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न्यूरोलॉजी क्या हैं


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नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) शरीर के अनेक अंग-तंत्रों (आर्गन सिस्टम्स) में से एक प्रमुख हैं | दूसरे अंग-तंत्रों के उदाहरण हैं – श्वसन, हृदय व रक्त वाहिनियाँ, लिवर, आंतें व पेट के अंग, प्रजनन तंत्र, अस्थियां व सन्धियाँ (जोड़), अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियाँ आदि ।
तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) के अंतर्गत आने वाले अंग हैं : खोपड़ी में स्थित मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी के अन्दर स्थित मेरु तंत्रिका, उपरोक्त दोनों से निकलने वाली ढेर सारी नाड़ियाँ (नर्व) और मांसपेशियाँ |


न्यूरो एक उर्वरक प्रत्यय

न्यूरो शब्द के लिये हिन्दी में तंत्रिका और स्नायु का उपयोग होता है परन्तु चलन की बहुलता के कारण न्यूरो प्रत्यय काम में लाया जा सकता है ।
न्यूरोसाईंस (न्यूरोविज्ञान) एक वृहत्‌ अर्थ वाला शब्द है जिसमें न्यूरालाजी (स्नायु रोग विज्ञान) के अतिरिक्त बहुत से दूसरे सम्बन्धित विषय समाहित हैं ।न्यूरो शब्द के लिये हिन्दी में तंत्रिका और स्नायु का उपयोग होता है परन्तु चलन की बहुलता के कारण न्यूरो प्रत्यय काम में लाया जा सकता है ।
न्यूरोसाईंस (न्यूरोविज्ञान) एक वृहत्‌ अर्थ वाला शब्द है जिसमें न्यूरालाजी (स्नायु रोग विज्ञान) के अतिरिक्त बहुत से दूसरे सम्बन्धित विषय समाहित हैं ।
तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) के विभिन्न भागों में होने वाली बीमारियों के अध्ययन को न्यूरालाजी कहते हैं । नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) शरीर के अनेक अंग-तंत्रों (आर्गन सिस्टम्स) में से एक प्रमुख हैं |
नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) के प्रमुख भाग इनमें से एक या अनेक के रोगों का अध्ययन न्यूरालाजी (तंत्रिका रोग विज्ञान) कहलाता है ।
न्यूरो प्रत्यय के साथ ज्ञान विज्ञान और यहाँ तक कि कला संकाय (ह्यूमेनिटीज) और वाणिज्य संकाय की अनेक शाखाएं जुड़ कर नित नये अन्तरसम्बन्धीय विषयों को जन्म देती हैं ।

न्यूरो प्रत्यय (The Neuro, Prefix) चिकित्सा विज्ञान का सबसे उर्वरक(Facund) प्रत्यय(Fecund) प्रत्यय हैं |
न्यूरो के साथ कितने सारे जोड़े बनते हैं?

न्यूरो-एनाटामी
मस्तिष्क व तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) की संरचना । बाह्य स्वरूप, बड़ा स्वरूप (मेक्रो), सूक्ष्म रचना (माईक्रो) आदि सब इसमें आते हैं ।

न्यूरो-फिजियोलाजी
तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) की कार्यप्रणाली । समस्त अंग कैसे काम करते हैं – उदाहरण के लिये चेतना (होश), स्मृति, व्यक्तित्व की पहचान, प्रेरक-क्रियाएं-मांसपेशियों द्वारा अंग संचालन, संवेदनाएं – विभिन्न ज्ञानेन्द्रियों द्वारा बाहरी और आंतरिक संसार की जानकारी को प्राप्त करना, छांटना, संग्रहित करना, वर्गीकृत करना । उपरोक्त समस्त कार्य सम्पादित होते समय मस्तिष्क और नाड़ियों में होने वाली रासायनिक और विद्युतीय गतिविधियों के अध्ययन द्वारा कार्यप्रणा (कार्यकी) को समझा जाता है ।

