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	<title>हिंदी एवं अन्य भाषाएँ Archives - न्यूरोज्ञान</title>
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		<title>हिन्दी में विज्ञान पत्रकारिता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[न्यूरो ज्ञान]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 14 Oct 2023 11:04:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चिट्ठा संसार (ब्लॉग)]]></category>
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		<category><![CDATA[हिन्दी में विज्ञान पत्रकारिता]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>1.0 परिभाषाएँ 1.1 विज्ञान विशिष्ट ज्ञान ज्ञान को प्राप्त करने, बढ़ाने, वृद्धि करने तथा पुष्टि करने की विशिष्ट विधियाँ, जिनकी शुरूआत किसीपरिकल्पना या सिद्धान्त से हो सकती हैं और फिर प्रयोगों और अवलोकनों द्वारा निष्कर्ष निकाला जाताहै। अनेक अवसरों पर अवलोकनों या डाटा से शुरूआत होती है और उसमें निहित फेक्ट्स द्वारा सिद्धान्त या परिकल्पनाओं [&#8230;]</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>1.0 परिभाषाएँ</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">1.1 विज्ञान विशिष्ट ज्ञान</p>



<p class="wp-block-paragraph">ज्ञान को प्राप्त करने, बढ़ाने, वृद्धि करने तथा पुष्टि करने की विशिष्ट विधियाँ, जिनकी शुरूआत किसीपरिकल्पना या सिद्धान्त से हो सकती हैं और फिर प्रयोगों और अवलोकनों द्वारा निष्कर्ष निकाला जाताहै। अनेक अवसरों पर अवलोकनों या डाटा से शुरूआत होती है और उसमें निहित फेक्ट्स द्वारा सिद्धान्त या परिकल्पनाओं का जन्म होता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">1.2 पत्रकारिता</p>



<p class="wp-block-paragraph">समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविजन या इन्टरनेट के लिये, सामयिक दृष्टि से तैयार किये गए,लिखे गए आलेख समाचार रिपोर्टस्, टिप्पणियां आदि।</p>



<p class="wp-block-paragraph">1.3 विज्ञान पत्रकारिता और विज्ञान लेखन दोनों में थोड़ा भेद है तथा थोड़ी समानता भी है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">1.3.1 विज्ञान लेखन को दो श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा स्वयं वैज्ञानिकों के लिये लेखनजो उक्त विषय की शोध पत्रिकाओं &#8216;जर्नल्स&#8217; में प्रकाशित होता है तथा जिसकी भाषा शैली गैरवैज्ञानिक या इतर वैज्ञानिक आम जनता के लिये दुरूह हो सकती है। शोध-लेख जो प्रायः गैर वैज्ञानिक पत्रकार या लेखक द्वारा या फिर स्वयं वैज्ञानिक द्वारा रचा जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">1.3.2 आम जनता के लिये विज्ञान लेखन जो किसी प्रयोगात्मक अध्ययन के परिणाम तथा उन पर आधारित बहस होती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">1.4 सापेक्षता विज्ञान पत्रकारिता और विज्ञान लेखन में सापेक्षता का भी भेद है। पत्रकारिता प्रायः समय (Topicality, Temporality) सापेक्ष, स्थान सापेक्ष (Locality) और व्यक्ति (Personality) सापेक्ष होती है जबकि गैर-पत्रकारिता लेखन इन प्रभावों में तुलनात्मक रूप से मुक्त होता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>2.0 विज्ञान का महत्व</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">किसी भी समाज, क्षेत्र, राज्य या राष्ट्र के लिये विज्ञान का महत्व असीम है। विज्ञान की शिक्षा, लोगों का वैज्ञानिक ज्ञान तथा आमजनों द्वारा वैज्ञानिक विधियों, प्रक्रियाओं और सोच या चिन्तन प्रणाली का आत्मसात किया जाना, किसी भी समुदाय की प्रगति, उन्नति और गुणवान बेहतर जीवन के लिये जरूरी है। मिथ्या विज्ञान और अंधविश्वासों से बहुत हानियाँ है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">विज्ञान मनुष्य की तर्कवादी (Rationalist) प्रवृत्तियों को पोसता है तथा बौद्धिक स्तर को ऊँचा उठाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">2.1 मानविकी और विज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं। उनमें विरोधाभास नहीं है। दोनों की विधियाँ अलग है परन्तु अन्तिम उद्देश्य एक है &#8211; मनुष्य की स्थिति को बेहतर बनाना। दोनों धाराएँ मानव के सहज स्वभाव का हिस्सा है। अच्छी विज्ञान शिक्षा, बेहतर वैज्ञानिक ज्ञान और विज्ञान की विधियों को अपनी आदत बनाने वाला इन्सान और समाज, मानविकी के क्षेत्रों में भी बेहतर तरीके से योगदान देने की स्थिति में होता है। इसका विपरीत भी सत्य है। एक अच्छा वैज्ञानिक स्वयं को मानविकी के ज्ञान और अनुभूतियों से अछूता नहीं रख सकता। अर्थशास्त्र, नीति शास्त्र, साहित्य, कलाएँ, दर्शनशास्त्र, कानून, धर्म, राजनीति, समाजशास्त्र, प्रशासन आदि समस्त विषय विज्ञान की उपेक्षा नहीं कर सकते।</p>



<p class="wp-block-paragraph">3.0 हिन्दी और भारतीय भाषाओं में चिकित्सा और स्वास्थ पत्रकारिता की स्थिति, वर्तमान स्थिति दुःखद व निराशाजनक रूप से खराब है। मात्रा और गुणवत्ता दोनों का अभाव है। प्रदाता लेखक व पत्रकार और गृहिता पाठक, दर्शक दोनों का अभाव है। कलेवर (Content) की कमी है। भाषागत अघोसंरचना (Linguistic infrastructure) का विकास अवरुद्ध है। भारत में अंग्रेजी का अत्यधिक प्रभाव और महत्व इसका प्रमुख कारण है। अंग्रेजी भाषा से मेरा विरोध नहीं है। चाहे जो ऐतिहासिक कारण रहे हों, भारतीयों का अंग्रेजी ज्ञान एक लाभकारी गुण हो सकता है। मेरा विरोध अंग्रेजी माध्यम में स्कूली व महाविद्यालयीन शिक्षा से है, जिसकी वजह से नई पीढ़ियाँ हिन्दी और भारतीय भाषाओं के बृहत शब्द संसार को खोती जा रही हैं । नई शब्द सम्पदा गढ़ने के अवसर खत्म हो रहे हैं। वैज्ञानिक विषयों की शब्दावली भी इस हानि का शिकार हो रही है। प्रश्न कूप जल और बहता नीर का नहीं है। हिंग्लिश की पिडगिन और क्रियोल रूपी खिचड़ी किसी का भला नहीं करती। न हिन्दी या अंग्रेजी भाषा का और न ही उन्हें उपयोग में लाने वाले व्यक्तियों का, जो न घर के रह जाते हैं, न घाट के।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>3.1 माँग या प्रदाय में से कौन पहले?</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">अनेक सम्पादक व लेखक पत्रकार शिकायत करते हैं कि चिकित्सा विज्ञान विषय पर माँग नहीं है। लोग कुछ और चीजें अधिक चाहते हैं । उन्हें चटपटा, मसालेदार माल चाहिए । राजनीति, क्रिकेट, बालीवुड, गपशप, अपराध आदि सारा स्थान और समय घेर लेते हैं। ऐसा सोचना गलत है। लोगों में चिकित्सा विज्ञान सम्बन्धी खबरों और विचारों को जानने की ललक है। उसे पोसने की जरूरत है। ठीक वैसे ही जैसे कि अच्छे फिल्मकार या निर्देशक और अभिनेता बेहतर कलात्मक फिल्में बनाकर, आमजनता को फूहड़ मसाला फिल्मों से परे विकल्प प्रदान करते हैं। वैसे ही पत्रकारों में से लगातार नई जमातृ निकलना चाहिये जो ग्लेमर और पैसे से परे चिकित्सा विज्ञान पत्रकारिता को अपनी विशेषज्ञता और पेशा बनाये। पत्रकारों को लीडर होना चाहिये- लोगों की वैज्ञानिक अभिरूचि और ज्ञान में श्रीवृद्धि करने वाले लीडर। विज्ञान पर विर्तमान कवरेज लगभग 3 प्रतिशत है जिसे 10 से 15 प्रतिशत तक होना चाहिये।</p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img decoding="async" width="701" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/a-701x400.jpg" alt="" class="wp-image-2698" style="aspect-ratio:1.7525;width:429px;height:auto" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/a-701x400.jpg 701w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/a-300x171.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/a-768x438.jpg 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/a.jpg 1015w" sizes="(max-width: 701px) 100vw, 701px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">4.0 चिकित्सा विज्ञान पत्रकारिता की उपयोगिता और स्वरूप विविध है। जैसे कि सूचना देना । जानकारी देना। खबर देना।। शिक्षित करना। ज्ञान बढ़ाना। किसी खबर या सूचना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि बताना। किसी खोज या शोध प्रपत्र की कमियों और सीमाओं की विवेचना करना।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मनोरंजन करना। पढ़ने में अच्छा लगना। मजा आना। अन्दर से खुश करना, आल्हादित करना। कभी-कभी दूसरे रसों की निवपत्ति भी हो सकती है जैसे कि भय, जुगुप्सा वीभत्स, आश्चर्य, करुणा, विषाद आदि। अन्ततः समस्त रस मन का रंजन ही करते है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बौद्धिक बहस में योगदान करना। दार्शनिक स्तर के प्रश्नों के उत्तर ढूंढने में मदद करना। नीति निर्धारण की प्रक्रिया में शरीक होना।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>5.0 विज्ञान, विज्ञान के लिये या समाज के लिये?</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">यह ठीक वैसे ही है कि &#8216;कला कला के लिये या समाज के लिये? क्या कला या विज्ञान सदैव सौद्देश्य ही होना चाहिये ? प्रायः दुहराए जाने वाले इस आव्हान का कितना महत्व कि विज्ञान को आम लोगों से तथा उनके देशकाल के सरोकारों से जुड़ना चाहिये ? बहुत सारी कलाएं और उससे कहीं अधिक विज्ञान, स्वयं के लिये होते हैं। उन्नीसवीं शताब्दी में रानी विक्टोरिया ने महान भौतिक शास्त्री माईकल फेराडे की एक विद्युतीय-मशीन को देख कर पूछा था &#8216; इसका क्या उपयोग ? फेराडे ने कहा &#8216;आपके पास में खड़ी इस महिला की गोद में लेटे इस शिशु की आज क्या उपयोगिता है ?&#8217; बेसिक साईसेस या आधारभूत विज्ञान की तात्कालिक व स्थानिक उपादेयता तथा प्रासंगिकता सदैव अगोचर व अनिश्चित रहेगी। विज्ञान में पूजी, श्रम और समय का निवेश हमेशा एक बड़ा जुआ रहेगा। एक प्रकार का …&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;परन्तु इतिहास गवाह हैं कि जिस राष्ट्र, राज्य या समाज ने विज्ञान में निवेश किया उसने सदैव प्रगति करी और आगे रहा। विज्ञान शोध और विज्ञान लेखन की तुलना में विज्ञान पत्रकारिता पर समय और स्थान सापेक्षता का बोझ कहीं अधिक होता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>6.0 चिकित्सा विज्ञान पत्रकारिता के कर्ता या प्रदाता</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">पत्रकार जिन्हें विज्ञान में रूचि और योग्यता है, की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण है। यह श्रम साध्य है। बहुत पढ़ना पड़ता है। चिकित्सकों से मिलकर बातचीत करनी होती है, साक्षात्कार लेने होते हैं। यह खोजी पत्रकारिता है। अपनी अपनी विशेषज्ञता का क्षेत्र चुन कर उसका विकास करना होता है। हरफन मौला होना अच्छा है, परन्तु उसकी सीमाएँ है। स्कूल-कालेज में यदि विज्ञान शिक्षा की पृष्ठि भूमि रही हो तो बेहतर होता है। गैर वैज्ञानिक पत्रकार जब कोई अच्छी स्टोरी विकसित करते हैं तो उसे पढ़कर, देखकर, उक्त विषय के वैज्ञानिक भी चकित रह जाते हैं। परन्तु अनेक बार गलतियां हो जाती हैं, जिन्हें टालने के लिये पत्रकार को चाहिये कि आलेख को छपने के लिये भेजने के पूर्व किसी मित्र-डॉक्टर से जरूर पढ़वा लें। परन्तु अनेक बार समय नहीं रहता। पत्रकारों को टाइम-लाइन पर काम करना पड़ता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">6.2 चिकित्सक स्वयं जिन्हें आम जनता की भाषा में लिखने बोलने में रूचि और योग्यता हो। ऐसे डॉक्टर्स बहुत कम हैं, पर हैं जरूर। उन्हें आगे आने की जरूरत है। अनेक हार्डकोर चिकित्सा वैज्ञानिक, आम जनता के लिये लिखने के काम को तौहीन की नजर से देखते हैं। यह गलत है। एक अच्छा&nbsp; वैज्ञानिक अच्छा संदेश वाहक भी हो सकता है। एक पत्रकार का सोच वैज्ञानिक की तुलना में अधिक विहगम या समग्र होगा जबकि वैज्ञानिक अपने स्वयं के विषय में निष्णात होने के कारण गहराई तक सोच पायेगा, समझ पायेगा। हालांकि वह इतर क्षेत्रों की व्यापक सोच से वंचित हो सकता है।</p>



