड़ी।&nbsp;&nbsp;प्रतिदिन घनश्याम रात को कह कर सोता – “माधुरी! सुबह दूध बांटने जाऊंगा सब तैयारी करके रखना।“</p>



<p class="wp-block-paragraph">2. दूसरा भूगोल भुलने से भी विकराल एक और समस्या थी। बीती नहीं बिसारदें तो ठीक है पर आगे की सुधि कैसे लें?&nbsp;&nbsp;घनश्याम को नया,&nbsp;जो कुछ घटित हो रहा है,&nbsp;ऐसे मिट जाता था&nbsp;&nbsp;जैसे कि कोई छात्र ने एक वाक्य लिखा, रबड़ से मिटा दिया,&nbsp;फिर कुछ और लिखा,&nbsp;फिर मिटा दिया। लिखा,&nbsp;मिटाया,&nbsp;लिखा मिटाया। कोई कुम्हार ने गढ़ा घड़ा,&nbsp;और तोड़ दिया। गढ़ा और तोड़ दिया। रेत पर कुछ निशान बने,&nbsp;लहर&nbsp;बहाकर ले गई। नई यादों के नाम पर एक गहरा कुआं,&nbsp;एक ब्लैक होल जिसकी कोई थाह नहीं। डालोगे कभी नहीं मिलेगा। याद कर और दरिया में डाल।</p>



<h2 class="wp-block-heading">आखिर क्या हुआ घनश्याम को?</h2>



<p class="wp-block-paragraph">बीमारी के&nbsp;6&nbsp;महीने बाद,&nbsp;घनश्याम मेरे पास उपचार के लिए लाया गया था। पूरा परिवार आया था। पिताजी व्हीलचेयर पर आए थे। उसके सोहने चेहरे पर हल्की मुस्कान के बावजूद एक उदासी थी। डॉक्टरों के पास समय की कमी रहती है लेकिन मेरा प्रयास रहता है कि कुछ ऐसी बातें करूं कि व्यक्ति से आत्मिय परिचय बने। केवल बीमारी की कहानी नहीं,&nbsp;जीवन और व्यक्तित्व के बारे में जानना पड़ता है। यु तो यह काम अनंत है। थोड़े से सैंपल के रूप में,&nbsp;हाँडी मे से&nbsp;चावल के दानों के रूप में,&nbsp;यहां-वहां की रैंडम बातें करने से रेपो बनता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“नमस्ते डॉक्टर साहब। मै कौनसी कुर्सी पर बैठु?&nbsp;ये&nbsp;मेरे पिताजी हैं और यह मां और वाइफ। हमारी एक बेटी है साक्षी&nbsp;3&nbsp;साल की उस को घर छोड़कर आए हैं।“ घनश्याम ने अपने बारे में विस्तार से बताया,&nbsp;सही सही बताया। असली परीक्षा अब शुरू होनी थी। “आज कौन सी तारीख है?&nbsp;क्या वार है?&nbsp;महीना कौन सा चल रहा है?&nbsp;वर्ष&nbsp;क्या है?”&nbsp;सब गलत था नहीं पता। इस बीच मुझे एक सीरियस मरीज देखने पास के कमरे में जाना पड़ा।&nbsp;5&nbsp;मिनट बाद मै वापस लौटा और पूछा</p>



<p class="wp-block-paragraph">“घनश्याम नमस्ते! क्या हम पहले कभी मिले?”</p>



<p class="wp-block-paragraph">“नहीं मुझे तो ध्यान नहीं आता। डॉक्टर साहब।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">“मुझे डॉक्टर क्यों कह रहे हो?”</p>



<p class="wp-block-paragraph">“आपने सफेद कोट पहना है आपके हाव-भाव डॉक्टर जैसे हैं।“</p>



