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हिंदी माध्यम में चिकित्सा शिक्षा की चुनौतियाँ


 डॉक्टर और मरीज – तेरी भाषा मेरी भाषा

वर्ष 2003 में मेरा पुत्र निपुण मुम्बई के सेठ जी.एस. मेडिकल कालेज (के.ई.एम. अस्पताल) में एम.बी.बी.एस अन्तिम वर्ष का छात्र था । मैं मिलने गया था । मेरी व उसके मित्रों की इच्छा थी की मैं उनकी एक अनौपचारिक क्लीनिकल क्लास लूँ जिसमें मरीजों से उनकी बीमारी के बारे में पूछना, शारीरिक जाँचकरना और सम्भावित निदानों की चर्चा करना शामिल रहता है । मुझे पढ़ाने का शौक है । कक्षा अच्छी रही । खूब प्रश्न व उत्तर दोनों दिशाओं से हुए । बाद में निपुण ने अपने मित्रों को प्रतिक्रिया बताई ।

किसी भी अन्य श्रेष्ठतम कक्षा से अलग एक बात का छात्रों को कुछ बाद में अहसास हुआ। हमें अधिक समझ में आया क्योंकि बीच-बीच में सर (अंकल) ने हिन्दी का अच्छा उपयोग किया था। चिकित्सा शिक्षा में आम तौर पर ऐसा नहीं किया जाता है । कहना न होगा कि मातृभाषा और भारतीय भाषाओं की संप्रेषणीयता अधिक होगी । लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि भारतीय चिकित्सा परिषद (मेडिकल काउन्सिल आफ इण्डिया) द्वारा निर्धारित नियम कि भारत के समस्त चिकित्सा महाविद्यालयों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होगा को बदलना वांछनीय या अनिवार्य या श्लाघ्य या व्यावहारिक रूप से आसान व सम्भव न निर्विवाद होगा। मुद्दा जटिल है और बहुत सारे पहलू हैं | भावनात्मक, आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, भाषागत, और व्यावहारिक आदि। अनेक कसौटियों पर विपरीत ध्रुवों से विचार प्रतिपादित हैं और बहस हो सकती है।
इस देश का एक छोटा परन्तु बहुत ज्यादा प्रभावशील तबका (शायद पांच प्रतिशत से कम) जिसमें महानगरों व अन्य बड़े शहरों के अंग्रेजी जानने व उसमें काम करने वाले लोग, अधिकांश चिकित्सा शिक्षक और शायद चिकित्सा छात्र, अंग्रेजी प्रेस/मीडिया और आई.ए.एस नौकर शाह शामिल हैं, यह कहेंगे कि मेडिकल एजुकेशन में हिन्दी पर चर्चा करना समय की बरबादी है। अंग्रेजी अच्छी भली चल रही है। अंग्रेजी न जानने वाले या कम जाननेवाले देशों की तुलना में हमें स्पर्धात्मक लाभ हैं। वे देश अब जैसे तैसे अंग्रेजी सुधारने और अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। हिन्दी और भारतीय भाषाओं के नाम कर पहिया उल्टा क्यों घुमाया जाए? इतनी सारी असम्भव-सी कठिनाईयों से क्यों सर फोड़ा जाए ? क्या जरूरत है यह सब मशक्कत करने की ? अनुवाद कितना महँगा, धीमा व कठिन होता है। अनुवाद करने वाले हैं कहाँ? अनुवाद की भाषा कितनी कृत्रिम, असहज, उबाऊ व अबोधगम्य होती है। जब तक अनुवाद होता रहेगा, विज्ञान आगे बढ़ जाएगा। नयी पुस्तकें, नये शोध पत्र आएँगे| कब तक उस पट्टे पर दौड़ते रहेंगे जो वहीं का वहीं घूमता रहता है। यदि अनुवाद नहीं तो फिर हिन्दी में मौलिक शोध, सोच, ज्ञान, वाकपटुता और लेखन क्षमता वाले चिकित्सा शिक्षक कहाँ हैं? कौन चाहता है हिन्दी में चिकित्सा शिक्षा? छात्रों से पूछ कर देखा है ? जब माँग ही नहीं है तो प्रदाय का लावजमा खड़ा करने पर क्यों दिमाग लगाया जाए? बिना आवश्यकता के आविष्कार के जनन की कल्पना क्यों की जाए?
इन तमाम आपत्तियों को मैं पूरी सोच-समझ के साथ खारिज करता हूँ । हालांकि कुछ शर्तों, अपवादों, किन्तु परन्तु, लेकिन, यह भी, वह भी आदि के साथ | दुनिया में अधिकांश सत्य केवल शुद्ध सफेद या शुद्ध स्याह नहीं होते, बल्कि भूरे रंग के अनेक शेड होते हैं। इन शर्तों और अपवादों की चर्चा मैं बाद में करूँगा। पहले हिन्दी के पक्ष में एक आदर्श स्थिति की परिकल्पना प्रस्तुत करता हूँ।