<h2 class="wp-block-heading"><strong>7.0 सूचना के स्रोत और प्रमाणिकता</strong></h2>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>7.1 प्राथमिक स्रोत ।</strong> अंग्रेजी मुहावरा है &#8220;घोड़े के मुंह से । किसी चिकित्सा वैज्ञानिक खोज के सन्दर्भ में उस शोध को करने वाला डॉक्टर या उनका दल प्राथमिक स्रोत कहलायेगा या फिर उनके द्वारा लिखित शोध पत्र। साइंटिफिक जर्नल्स में प्रकाशित किसी नये अध्ययन पर आधारित मौलिक लेख सबसे महत्वपूर्ण है और विश्वसनीय प्राथमिक स्रोत माने जाते हैं। अच्छे चिकित्सा विज्ञान संवाददाता अनेक मेडिकल शोध पत्रिकाएं नियमित रूप से पढ़ते हैं। प्रत्येक अंक में जरूरी नहीं है कि &#8220;खबर के लायक । कोई आलेख मिले। खूब पढ़ो, धैर्य रखो, पढ़ते रहो। तब कहीं कुछ मिलता है। उसकी स्टोरी और हेडलाईन बनाना एक दूसरी कला है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">चिकित्सा विज्ञान की किसी भी शाखा में कोई नई खोज या आविष्कार की सूचना सीधे-सीधे मीडिया में देने की मनाही है। शोध-आलेख साईटिफिक जर्नल में प्रकाशित होने के बाद ही उससे सम्बन्धित समाचार मीडिया को जारी किया जा सकता है या पत्रकारवार्ता करी जा सकती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यदि कोई डॉक्टर स्वयं प्रेस विज्ञप्ति देकर कोई दावा करे तो उसकी विश्वसनीयता नहीं मानी जा सकती, जब तक कि उस दावे की पुष्टि किसी शोध पत्रिका में न हुई हो।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मनोरंजन करना। पढ़ने में अच्छा लगना। मजा आना। अन्दर से खुश करना, आल्हादित करना। कभी-कभी दूसरे रसों की निवपत्ति भी हो सकती है जैसे कि भय, जुगुप्सा वीभत्स, आश्चर्य, करुणा, विषाद आदि। अन्ततः समस्त रस मन का रंजन ही करते है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बौद्धिक बहस में योगदान करना। दार्शनिक स्तर के प्रश्नों के उत्तर ढूंढने में मदद करना। नीति निर्धारण की प्रक्रिया में शरीक होना।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नया आलेख जिस विषय से सम्बन्धित हो उस क्षेत्र के दूसरे प्रतिष्ठित वरिष्ठ वैज्ञानिकों से भी साक्षात्कार द्वारा टिप्पणी प्राप्त करी जा सकती है ताकि नई खोज को सम्यक और समग्र सन्दर्भ और पृष्ठभूमि के साथ परखा जा सके।</p>



<p class="wp-block-paragraph">चिकित्सा संगठनों तथा शासकीय या अशासकीय संस्थानों तथा अस्पतालों द्वारा समय समय पर जारी करी जाने वाली रिपोर्ट्स व विज्ञप्तियां भी प्राथमिक स्रोत हैं।</p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img decoding="async" width="1048" height="381" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/b-1048x381.jpg" alt="" class="wp-image-2699" style="aspect-ratio:2.7506561679790025;width:635px;height:auto" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/b-1048x381.jpg 1048w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/b-300x109.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/b-768x279.jpg 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/b.jpg 1200w" sizes="(max-width: 1048px) 100vw, 1048px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>7.2 द्वितीयक स्रोत &#8211;</strong> चिकित्सा वैज्ञानिक व सामान्य पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाले निबन्ध, टिप्पणियों, संपादकीय, रिव्यू लेख आदि अनेक प्राथमिक स्रोतों को आधार बना कर लिखी जाती हैं। विज्ञान की पाठ्य पुस्तकें व उनके विभिन्न अध्याय भी द्वितीयक स्रोत के उदाहरण है । विज्ञान के शिक्षक जो स्वयं शोध नहीं करते परन्तु पढ़ते-पढ़ाते रहते हैं भी द्वितीयक स्रोत के उदाहरण है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>7.3 तृतीयक स्रोत &#8211;</strong> गैर वैज्ञानिक स्रोत जैसे कि सामान्य पत्रकार, आम नागरिक, प्रशासनिक अधिकारी आदि भी कभी-कभी वैज्ञानिक जानकारी प्रदान कर सकते हैं। परन्तु उनकी विश्वसनीयता सबसे कम होती है। उनके अवलोकनों और विचारों का हवाला, गैर-विशेषज्ञ गवाह के रूप में दिया जा सकता है || किसी खास बीमारी से ग्रस्त मरीजों के अनुभवों को मरीज कथा &#8216;क्लीनिकल टेल के रूप में लिखनाउपयोगी है। इन्टरनेट पर अनेक प्रकार के अप्रमाणिक तृतीयक स्रोतों की भरमार हो गई है जो आम जनता को भ्रमित कर सकते हैं। विज्ञान पत्रकारिता में काम करने वालों को कुछ कसौटियों का ज्ञान और अनुभव होना चाहिये। ऐसे स्रोतों से बचना चाहिये जिनकी शैक्षणिक और अकादमिक योग्यता संदिग्ध हो, जो पूर्व घोषित ऐजेन्डा या लक्ष्य के लिये काम कर रहे हों, जो दावा करते हों कि अनेक तथाकथित शक्तिशाली ताकतें उनके व उनके काम के खिलाफ षड़यंत्र रचती हैं। असली और सच्चे वैज्ञानिक किसी षड़यंत्र का शिकार होने का बहाना नहीं बनाते। विज्ञान सत्य है। सत्य छिपाये नहीं छिपता।</p>



<h2 class="wp-block-heading"><strong>8.0 चिकित्सा विज्ञान पत्रकारिता की भाषा का स्तर और शैली।</strong></h2>



<p class="wp-block-paragraph">भाषा सरल हो। परन्तु जरूरत से अधिक सरल नहीं। कुछ तो स्तर बना कर रखना पड़ेगा। कक्षा दसवीं से बारहवीं तक के छात्र कुछ प्रयत्न के साथ उक्त आलेख को पढ़ें, समझें और आनन्द लें, ऐसा स्तर उचित माना जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हिन्दी और भारतीय भाषाओं में विज्ञान लेखन प्रायः अंग्रेजी स्रोतों से अनुवादित हो कर आता है। अनुवाद की अपनी सीमाएं हैं। अच्छा विज्ञान पत्रकार तीन क्षेत्रों में महारथ धारण करने वाला होना चाहिये -1. अंग्रेजी भाषा 2 हिन्दी भाषा. 3. विज्ञान का उक्त सम्बन्धित विषय जिस पर रिपोर्टिग करना है। शब्दानुवाद कृत्रिम और दुरूह होता है। भाषा में प्राजलता और वहाव की कमी हो जाती है। पत्रकार को चाहिये कि एक से अधिक प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों के लेख (अंग्रेजी) मनोयोग से पढ़ें. उनके बारे में मन से सोचें, विचारें फिर कल्पना करें कि उस जानकारी को बोलचाल की सरल हिन्दी में कैसे कहा जायेगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हिन्दी में पारिभाषिक शब्दालियां हैं परन्तु वे शब्द चलन में न होने से कभी-कभी अटपटे या कठिन प्रतीत होते हैं। ऐसे शब्दों का आरम्भिक उपयोग करते समय उनकी सरल परिभाषा और अंग्रेजी पर्यायवाची रोमन व देवनागरी दोनों लिपियों में देना ठीक रहता है। हिन्दी अंग्रेजी पर्यायवाची युग्मों का उलटपुलट कर उपयोग करना चाहिये ताकि हिन्दी शब्दों का चलन बढ़े । डिस्कवरी और नेश्नल जियोग्राफिक जैसे चेनल्स पर वैज्ञानिक डाक्यूमेन्टरीज का हिन्दी डबिंग एक अच्छा उदाहरण है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">9.0 विवादास्पद विषयों में सम्यकता और सन्तुलन</h2>



<p class="wp-block-paragraph">पत्रकारिता के किसी भी क्षेत्र से अपेक्षा करी जाती है कि व्यक्तियों, संस्थानों या विचारों में विरोध की स्थिति में सम्यकता, सन्तुलन और समग्रता बनाई रखी जावेगी। हमेशा फिफ्टी फिफ्टी होना जरूरी नहीं है परन्तु समस्त पक्षों को उचित महत्व मिलना चाहिये। उचित की परिभाषा और कसौटियाँ स्वयं विवादित हो सकती हैं। उदाहरण के लिये धार्मिक कारणों से अमेरिका जैसे आधुनिक प्रतीत होने वाले देश में लगभग आधी आबादी डार्विन के जैव विकास इवाल्यूशन सिद्धांत के बजाय बाईबिल में वर्णित जिनेसिस की कथा पर विश्वास करती है। सारे बायोलॉजिस्ट्स जीव वैज्ञानिक डार्विन के सिद्धांत को मानते हैं। इस प्रकार की बहस में सन्तुलन के</p>



<p class="wp-block-paragraph">नाम पर धार्मिक अन्धविश्वास को बराबर का महत्व नहीं | दिया जा सकता। जलवायु परिवर्तन ग्लोबल वार्मिंग के सन्दर्भ में अधिकांश वैज्ञानिक मानते हैं कि मनुष्य के कार्यकलापों के कारण कार्बनडाईआक्साईड जैसे ग्रीन हाउस गैस की मात्रा बढ़ने में वायुमंडल गर्म हो रहा है। कुछ वैज्ञानिक इस परिवर्तन के सम्भावित नुकसानों और उनसे निपटने के तौर-तरीकों को लेकर दूसरे विचार रखते हैं। अच्छी पत्रकारिता का तकाजा है कि उनकी बात भी सुनी जायेगी |</p>



<p class="wp-block-paragraph">10.0 हिन्दी में चिकित्सा विज्ञान पत्रकारिता की मात्रा और गुणवत्ता बढ़ाने के लिये कार्य-योजनाएं मांग और पूर्ति दोनों पक्षों पर काम करने की जरूरत है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>10.1 मांग कैसे बढ़ाएं?</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">मांग है पर छिपी हुई है। भूख है पर दबी हुई है। इच्छा है पर पल्लवित नहीं हुई है। सम्पादकों को गलतफहमी है कि क्या बिकता है और क्या नहीं । उन्हें पहल करना पड़ेगी। विज्ञान पत्रकारिता का कलेवर नियमित रूप से अधिक मात्रा में पेश करना पड़ेगा। स्वाद धीरे-धीरे विकसित होते हैं। रूचियां धीरे-धीरे जाग्रत होती है। शुरूआत करना पड़ेगी। हिम्मत करना पड़ेगी। थोड़ी सी जोखिम लेना होगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पाठकों को भागीदारी के लिये आमंत्रित करिये। प्रतियोगिता और इनाम रखिये। पाठकों और श्रोताओं का सतत् सर्वेक्षण करवाते रहिये। फीडबेक प्रतिपुष्टि कितनी पढ़ी गई, कितनी सराही गई।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वैज्ञानिक खबरों को सनसनी खेज, रोचक, मसालेदार बनाना प्रायः मुश्किल होता है। जबरदस्ती करना गलत होता है । फिर भी उन रिपोर्ट्स की पृष्ठभूमि का महत्व होता है। उसक उल्लेख किया जा सकता है। भविष्य की संभावनाओं की चर्चा करी जा सकती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>10.2 पूर्ति कैसे बढाएँ ?</strong> अनेक कोर्सेस उपलब्ध हैं परन्तु उनकी संख्या और गुणवत्ता पर बहुत काम करना है। विज्ञान पत्रकारिता के क्षेत्र की मूर्धन्य हस्तियों को इन संस्थानों से जोड़े जाने की जरूरत है। वैज्ञानिकों को इन कोर्सेस से आज तक अछूता रखा गया है। स्वयं मुझे आज तक मौका नहीं मिला जबकि मेरे जैसे अनेक वैज्ञानिक विजिटिंग टीचर्स के रूप में अपनी सेवाएं देना चाहते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">श्रेष्ठ विज्ञान पत्रकारिता के लिये अधिक संख्या में, अधिक मूल्य और प्रतिष्ठा के पुरस्कारों की वार्षिक परम्परा विकसित करने की जरूरत है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर वार्षिक व अन्य कालिक सम्मेलन, वर्कशाप, प्रतियोगिता आदि का आयोजन हो, उनका प्रचार प्रसार हो तथा उनमें भागीदारी बढ़े।</p>
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		<title>हिंदी माध्यम में चिकित्सा शिक्षा की चुनौतियाँ</title>
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		<dc:creator><![CDATA[न्यूरो ज्ञान]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 14 Oct 2023 05:02:59 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[हिंदी माध्यम में चिकित्सा शिक्षा की चुनौतियाँ]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160;डॉक्टर और मरीज – तेरी भाषा मेरी भाषा वर्ष 2003 में मेरा पुत्र निपुण मुम्बई के सेठ जी.एस. मेडिकल कालेज (के.ई.एम. अस्पताल) में एम.बी.बी.एस अन्तिम वर्ष का छात्र था । मैं मिलने गया था । मेरी व उसके मित्रों की इच्छा थी की मैं उनकी एक अनौपचारिक क्लीनिकल क्लास लूँ जिसमें मरीजों से उनकी बीमारी [&#8230;]</p>
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<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1028" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/graphcs-1028x400.jpg" alt="" class="wp-image-2649" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/graphcs-1028x400.jpg 1028w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/graphcs-300x117.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/graphcs-768x299.jpg 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/graphcs.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1028px) 100vw, 1028px" /></figure>