<p class="wp-block-paragraph">“बताओ अभी तुम कहां हो?”</p>



<p class="wp-block-paragraph">“चारों ओर देखते हुए,&nbsp;लगता तो कोई अस्पताल है। हम सब यहां क्यों आए हैं?&nbsp;माधुरी मां,&nbsp;पिताजी आप सब यहां क्यों आए हो?&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">“पिताजी बोले &#8211; “बेटा ! ये न्युरालॉजिस्ट है। दिमाग के डॉक्टर है। तुम्हे जांच कराने लाये है।“</p>



<p class="wp-block-paragraph">“दिमाग के डॉक्टर?&nbsp;मेरा दिमाग ठीक है। मैं अच्छा हूं।“</p>



<p class="wp-block-paragraph">“आप भूल जाते हैं,&nbsp;आपको याद नहीं रहता इसलिए लाए है।“ माधुरी बोली ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">“याद नहीं रहता?&nbsp;शायद हो सकता है।“</p>



<p class="wp-block-paragraph">घनश्याम की शॉर्ट टर्म मेमोरी और नई चीजों को याद रखने की क्षमता के अलावा बुद्धि के अन्य पहलू अच्छे थे। मैंने स्टॉपवॉच द्वारा उस अवधि को नापा जहां तक की बाते वह कुछ याद रख पाता है। टेबल पर&nbsp;5&nbsp;आयटम रखें मेरे हाथ घड़ी,&nbsp;पेन,&nbsp;चश्मा,&nbsp;रुमाल और पर्स्।&nbsp;घनश्याम से पांचो नाम तिन बार&nbsp;&nbsp;गिनवाएं और कागज पर लिखवाया। फिर एक टॉवल से टेबल को ढक दिया।&nbsp;5&nbsp;मिनट कुछ और बातें करी फिल्म,&nbsp;राजनीति,&nbsp;क्रिकेट। तब पूछा इस टॉवेल के नीचे क्या क्या रखा है?&nbsp;&nbsp;कुछ याद नहीं यह भी याद नहीं की टेबल पर कुछ रखा भी था और याद करवाया था। यह भी नहीं कि उसने कागज पर कुछ लिखा था। आइटम बदले। टाइम घटाया। फिर फेल। आइटम बदले टाइम घटाया&nbsp;60&nbsp;सेकंड।&nbsp;1&nbsp;मिनट। बस इतनी देर तक की स्मृति है। उसके बाद जो बात गई सो बीत गई।</p>



<p class="wp-block-paragraph">टिक टेक टो का गेम उसने अच्छे से खेला। लेकिन&nbsp;2&nbsp;मिनट बाद उसे सिर्फ धुंधली सी याद थी कि किसी डॉक्टर ने कभी उसके साथ यह खेल खेला था। कौन सा डॉक्टर,&nbsp;कब था वह कभी,&nbsp;कुछ पता नहीं। पूछे जाने पर कि आजकल मौसम कौन सा है रितु कौन सी है,&nbsp;उसने आसपास नजरें फिरा कर कैलेंडर ढूंढा और फिर खिड़की के बाहर आकाश देखने लगा। जब मैंने कहा कि मैंने ही वह गेम खेला था तो उसके चेहरे पर विस्मय का क्षणिक भाव आया. तुरंत तिरोहित होकर वही स्थाई निसंगता। कोउ स्मृति हो न हो,&nbsp;हमें का हानी। घनश्याम के लिए कल,&nbsp;आज और कल में से सिर्फ आज रह गया था। न जाने वाला कल था,&nbsp;ना आने वाला कल आएगा। साहिर लुधियानवी के शब्दों में “आगे भी जाने न तू,&nbsp;पीछे भी जाने न तू,&nbsp;जो भी है बस यही एक पल है,&nbsp;कर ले तू आरजू। “<br>घनश्याम आरजू भी ठीक से नहीं कर पाता था। सिर्फ तीन चार चीजों को छोड़कर माधुरी से प्यार,&nbsp;सुबह दूध बांटने जाना,&nbsp;शाम को वॉलीबॉल खेलना,&nbsp;और मंगलवार को हनुमान मंदिर के कीर्तन में गाना।</p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="836" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/The-Last-Mariner-836x400.jpg" alt="" class="wp-image-2229" style="width:675px;height:auto" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/The-Last-Mariner-836x400.jpg 836w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/The-Last-Mariner-1536x735.jpg 1536w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/The-Last-Mariner-2048x980.jpg 2048w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/The-Last-Mariner-1320x631.jpg 1320w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/The-Last-Mariner-300x144.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/The-Last-Mariner-768x367.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 836px) 100vw, 836px" /></figure>