चिकित्सा शिक्षा के ग्रहीताओं के अनेक स्तर

स्तर – 1 : सबसे सरल व प्राथमिक क्षेत्र है – जन स्वास्थ्य शिक्षा। विभिन्न बीमारियों और स्वास्थ्य सम्बन्धी विषयों पर पत्र-पत्रिकाओं , पुस्तिकाओं, पोस्टर्स और पुस्तकों के रूप में बहुत कुछ लिखा गया है। परन्तु बिखरा हुआ है, सूचीबद्ध नहीं है। एकरूपता की कमी है। भाषा और गुणवत्ता अच्छी और बुरी दोनों तरह की है। प्रामाणिकता की पुष्टि करना जरूरी हो सकता है।

इन्द्रधनुषीय भिन्नता के पाठक वर्गों को लक्ष्य करने के कारण लेखन के शैलीगत व भाषागत स्तर में एकरूपता नहीं रह पाती है । कुछ खण्ड सरल, प्रवहमान, बोलचाल की भाषा में होते हैं तो कुछ अन्य तत्सम बहुल व क्लिष्ट प्रतीत हो सकते हैं | जानकारी का स्तर कहीं बुनियादी या प्राथमिक होता है तो कहीं चिकित्सकों के लिये भी नवीनतम व जटिल। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि मुद्रित व अन्य माध्यमों से प्रदान की जाने वाली स्वास्थ्य शिक्षा के द्वारा मरीज व परिजन अच्छा अनुभव करते हैं, आत्मविश्वास व निर्णय क्षमता बढ़ती है । अंग्रेजी व अन्य विकसित देशों की भाषाओं के सन्दर्भ में, जहाँ शिक्षा मातृभाषा में दी जाती है, अनेक वरिष्ठ शिक्षक-चिकित्सक आम जनता के लिये अथवा मरीजों के लिये सरल भाषा में लिखने को हेय दृष्टि से नहीं देखते हैं । यदि एक ओर वे जटिलतम और आधुनिक विषयवस्तु को अपने छात्रों, शोधार्थियों व सहकर्मियों के लिये प्रस्तुत करते है तो दूसरी ओर उतनी ही प्राथमिकता से जन-शिक्षा के प्रति अपना दायित्व भी निभाते हैं । विज्ञान पत्रिकारिता में अपना कॅरियर बनाने वाले अनेक प्रसिद्ध और गैर चिकित्सक लेखक हैं जो तकनीकी विषयों पर सतत्‌ पकड़ रखते हैं और टाईम, न्यूयार्कर, न्यूज बीक, नेशनल ज्योग्राफिक, साइन्टिफिक अमेरिकन जैसे प्रकाशनों द्वारा और स्वतंत्र पुस्तकों के माध्यम से आम लोगों के लिये प्रांजल (सरल, समझ में आने वाली) भाषा में उच्च कोटि की नई से नई जानकारी व बहस के मुद्दे प्रस्तुत करते हैं। उपरोक्त दोनों श्रेणियों के लेखकों की हिन्दी व भारतीय भाषाओं में कमी है।