<h3 class="wp-block-heading">&nbsp;डॉक्टर और मरीज – तेरी भाषा मेरी भाषा</h3>



<figure class="wp-block-table"><table><tbody><tr><td><strong>वर्ष 2003 में मेरा पुत्र निपुण मुम्बई के सेठ जी.एस. मेडिकल कालेज (के.ई.एम. अस्पताल) में एम.बी.बी.एस अन्तिम वर्ष का छात्र था । मैं मिलने गया था । मेरी व उसके मित्रों की इच्छा थी की मैं उनकी एक अनौपचारिक क्लीनिकल क्लास लूँ जिसमें मरीजों से उनकी बीमारी के बारे में पूछना, शारीरिक जाँचकरना और सम्भावित निदानों की चर्चा करना शामिल रहता है । मुझे पढ़ाने का शौक है । कक्षा अच्छी रही । खूब प्रश्न व उत्तर दोनों दिशाओं से हुए । बाद में निपुण ने अपने मित्रों को प्रतिक्रिया बताई ।</strong></td></tr></tbody></table></figure>



<p class="wp-block-paragraph">किसी भी अन्य श्रेष्ठतम कक्षा से अलग एक बात का छात्रों को कुछ बाद में अहसास हुआ। हमें अधिक समझ में आया क्योंकि बीच-बीच में सर (अंकल) ने हिन्दी का अच्छा उपयोग किया था। चिकित्सा शिक्षा में आम तौर पर ऐसा नहीं किया जाता है । कहना न होगा कि मातृभाषा और भारतीय भाषाओं की संप्रेषणीयता अधिक होगी । लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि भारतीय चिकित्सा परिषद (मेडिकल काउन्सिल आफ इण्डिया) द्वारा निर्धारित नियम कि भारत के समस्त चिकित्सा महाविद्यालयों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होगा को बदलना वांछनीय या अनिवार्य या श्लाघ्य या व्यावहारिक रूप से आसान व सम्भव न निर्विवाद होगा। मुद्दा जटिल है और बहुत सारे पहलू हैं | भावनात्मक, आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, भाषागत, और व्यावहारिक आदि। अनेक कसौटियों पर विपरीत ध्रुवों से विचार प्रतिपादित हैं और बहस हो सकती है।<br>इस देश का एक छोटा परन्तु बहुत ज्यादा प्रभावशील तबका (शायद पांच प्रतिशत से कम) जिसमें महानगरों व अन्य बड़े शहरों के अंग्रेजी जानने व उसमें काम करने वाले लोग, अधिकांश चिकित्सा शिक्षक और शायद चिकित्सा छात्र, अंग्रेजी प्रेस/मीडिया और आई.ए.एस नौकर शाह शामिल हैं, यह कहेंगे कि मेडिकल एजुकेशन में हिन्दी पर चर्चा करना समय की बरबादी है। अंग्रेजी अच्छी भली चल रही है। अंग्रेजी न जानने वाले या कम जाननेवाले देशों की तुलना में हमें स्पर्धात्मक लाभ हैं। वे देश अब जैसे तैसे अंग्रेजी सुधारने और अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। हिन्दी और भारतीय भाषाओं के नाम कर पहिया उल्टा क्यों घुमाया जाए? इतनी सारी असम्भव-सी कठिनाईयों से क्यों सर फोड़ा जाए ? क्या जरूरत है यह सब मशक्कत करने की ? अनुवाद कितना महँगा, धीमा व कठिन होता है। अनुवाद करने वाले हैं कहाँ? अनुवाद की भाषा कितनी कृत्रिम, असहज, उबाऊ व अबोधगम्य होती है। जब तक अनुवाद होता रहेगा, विज्ञान आगे बढ़ जाएगा। नयी पुस्तकें, नये शोध पत्र आएँगे| कब तक उस पट्टे पर दौड़ते रहेंगे जो वहीं का वहीं घूमता रहता है। यदि अनुवाद नहीं तो फिर हिन्दी में मौलिक शोध, सोच, ज्ञान, वाकपटुता और लेखन क्षमता वाले चिकित्सा शिक्षक कहाँ हैं? कौन चाहता है हिन्दी में चिकित्सा शिक्षा? छात्रों से पूछ कर देखा है ? जब माँग ही नहीं है तो प्रदाय का लावजमा खड़ा करने पर क्यों दिमाग लगाया जाए? बिना आवश्यकता के आविष्कार के जनन की कल्पना क्यों की जाए?<br>इन तमाम आपत्तियों को मैं पूरी सोच-समझ के साथ खारिज करता हूँ । हालांकि कुछ शर्तों, अपवादों, किन्तु परन्तु, लेकिन, यह भी, वह भी आदि के साथ | दुनिया में अधिकांश सत्य केवल शुद्ध सफेद या शुद्ध स्याह नहीं होते, बल्कि भूरे रंग के अनेक शेड होते हैं। इन शर्तों और अपवादों की चर्चा मैं बाद में करूँगा। पहले हिन्दी के पक्ष में एक आदर्श स्थिति की परिकल्पना प्रस्तुत करता हूँ।</p>



<h3 class="wp-block-heading"><strong>चिकित्सा शिक्षा के ग्रहीताओं के अनेक स्तर</strong></h3>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>स्तर – 1 : </strong>सबसे सरल व प्राथमिक क्षेत्र है &#8211; जन स्वास्थ्य शिक्षा। विभिन्न बीमारियों और स्वास्थ्य सम्बन्धी विषयों पर पत्र-पत्रिकाओं , पुस्तिकाओं, पोस्टर्स और पुस्तकों के रूप में बहुत कुछ लिखा गया है। परन्तु बिखरा हुआ है, सूचीबद्ध नहीं है। एकरूपता की कमी है। भाषा और गुणवत्ता अच्छी और बुरी दोनों तरह की है। प्रामाणिकता की पुष्टि करना जरूरी हो सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इन्द्रधनुषीय भिन्नता के पाठक वर्गों को लक्ष्य करने के कारण लेखन के शैलीगत व भाषागत स्तर में एकरूपता नहीं रह पाती है । कुछ खण्ड सरल, प्रवहमान, बोलचाल की भाषा में होते हैं तो कुछ अन्य तत्सम बहुल व क्लिष्ट प्रतीत हो सकते हैं | जानकारी का स्तर कहीं बुनियादी या प्राथमिक होता है तो कहीं चिकित्सकों के लिये भी नवीनतम व जटिल। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि मुद्रित व अन्य माध्यमों से प्रदान की जाने वाली स्वास्थ्य शिक्षा के द्वारा मरीज व परिजन अच्छा अनुभव करते हैं, आत्मविश्वास व निर्णय क्षमता बढ़ती है । अंग्रेजी व अन्य विकसित देशों की भाषाओं के सन्दर्भ में, जहाँ शिक्षा मातृभाषा में दी जाती है, अनेक वरिष्ठ शिक्षक-चिकित्सक आम जनता के लिये अथवा मरीजों के लिये सरल भाषा में लिखने को हेय दृष्टि से नहीं देखते हैं । यदि एक ओर वे जटिलतम और आधुनिक विषयवस्तु को अपने छात्रों, शोधार्थियों व सहकर्मियों के लिये प्रस्तुत करते है तो दूसरी ओर उतनी ही प्राथमिकता से जन-शिक्षा के प्रति अपना दायित्व भी निभाते हैं । विज्ञान पत्रिकारिता में अपना कॅरियर बनाने वाले अनेक प्रसिद्ध और गैर चिकित्सक लेखक हैं जो तकनीकी विषयों पर सतत्‌ पकड़ रखते हैं और टाईम, न्यूयार्कर, न्यूज बीक, नेशनल ज्योग्राफिक, साइन्टिफिक अमेरिकन जैसे प्रकाशनों द्वारा और स्वतंत्र पुस्तकों के माध्यम से आम लोगों के लिये प्रांजल (सरल, समझ में आने वाली) भाषा में उच्च कोटि की नई से नई जानकारी व बहस के मुद्दे प्रस्तुत करते हैं। उपरोक्त दोनों श्रेणियों के लेखकों की हिन्दी व भारतीय भाषाओं में कमी है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>स्तर – 2 : </strong>अन्य चिकित्सा कर्मी जिन्हें पेरमेडिकल स्टाफ कहा जाता है- जैसे परिचारिकाएं, सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता आदि के लिये भारतीय भाषाओं में अच्छी गुणवत्ता के चिकित्सा साहित्य की जरूरत है। अनुवाद के रूप में कुछ सामग्री नर्सिग क्षेत्र में उपलब्ध हैं परन्तु भाषा असहज प्रतीत होती है। यह समुदाय आम जनता और चिकित्सकों के बीच पुल का काम करता है| व्यस्त चिकित्सकों की मरीज शिक्षा सम्बन्धी जिम्मेदारी में हाथ बँटा सकता है।</p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="1048" height="349" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-13-1048x349.jpg" alt="" class="wp-image-2652" style="aspect-ratio:3;width:612px;height:auto" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-13-1048x349.jpg 1048w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-13-300x100.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-13-768x256.jpg 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-13.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1048px) 100vw, 1048px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>स्तर – 3 : </strong>स्नातक स्तर (एम.बी.बी.एस) के चिकित्सा छात्रों के लिये सम्पूर्ण रूप से हिन्दी माध्यम में शिक्षा देना फिलहाल दूभर प्रतीत होता है। लेकिन ऊपर वर्णित स्तर एक तथा दो के लिये निर्मित सामग्री में उनका निष्णात होना महत्वपूर्ण है । चिकित्सा छात्रों को अपने अध्ययन और कार्यअनुभव के दौरान इस बात का अहसास कराना और प्रशिक्षण दिया जाना जरूरी है कि जनता व मरीजों से उनकी बीमारी के बारे में कैसे, कितनी मात्रा व किस तरह की भाषा में बात की जाए तथा क्&#x200d;या लिखित सामग्री दी जाए । यदि राजनैतिक इच्छा शक्ति हो तो असम्भव कुछ नहीं है। संक्रमण काल में कुछ वर्षों तक तकलीफ होगी परन्तु बाद में आसान प्रतीत होगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>स्तर – 4 : </strong>स्नातकोत्तर व शोध क्षेत्र में हिन्दी का उपयोग स्तर तीन पर मिली सफलता के बाद ही कल्पित किया जा सकता है। हालांकि कुछ चुने हुए क्षेत्रों (आगे चर्चित) में स्तर तीन व चार की चिकित्सा शिक्षा तत्काल सम्भव है।</p>



<h3 class="wp-block-heading"><strong>चिकित्सा शिक्षा के अनेक विषय</strong></h3>



<p class="wp-block-paragraph">चिकित्सा शिक्षा का संसार बहुत बड़ा है । अनेक विषय हैं । कुछ सरल व कुछ कठिन । कुछ क्षेत्रों में हिन्दी का तत्काल उपयोग न केवल आसानी से सम्भव है बल्कि वांछनीय भी है । दूसरे क्षेत्र जिनमें तकनीकी शब्दवली की बहुलता हो, तुलनात्मक रूप से कठिन हो सकते हैं ।<br>मरीजों से बातचीत करना और उनकी बीमारी का विस्तृत वर्णन (इतिवृत्त/हिस्ट्री) जानने के लिये प्रश्न पूछना आदि चूंकि हिन्दी में होता है अत: कल्पना की जा सकती है कि तत्सम्बन्धी शिक्षा भी हिन्दी में ही दी जानी चाहिये । दुर्भाग्य से ऐसा नहीं होता है। परिजनों से पूछे जाने वाले प्रश्नों व संवादों की लड़ी को अंग्रेजी में पढ़ाया जाता है । छात्र व चिकित्सक अपनी बुद्धि वे अनुभव से उसका हिन्दी अनुवाद करते हैं । हिन्दी में आसान शब्द होते हुए भी , वे मरीज के साथ अंग्रेजी की खिचड़ी वापरते हैं । मरीज समझ नहीं पाता है। हिस्ट्री टेकिंग चिकित्सा शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है । बीमारी की सही डायग्नोसिस का दारोमदार इसी पर सबसे अधिक होता है। निदान के अलावा मरीजों से दूसरी बातें भी करनी होती है &#8211; उनके हाल चाल पूछना, बीमारी व उपचार के बारे में उन्हें समझाना, पूर्वानुमान की चर्चा करना, उपचार के विकल्पों में एक को चुनने की साझी निर्णय प्रक्रिया में मरीज को बराबरी का भागीदार बनाना आदि । यह सारी कला और समझ, अनुभव द्वारा सब को आती है । किसी को जल्दी और ज्यादा, किसी को देर से तथा कम । परन्तु चिकित्सा शिक्षकों की जमात ने इस ज्ञान व बुद्धि को सरल सुबोध हिन्दी में पढ़ाने का, सूचिबद्ध करने, सैद्धांतिक प्रतिपादन करने का कोई प्रयास नहीं किया।</p>



<figure class="wp-block-table"><table><tbody><tr><td><strong>नरेटिव मेडिसिन (कथात्मक चिकित्सा) पर आजकल पुन: अधिक जोर दिया जा रहा है। बीमारी के अनुभव को भोगने वाले व्यक्ति व परिवार की आप बीती का वर्णन जरूरी है । मनोविज्ञान (सरायकोलाजी) व मनोरोग विज्ञान (साईकिएट्री) का सम्बन्ध मानविकी (ह्यूमेनिटीज) से है। अत: हिन्दी शब्दावली कुछ अंशों में उपलब्ध है और चलन में है।</strong></td></tr></tbody></table></figure>



<p class="wp-block-paragraph">सामुदायिक चिकित्सा विज्ञान की अधिकांश सामग्री को अच्छी हिन्दी में आसानी से प्रयुक्त किया जा सकता है । विधि साहित्य पर भारतीय भाषाओं में लेखन की परम्परा है इसलिये मेडिकल ज्यूरिस प्रडेन्स और फारेन्सिक मेडिसिन सम्बन्धी ज्ञान का बड़ा अंश हिन्दी में उपलब्ध कराना कठिन नहीं होगा।</p>