न्यूरो-पेथोलाजी
विभिन्न बीमारियों में नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) की रचना और कार्यप्रणाली में पैदा होने वाली विकृतियों और खराबियों के अध्ययन द्वारा समझने की कोशिश की जाती है कि रोग क्यों हुआ , कैसे हुआ, क्या बुरा असर डाल रहा है आदि ।

न्यूरो -फार्मेकोलाजी
न्यूरालाजिकल बीमारियों के उपचार में काम आने वाली औषधियों का अध्ययन – उनकी रासायनिक संरचना, बनाने की विधि, शरीर पर प्रभाव और दुष्प्रभाव आदि ।

न्यूरो-सर्जरी
जैसे मस्तिष्क में ट्यूमर (गांठ), फोड़ा (एब्सेस), खोपड़ी में पानी अधिक भर जाना (हाईड्रोसिफेलस), कुछ जन्मजात विकृतियाँ, मेरू तंत्रिका पर रीढ़ की हड्डी का दबाव आदि । सिर की चोट (हेड-इन्ज्युरी) और रीढ़ की हड्डी की चोट (स्पाईनल इन्ज्यूरी) का उपचार मुख्यतया न्यूरोसर्जन द्वारा किया जाता है । हालांकि प्रत्येक चोट ग्रस्त मरीज में आपरेशन सदैव जरूरी नहीं होता ।
एपिलेप्सी (मिर्गी), पक्षाघात (लकवा) , पार्किन्सोनिज़्म जैसे मरीजों में बहुत थोड़ो में कभी-कभी शल्य उपचार उपयोगी होता है । किस मरीज को न्यूरोसर्जरी की जरूरत पड़ेगी यह फैसला, अधिकांश मामलों में न्यूरोफिजिशियन स्वयं अथवा न्यूरोसर्जन के साथ संयुक्त परामर्श द्वारा लेता है ।
न्यूरोफिजिशियन या न्यूरोलाजिस्ट की शिक्षा 4 वर्ष 6 माह की होती है- एम.बी.बी.एस. 5.5 वर्ष, एम.डी. मेडिसिन 3 वर्ष, एम.सी.एच न्यूरोसर्जरी 3 वर्ष दोनों को अपनी डिग्री हासिल करने के बाद कुछ वर्ष और प्रायोगिक अनुभव प्राप्त करना होता है । कुछ चिकित्सक न्यूरोविज्ञान की किसी छोटी सी शाखा में और अधिक गहरा ज्ञान और निपुणता प्राप्त करने हेतु कुछ वर्ष और अपने आप को झौँकते हैं ।
अनेक मरीज न्यूरालाजिस्ट और न्यूरोसर्जन में भेद नहीं करपाते। चूंकि अधिकांश बीमारियों के लिये आपरेशन की आवश्यकता है या नहीं यह निर्णय प्राथमिक रूप से न्यूरोफिजिशियन द्वारा ही लिया जाता है अत: उचित होगा कि संभावित न्यूरालाजिकल बीमारी के मरीज अपने फेमिली फिजिशियन से पहले उचित राय ले लेवें ।

न्यूरो-साइकिएट्री/ मनोरोग विज्ञान
इसके विशेषज्ञ मेडिकल डॉक्टर नहीं होते | वे दवाइयों का नुस्खा नहीं लिखते | न्यूरोसायकोलाजिस्ट ने मनोविज्ञान में एम.ए. के बाद क्लीनिकल सायकोलाजी में डिप्लोमा या डिग्री हासिल करी होती हैं | ये विशेषज्ञ मरीजों की मानसिक अवस्था के विभिन्न पहलुओं का विस्तारसे आकलन करते हैं |

न्यूरो-एनेस्थीसिया
न्यूरोसर्जिकल शल्य क्रिया के दौरान जब मरीज को बेहोश या सुन्न करना हो अथवा दीर्घकालिक कठिन दर्द का उपचार करना हो तो निश्चेतना विज्ञान की इस शाखा के सदस्य अपनी भूमिका निभाते हैं ।