स्तर – 2 : अन्य चिकित्सा कर्मी जिन्हें पेरमेडिकल स्टाफ कहा जाता है- जैसे परिचारिकाएं, सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता आदि के लिये भारतीय भाषाओं में अच्छी गुणवत्ता के चिकित्सा साहित्य की जरूरत है। अनुवाद के रूप में कुछ सामग्री नर्सिग क्षेत्र में उपलब्ध हैं परन्तु भाषा असहज प्रतीत होती है। यह समुदाय आम जनता और चिकित्सकों के बीच पुल का काम करता है| व्यस्त चिकित्सकों की मरीज शिक्षा सम्बन्धी जिम्मेदारी में हाथ बँटा सकता है।

स्तर – 3 : स्नातक स्तर (एम.बी.बी.एस) के चिकित्सा छात्रों के लिये सम्पूर्ण रूप से हिन्दी माध्यम में शिक्षा देना फिलहाल दूभर प्रतीत होता है। लेकिन ऊपर वर्णित स्तर एक तथा दो के लिये निर्मित सामग्री में उनका निष्णात होना महत्वपूर्ण है । चिकित्सा छात्रों को अपने अध्ययन और कार्यअनुभव के दौरान इस बात का अहसास कराना और प्रशिक्षण दिया जाना जरूरी है कि जनता व मरीजों से उनकी बीमारी के बारे में कैसे, कितनी मात्रा व किस तरह की भाषा में बात की जाए तथा क्‍या लिखित सामग्री दी जाए । यदि राजनैतिक इच्छा शक्ति हो तो असम्भव कुछ नहीं है। संक्रमण काल में कुछ वर्षों तक तकलीफ होगी परन्तु बाद में आसान प्रतीत होगा।

स्तर – 4 : स्नातकोत्तर व शोध क्षेत्र में हिन्दी का उपयोग स्तर तीन पर मिली सफलता के बाद ही कल्पित किया जा सकता है। हालांकि कुछ चुने हुए क्षेत्रों (आगे चर्चित) में स्तर तीन व चार की चिकित्सा शिक्षा तत्काल सम्भव है।

चिकित्सा शिक्षा के अनेक विषय

चिकित्सा शिक्षा का संसार बहुत बड़ा है । अनेक विषय हैं । कुछ सरल व कुछ कठिन । कुछ क्षेत्रों में हिन्दी का तत्काल उपयोग न केवल आसानी से सम्भव है बल्कि वांछनीय भी है । दूसरे क्षेत्र जिनमें तकनीकी शब्दवली की बहुलता हो, तुलनात्मक रूप से कठिन हो सकते हैं ।
मरीजों से बातचीत करना और उनकी बीमारी का विस्तृत वर्णन (इतिवृत्त/हिस्ट्री) जानने के लिये प्रश्न पूछना आदि चूंकि हिन्दी में होता है अत: कल्पना की जा सकती है कि तत्सम्बन्धी शिक्षा भी हिन्दी में ही दी जानी चाहिये । दुर्भाग्य से ऐसा नहीं होता है। परिजनों से पूछे जाने वाले प्रश्नों व संवादों की लड़ी को अंग्रेजी में पढ़ाया जाता है । छात्र व चिकित्सक अपनी बुद्धि वे अनुभव से उसका हिन्दी अनुवाद करते हैं । हिन्दी में आसान शब्द होते हुए भी , वे मरीज के साथ अंग्रेजी की खिचड़ी वापरते हैं । मरीज समझ नहीं पाता है। हिस्ट्री टेकिंग चिकित्सा शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है । बीमारी की सही डायग्नोसिस का दारोमदार इसी पर सबसे अधिक होता है। निदान के अलावा मरीजों से दूसरी बातें भी करनी होती है – उनके हाल चाल पूछना, बीमारी व उपचार के बारे में उन्हें समझाना, पूर्वानुमान की चर्चा करना, उपचार के विकल्पों में एक को चुनने की साझी निर्णय प्रक्रिया में मरीज को बराबरी का भागीदार बनाना आदि । यह सारी कला और समझ, अनुभव द्वारा सब को आती है । किसी को जल्दी और ज्यादा, किसी को देर से तथा कम । परन्तु चिकित्सा शिक्षकों की जमात ने इस ज्ञान व बुद्धि को सरल सुबोध हिन्दी में पढ़ाने का, सूचिबद्ध करने, सैद्धांतिक प्रतिपादन करने का कोई प्रयास नहीं किया।