<figure class="wp-block-image size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="658" height="379" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Untitled-2.png" alt="" class="wp-image-2654" style="aspect-ratio:1.7361477572559367;width:429px;height:auto" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Untitled-2.png 658w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/Untitled-2-300x173.png 300w" sizes="auto, (max-width: 658px) 100vw, 658px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">किसी भी एक रोग पर लिखे गये अध्याय में प्राय: निम्न खण्ड होते हैं &#8211; 1. परिभाषा, 2. पर्यायवाची, 3. भूमिका, 4. एपिडेमियोलाजी (अधिजन विज्ञान), 5. रोगविकृति (पेथालजी), 6. रोग विधि, 7. कारण, 8. लक्षण, 9. शारीरिक जाँचमें चिह्न, 10. प्रयोगशाला जाँचे, 11. निदान तथा 12. निदान भेद, 13. औषधि उपचार, 14. गैर औषधि उपचार, 15. शल्य उपचार, 16. पूर्वानुमान (प्रोग्रोसिस) ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इनमें से कुछ खण्डों के वर्णन में तकनीकी शब्दों की बहुलता होगी तथा कुछ में कम ।</p>



<h3 class="wp-block-heading"><strong><u>भाषा-प्रयोग नहीं हैं असाध्य रोग, सरल निदान हैं इसका</u></strong></h3>



<h4 class="wp-block-heading"><strong>भाषा का स्वरूप</strong></h4>



<p class="wp-block-paragraph">अंग्रेजी में सोचने वाले लोग प्राय: आम लोगों की हिन्दी को कम करके आंकते हैं। चूंकि वे खुद हिन्दी का उपयोग छोड़ चुके हैं और अपनी शब्द सम्पदा गँवा चुके हैं, दूसरों को भी वैसा ही समझते हैं । थोड़ी-सी अच्छी और शुद्ध हिन्दी से अंग्रेजी परस्त विद्वातजनों की जीभ ऐंठने लगती है। &#8220;परिस्थितियाँ&#8221; जैसा शब्द उनके लिये टंग-ट्विस्टर है परन्तु &#8220;सर्कमस्टान्सेस&#8221; नहीं । चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में हिन्दी में लिखने वालों को अपने बुद्धिमान व पढ़े-लिखे पाठकों की क्षमता पर सन्देह नहीं होना चाहिये । यदि आपकी भाषा शैली प्रांजल व प्रवाहमय हो तो लोग सुनते है, पढ़ते हैं, गुनते हैं, समझते हैं, सराहते हैं, आनन्दित होते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">तकनीकी शब्दों के अनुवाद व गठन हेतु कुछ परम्पराएँ मौजूद हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">*************************************</p>



<p class="has-black-color has-text-color wp-block-paragraph">अंग्रेजी व यूरोपीय भाषाओं में तकनीकी शब्दों का मूल स्रोत लेटिन व ग्रीक भाषाएँ हैं । हिन्दी व भारतीय भाषाओं के लिये संस्कृत है । हिन्दी को सरलीकृत करने के नाम पर अंग्रेजी में सोचने वाले कुछ विद्वान उसे हिन्दुस्तानी अर्थात्‌ उर्दू अर्थात मिश्रित स्वरूप प्रदान करने पर जोर देते हैं तथा संस्कृतनिष्ठ शब्दों से परहेज करने की सलाह देते हैं | बोलचाल व फिल्&#x200d;मी गीतों &#8211; संवादों तक के लिये हिन्दुस्तानी उपयुक्त हो सकती है परन्तु साहित्य व तकनीकी दोनों क्षेत्रों में संस्कृत जनित तत्सम शब्दों के प्रचुर उपयोग के बिना समृद्ध सम्प्रेषण सम्भव नहीं है | उर्दू मिश्रित हिन्दुस्तानी की ग्राह्यता गैर हिन्दी क्षेत्रों में कम है । संस्कृत शब्दावली, हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं में (भारोपीय व द्रविड़ दोनों वर्ग) में अधिक आसानी से समाहित की जा सकती है । यह सोच गलत है कि तत्सम शब्द जटिल होते हैं या कि तदभव शब्द ही आसान होते हैं । शब्दों की इन श्रेणियों को वर्ण व्यवस्था व वर्ग विभेद की दृष्टि से देखना भी गलत है।</p>



<p class="has-black-color has-text-color wp-block-paragraph">हमें यथार्थ स्वीकारना होगा कि अंग्रेजी एक भारतीय भाषा भी है । इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक सामाजिक पहलुओं,की चर्चा, मेरे आलेख का विषय नहीं है। हम मूलतः द्विभाषी या बहुभाषी लोग हैं । चिकित्सा शिक्षा में हिन्दी के उपयोग की चर्चा का अर्थ अंग्रेजी को वर्जित करना कदापि नहीं हो सकता है। हमें दोनों का मिला जुला उपयोग करना है। दोनों एक दूसरे को अच्छे दूसरे को अच्छे व बुरे अर्थो में प्रभावित करती हैं। अंग्रेजी में उपलब्ध सामग्री को हमें मानक के रूप में स्वीकार करना होगा। हालाँकि इस बात की उम्मीद भी रखना होगी कि हिन्दी में शायद कभी कुछ नया मौलिक चिकित्सा साहित्य निकलेगा जिसके अंग्रेजी अनुवाद की आवश्यकता महसूस हो । फिलहाल तो यह रूपान्तरण एकल दिशा वाला ही है।</p>



<p class="has-black-color has-text-color wp-block-paragraph">पाठकों के मन-मस्तिष्क व जुबान पर हिन्दी के तकनीकी शब्द चढ़ाने के लिये नीचे दिये गये उदाहरणों पर गौर करें।मैं कुछ युक्तियाँ प्राय: अपनाता हूँ ।</p>



<p class="has-black-color has-text-color wp-block-paragraph">*यदि मुझे ऐसी लगता है कि हिन्दी में किसी विशिष्ट तथ्य या विचार के लिये उपयुक्त शब्द नहीं है तो मैं अंग्रेजी भाषा के तकनीकी शब्द को बिना अनुवाद के रोमन लिपि में और साथ ही लिप्यन्तरण द्वारा देवनागरी में बिम्ब युग्म के रूपमें प्रस्तुत करता हूँ । रोमन व देवनागरी रूप का क्रम आगामी उल्लेखों में उल्टा-पुल्टा किया जाना चाहिये।</p>



<p class="has-black-color has-text-color wp-block-paragraph">*अनेक मरीजों को लिखते समय हाथ की मांसपेशियों &#8230;&#8230;. । इस अवस्था को राइयटर्स क्रैम्प (Writer&#8217;s Cramp) कहते हैं।</p>



<p class="has-black-color has-text-color wp-block-paragraph">*यदि मूल अंग्रेजी शब्द का हिन्दी पर्याय नया, अप्रचलित और (तथा कथित रूप से) कठिन या क्लिष्ट हो तो दूसरे प्रकार का शब्द युग्म प्रयुक्त किया जा सकता है। बहुप्रचलित अंग्रेजी शब्द को देवनागरी में प्रस्तुत करें और साथ ही उसका हिन्दी समानार्थक शब्द कोष्टक में देवें। आलेख में इस शब्द की अगली प्रयुक्ति के समय युग्म या जोड़े में अंग्रेजी-हिन्दी का क्रम उलट किया जाए।</p>



<p class="has-black-color has-text-color wp-block-paragraph">*मिर्गी (एपिलेप्सी)&#8230;&#8230;&#8230; एपिलेप्सी (मिर्गी) इस कश्मकश के पीछे सोच यह है कि पर्यायवाची युग्मों के बार-बार उपयोग से पाठक या श्रोता के दिमाग में उनकी समानार्थकता स्थापित होगी। अल्पप्रचलित परन्तु सुन्दर व सटीक हिन्दी शब्दों से परिचय होगा, उपयोग होगा तथा उनके जुबान पर चढ़ने की संभावना बढ़ेगी।</p>



<p class="has-black-color has-text-color wp-block-paragraph">*आलेख में किसी भी तकनीकी शब्द का प्रथम बार प्रयोग होते समय उसकी परिभाषा व सरल व्याख्या तत्काल वहीं उसी पेराग्राफ (अनुच्छेद) में या उस पृष्ठ के नीचे फुट नोट (पादटिप्पणी) के रूप में दी जानी चाहिये । निम्न उदाहरण देखिये।</p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="1048" height="349" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-10-1048x349.jpg" alt="" class="wp-image-2618" style="aspect-ratio:3;width:600px;height:auto" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-10-1048x349.jpg 1048w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-10-300x100.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-10-768x256.jpg 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-10.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1048px) 100vw, 1048px" /></figure>



<p class="has-black-color has-text-color wp-block-paragraph">*मल्टीपल स्क्लीरोसिस (Multiple Sclerosis) रोग में मस्तिष्क व मेरूतंत्रिका (स्पाईनल कार्ड) में मौजूद तंत्रिका-तन्तुओं (नर्व &#8211; फाईबर्स) के माईलिन (Myelin) आवरण में खराबी आ जाती है । माईलिन एक विशेष प्रकार की रासायनिक संरचना है जो प्रोटीन व वसा के जटिल अणुओं से बनती है। माईलिन एक बारीक महीन झिल्ली के रूप में न्यूगान कोशिकाओं को जोड़ने वाले अक्ष-तन्तुओं (एक्सान) के चारों ओर कई परतों वाला सर्पिलाकार खोल बनाती है।</p>



<p class="has-black-color has-text-color wp-block-paragraph">*जानवर में पैदा की जाने वाली मिर्गी को प्रायोगिक मॉडल कहते हैं | न केवल मिर्गी वरन्‌ दूसरी बहुत सी बीमारियों के अध्ययन में एक्सपेरिमेंटल एनिमल (प्रायोगिक प्राणी) मॉडल से अत्यन्त उपयोगी जानकारी मिलती है व उपचार की विधियाँ खोजना आसान हो जाता है।</p>



<p class="has-black-color has-text-color wp-block-paragraph">*ऐसे भी मिर्गी होती है जिसमें कोई विकार स्थान नहीं दिख पाता। विद्युतीय गड़बड़ी मस्तिष्क के केन्द्रीय भाग से आरंभ होकर दोनों गोलार्धों के एक साथ समाहित कर लेती है। इसे प्राथमिक सर्वव्यापी (&#8216;Primary Generalized&#8217;) मिर्गी कहते हैं। इनकी कार्यविधि समझना और भी कठिन है।</p>



<p class="has-black-color has-text-color wp-block-paragraph">*थेलेमस की न्यूरान कोशिकाओं की विद्युत सक्रियता, अन्य भागों की तुलना में अधिक लयबद्ध, समयबद्ध होती है। एक साथ बन्द चालू होने के इस गुण को समक्रमिकता ( Synchronization सिन्क्रोनाइजेशन) कहते हैं। विकार स्थान (फोकस) सूक्ष्मदर्शी यंत्र से दिखने में सामान्य हो या असामान्य, वहां की रासायनिक गतिविधियाँ जरूर गड़बड़ होती हैं।</p>



<figure class="wp-block-table"><table><tbody><tr><td><strong>फायरिंग (सुलगने) के दौरान पोटेशियम आयन कोशिका से बाहर आ जाते हैं व केल्शियम आयन भीतर प्रवेश कर जाते हैं। न्यूरोट्रान्समीटर्स (तंत्रिका प्रेषक) का अधिक मात्रा में रिसाव होता है। उक्त फोकस की न्यूरान कोशिकाओं द्वारा ग्लूकोज व आक्सीजन का उपभोग कुछ सेकण्ड्स के लिये बढ़ जाता है।</strong></td></tr></tbody></table></figure>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>एक समस्या और है वह है अनुवादकों द्वारा जनित समस्या &#8211;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">अनुवादक का ध्येय केवल भाषांतर करने की अपेक्षा उसकी ग्राह्यता को बनाए रखना भी होना चाहिए | कठिन से कठिन की ओर बहने वाला प्रवाह सामान्य जनोपयोगी नहीं होता |</p>



<p class="wp-block-paragraph">स्वर्ग से उतरी गंगा यदि शिव जटाओं में ही उलझी रहे, चोंटियों से समतल मैदानों तक ही न उतरे तो क्या काम की |</p>