न्यूरो-एण्डोक्रायनोलाजी
अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियाँ (पिट्यूटरी, थायराईड, पेराथायराईड,एड्रीनल, अण्डकोष) जो तरह-तरह के हार्मोन्स बनाती हैं अन्तत: नर्वस सिस्टम द्वारा नियंत्रित होती हैं और बदले में उस पर असर डालती हैं ।

न्यूरो-आंकोलाजी
नर्वस सिस्टम के केंसर (जैसे ब्रेन ट्यूमर) तथा शरीर के अन्य अंगों के केंसर का नर्वस सिस्टम पर प्रभाव |

न्यूरो-लिंग्विस्टिक्स
मस्तिष्क में भाषा सम्बन्धी कार्यों को संपादित करने की विधियाँ और भाषा वैज्ञानिक द्रष्टि से उनका अध्ययन|

कुछ अन्य

भाषाविज्ञान Neuro- Linguistics
अर्थविज्ञान Neuro-Economics
—विज्ञान Neuro-Anthropology
दर्शनशास्त्र Neuro-Philosophy
मनोविज्ञान Neuro-Psychology
नीतिशास्त्र Neuro- Ethics
प्राणीव्यवहार Neuro-Ethology

कोशिश कर के देखिये, चिकित्साविज्ञान की किसी अन्य शाखा के प्रत्यय के साथ ऐसे Pair बनाने की ……..
कार्डियो, गेस्ट्रो, एंडोक्राइनो, पल्मो, नेफ्रो, यूरो, आंको, हिमेटो, रह्युमेंटो|
किसी के साथ इतने सारे Inter-disciplinary(अंतर्विषयक), Cross-disciplinary(इतर-विषयक) क्षेत्र निर्मित नहीं होते|
न्यूरोसाइंस ही ऐसा विषय हैं जो ज्ञान विज्ञानं की अनेकानेक शाखाओं को न केवल छुता हैं बल्कि उनके साथ गहन जुगलबंदी करता हैं, उन्हें प्रभावित करता हैं और थोड़ा बहुत उनसे प्रभावित भी होता हैं |
यहाँ तक कि मेडिकल साइंस से परे, कला संकाय या Humanities(मानविकी) के अनेक विषयों के साथ भी न्यूरो के महत्वपूर्ण सम्बन्ध हैं|
इनमें अधिकांश में ढेर सारा साहित्य मौजूद हैं, सक्रिय शोध के बहुत सारे प्रकल्प जारी हैं, रिसर्च जर्नल प्रकाशित होते हैं, इनके संगठन सम्मलेन आयोजित करते हैं|


न्यूरोलॉजिस्ट कौन होते हैं

न्यूरोलॉजिस्ट वे मेडिकल डॉक्टर होते हैं जिन्होंने नर्वस सिस्टम की बीमारियों के इलाज की अतिरिक्त स्पेशल ट्रेंनिंग के बाद डी.एम. डिग्री प्राप्त की होती हैं| इसके पहले इन्होने एम.बी.बी.एस. (साढ़े पांच वर्ष) तथा एम.डी. (मेडिसिन)(तीन वर्ष) की योग्यता हासिल करना अनिवार्य होता हैं|


न्यूरोलॉजिस्ट बनना एक कठिन और लम्बी प्रक्रिया हैं|
पी.एम्.टी. की तैयारी(10+2 के बाद) शुन्य से 1-2 वर्ष
एम.बी.बी.एस 4 ½ – 5 वर्ष
इंटर्नशिप 1 वर्ष
अनिवार्य ग्रामीण सेवा शुन्य से दो वर्ष
प्री.पी.जी. परीक्षा की तैयारी शुन्य से २ वर्ष
एम्.डी. मेडिसिन 3 वर्ष
डी.एम. प्रवेश परीक्षा की तैयारी शुन्य से २ वर्ष
डी.एम्. तीन वर्ष
फेलोशिप(सुपर स्पेश्लाइज़ेशन) एच्छिक(1-2 वर्ष)