<h2 class="wp-block-heading">‘द लास्ट मेंराइनर’ &#8211; {आलिवर सेक्स की कहानी}</h2>



<p class="wp-block-paragraph">मुझे डॉक्टर आलिवर सेक्स की कहानी&nbsp;‘द लास्ट मेंराइनर’&nbsp;याद आई। भटका हुआ नौसैनिक जिसमें जिम्मी का वर्णन है। उसकी यादों की रिकॉर्डिंग बचपन से लेकर&nbsp;19&nbsp;वर्ष की उम्र तक पर्फेक्ट थी। सन 1945 तक,&nbsp;जब अमेरिका और मित्र राष्ट्रों ने द्वितीय विश्वयुद्ध लगभग जीत लिया था। उन्हीं दिनों एक बम विस्फोट में उसकी स्मृति जाती रही। जिम्मी के लिए वक्त&nbsp;1945&nbsp;में और स्वयं की उम्र&nbsp;19&nbsp;वर्ष पर ठहर गई थी। पुराने क्षणों को याद करते-करते वह उनमें इतना डूब जाता था कि मानो उन्हें पुनः जी रहा हो।&nbsp;&nbsp;भूत,&nbsp;वर्तमान बन जाता था।&nbsp;&nbsp;वाक्यों में पास्ट टेंस की बजाय प्रजेंट टेंस का उपयोग करता था। उसकी देखभाल करने वाले आसपास आईना नहीं रखते थे। स्वयं को बूढ़ा देखकर&nbsp;19&nbsp;वर्ष का वह युवक परेशान हो जाता था। घनश्याम की स्थिति बेहतर थी। जिम्मी,&nbsp;ब्रह्म आश्रम में था,&nbsp;घनश्याम भरे पूरे परिवार में। डॉक्टर आलिवर सेक्स ने प्रश्न उठाया “बिना स्मृति के कैसा जीवन?&nbsp;कैसी दुनिया,&nbsp;कैसा व्यक्तित्व। जड़ विहीन वृक्ष। लंगर विहीन जहाज। क्या जिम्मी की आत्मा का भी क्षरण हो गया था। शायद कुछ बची थी। प्रति रविवार गिरजाघर में प्रार्थना के समय जब उसकी एकाग्रता,&nbsp;तल्लीनता,&nbsp;शांति,&nbsp;संतोष और आनंद चेहरे पर परछाइयां डालते थे। पूजा अर्चना श्रद्धा आदि के कर्मकांड का अपना एक सौंदर्य और आकर्षण होता है। मास्को के मूर्धन्य न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट डॉक्टर एलेक्सांद्र ल्युरिया के अनुसार मनुष्य सिर्फ स्मृति मात्र नहीं है। यादों के परे भी इंसान की अर्थवान दुनिया होती है। उसकी इमोशंस,&nbsp;फिलिंग्स,&nbsp;संवेदनाएं,&nbsp;&nbsp;चाहते और आध्यात्मिकता। कला,&nbsp;संगीत,&nbsp;नृत्य,&nbsp;प्रकृति,&nbsp;हास्य आदि विधाएं स्मृति विहीन व्यक्ति को भी उतनी ही शिद्दत से सरोबोर कर सकती है जितनी किसी यादवान को। विस्मृति के सागर में स्मृति के छोटे-छोटे बच्चे रह जाते हैं। कभी-कभी नए द्वीप उभरते हैं।</p>