नरेटिव मेडिसिन (कथात्मक चिकित्सा) पर आजकल पुन: अधिक जोर दिया जा रहा है। बीमारी के अनुभव को भोगने वाले व्यक्ति व परिवार की आप बीती का वर्णन जरूरी है । मनोविज्ञान (सरायकोलाजी) व मनोरोग विज्ञान (साईकिएट्री) का सम्बन्ध मानविकी (ह्यूमेनिटीज) से है। अत: हिन्दी शब्दावली कुछ अंशों में उपलब्ध है और चलन में है।

सामुदायिक चिकित्सा विज्ञान की अधिकांश सामग्री को अच्छी हिन्दी में आसानी से प्रयुक्त किया जा सकता है । विधि साहित्य पर भारतीय भाषाओं में लेखन की परम्परा है इसलिये मेडिकल ज्यूरिस प्रडेन्स और फारेन्सिक मेडिसिन सम्बन्धी ज्ञान का बड़ा अंश हिन्दी में उपलब्ध कराना कठिन नहीं होगा।

किसी भी एक रोग पर लिखे गये अध्याय में प्राय: निम्न खण्ड होते हैं – 1. परिभाषा, 2. पर्यायवाची, 3. भूमिका, 4. एपिडेमियोलाजी (अधिजन विज्ञान), 5. रोगविकृति (पेथालजी), 6. रोग विधि, 7. कारण, 8. लक्षण, 9. शारीरिक जाँचमें चिह्न, 10. प्रयोगशाला जाँचे, 11. निदान तथा 12. निदान भेद, 13. औषधि उपचार, 14. गैर औषधि उपचार, 15. शल्य उपचार, 16. पूर्वानुमान (प्रोग्रोसिस) ।

इनमें से कुछ खण्डों के वर्णन में तकनीकी शब्दों की बहुलता होगी तथा कुछ में कम ।

भाषा-प्रयोग नहीं हैं असाध्य रोग, सरल निदान हैं इसका

भाषा का स्वरूप

अंग्रेजी में सोचने वाले लोग प्राय: आम लोगों की हिन्दी को कम करके आंकते हैं। चूंकि वे खुद हिन्दी का उपयोग छोड़ चुके हैं और अपनी शब्द सम्पदा गँवा चुके हैं, दूसरों को भी वैसा ही समझते हैं । थोड़ी-सी अच्छी और शुद्ध हिन्दी से अंग्रेजी परस्त विद्वातजनों की जीभ ऐंठने लगती है। “परिस्थितियाँ” जैसा शब्द उनके लिये टंग-ट्विस्टर है परन्तु “सर्कमस्टान्सेस” नहीं । चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में हिन्दी में लिखने वालों को अपने बुद्धिमान व पढ़े-लिखे पाठकों की क्षमता पर सन्देह नहीं होना चाहिये । यदि आपकी भाषा शैली प्रांजल व प्रवाहमय हो तो लोग सुनते है, पढ़ते हैं, गुनते हैं, समझते हैं, सराहते हैं, आनन्दित होते हैं।