कुल समय 12-18 वर्ष

नौकरी या प्रेक्टिस शुरू करते करते एक न्यूरोलॉजिस्ट की उम्र 30 से 40 वर्ष तक हो चुकी होती हैं|
भारत में पिछले पांच वर्षों में न्यूरोलॉजी प्रशिक्षण हेतु संसथान और उनमें कुल सीटो की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई हैं|


डी.एम्. के अलावा डी.एस.बी. की उपाधि National Board of Examination द्वारा प्राप्त करके भी न्यूरोलॉजिस्ट बना जा सकता हैं|
न्यूरोलॉजिस्ट विशेषज्ञ मेडिसिन के डॉक्टर होते हैं| औषधि उपचार उनका प्रमुख उपाय होता हैं, हालांकि अन्य विधियाँ भी हैं|
कुछ लोग गलती से इन्हें न्यूरो सर्जन कहते हैं|
अधिकाँश विशेषज्ञ जनरल न्यूरोलॉजिस्ट होते हैं, जो न्यूरोलॉजी की सभी प्रकार की बीमारियों का इलाज़ करते हैं लेकिन ऑपरेशन नहीं करते|
पिछले दस वर्षों में न्यूरोलॉजी की उपशाखाओं खूब विकास हुआ हैं| अनेक विशेषज्ञ जनरल न्यूरोलॉजी के बजाय निम्न में किसी एक सब-स्पेशलिटी में चुनिन्दा काम करने लगे हैं|
स्ट्रोक
एपिलेप्सी
सिरदर्द
डिमेंशिया
अन्य अनेक


न्यूरोलॉजिस्ट कौन कौन सी बीमारियाँ ठीक करते हैं?

नीचे दी गई तालिकाओं में वर्णित लक्षणों(सिम्पटम्स) और बीमारियों(Diseases) का इलाज़ न्यूरोलॉजिस्ट द्वारा किया जाता हैं| लेकिन इनमें कुछ ही रोग ऐसे हैं, जिनसे प्रभावित मरीजों की संख्या करोड़ों में हो|

शेष न्यूरोलॉजिकल अवस्थाएं कम लोगो को ग्रस्त करती हैं(लाखो या हजारों) तथा कुछ इतनी रेयर (या अत्यल्प) दुर्लभ होती हैं, कि पूरे देश में उनकी संख्या सिर्फ कुछ सैकड़ो में होगी|


न्यूरोलोजिस्ट को कब दिखाना चाहिए

When to Visit a Neurologist

न्यूरोलाजी संबंधी बिमारियों की अधिकता होने के कारण न्यूरोलॉजिस्ट डाक्टर एवं रोगी के बीच में दो तरह के संपर्क-सूत्र होते हैं मुख्य एवं द्वितियक। कुछ न्यूरोलॉजिकल बिमारियाँ जैसे पार्किन्सन, मल्टीपल स्केलेरोसिस आदि में मरीज को हर बार न्यूरोलॉजिस्ट से ही मिलना चाहिये। यहाँ न्यूरोलॉजिस्ट प्रींसिपल फिजिशियन की भूमिका निभाते हैं। कुछ बिमारियाँ जैसे – स्ट्रोक, डिमेन्शिया या मानसिक रोग संबंधी बिमारियों आदि यें प्रथम बार न्यूरोलॉजिस्ट देखते हैं एवं उसके बाद से वो रोगी फैमिली फिजिशियन को आवश्यक सलाह देकर रोग का इलाज करते हैं एवं इस तरह परामर्शदाता की भूमिका निभाते हैं। मानसिक, भावनात्मक या स्वभाव संबंधी रोगों के इलाज के समय न्यूरोलॉजिस्ट साइकिएट्रिस्ट, साईकोलॉजिस्ट एवं अन्य विशेषज्ञ की सलाह भी लेते हैं