<p class="wp-block-paragraph">अनुदित भाषा-गंगा भी ऐसी ही हैं | हाँ गंगोत्री की सी शुद्धता नीचे आते-आते कम हो जाती है पर सामान्य जन का कल्याण भी इसके बिना गंगा नहीं कर सकती |</p>
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		<title>हिन्दी में विज्ञान लेखन में चुनौतियां</title>
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		<dc:creator><![CDATA[न्यूरो ज्ञान]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 05 Oct 2023 11:48:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>हिन्दी में विज्ञान विषयों पर लिखने वाले को सदैव इस समस्या का सामना करना पड़ा है कि या तो वे भाषा व ज्ञान को अति सरलीकृत रखें और विषयवस्तु की गुणवत्ता व मात्रा दोनों की बलि चढ़ा दें या फिर सचमच में कुछ गम्भीर व विस्तृत व आधुनिक लिखें,&#160;फिर चाहे ये आरोप क्‍यों न लग [&#8230;]</p>
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<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1048" height="351" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-6-1048x351.jpg" alt="" class="wp-image-2637" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-6-1048x351.jpg 1048w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-6-300x101.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-6-768x257.jpg 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-6.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1048px) 100vw, 1048px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">हिन्दी में विज्ञान विषयों पर लिखने वाले को सदैव इस समस्या का सामना करना पड़ा है कि या तो वे भाषा व ज्ञान को अति सरलीकृत रखें और विषयवस्तु की गुणवत्ता व मात्रा दोनों की बलि चढ़ा दें या फिर सचमच में कुछ गम्भीर व विस्तृत व आधुनिक लिखें,&nbsp;फिर चाहे ये आरोप क्&#x200d;यों न लग जाए कि भाषा दुरूह है। बीच का रास्ता निकालना मुश्किल है। हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में उच्च स्तर की भाषा पढ़ने समझने वालों का प्रतिशत घटता जा रहा है। हिन्दी शब्दावली इसलिये दुरूह महसूस होती है कि हमने उस स्तर की संस्कृतनिष्ठ भाषा सीखी ही नहीं और न उसका आम चलन में उपयोग किया। अंग्रेजी शब्द आसान प्रतीत होते हैं क्योंकि वे पहले ही जुबान पर चढ़ चुके होते हैं। समाज का वह बुद्धिमान व सामश्र्यवान तबका जो उच्च स्तर की हिन्दी समझ सकता है,&nbsp;अपना अधिकांश पठन-मनन अंग्रेजी में करता है। हिन्दी पर उसकी पकड़ छूटती जाती है। वह निहायत ही भद्दी मिश्रित भाषा का उपयोग करने लगता है। बचे रह जाते हैं अल्पशिक्षित विपन्न वर्ग के लोग। हिन्दी जब तक श्रेष्ठिवर्ग या उच्च स्तर के बुद्धिजीवी वर्ग में प्रतिष्ठित नहीं होती तब तक इस लेखक को अपनी भाषा को सरलीकृत करने को मजबूर होना पड़ेगा और वैज्ञानिक तथ्यों को कुछ हद तक छोड़ना पड़ेगा। अंग्रेजी जानने वाले पाठक इस पुस्तक के अंग्रेजी रूपान्तरण का 80 प्रतिशत समझ पायेंगे। हिन्दी भाषी पाठक वर्तमान सरलीकृत रूप का 50 प्रतिशत से कम समझ जायेंगे क्&#x200d;योंकि या तो उन्होंने उतना विज्ञान पढा ही नहीं या अंग्रेजी पढा। हिन्दी माध्यम के विद्यालय व महाविद्यालय यदि निरन्तर निम्न वर्ग की संस्थाएं बनती रहें तो हिन्दी में विज्ञान लेखन का स्तर एक सीमा से उपर नहीं उठ पायेगा। इस लेखक ने स्वयं हिन्दी माध्यम की शालाओं में शिक्षा प्राप्त की। आज से तीन दशक पूर्व उच्च मध्यवर्ग तक के बालक-बालिकाएँ शासकीय संस्थाओं में अध्ययन करते थे। आज निम्न मध्य वर्ग के पालक भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम की शालाओं में भेजते हैं। फिरभी उम्मीद की जाती है कि इस प्रयोग से उपयोगी प्रतिपुष्टि&nbsp;&#8216;फीडबेक&#8217;&nbsp;प्राप्त होगी तथा भविष्य में हिन्दी में बेहतर मूल लेखन की प्रेरणा प्राप्त होगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">विश्व के अन्य देशों में बीमारियों पर पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। उसका रूपान्तरण किया गया है। अंग्रेजी भाषा की शैली इंडियन व मुहावरे का प्रभाव कहीं-कहीं इृष्टिगोचर हो सकता है। वैज्ञानिक शब्दावली के चयन में अनेक प्रयोग हैं। केंद्रीय हिन्दी निदेशालय व शिक्षा मंत्रालय द्वारा प्रकाशित वृह्त पारिभाषिक शब्द संग्रह का उपयोग किया गया;&nbsp;परन्तु ये शब्द प्रायः दुरूह,&nbsp;अति तत्सम या संस्कृत आधारित प्रतीत हुए। अन्य हिन्दी-अंग्रेजी कोशों की मदद पूरी गई। आम बोलचाल की हिन्दुस्तानी से उर्दू आधारित व तद्भव शब्दों को भी चुना गया है&nbsp;|&nbsp;लेखक ने स्वयं अनेक नये शब्द गढ़े हैं। प्रामाणिक एक-रूपी शब्दावली का उपयोग न करना,&nbsp;अकादमिक दृष्टि से श्रेयस्कर नहीं है। फिर भी सोचा यह गया कि इस साहित्य से प्रमुख लाभन्वित रहने वाले लोग हैं मरीज,&nbsp;रिश्तेदार व प्राथमिक स्वास्थ्य कर्मी। यह पाठ्यपुस्तक॑ नहीं है इसलिये शब्द चयन में छूट ली गई है। भारतीय भाषाओं पर अधिकार रखने वाले चिकित्सकों व वैज्ञानिकों का कर्तव्य बनता है के छवि जन स्वास्थ्य शिक्षा के क्षेत्र में आगे आऐं। साक्षरता,&nbsp;शिक्षा व आर्थिक स्तर में सुधार के साथ उम्मीद की जाती है कि विकासशील देशों में भी इस प्रकार स्वास्थ्य साहित्य की मांग व चलन बढ़ेगा। अंतिम लक्ष्य है मरीज की आत्मनिर्भरता। स्वयं की बीमारी व उपचार के सन्दर्भ में सारे निर्णय चिकित्सक के हाथों में छोड़ने के बजाय वह भी उक्त प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी निभाएं,&nbsp;ऐसी अभिलाषा है।</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="1048" height="349" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-11-1048x349.jpg" alt="" class="wp-image-2635" style="width:846px;height:auto" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-11-1048x349.jpg 1048w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-11-300x100.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-11-768x256.jpg 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-11.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1048px) 100vw, 1048px" /></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">यह एक चुनौती है। एक टीम की दरकार है। अकेले करना मुश्किल है। एक अर्धकालिक सम्पादक तो कम से कम चाहिये। चिकित्सा विज्ञान पत्रकारिता में ग्लेमर,&nbsp;रसूख,&nbsp;सम्पर्क और पैसा नहीं मिलता। इसलिये कोई इस तरफ रूख ही नहीं करता। कलेवर में गहराई और विविधता के लिये बहुत सारे लेखक चाहिये जो समय-समय पर रचनाएं देते रहें। पाठकों से अभी तक प्रतिसाद अच्छा मिल्रा है परन्तु कुछ प्रतिक्रियाओं और सुझावों से मैं सहमत नहीं हो पाया। आप इसे अंग्रेजी में क्यों नहीं निकालते&nbsp;?&nbsp;मेरे भाई,&nbsp;अंग्रेजी में चिकित्सा शिक्षा साहित्य की कोई कमी नहीं है,&nbsp;जरूरत तो हिन्दी व भारतीय भाषाओं में काम करने की है,&nbsp;इसमें न्यूरोलाजी के अलावा अन्य विषयों पर भी छापिये पत्रिका का नाम न्यूरोज्ञान इस बात का पक्का द्योतक है कि प्रकाशक की मंशा क्&#x200d;या है। एक बार में एक ही बीमारी के बारे में क्यों&nbsp;?&nbsp;जिसे जो रोग होता है,उसे उसी के बारे में जानने की लालसा होती है और उस अंक को हम उसी रोग से पीडित व्यक्तियों को पोस्ट करते हैं। न्यूरोज्ञान के प्रत्येक अंक में किसी एक रोग पर तैयार सामग्री को निम्न शीर्षकों में संग्रहित किया जाता है –</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>1. रोग से सम्बन्धित वैज्ञानिक पहलू -सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक दोनों ।<br>2. उक्त रोग से पीडित व्यक्तियों और परिवारों के हितों के लिये काम करते संगठन तथा उनकी गतिविधियों के समाचार।<br>3. कुछ मरीजों व देखभालकर्ताओं की आप बीती।<br>4. शोध के समाचार तथा भविष्य की सम्भावनाऐं<br>5. वैज्ञानिक पारिभाषिक शब्दावली<br>5. ज्ञान की परख &#8211; आत्मपरीक्षण हेतु प्रश्नावली और उत्तर।<br>6. शिक्षाप्रद पोस्टर्स या कलाकृति।</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">जीवन का पहला सुख निरोगी काया है। परन्तु बीमार पड़ना भी मनुष्य की नियति है। देह घरे का दण्ड है। मृत्यु,&nbsp;वृद्धावस्था व रोग के क्रूर सत्य के अहसास ने युवक सिद्धार्थ को गौतम बुद्ध बना दिया। बहुत से रोग अल्प अवधि के होते हैं। ठीक हो जाते हैं। एक लघु दुःस्वप्न के समान,&nbsp;हम उन्हें प्रायः भूल जाते हैं। कुछ दूसरे रोग दीर्घ अवधि के होते हैं। ठीक नहीं होते। बने रहते हैं। बार-बार लौट कर वार करते हैं। या बिगड़ते चले जाते हैं,&nbsp;जीवन का स्थाई अंग बन जाते हैं। ऐसी बीमारी से सामना पड़ने पर,&nbsp;उसकी निरंतरता से रूबरू होने पर,&nbsp;लोग हतप्रभ रह जाते हैं,&nbsp;विश्वास नहीं करते,&nbsp;स्वीकार नहीं करते,&nbsp;विद्रोह करते हैं,&nbsp;उदास हो निराशा के गर्त में गहरे डूब जाते हैं,&nbsp;हार जाते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">परन्तु जीवन फिर भी चलता है। दौड़ता है। हासिल करता है। मंजिलों तक पहुंचता है। ऐसे में रोग से लड़ने का सहारा कहां से मिलता है?&nbsp;अपने अंतर्मन की जीवनी-शक्ति से,&nbsp;जिजीविषा से। यह शक्ति या तो जन्मजात होती है या बाद में गढ़ी जाती है। सहारा मिलता है &#8211; परिजनों से मित्रों से,&nbsp;चिकित्सा व्यवसाय में रत कर्मियों से।</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="1048" height="349" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-11-1048x349.jpg" alt="" class="wp-image-2634" style="width:840px;height:auto" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-11-1048x349.jpg 1048w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-11-300x100.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-11-768x256.jpg 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-11.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1048px) 100vw, 1048px" /></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">आस्था भी एक सहारा है। आस्था अपने आप में । आस्था ईश्वर में या नियति में &#8211; आस्था अपने सर्मों व सदबुद्धि&nbsp;में।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दो और स्रोत हैं सहारे के &#8211; ज्ञान व हमसफर। ज्ञान एक बड़ी शक्ति है। अज्ञान भय है। ज्ञान हमे निर्भय बनाता है। ज्ञान किस बात का&nbsp;?&nbsp;रोग का,&nbsp;उसके कारणों&nbsp;,&nbsp;लक्षणों,&nbsp;निदान,&nbsp;प्रयोगशाला जांचों,&nbsp;उपचार,&nbsp;पूर्वानुमान आदि अनेक पहलुओं का । बीमारी के बारे में हमारी समझ हमारा विश्वास बढ़ाती है। स्थिति हमें नियंत्रण में प्रतीत होती है। सत्य चाहे बुरा हो,&nbsp;अनिष्ठदर्शक हो,&nbsp;फिर भी उसे जानना बेहतर है,&nbsp;बजाय कि अज्ञान व अनिश्चय के अंधकार में डूबे रहने के । रेत में सिर छुपाने से तुफान नहीं टलता। मुंह छिपाने से यथार्थ छुप नहीं जाता। सत्य शायद उतना बुरा न हो जितना अन्यथा सोचने में आता है या सत्य शायद उतना बुरा है फिर भी वह मदद करता है &#8211; हमें मन से तैयार करता है। बीमारी का उपचार एक मार्गी उपक्रम नहीं है। डाक्टर ने दवा लिखी,&nbsp;आपने ले ली। हमें क्या करना बीमारी के बारे में जानकर! हमें मतलब है ठीक होने से। ऐसी मानसिकता ठीक नहीं। उपचार उभयमार्गी व बहुमार्गी उद्यम है। एक टीम-वर्क है। मरीज व उसके परिजनों को सक्रिय भूमिका निभानी है। चिकित्सकों के पास अधिक जानकारी है,&nbsp;इसका मतलब यह नहीं कि व आपके शरीर के एक मात्र नियंता हो गये। निर्णय प्रक्रिया में मरीज व घरवालों को भी भागीदारी होना चाहिये। चिकित्सकगण विकल्प बतायेंगे,&nbsp;सम्भावनाओं की चर्चा करेँंगे। अपनें हित में,&nbsp;अपनी सोच,&nbsp;अपनी रूचि,&nbsp;अपनी पारिवारिक स्थिति के आधार पर कौन सा विकल्प उचित होगा यह फैसला सिर्फ डाक्टर्स द्वारा थोपा नहीं जा सकता। अतः रोग का जान जरूरी है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ज्ञान के साथ दूसरा सहारा है &#8211; हमसफर,&nbsp;हमदर्द। उसी रोग से ग्रस्त अन्य मरीज। यह जानना सुकून देता है कि हम अकेले नहीं है हमारे जैसे और भी हैं। बीमारी से लड़ रहे हैं। कोई छोटी विजय। कोई बड़ी विजय। हार कर भी नहीं हार रहे हैं। वास्तविकता को स्वीकार कर रहे हैं। जीवन को ढाल रहे हैं। अपने आपको हालातों के अनुकूल बना रहे हैं। समझोता करना सीख रहे हैं। जीवन के लक्ष्यों को पुनः परिभाषित व संशोधित करना सीख रहे हैं। परिवर्तित जीवन शैली व मंजिल में संतोष ढूंढ रहे हैं। नई उर्जा संग्रह कर रहे हैं। अपने जैसे दूसरे रोगियों के अनुभव को जानना एक बहुत बड़ा सहारा है। न्यूरोज्ञान पत्रिका मरीजों के लिये ज्ञान और हमसफर का मिल्रा जुला स्रोत है। इसमें निहित जानकारियां व अनुभव एक प्रतिध्वनि के समान चिकित्सकों व मरीजों के वृहत्तर होते जाते समूह में गुंजायमान होती चली जाएंगी। लघु पत्रिकाओं की यह श्रंखला,&nbsp;स्वास्थ्य संबंधी अन्य पत्रिकाओं से भिन्न होंगी। न्यूरोल्रारँजी और फिर बाद मेँ अन्य बीमारियों पर केंद्रित इसके अंक निकलेंगे। मिर्गी-मुकाबला और पार्किन्सोनिज्म-प्रहार नाम से प्रथम अंक निकले हैं। किसी एक बीमारी पर केंद्रित न्&#x200d;यूज लेटर उन्हीं को भेजा जाएगा जो उससे पीडित हैं। या उनके परिजनों व मित्रों को,&nbsp;तथा तत्सम्बन्धी ज्ञान का प्रचार प्रसार करने में योगदान हेतु तत्पर हो। विभिन्&#x200d;न न्यूरोला“जिकल बीमारियों से ग्रस्त मरीजों के नाम पतों की एक बड़ी सूची हमारे पास है। हमारी पहली मेलिंग लिस्ट इसी से बनी। पत्रिका पाने वालों से अनुरोध है कि अपने जैसे अन्य मरीजों को इसकी सूचना देवें,&nbsp;उनके नाम-पते हमारे पास भेजें ताकि हमारी सूची का विस्तार होता रहे। अन्य रोग जिन पर ऐसे ही न्यूजलेटर निकल रहे हैं-पक्षाघात&nbsp;&#8216;लकवा&#8217;,&nbsp;वाचाघात&nbsp;&#8216;अफेजिया&#8217;,&nbsp;सेरीब्रल पाल्सी&nbsp;&#8216;&nbsp;बाल लकवा&#8217;,&nbsp;बे्‌रन ट्यूमर,&nbsp;मन्द बुद्धि व सीखने में अवरोध,&nbsp;एल्जीमर्स-डिमेन्शिया&nbsp;&#8216;बुद्धिक्षया&#8217;,&nbsp;मायोपेथी,&nbsp;मोटरन्यूरारन डिसीज,&nbsp;अधोअंग लकवा&nbsp;&#8216;स्पाइनलकार्ड रोग&#8217;&nbsp;व अन्य और।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुछ बीमारियों से ग्रस्त मरीजों की संख्या लाखों में है&nbsp;&#8216;मिर्गी,&nbsp;पक्षाघात&#8217;,&nbsp;कुछ की हजारों में&nbsp;&#8216;पार्किन्सोज्मि&#8217;&nbsp;कुछ सैंकड़ों में या उससे भी कम। अल्पसंख्या में होने वाले दुर्लभ रोगों तक भी प्रतिध्वनि पहुंचेगी। हमारा लक्ष्य है अधिकाधिक प्रकार के रोगियों तक ज्ञान का प्रसार करना,&nbsp;उन्हें हमसफर का साथ मुहैया कराना और टोली में शामिल करना। विभिन्&#x200d;न नगरों और बस्तियों में विभिन्&#x200d;न रोगों से ग्रस्त मरीजों के स्वयंसेवक समूहों का निर्माण करना इस प्रक्रिया का अगला आनुषंगित परिणाम होगा।<a></a></p>
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		<title>हिन्दी में चिकित्सा विज्ञान पत्रकारिता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[न्यूरो ज्ञान]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 05 Oct 2023 05:54:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चिट्ठा संसार (ब्लॉग)]]></category>
		<category><![CDATA[blog]]></category>
		<category><![CDATA[hindi main chikitsha vigyan patrkarita]]></category>
		<category><![CDATA[ब्लॉग]]></category>
		<category><![CDATA[हिंदी एवं अन्य भाषाएँ]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी में चिकित्सा विज्ञान पत्रकारिता]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>हिन्दी में चिकित्सा विज्ञान पत्रकारिता करने वालों को सदैव इस समस्या का सामना करना पड़ा है कि या तो वे भाषा व ज्ञान को अति सरलीकृत रखें और विषयवस्तु की गुणवत्ता व मात्रा दोनों की बलि चढ़ा दें या फिर सचमुच में कुछ गम्भीर व विस्तृत व आधुनिक लिखें, फिर चाहे ये आरोप क्यों न [&#8230;]</p>
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<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="956" height="400" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-12-956x400.jpg" alt="" class="wp-image-2640" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-12-956x400.jpg 956w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-12-300x126.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-12-768x321.jpg 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/1-12.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 956px) 100vw, 956px" /></figure>