तकनीकी शब्दों के अनुवाद व गठन हेतु कुछ परम्पराएँ मौजूद हैं।

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अंग्रेजी व यूरोपीय भाषाओं में तकनीकी शब्दों का मूल स्रोत लेटिन व ग्रीक भाषाएँ हैं । हिन्दी व भारतीय भाषाओं के लिये संस्कृत है । हिन्दी को सरलीकृत करने के नाम पर अंग्रेजी में सोचने वाले कुछ विद्वान उसे हिन्दुस्तानी अर्थात्‌ उर्दू अर्थात मिश्रित स्वरूप प्रदान करने पर जोर देते हैं तथा संस्कृतनिष्ठ शब्दों से परहेज करने की सलाह देते हैं | बोलचाल व फिल्‍मी गीतों – संवादों तक के लिये हिन्दुस्तानी उपयुक्त हो सकती है परन्तु साहित्य व तकनीकी दोनों क्षेत्रों में संस्कृत जनित तत्सम शब्दों के प्रचुर उपयोग के बिना समृद्ध सम्प्रेषण सम्भव नहीं है | उर्दू मिश्रित हिन्दुस्तानी की ग्राह्यता गैर हिन्दी क्षेत्रों में कम है । संस्कृत शब्दावली, हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं में (भारोपीय व द्रविड़ दोनों वर्ग) में अधिक आसानी से समाहित की जा सकती है । यह सोच गलत है कि तत्सम शब्द जटिल होते हैं या कि तदभव शब्द ही आसान होते हैं । शब्दों की इन श्रेणियों को वर्ण व्यवस्था व वर्ग विभेद की दृष्टि से देखना भी गलत है।

हमें यथार्थ स्वीकारना होगा कि अंग्रेजी एक भारतीय भाषा भी है । इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक सामाजिक पहलुओं,की चर्चा, मेरे आलेख का विषय नहीं है। हम मूलतः द्विभाषी या बहुभाषी लोग हैं । चिकित्सा शिक्षा में हिन्दी के उपयोग की चर्चा का अर्थ अंग्रेजी को वर्जित करना कदापि नहीं हो सकता है। हमें दोनों का मिला जुला उपयोग करना है। दोनों एक दूसरे को अच्छे दूसरे को अच्छे व बुरे अर्थो में प्रभावित करती हैं। अंग्रेजी में उपलब्ध सामग्री को हमें मानक के रूप में स्वीकार करना होगा। हालाँकि इस बात की उम्मीद भी रखना होगी कि हिन्दी में शायद कभी कुछ नया मौलिक चिकित्सा साहित्य निकलेगा जिसके अंग्रेजी अनुवाद की आवश्यकता महसूस हो । फिलहाल तो यह रूपान्तरण एकल दिशा वाला ही है।

पाठकों के मन-मस्तिष्क व जुबान पर हिन्दी के तकनीकी शब्द चढ़ाने के लिये नीचे दिये गये उदाहरणों पर गौर करें।मैं कुछ युक्तियाँ प्राय: अपनाता हूँ ।

*यदि मुझे ऐसी लगता है कि हिन्दी में किसी विशिष्ट तथ्य या विचार के लिये उपयुक्त शब्द नहीं है तो मैं अंग्रेजी भाषा के तकनीकी शब्द को बिना अनुवाद के रोमन लिपि में और साथ ही लिप्यन्तरण द्वारा देवनागरी में बिम्ब युग्म के रूपमें प्रस्तुत करता हूँ । रोमन व देवनागरी रूप का क्रम आगामी उल्लेखों में उल्टा-पुल्टा किया जाना चाहिये।

*अनेक मरीजों को लिखते समय हाथ की मांसपेशियों ……. । इस अवस्था को राइयटर्स क्रैम्प (Writer’s Cramp) कहते हैं।

*यदि मूल अंग्रेजी शब्द का हिन्दी पर्याय नया, अप्रचलित और (तथा कथित रूप से) कठिन या क्लिष्ट हो तो दूसरे प्रकार का शब्द युग्म प्रयुक्त किया जा सकता है। बहुप्रचलित अंग्रेजी शब्द को देवनागरी में प्रस्तुत करें और साथ ही उसका हिन्दी समानार्थक शब्द कोष्टक में देवें। आलेख में इस शब्द की अगली प्रयुक्ति के समय युग्म या जोड़े में अंग्रेजी-हिन्दी का क्रम उलट किया जाए।

*मिर्गी (एपिलेप्सी)……… एपिलेप्सी (मिर्गी) इस कश्मकश के पीछे सोच यह है कि पर्यायवाची युग्मों के बार-बार उपयोग से पाठक या श्रोता के दिमाग में उनकी समानार्थकता स्थापित होगी। अल्पप्रचलित परन्तु सुन्दर व सटीक हिन्दी शब्दों से परिचय होगा, उपयोग होगा तथा उनके जुबान पर चढ़ने की संभावना बढ़ेगी।