न्यूरोलॉजिकल परामर्श या कन्सलटेशन क्या है ?
अगर मरीज के फैमिली फिजिशियन को लगता है कि मरीज के रोग के लक्षण स्नायु तंत्र संबंधी बीमारियों के हैं, तो वे इसके इलाज के लिये स्नायु तंत्र विशेषज्ञ को आग्रह करते हैं। न्यूरोलॉजिकल कन्सलटेंट में मरीज की पूर्व बिमारी का इतिहास लिया जाता है एवं वर्तमान दिक्कत पर ध्यान दिया जाता है । परिक्षण के अंतर्गत दृष्टि की जांच, ताकत, संवेदना, गति संबंधी अनियमितता, सन्तुलन एवं रिफ्लेक्स देखा जाता है। इन सबकी सहायता से न्यूरोलॉजिस्ट जानते हैं कि बिमारी तंत्रिका तंत्र में कहाँ है । इसके अलावा जरूरत पड़ने पर विभिन्न जांचें भी करवाई जाती हैं ताकि सही रोग निर्णय हो सके।


क्या न्यूरोलॉजिकल कन्सलटेशन के बाद फैमिली फीजिशियन की जरूरत रहती है ?

निश्चित | वस्तुत: आपका फैमिली फिजिशियन ही पूर्ण रूप से आपकी स्वास्थ्य दशा की प्रारंभिक जांच करता है । जरूरत होने पर वो पुन: आपको न्यूरोलॉजिस्ट की सलाह के लिये भेज सकते हैं। एक न्यूरालॉजिस्ट व मरीज के बीच में , फैमिली फिजिशियन एक पुल का काम करता है। बाद का फालोअप (अनुगमन) तथा दूसरी छोटी-मोटी समस्याओं का उपचार उसी के द्वारा होना चाहिये।


न्यूरोसर्जन कौन होते हैं ?

Who are Neurosurgeons

न्यूरोसर्जन वे मेडिकल डाक्टर होते हैं जिन्होंने नर्वस सिस्टम की बीमारियों के शल्य उपचार (आपरेशन द्वारा) की अतिरिक्त स्पेशल ट्रेनिंग के बाद एम.सीएच. डिग्री प्राप्त की होती है। इसके पहले इन्हें एम.बी.बी.एस (साढ़े पांच वर्ष) तथा एम.एस. (जनरल सर्जरी) (तीन वर्ष) की योग्यता हासिल करना अनिवार्य होता है।
न्यूरोलॉजिस्ट और न्यूरोसर्जन दोनों को अपनी डिग्री हासिल करने के बाद कुछ वर्ष और प्रायोगिक अनुभव प्राप्त करना होता है | कुछ चिकित्सक न्यूरोविज्ञान की किसी छोटी सी शाखा में अधिक गहरा ज्ञान और निपुणता प्राप्त करने हेतु कुछ वर्ष और अपने आप को झौंकते हैं ।
अनेक मरीज न्यूरालाजिस्ट और न्यूरोसर्जन में भेद नहीं कर पाते। चूंकि अधिकांश बीमारियों के लिये आपरेशन की आवश्यकता है या नहीं यह निर्णय प्राथमिक रूप से न्यूरोफिजिशियन द्वारा ही लिया जाता है अत: उचित होगा कि संभावित न्यूरालाजिकल बीमारी के मरीज अपने फेमिली फिजिशियन से पहले उचित राय ले लेवें ।

न्यूरो-सर्जरी में इलाज कराने वाली बीमारियाँ कौन-कौन सी हैं ?
मस्तिष्क में ट्यूमर (गांठ), फोड़ा (एब्सेस), खोपड़ी में पानी अधिक भर जाना (हाईड्रोसिफेलस), कुछ जन्मजात विकृतियाँ, मेरू तंत्रिका पर रीढ़ की हड्डी का दबाव आदि।
सिर की चोट (हेड-इन्ज्युरी) और रीढ़ की हड्डी की चोट (स्पाईनल इन्ज्यूरी) का उपचार मुख्यतया न्यूरोसर्जन द्वारा किया जाता है । हालांकि प्रत्येक चोट ग्रस्त मरीज में आपेशन सदैव जरूरी नहीं होता ।
मिर्गी, पक्षाघात, पार्किन्सोनिज़्म जैसे मरीजों में बहुत थोड़ो में कभी-कभी शल्य उपचार उपयोगी होता है । किस मरीज को न्यूरोसर्जरी की जरूरत पड़ेगी यह फैसला, अधिकांश मामलों में न्यूरोफिजिशियन स्वयं अथवा न्यूरोसर्जन के साथ संयुक्त परामर्श द्वारा लेता है