<h2 class="wp-block-heading">बिना स्मृति के कैसा जीवन?&nbsp;कैसी दुनिया,&nbsp;कैसा व्यक्तित्व।</h2>



<p class="wp-block-paragraph">प्रकाश प्रदूषण से परे की विरान धरती पर,&nbsp;अमावस की घोर काली रात में तारे अधिक चमकिले दिखते है। ऐसे ही कुछ तारों की रोशनी हमें घनश्याम की जिंदगी में नजर आई। माधुरी ने पिंटू भतीजे के साथ मोहल्ला मोहल्ला घूमकर पुराने ग्राहकों को ढूंढा। घनश्याम के मोबाइल में सब के नंबर&nbsp;थे। एक नक्शा और एक टाइम टेबल बनाया। मोटर बाइक पर पिंटू पीछे बैठता। कभी रास्ता बताता। कभी परीक्षा लेता। सभी ग्राहक अपने समय के अनुसार ओटले पर,&nbsp;दरवाजे पर,&nbsp;खिड़की में खड़े रहते,&nbsp;आवाज लगाते,&nbsp;घंटी,&nbsp;या ताली बजाते,&nbsp;मोबाइल की लाइट चमकाते,&nbsp;मोबाइल पर पूछते अभी कहां हो,&nbsp;आसपास क्या दिख रहा है,&nbsp;ठीक है,&nbsp;अब आगे से बाईं तरफ मुड़ो। पिंटू रोज नक्शे का रिवीजन करवाता। पुराने ग्राहकों से हंसी मजाक कर के घनश्याम का मन खिल उठता था। उसे रास्ते कभी इतनी अच्छी तरह याद नहीं हुए कि अकेला जाने दे। बाद में पिंटू एक दूसरी बाइक पर पीछे पीछे चलता था और जरूरत पड़ने पर मदद करता था। घर में साक्षी ने जगह-जगह माय तीर के लेबल चिपका दिए थे बैडरूम,&nbsp;ड्राइंग रूम&nbsp;,&nbsp;दालान आंगन,&nbsp;सिढिया,&nbsp;दादा जी का कमरा,&nbsp;&nbsp;बाथरूम आदि। हनुमान मंदिर में नए पंडित जी आ गए थे। उन्होंने कुछ नए भजन सिखाना शुरू कर दिए थे। बजरंगबली की भक्ति के जोश में और नया याद हो ना हो,&nbsp;ये भजन थोड़ा थोड़ा दिमाग में घुसने लग गए थे। वॉलीबॉल टूर्नामेंट के लिए घनश्याम की टीम के नए कोच ने खेलने की जो नई तरकीबें बताई,&nbsp;वे उसने तुलनात्मक रूप से जल्दी सीख ली।<br>दुर्घटना के&nbsp;1&nbsp;वर्ष बाद घनश्याम अपनी गोद में गुड्डू को लेकर आया। माधुरी ने बताया कि अब वह गुड्डू को अपने बेटे के रूप में मानने और जानने लगा है। बड़े उत्साह से घनश्याम ने मुझसे कहा –&nbsp;&nbsp;<br>“आप डॉक्टर है न”?&nbsp;&nbsp;हा तो मैं बताऊं मेरा गुड्डू पाव पाव चलने लगा है”।<br>“कब”?<br>“शायद&#8230; शायद कल से,&nbsp;और हम इसका मुंडन करवाएंगे।<br>“कब?”<br>“कल।”</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8220;रात का आकाश अभी भी वैसा ही काला था लेकिन इसमें दो चमकीले तारे उग आए थे &#8220;आज&#8221; के साथ &#8220;कल&#8221; और &#8220;कल&#8221; भी जुड़ गए थे।&#8221;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"><br>**********************************************</p>
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