<figure class="wp-block-table"><table><tbody><tr><td><strong>हिन्दी में चिकित्सा विज्ञान पत्रकारिता करने वालों को सदैव इस समस्या का सामना करना पड़ा है कि या तो वे भाषा व ज्ञान को अति सरलीकृत रखें और विषयवस्तु की गुणवत्ता व मात्रा दोनों की बलि चढ़ा दें या फिर सचमुच में कुछ गम्भीर व विस्तृत व आधुनिक लिखें, फिर चाहे ये आरोप क्यों न लग जाए कि भाषा दुरूह है। बीच का रास्ता निकालना मुश्किल है।</strong></td></tr></tbody></table></figure>



<p class="wp-block-paragraph">हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में उच्च स्तर की भाषा पढ़ने समझने वालों का प्रतिशत घटता जा रहा है। हिन्दी शब्दावली इसलिये दुरूह महसूस होती है कि हमने उस स्तर की संस्कृतनिष्ठ भाषा सीखी ही नहीं और न उसका आम चलन में उपयोग किया। अंग्रेजी शब्द आसान प्रतीत होते हैं क्योंकि वे पहले ही जुबान पर चढ़ चुके होते हैं। समाज का वह बुद्धिमान व सामर्थ्यवान तबका जो उच्च स्तर की हिन्दी समझ सकता है, अपना अधिकांश पठन-मनन अंग्रेजी में करता है। हिन्दी पर उसकी पकड़ छूटती जाती है। वह निहायत ही भद्दी मिश्रित भाषा का उपयोग करने लगता है। बचे रह जाते हैं अल्पशिक्षित विपन्न वर्ग के लोग। हिन्दी जब तक श्रेष्ठिवर्ग या उच्च स्तर के बुद्धिजीवी वर्ग में प्रतिष्ठित नहीं होती तब तक इस लेखक को अपनी भाषा को सरलीकृत करने को मजबूर होना पड़ेगा और वैज्ञानिक तथ्यों को कुछ हद तक छोड़ना पड़ेगा। हिन्दी भाषी पाठक सरलीकृत रूप को भी कम समझ पाते हैं क्योंकि या तो उन्होंने उतना विज्ञान पढ़ा ही नहीं या अंग्रेजी में पढ़ा। हिन्दी माध्यम के विद्यालय व महाविद्यालय यदि निरन्तर निम्न वर्ग की संस्थाएं बनती रहें तो हिन्दी में चिकित्सा विज्ञान लेखन का स्तर एक सीमा से ऊपर नहीं उठ पायेगा। इस लेखक ने स्वयं हिन्दी माध्यम की शालाओं में शिक्षा प्राप्त की। आज से तीन दशक पूर्व उच्च मध्यवर्ग तक के बालक-बालिकाएं शासकीय संस्थाओं में अध्ययन करते थे। आज निम्न मध्य वर्ग के पालक भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम की शालाओं में भेजते हैं। फिर भी उम्मीद की जाती है कि हिन्दी और भारतीय भाषाओं में उच्च कोटि की चिकित्सा पत्रकारिता से उपयोगी प्रतिपुष्टि (फीडबेक) प्राप्त होगी तथा भविष्य में हिन्दी में बेहतर मूल लेखन की प्रेरणा प्राप्त होगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अंग्रेजी में सोचने वाले लोग प्राय: आम लोगों की हिन्दी को कम करके आंकते हैं। चूंकि वे खुद हिन्दी का उपयोग छोड़ चुके हैं और अपनी शब्द सम्पदा गवां चुके हैं, दूसरों को भी वैसा ही समझते हैं । थोड़ी सी अच्छी और शुद्ध हिन्दी से अंग्रेजी परस्त विद्वत्जनों की जीभ ऐंठने लगती है। &#8216;परिस्थितियाँ&#8217; जैसा शब्द उनके लिये टंग-ट्विस्टर है परन्तु सर्कमस्टान्सेस (circumstances) नहीं । चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में हिन्दी में लिखने वालों को अपने बुद्धिमान व पढ़े लिखे पाठकों की क्षमता पर सन्देह नहीं होना चाहिये । यदि आपकी भाषा शैली प्रांजल व प्रवाहमय हो तो लोग सुनते है, पढ़ते हैं, गुनते हैं, समझते हैं, सराहते हैं, आनन्दित होते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">तकनीकी शब्दों के अनुवाद व गठन हेतु कुछ परम्पराएँ मौजूद हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अंग्रेजी व यूरोपीय भाषाओं में तकनीकी शब्दों का मूल स्रोत लेटिन व ग्रीक भाषाएं हैं । हिन्दी व भारतीय भाषाओं के लिये संस्कृत है । हिन्दी को सरलीकृत करने के नाम पर अंग्रेजी में सोचने वाले कुछ विद्वान उसे हिन्दुस्तानी अर्थात् उर्दू मिश्रित स्वरूप प्रदान करने पर जोर देते हैं तथा संस्कृत निष्ठ शब्दों से परहेज करने की सलाह देते हैं । बोलचाल व फिल्मी गीतों &#8211; संवादों तक के लिये हिन्दुस्तानी उपयुक्त हो सकती है परन्तु साहित्य व तकनीकी दोनों क्षेत्रों में संस्कृत जनित तत्सम शब्दों के प्रचुर उपयोग के बिना समृद्ध सम्प्रेषण सम्भव नहीं है। उर्दू मिश्रित हिन्दुस्तानी की ग्राह्यता गैर हिन्दी क्षेत्रों में कम है । संस्कृत शब्दावली, हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं में (भारोपीय व द्रविड़ दोनों वर्ग) में अधिक आसानी में समाहित की जा सकती है । यह सोच गलत है कि तत्सम शब्द जटिल होते हैं या कि तद्भव शब्द ही आसान होते हैं । शब्दों की इन श्रेणियों को वर्ण व्यवस्था व वर्ग विभेद की दृष्टि से देखना भी गलत है।</p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-5-1048x349.jpg" alt="" class="wp-image-2620" style="width:651px;height:217px" width="651" height="217" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-5-1048x349.jpg 1048w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-5-300x100.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-5-768x256.jpg 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/3-5.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 651px) 100vw, 651px" /></figure>



<figure class="wp-block-table"><table><tbody><tr><td><strong>हमें यथार्थ स्वीकारना होगा कि अंग्रेजी एक भारतीय भाषा भी है । इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक सामाजिक पहलुओं की चर्चा, मेरे आलेख का विषय नहीं है। हम मूलत: द्विभाषी या बहुभाषी लोग हैं । चिकित्सा शिक्षा में हिन्दी के उपयोग की चर्चा का अर्थ अंग्रेजी को वर्जित करना कदापि नहीं हो सकता है। हमें दोनों का मिला जुला उपयोग करना है। दोनों एक दूसरे को अच्छे व बुरे अर्थों में प्रभावित करती हैं।</strong></td></tr></tbody></table></figure>