यह न्यूरोलॉजी नहीं हैं?

वेरीकोस वेन्स
इसका सम्बन्ध रक्त नली (शिरा) से न कि नर्व या तंत्रिका से । हमारे शरीर में दो तरह की रक्त नलियाँ होती हैं, धमनियाँ (आर्टरीज़) एवं शिराएं, (वेन्स)। धमनियों का कार्य शुद्ध रक्त को हृदय से शरीर के विभिन्न भागों में पहुंचाना होता है एवं शिराओं का कार्य अशुद्ध रक्त को शरीर के विभिन्न अंगों से लेकर वापस हृदय को पहुंचाना है। विभिन्न कारणों से शिराओं का मुड़ना व आकार में बड़ा हो जाना जिससे वो त्वचा के समीप नंगी आंखों से दिखने लगती है, इसे ही वेरिकोज़ वेन कहते हैं। बहुतायत में यह पांव में होती है।
कारण – शिराओं में एक तरफा वाल्व होते हैं जो हृदय तक रक्त पहुंचाने में मदद करते हैं। किसी कारण से जब यह वाल्व अपना काम सही नहीं कर पाते तो शिराओं व अंगों में खून का जमाव होने लगता है।
‘किन्हें अधिक होता है ? प्राय: मोटे व्यक्ति, गर्भवती महिलाएं व ऐसे व्यक्ति जिनका कार्य लम्बे समय तक खड़े रहने का होता है। ऐसे व्यक्तियों में यह समस्या बहुतायत से | देखी जाती है।
लक्षण – वेरीकोज वेन त्वचा के नीचे दिखने में गहरी नीली, फूली एवं मुड़ी दिखती है। कुछ व्यक्तियों में कोई लक्षण नहीं दिखता, मगर कुछ में पांव का भारीपन पांव में जलन, थकावट पाँव में दर्द आदि समस्याएँ पाई जाती हैं | पाई जाती हैं। लम्बे समय तक खड़े रहने से या पांव लटका कर लम्बे समय तक बैठे रहने से यह समस्या प्राय: बढ़ जाती है। कुछ लोगों में गम्भीर लक्षण जैसे पांव की सूजन, पिंडलियों में असहनीय दर्द पांव त्वचा के रंग में परिवर्तन भी पाए जाते हैं |
उपचार – सामान्य लक्षण वाले मरीजों में निम्न उपाय से फायदा होता है। दबाव वाले मौजे पहनना, लेटते समय पांव को शरीर के अनुपात से उपर उठाकर रखना , लम्बे समय तक खड़े रहने या बैठने वाले कार्य से बचना / पांव के सक्रीय व्यायाम करते रहना । शरीर के वजन को नियंत्रित रखना । गम्भीर लक्षण वाले मरीजों में सर्जरी से फायदा होता है, इस हेतु सर्जन से सलाह लेनी चाहिये । प्राय: देखा गया है कि वेरीकोज वेन को नसों की बिमारी समझ कर लोग न्यूरोलॉजिस्ट के पास जाते हैं, लेकिन यह रक्त-नलियों से संबंधित है, जिसके लिये सामान्य सर्जन व चर्म रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिये ।