*आलेख में किसी भी तकनीकी शब्द का प्रथम बार प्रयोग होते समय उसकी परिभाषा व सरल व्याख्या तत्काल वहीं उसी पेराग्राफ (अनुच्छेद) में या उस पृष्ठ के नीचे फुट नोट (पादटिप्पणी) के रूप में दी जानी चाहिये । निम्न उदाहरण देखिये।

*मल्टीपल स्क्लीरोसिस (Multiple Sclerosis) रोग में मस्तिष्क व मेरूतंत्रिका (स्पाईनल कार्ड) में मौजूद तंत्रिका-तन्तुओं (नर्व – फाईबर्स) के माईलिन (Myelin) आवरण में खराबी आ जाती है । माईलिन एक विशेष प्रकार की रासायनिक संरचना है जो प्रोटीन व वसा के जटिल अणुओं से बनती है। माईलिन एक बारीक महीन झिल्ली के रूप में न्यूगान कोशिकाओं को जोड़ने वाले अक्ष-तन्तुओं (एक्सान) के चारों ओर कई परतों वाला सर्पिलाकार खोल बनाती है।

*जानवर में पैदा की जाने वाली मिर्गी को प्रायोगिक मॉडल कहते हैं | न केवल मिर्गी वरन्‌ दूसरी बहुत सी बीमारियों के अध्ययन में एक्सपेरिमेंटल एनिमल (प्रायोगिक प्राणी) मॉडल से अत्यन्त उपयोगी जानकारी मिलती है व उपचार की विधियाँ खोजना आसान हो जाता है।

*ऐसे भी मिर्गी होती है जिसमें कोई विकार स्थान नहीं दिख पाता। विद्युतीय गड़बड़ी मस्तिष्क के केन्द्रीय भाग से आरंभ होकर दोनों गोलार्धों के एक साथ समाहित कर लेती है। इसे प्राथमिक सर्वव्यापी (‘Primary Generalized’) मिर्गी कहते हैं। इनकी कार्यविधि समझना और भी कठिन है।

*थेलेमस की न्यूरान कोशिकाओं की विद्युत सक्रियता, अन्य भागों की तुलना में अधिक लयबद्ध, समयबद्ध होती है। एक साथ बन्द चालू होने के इस गुण को समक्रमिकता ( Synchronization सिन्क्रोनाइजेशन) कहते हैं। विकार स्थान (फोकस) सूक्ष्मदर्शी यंत्र से दिखने में सामान्य हो या असामान्य, वहां की रासायनिक गतिविधियाँ जरूर गड़बड़ होती हैं।

फायरिंग (सुलगने) के दौरान पोटेशियम आयन कोशिका से बाहर आ जाते हैं व केल्शियम आयन भीतर प्रवेश कर जाते हैं। न्यूरोट्रान्समीटर्स (तंत्रिका प्रेषक) का अधिक मात्रा में रिसाव होता है। उक्त फोकस की न्यूरान कोशिकाओं द्वारा ग्लूकोज व आक्सीजन का उपभोग कुछ सेकण्ड्स के लिये बढ़ जाता है।

एक समस्या और है वह है अनुवादकों द्वारा जनित समस्या –

अनुवादक का ध्येय केवल भाषांतर करने की अपेक्षा उसकी ग्राह्यता को बनाए रखना भी होना चाहिए | कठिन से कठिन की ओर बहने वाला प्रवाह सामान्य जनोपयोगी नहीं होता |

स्वर्ग से उतरी गंगा यदि शिव जटाओं में ही उलझी रहे, चोंटियों से समतल मैदानों तक ही न उतरे तो क्या काम की |

अनुदित भाषा-गंगा भी ऐसी ही हैं | हाँ गंगोत्री की सी शुद्धता नीचे आते-आते कम हो जाती है पर सामान्य जन का कल्याण भी इसके बिना गंगा नहीं कर सकती |

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