<p class="wp-block-paragraph">अंग्रेजी में उपलब्ध सामग्री को हमें मानक के रूप में स्वीकार करना होगा। हालांकि इस बात की उम्मीद भी रखना होगी कि हिन्दी में भविष्य में नया मौलिक चिकित्सा साहित्य निकलेगा जिसके अंग्रेजी अनुवाद की आवश्यकता महसूस हो । फिलहाल तो यह रूपान्तरण एकल दिशा वाला ही है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">विश्व के अन्य देशों में अनेक बीमारियों पर पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। उसका रूपान्तरण किया जा सकता है है। अंग्रेजी भाषा की शैली (इंडियन व मुहावरे) का प्रभाव कहीं-कहीं दृष्टिगोचर हो सकता है। वैज्ञानिक शब्दावली के चयन में अनेक प्रयोग करना पड़ सकते हैं। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय व शिक्षा मन्त्रालय द्वारा प्रकाशित वृह्त पारिभाषिक शब्द संग्रह है। परन्तु ये शब्द प्राय: दुरूह, अति तत्सम या संस्कृत आधारित हैं। अन्य हिन्दी-अंग्रेजी कोशों की मदद ले सकते हैं। आम बोलचाल की हिन्दुस्तानी से उर्दू आधारित व तद्भव शब्दों को भी चुना जा सकता है। लेखक स्वयं अनेक नये शब्द गढ़ सकता है। प्रामाणिक एक-रुपी शब्दावली का उपयोग न करना, अकादमिक दृष्टि से श्रेयस्कर नहीं है। फिर भी सोचना यह चाहिए कि इस चिकित्सा पत्रकारिता से प्रमुख लाभान्वित रहने वाले लोग हैं मरीज, रिश्तेदार व प्राथमिक स्वास्थ्य कर्मी। इसीलिये शब्द चयन में छूट ली जा सकती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पाठकों के मन-मस्तिष्क व जुबान पर हिन्दी के तकनीकी शब्द चढ़ाने के लिये नीचे दिये गये उदाहरणों पर गौर करें । मैं कुछ युक्तियाँ प्राय: अपनाता हूँ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&gt;यदि मुझे ऐसी लगता है कि हिन्दी में किसी विशिष्ट तथ्य या विचार के लिये उपयुक्त शब्द नहीं है तो मैं अंग्रेजी भाषा के तकनीकी शब्द को बिना अनुवाद के रोमन लिपि में और साथ ही लिप्यन्तरण द्वारा देवनागरी में बिम्ब युग्म रूप में प्रस्तुत करता हूँ । रोमन व देवनागरी रूप का क्रम आगामी उल्लेखों में उल्टा पुल्टा किया जाना चाहिये।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&gt;अनेक मरीजों को लिखते समय हाथ की मांसपेशियों में ऐंठन होने लगती हैं। इस अवस्था को राइटर्स क्रैम्प (Writer&#8217;s Cramp)कहते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&gt;यदि मूल अंग्रेजी शब्द का हिन्दी पर्याय नया, अप्रचलित और (तथा कथित रूप से) कठिन या क्लिष्ट हो तो दूसरे प्रकार का शब्द युग्म प्रयुक्त किया जा सकता है। बहुप्रचलित अंग्रेजी शब्द को देवनागरी में प्रस्तुत करें और साथ ही उसका हिन्दी समानार्थक शब्द कोष्टक में देवें। आलेख में इस शब्द की अगली प्रयुक्ति के समय युग्म या जोड़े में अंग्रेजी-हिन्दी का क्रम उलट किया जावे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&gt;मिर्गी (एपिलेप्सी)&#8230;&#8230; एपिलेप्सी (मिर्गी)| इस कश्मकश के पीछे सोच यह है कि पर्यायवाची युग्मों के बार-बार उपयोग से पाठक या श्रोता के दिमाग में उनकी समानार्थकता स्थापित होगी। अल्पप्रचलित परन्तु सुन्दर व सटीक हिन्दी शब्दों से परिचय होगा, उपयोग होगा तथा उनके जुबान पर चढ़ने की संभावना बढ़ेगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&gt;आलेख में किसी भी तकनीकी शब्द का प्रथम बार प्रयोग होते समय उसकी परिभाषा व सरल व्याख्या तत्काल वहीं उसी पेराग्राफ में या उस पृष्ठ के नीचे फुट नोट के रूप में दी जानी चाहिये । निम्न उदाहरण देखिये।</p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-10-1048x349.jpg" alt="" class="wp-image-2618" style="width:645px;height:215px" width="645" height="215" srcset="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-10-1048x349.jpg 1048w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-10-300x100.jpg 300w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-10-768x256.jpg 768w, https://neurogyan.com/wp-content/uploads/2-10.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 645px) 100vw, 645px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">&gt;मल्टीपल स्क्लीरोसिस (Multiple Sclerosis) रोग में मस्तिष्क व मेरूतंत्रिका (स्पाईनल कार्ड) में मौजूद तंत्रिका-तन्तुओं (नर्व &#8211; फाईबर्स) के माईलिन (Myelin) आवरण में खराबी आ जाती है । माईलिन एक विशेष प्रकार की रासायनिक संरचना है जो प्रोटीन व वसा के जटिल अणुओं से बनती है। माईलिन एक बारीक महीन झिल्ली के रूप में न्यूरान कोशिकाओं को जोड़ने वाले अक्ष-तन्तुओं (एक्सान) के चारो ओर कई परतों वाला सर्पिलाकार खोल बनाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&gt;जानवरों में पैदा की जाने वाली मिर्गी को प्रायोगिक मॉडल कहते हैं । न केवल मिर्गी वरन् दूसरी बहुत सी बीमारियों के अध्ययन में एक्सपेरिमेंटल एनिमल (प्रायोगिक प्राणी) मॉडल से अत्यन्त उपयोगी जानकारी मिलती है व उपचार की विधियाँ खोजना आसान हो जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&gt;ऐसे भी मिर्गी होती है जिसमें कोई विकार स्थान नहीं दिख पाता। विद्युतीय गड़बड़ी मस्तिष्क के केन्द्रीय भाग से आरंभ होकर दोनों गोलार्थों के एक साथ समाहित कर लेती है। इसे प्राथमिक सर्वव्यापी (&#8216;Primary Generalized&#8217;) मिर्गी कहते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&gt;थेलेमस की न्यूरान कोशिकाओं की विद्युत सक्रियता, अन्य भागों की तुलना में अधिक लयबद्ध, समयबद्ध होती है। एक साथ बन्द चालू होने के इस गुण को समक्रमिकता (&#8216;Syncrohizationसिन्क्रोनाइजेशन) कहते हैं। विकार स्थान (फोकस) सूक्ष्मदर्शी यंत्र से दिखने में सामान्य हो या असामान्य, वहां की रासायनिक गतिविधियाँ जरूर गड़बड़ होती हैं। फायरिंग (सुलगने) के दौरान पोटेशियम आयन कोशिका से बाहर आ जाते हैं व केल्शियम आयन भीतर प्रवेश कर जाते हैं। न्यूरोट्रान्समीटर्स (तंत्रिका प्रेषक) का अधिक मात्रा में रिसाव होता है। उक्त फोकस की न्यूरान कोशिकाओं द्वारा ग्लूकोज व आक्सीजन का उपभोग कुछ सेकण्ड्स के लिये बढ़ जाता है।</p>



<figure class="wp-block-table"><table><tbody><tr><td><strong>भारतीय भाषाओं पर अधिकार रखने वाले चिकित्सकों व वैज्ञानिकों का कर्तव्य बनता है कि वे चिकित्सा पत्रकारिता के क्षेत्र में आगे आएं। साक्षरता, शिक्षा व आर्थिक स्तर में सुधार के साथ उम्मीद की जाती है कि विकासशील देशों में भी इस प्रकार स्वास्थ्य साहित्य की मांग व चलन बढ़ेगा। अंतिम लक्ष्य है मरीज की आत्मनिर्भरता । स्वयं की बीमारी व उपचार के सन्दर्भ में सारे निर्णय चिकित्सक के हाथों में छोड़ने के बजाय वह भी उक्त प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी निभाएं, ऐसी अभिलाषा है।</strong></td></tr></tbody></table></figure>



<p class="wp-block-paragraph">यह एक चुनौति है। एक टीम की दरकार है। अकेले करना मुश्किल है। एक अर्धकालिक सम्पादक तो कम से कम चाहिये। चिकित्सा विज्ञान पत्रकारिता में ग्लेमर, रसूख, सम्पर्क और पैसा नहीं मिलता। इसलिये कोई इस तरफ रुख ही नहीं करता। कलेवर में गहराई और विविधता के लिये बहुत सारे लेखक चाहिये जो समय-समय पर रचनाएं देते रहें।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>चिकित्सा पत्रकारिता के ग्रहीताओं के अनेक स्तर</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">सबसे सरल व प्राथमिक क्षेत्र है आम जनता । विभिन्न बीमारियों और स्वास्थ्य सम्बन्धी विषयों पर पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तिकाओं, पोस्टर्स और पुस्तकों के रूप में बहुत कुछ लिखा गया है। परन्तु बिखरा हुआ है, सूचीबद्ध नहीं है। एकरूपता की कमी है। भाषा और गुणवत्ता अच्छी और बुरी दोनों तरह की है। प्रामाणिकता की पुष्टि करना जरूरी हो सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इन्द्रधनुषीय भिन्नता के पाठक वर्गों को लक्ष्य करने के कारण लेखन के शैलीगत व भाषागत स्तर में एकरूपता नहीं रह पाती है । कुछ खण्ड सरल, प्रवाहमान, बोलचाल की भाषा में होते है तो कुछ अन्य तत्सम बहुल व क्लिष्ट प्रतीत हो सकते हैं । जानकारी का स्तर कहीं बुनियादी या प्राथमिक होता है तो कहीं चिकित्सों के लिये भी नवीनतम व जटिल। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि मुद्रित व अन्य माध्यमों से प्रदान की जाने वाली स्वास्थ्य शिक्षा के द्वारा मरीज व परिजन अच्छा महसूस करते हैं, आत्मविश्वास व निर्णय क्षमता बढ़ती है । अंग्रेजी व अन्य विकसित देशों की भाषाओं के सन्दर्भ में, जहाँ चिकित्सा शिक्षा मातृभाषा में दी जाती है, अनेक वरिष्ठ शिक्षक-चिकित्सक आम जनता के लिये अथवा मरीजों के लिये सरल भाषा में लिखने को हेय दृष्टि से नहीं देखते हैं । यदि एक ओर वे जटिलतम और आधुनिक विषयवस्तु को अपने छात्रों, शोधार्थियों व सहकर्मियों के लिये प्रस्तुत करते है तो दूसरी ओर उतनी ही प्राथमिकता से जन-शिक्षा के प्रति अपना दायित्व भी निभाते हैं । चिकित्सा विज्ञान पत्रिकारिता में अपना करियन बनाने वाले अनेक प्रसिद्ध और गैर चिकित्सक लेखक हैं जो तकनीकी विषयों पर सतत् पकड़ रखते हैं और टाईम, न्यूयार्कर, न्यूज वीक, नेशनल ज्योग्राफिक, साइन्टिफिक अमेरिकन जैसे प्रकाशनों द्वारा और स्वतंत्र पुस्तकों के माध्यम से आम लोगों के लिये प्रांजल भाषा में उच्च कोटि की अद्यतन जानकारी व बहस के मुद्दे प्रस्तुत करते हैं । उपरोक्त दोनों श्रेणियों के लेखकों की हिन्दी व भारतीय भाषाओं में कमी है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अल्प शिक्षित आम जनता के स्तर से उपर उठकर उच्च शिक्षित बुद्धिजीवी वर्ग को भी लक्ष्य किये जाने की जरूरत है। ऐसे लोगों का प्रतिशत बढ़ रहा है। ये समूह बहस में भाग लेकर नीति निर्धारण में योगदान करता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>चिकित्सा पत्रिकारिता के अनेक विषय और वृहत दायरा</strong><br>स्वास्थ्य व चिकित्सा पत्रिकारिता का संसार बहुत बड़ा है। अनेक विषय है । कुछ सरल व कुछ कठिन । कुछ क्षेत्रों में हिन्दी का तत्काल उपयोग न केवल आसानी से सम्भव है बल्कि वांछनीय भी है । दूसरे क्षेत्र जिनमें तकनीकी शब्दवली की बहुलता हो, तुलनात्मक रूप से कठिन हो सकते हैं ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8220;प्रेस कान्फ्रेस के माध्यम से विज्ञान&#8221; (Science by Press conference)</p>



<p class="wp-block-paragraph">अनेक चिकित्सक या चिकित्सा शोधकर्मी प्राचार के लालच में कुछ नैतिक, प्रशासनिक और पारम्परिक मूल्यों की अवहेलना करते हैं। प्रचार की जरुरत किसे नहीं होती। व्यावसायिक कम्पनिया. बड़े अस्पतालों, संस्थानो, शासकीय विभागों, गैर शासकीय संगठन सभी को प्रचार की भूख होती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">विज्ञान की अन्य शाखाओं के समान चिकित्सा में भी परम्परा है कि शोध के परिणामों और निष्कों को एक आलेख के रुप में सम्पादकों और समकालीन समीक्षकों के सम्मुख उनकी टिप्पणियों और सम्मति क लिये भेजा जाता है। प्रायः लेखक से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने लेख को संशोधित करे, उसकी कमियां दूर करें। यदि उक्त आलेख को पढ़ कर सम्पादकों व समकालीन समीक्षकों को लगता है कि शोध की परिकल्पना, उसका मूलभूत प्रश्न, शोध की विधि, परिणामों का प्रस्तुतिकरण और शोध के निष्कर्श आदि सभी पक्ष गड़बड़ है तो आलेख वापस लौटा दिया जाता है, उसे छपने योग्य नहीं माना जाता। प्रकाशन के पहले की इस तमाम कवायद को पीथर-रिव्यू कहते है। चिकिता विज्ञान की कोई भी नई खोज, प्रगति या अविष्कार की घोशणा सीधे-सीधे प्रेस कान्फ्रेस या प्रेस विज्ञप्ति के रुप में नहीं की जा सकती। वरना माना जाता है कि उक्त खोज का दावा अवैज्ञानिक है, उसमें दम नहीं है, सच्चाई नहीं है। चिकित्सक ने पीथर-रिव्यू की प्रामाणिक, कठिन निष्पक्ष प्रक्रिया को बायपास करा, शार्टकट ढूंढा। ऐसे चिकित्सकों को शेष वैज्ञानिक जगत हिकारत की नजर से देखता है, उन पर थू-थू करता है।</p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://neurogyan.com/wp-content/uploads/press-edited.png" alt="" class="wp-image-2643" style="width:418px;height:261px" width="418" height="261"/></figure>



<p class="wp-block-paragraph">चिकित्सा वैज्ञानिकों से उम्मीद की जा सकती है कि वे कभी भी ऐसा बर्ताव नहीं करेंगे जिससे कि उनका प्रचार हो, शेष समाज में उनके प्रति ध्यान आकर्षित हो। वैज्ञानिक चुप रहता है. उसका काम बोलता है- सम्मानित प्रतिष्ठित शोध पत्रिका (जर्नल) में छपा लेख ही चिकित्सक को बयान होता है, न कि प्रेस कान्फ्रेस में दिया गया वक्तव्य।</p>