नामर्दी, यौन-कमजोरी
यौन कमजोरी की शिकायत लेकर कुछ पुरूष कभी-कभी न्यूरोलॉजिस्ट के पास इलाज कराने पहुंचते हैं। थोड़े से मामलों में न्यूरोलॉजिकल बीमारी हो सकती है परन्तु अधिकांश में मानसिक उदासी, व्यग्रता, स्री-पुरूष में सहयोग का अभाव, डायबिटीज़, कुपोषण, उच्च रक्तचाप, अनेक दूसरी दवाईयों के दुष्प्रभाव आदि कारण होते हैं। उचित डिग्री प्राप्त सेक्‍स विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिये।

जोड़ों का गठिया
जोड़ों का गठिया आस्टियोअर्ध्रॉईटिस, खास कर घुटने के जोड़ के दर्द के मरीज न्यूरोलॉजिस्ट के पास गलती से पहुंच जाते हैं। प्रभावित घुटने के ऊपर, नीचे, आगे, पीछे कुछ मांसपेशियाँ तथा हड्डी से जुड़ने वाले टेंग्डन (कण्डरा) में सूजन व दर्द को लोग “नसों का दर्द समझते है।


बच्चों के न्यूरोलॉजिस्ट

हालांकि सभी न्यूरोलोजिस्ट को बच्चों के नर्वस सिस्टम सम्बन्धी बीमारियों की जानकारी होती हैं, मगर कुछ न्यूरोलॉजिस्ट इसमें विशेष दक्षता हासिल कर बच्चों के विशेषज्ञ न्यूरोलॉजिस्ट होतें हैं| ये न्यूरोलॉजिस्ट इस क्षैत्र में विशेष ट्रेनिंग लिए होते हैं|


साइकिएट्री/ मनोरोग विज्ञान और न्यूरोलॉजी मे क्या अंतर है ?

मनोरोग या मानसिक रोगों के लक्षण अनेक अवसरों पर न्यूरालाजिकल या न्यूरोसर्जिकल रोगों से मिलते जुलते प्रतीत होते हैं । इसलिये बहुत से मरीज शुरु में गलत विशेषज्ञ के पास पहुंच जाते हैं ।
पागलपन या मानसिक विक्षिप्तता (सायकोसिस) में मरीज का सोच-विचार गड़बड़ा जाता है । बोल-व्यवहार बदल जाता है, अजीब हो जाता है। शक करना, वहम करना, उत्तेजित होना, चिल्लाना, गुमसुम हो जाना, उदास रहना , आत्महत्या के बारे में सोचना जैसे लक्षण देखे जाते हैं। गलती से इनमें कुछ मरीज न्यूरोलाजिस्ट के पास परामर्श हेतु पहुंच जाते हैं । इन्हें मनोरोग विशेषज्ञ (साइकिएट्रिस्ट) के पास जाना चाहिये।
न्यूरोसिस जैसे कि व्यग्रता, बैचेनी, तनाव, चिन्ता, घबराहट, निराशा हताश, ओसीडी भय आदि का उपचार भी मनोरोग विशेषज्ञ ही करते हैं।
मन का वास कहाँ है, हमारा दिमाग। मानसिक बीमारियाँ क्‍यों पैदा होती हैं, दिमाग की सोच प्रक्रिया में गड़बड़ी आने से | फिर मनोरोग व न्यूरालॉजी में क्या अन्तर हुआ । मनोरोग में दिमाग की रचना या कार्यविधि में किसी भी जांच (जैसे सी.टी. स्कैन, एम.आर. आई. स्कैन) या मृत्यु उपरान्त शव परीक्षण द्वारा कोई खराबी या विकृति नहीं चीन्हीं जा सकती है – न गूढ़ स्तर पर (मेक्रो) न सूक्ष्म स्तर पर (माईक्रो)
इसके विपरीत न्यूरोलाजिकल (और न्यूरोसर्जिकल) बीमारियों में मस्तिष्क में कोई न कोई विकृति को पहचाना जा सकता है ।
न केवल मस्तिष्क या नर्वस सिस्टम, बल्कि शरीर के अन्य सभी अंग तंत्र (हृदय, फेफड़े,लीवर, गुर्दा, आंतें आदि) में रोग पैदा करने वाली विधियाँ गिनी चुनी होती हैं जैसे कि – ट्यूमर, कैंसर, इन्फेक्शन (संक्रमण), प्रदाह, चोट, रक्तप्रवाह में कमी इत्यादि | मानसिक रोग के मरीजों में इनमें से कोई सी भी दिमागी खराबी जिम्मेदार नहीं होती । फिर मस्तिष्क ठीक से काम क्‍यों नहीं करता है ? कारण अज्ञात है, अल्पज्ञात है, व कठिनाई से समझे जा रहे हैं | बायोलाजिकल कारणों की भूमिका वहाँ भी हैं पर तुलनात्मक रूप से गौण । परिस्थिति जन्य व वातावरण जन्य कारण तथा जीवन अनुभव और इन्सान का जन्मजात व्यक्तित्व अधिक जिम्मेदार है ।