<p class="wp-block-paragraph">किसी असाध्य घातक बीमारी के इलाज में क्रान्तिकारी रुप से सफल नये उपचार की घोषणा भी शार्टकट से सीधे प्रेस में नहीं की जा सकती है। धैर्य रखना होता है। प्रतीक्षा करती पड़ती है। समय लगता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रेस कान्फ्रेस के माध्यम से विज्ञान पत्रकारिता के कुछ निदनीय उदाहरण हैं-<br>1. एन्ड्रयू वेकफील्ड (1998) ने एक प्रेस कान्फ्रेस में दावा किया था एम एम.आर वेक्सीन (मीजल्स, मम्पस, रुबेला) के कारण बच्चों में &#8216;आटिज्म&#8217; नामक रोग होता है। वर्ष 2011 में ब्रायन डीयर ने ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में दर्शाया कि वेकफील्ड का दावा और आंकड़े झूठे थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">2. क्लोन-एड नामक समूह ने 2002 ने घोषणा की थी कि उन्होंने मनुष्य का क्लोन बनाने में सफलता प्राप्त कर ली है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">3. जिलेस एरिक सिरालिनी (2012) ने दावा किया था कि जिनेटिकली परिवर्धित भोज्य पदार्थ (जी एम ओ) से खतरनाक कैंसर होते हैं। एक वर्ष बाद उनके शोध पत्र को वापस लिया गया और उसे &#8220;अप्रकाशित घोषित किया गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रामाणिकता/सत्यपरकता/Accuracyचिकित्सा विज्ञान पत्राकारिता की पहली जरुरत है उसका प्रामाणिक या सत्य होना। दीगर पत्रकारिता के लिये भी सच्चाई एक अनिवार्यता है, परन्तु विज्ञान विषयों को कवर करते समय चुनौतियां बढ़ जाती है। पत्रकारों का खुद का ज्ञान सीमित होता है। स्टोरी बनाने के लिये समय कम पड़ता है, एक टाइम लिमिट में जल्दी-जल्दी काम करना पड़ता है। पत्रकारिता या टीवी में उक्त विषय कि लिये जितना स्थान या समय मिलना चाहिये उतना उपलब्ध न होने से बेरहम एडिटिंग करना पड़ती है। अनेक महत्त्वपूर्ण मूद्दे छूट जाते है या संक्षेप में निपटाने पड़ते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">चिकित्सा विज्ञान रिपोटिंग में &#8220;सबूत पर आधारित होना बहुत जरुरी है। इसी प्रकार किसी उपचार, औषधि या आपरेशन के सम्भावित फायदे और नुकसान की बारीकी के साथ निष्पक्ष पड़ताल होनी चाहिये।</p>



<figure class="wp-block-table"><table><tbody><tr><td><strong>व्यावसायिक खबरों से परे मेडिकल जर्नलिज्म एक गम्भीर अकादमिक किस्म की मशक्कत है। इसके दो रास्ते है। पहला- रिपार्टर विभिन्न मेडिकल विषयों का गहराई से अध्ययन करे, अनेक विशेषज्ञों से बात करे और फिर अपने रफ आलेख को किसी जानकार से पढ़वा लें (कुछ पत्रकार इसमें अपनी तौहीन समझते है, जो कि गलत बात है)।</strong></td></tr></tbody></table></figure>



<p class="wp-block-paragraph">दूसरा रास्ता है कि कुछ चिकित्सक या चिकित्सा वैज्ञानिक आम जनता कि लिये हिन्दी में लिखना शुरु करें। ऐसे डॉक्टर्स कम हैं, पर हैं जरुर। अन्दर से जज्बा होना चाहिये। भाषा पर पकड़ हो, पाठकों की रुचि और बौद्धिक समझ का अहसास हो, बात को मनोरंजक, महत्वपूर्ण मजेदार और खबर के लायक बनाने का हुनर होना चाहिये। देश विदेश में अनेक ट्रेनिंग संस्थान और कोर्स उपलब्ध है परन्तु प्रायः अंग्रेजी में।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रामाणिकता को परखने के लिये कुछ अच्छी संस्थानों की अच्छी वेबसाईट विकसित हुई हैं। विकिपीडिया अपनी कमियों के बावजूद अच्छा स्त्रोत है। परन्तु हिन्दी या भारतीय भाषाओं में बहुत कम लेख उपलब्ध है। (दुःख की बात है कि हिन्दी के नाम पर रोने, शिकायत करने, हल्ला मचाने, आन्दोलन करवाने वाले वक्तव्य वीरों की संख्या ज्यादा है लेकिन हिन्दी में चिकित्सा व स्वास्थ्य पर उच्च कोटि की प्रामाणिकता सामग्री जिसका फलक सरल संलिप्त से लेकर गूढ-कठिन-गम्भीर विस्तृत तक फैला हो, लिखने वाले चिकित्सकों की बेहद कमी है।) अंग्रेजी में कुछ स्त्रोत हैं &#8211;</p>



<p class="wp-block-paragraph">1. Behind the Headlines<br>2. Health News Review<br>3. Media Doctor<br>4. Journal of Health Communication<br>5. American Journal of Public health<br>6. The Lancet</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>Conflict of interest / स्वार्थों का टकराव / हितों काटकराव &#8211;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">चिकित्सा विरुद्ध पत्रकार, दोनों की पृष्ठभूमि और सोच में जमीन आसमान का अन्तर है। क्या चीज खबर के लायक है इस पर दोनों की राय एकदम जुदा हो सकती है। पत्रकारों को उस समय ज्यादा मजा आता है जब वे मेडिकल साइन्स के नकारात्मक पहलुओं को कवर कर रहे होते हैं या तब, जब कि स्टोरी का सम्बन्ध चिकित्सा शोध की अनैतिकता और कदाचरण से हो। किसी चिकित्सक या अस्पताल की उपलब्धि वाली खबरें भी अनेक बार दूसरे चिकित्सकों को नागवार लग सकती है। वे कह सकते हैं इसमें खबर के लायक क्या था? यह तो रुटीन ऑपरेशन है. हम रोज करते हैं</p>



<p class="wp-block-paragraph">इलाज में लापरवाही की खबरें डॉक्टर्स को बहुत बुरी लगती है। मरीज या घरवालों के आरोपों को स्वयंसिद्ध सत्य मान लिया जाता है। डॉक्टर्स का पक्ष या तो नदारद रहता है या कहीं कोने में संक्षेप में दबा दिया जाता है। अन्य निष्पक्ष डॉक्टर्स की राय नहीं पूछी जाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>व्यावसायिक हितों का टकराव :</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">औषधि कम्पनियों के पास बहुत पैसा होता है, बड़ी प्राफिट मार्जिन दाव पर लगी होती है। यह सच है कि औषधि कम्पनियां मीडिया को प्रभावित कर सकती है। परन्तु यह भी सच है कि फार्मा-कम्पनियों को खलनायक के रुप में चित्रित करने वाली स्टोरी बना कर, पत्रकारों को वाहवाही ज्यादा मिलती है और इस लालच में उनका कवरेज कई बार असत्य और एक पक्षीय हो जाता है। इसी प्रकार के उभयपक्षीय मुद्दे बड़े अस्पतालों, डॉक्टर्स और यहा तक कि एन.जी.ओ. पर लागू होते हैं</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>विचारधाराओं का टकराव :</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">पत्रकार या उसके मीडिया-हाउस की राजनैतिक और विचारधारात्मक पृष्ठभूमि का भी असर पड़ता है। वामपन्थी विचारों में पगे पत्रकार बहुराष्ट्रीय औषधि कम्पनियों की उपलब्धियों और योगदान के बजाय उनके द्वारा कथित शोषण को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करेंगे। दक्षिण पन्थी मीडिया ग्लोबल वार्मिग के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले बुरे बुरे प्रभावों की चर्चा दबे स्वर में करेगा। जर्मनी की फासी/सरकार के जमाने में मनुष्यों पर अनैतिक प्रयोगो की कोई खबर नहीं छापी गई थी। स्टालिन के पतन के बाद भी गुलाग की दुनिया में मनोचिकित्सा के दुरुपयोग की सच्चाई उभर कर आई। धार्मिक रुढीवादी सोच के पत्रकार यौन शिक्षा और कन्डोम के फायदों के स्थान पर संयमशील संस्कृति की ज्यादा दुहाई देंगे।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>चिकित्सा और स्वस्थ्य पत्रकारिता का महत्त्व और दायरा</strong> :</p>



<p class="wp-block-paragraph">आम लोगों के मत में स्वास्थ्य और चिकित्सा संबंधित समाचारों, विचारों और जानकारियों को पाने की गहरी भूख है। बीमारी और स्वास्थ्य हर इंसान की जिंदगी के अहम पहलू हैं। यह एक परिवर्तनशील क्षेत्र है जिसमें सतत तीव्र गति से विकास हो रहा है। चिकित्सा और स्वास्थ्य पत्रकारिता को दो प्रमुख वर्गों में बांटा जा सकता है 1. तात्कालिक, सामयिक, स्थानिक 2 दीर्घकालिक, सार्वभौमिक, शाश्वत।<br>तात्कालिक-सामयिक-स्थानिक किस्म की चिकित्सा देश स्वास्थ्य पत्रकारिता के विषयों के कुछ उदाहरण तथा अनेक प्रश्न जिनका जवाब ढूंढा जाना चाहिए &#8211;</p>



<p class="wp-block-paragraph">1. इंदौर में स्वाइन फ्लू के 5 मरीज मिले &#8211;</p>



<p class="wp-block-paragraph">स्वाइन फ्लू क्या रोग है? कैसे होता है? क्यों होता है? कितना घातक है? कितना घातक है? 5 मरीज मिलना बड़ी खबर है या छोटी खबर है? समाज को कितना खतरा है? क्या लोगों को डरने की जरूरत है? रोकथाम कैसे संभव है? प्रशासन ने क्या उपाय किए हैं? क्या ये उपाय पर्याप्त है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">2. शहर के बड़े अस्पताल में इलाज में लापरवाही से क्रोधित रिश्तेदारों द्वारा तोड़फोड़ &#8211;</p>



<p class="wp-block-paragraph">क्या बीमारी थी? उस बीमारी का क्या स्वरूप था? मरीज की क्या स्थिति थी? रिश्तेदारों का क्या आरोप है? डॉक्टर का क्या कहना है? मौके पर मौजूद अन्य लोगों का क्या कहना है? अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड्स में क्या लिखा है? उपरोक्त तमाम तथ्यों के प्रकाश में अन्य संबंध विशेषज्ञों की क्या राय है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">3. बाबा रामदेव ने दावा किया कि उनके पास कैंसर और एड्स के लिए रामबाण जड़ी बूटियां है इस दावे का आधार क्या है? सबूत क्या है? वैज्ञानिक अध्ययन हुआ या नहीं? किसी स्टैंडर्ड मानक शोध पत्रिका में छपा या नहीं?</p>



<p class="wp-block-paragraph">4. सर्जन ने पेट में से 3 किलो की गठान निकाली? क्या यह एक असामान्य ऑपरेशन है? दूसरे सर्जन्स की क्या राय है? इसमें क्या खास बात है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">5. जम्मू कश्मीर में बाढ़ के बाद महामारी का खतरा? क्या यह खतरा सचमुच में बढ़ता है? कितने प्रतिशत? कौन सी बीमारियां? क्यों बढ़ता है? रोकथाम और उपचार के क्या उपाय हैं? शासन की क्या तैयारी है? आम लोग क्या कर सकते हैं?</p>



<p class="wp-block-paragraph">6. राष्ट्रीय दवा नीति में परिवर्तन औषधियों के मूल्यों पर शासन का नियंत्रण कम करने का फैसला। इसकी पृष्ठभूमि। पक्ष और विपक्ष में तर्क। मरीजों पर इसका असर। क्या इस निर्णय को सुधारा जा सकता है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">7. 5 नए एम्स खुलेंगे इनका क्या फायदा? कितना बजट? कितना समय? केवल 5 ही क्यों? इन्हीं शहरों में क्यों? यही पैसा यदि पुराने मेडिकल कॉलेजों की व्यवस्था सुधारने में लगाते तो शायद बेहतर होता?</p>



<p class="wp-block-paragraph">8. संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 2015 के बाद के मेले नियम लक्ष्यों की घोषणा इनमें स्वास्थ्य संबंधी लक्ष्यों की क्या स्थिति है? कौन से देशों ने अच्छा काम किया है? भारत पीछे क्यों है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">9. ड्रग ट्रायल में मरीजों को बनाया मिनी पिग &#8211;</p>



<p class="wp-block-paragraph">इन आरोपों का क्या आधार? आरोप लगाने वालों की क्या पृष्ठभूमि? समबद्ध डॉक्टर्स का क्या पक्ष? असम्बद्ध विशेषज्ञों की क्या राय? पूरी दुनिया में कितने ड्रग ट्रायल? भारत में कितने? इस के कायदे कानून सब देशों में एक जैसे हैं या अलग-अलग?</p>



<p class="wp-block-paragraph">10. प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में सतत प्रकाशित होने वाले रिसर्च पेपर्स पर आधारित समाचार प्रायः विदेशी पत्र-पत्रिकाओं से प्राप्त जानकारी का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत कर दिया जाता है। हमें चाहिए ऐसे हिंदी पत्रकार जो प्रति सप्ताह प्रतिमाह जर्नल्स की</p>



<figure class="wp-block-table"><table><tbody><tr><td><strong>दीर्घकालिक सार्वभौमिक शाश्वत किस्म की स्वास्थ्य और चिकित्सा पत्रकारिता के विषयों के कुछ उदाहरण :<br>1. विभिन्न बीमारियों पर केंद्रित आलेख जैसे कैंसर, एड्स, हार्टअटैक, लकवा, अस्थमा, डायबिटीज, उच्च रक्तचाप आदि<br>2. जींस या अनुवांशिकता का स्वास्थ्य पर अधिक असर पड़ता है या वातावरण व प्रकृति का?<br>3. जीन थेरेपी द्वारा बेहतर शिशु प्राप्त करने या मानव कलम बनाने की कितनी संभावना? और क्या इस हेतु अनुमति दी जानी चाहिए?<br>4. व्यक्तिगत आदतें और स्वास्थ्य का संबंध खानपान नशे व्यायाम आदि<br>5. स्मृति और बुद्धि बढ़ाना संभव है या नहीं?</strong></td></tr></tbody></table></figure>
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