हिन्दी शब्द ‘नस’ के अनेक भ्रामक अर्थ | इनके उपयोग से बचिये

वेन्स (Veins)
रक्त नलियाँ जो पूरे शरीर से अशुद्ध/कम आक्सीजन वाला रक्त हृदय तक लाती हैं।
बीमारी के उदाहरण – वेरिकोज़ वेन फूली हुई शिराएं इन्हें हिन्दी में शिराएं कहिये, नस मत बोलिये।
यह न्यूरोलॉजी नहीं है।

आर्टरी (Artery)
रक्त नलियाँ जो आक्सीजन वाला रक्त हृदय से शरीर के विभिन्न अंगों तक ले जाती हैं ।
बीमारी के उदाहरण – गेंग्रीन
इन्हें हिन्दी में धमनी कहिये, नस मत बोलिये।
यह न्यूरोलॉजी नहीं है।

टेंडन, मसल लिगामेंट (Tendon, Muscle, Ligament)
मांसपेशियाँ और उन्हें जोड़ों तथा हड्डियों से बांधने वाले सख्त तन्तुओं के बण्डल।
बीमारी के उदाहरण – गठिया, आस्टियोअर्राइटिस
इन्हें हिन्दी में कण्डरा व मांसपेशियाँ कहिये, नस मत बोलिये।
यह न्यूरोलॉजी नहीं है।

नर्व (Nerves)
तंतु या धागों के बण्डल जिनमें बिजली बहती हैं तथा सुचना का आदान-प्रदान होता हैं|
बीमारी के उदाहरण – झुनझुनी , सुन्नपना, अशक्तता
इन्हें हिन्दी में स्नायु या नाड़ियाँ कहिये, नस मत बोलिये।
यही न्यूरोलॉजी है।


न्यूरोलॉजिस्ट एवं मरीज़ के लिये शोध का महत्व

वर्तमान में न्यूरोलॉजिस्ट तंत्रिका तंत्र संबंधी कुछ बिमारियों के इलाज में सक्षम हैं एवं कुछ बिमारियों में लक्षण संबंधी उपचार करते हैं। शोध के द्वारा बिमारियों के सही इलाज की दवा खोजी जाती है | जो हमारे आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य की दृष्टिकोण से काफी हितकर साबित होती है | पुन: शोध के सफल होने पर उन सभी मरीजों को फायदा होता है जो वर्तमान में इस बिमारी से ग्रसित है । इन सभी शोधों की जानकारी आपके न्यूरोलॉजिस्ट के द्वारा आपको मिलती हैं| इसके साथ ही शोध में शामिल होने के लिये न्यूरोलॉजिस्ट आपको सही संस्था का नाम व पता देते हैं जो आपकी बिमारी के ऊपर शोध कर रहे हैं | इससे मरीज को बिमारी के सही निदान में मदद मिलती है | विभिन्न नई औषधियों के विकास हेतु जारी ड्रग ट्रायल्स में शामिल होने हेतु मरीजों को सूचना दी जाती है आप या मरीज अपने डाक्टर से पूछ सकते हैं ।

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