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प्रति सेकण्ड दस बार – कम्पन


देवादित्य सक्सेना (69 वर्ष) को आज भी याद है, हाथों के कम्पन पर उनका ध्यान पहली बार हा गया कि | शायद दस वर्ष की उम्र रही होगी जब वह बड़े भैया और उनके दोस्तों के साथ टाकीज में डरावनी फिल्‍म ‘बीस साल बाद’ देख रहे थे। अनेक दृश्यों के समय वह जोर से कांपा और बहुत देर तक कांपता रहा। कम्पन सबसे ज्यादा हाथों में था। डर-डर के बाथरुम जाते समय पांव भी कांप रहे थे। मां के बिस्तर में घुस कर जैसे-तैसे नींद आई। पिताजी ने सोचा- बेटा ज्यादा ही डरपोक है।

इसके बाद अनेक अवसरों पर हाथ कांपते और थोड़ी देर में ठीक हो जाते- स्कूल में मौखिक परीक्षा में, खेल के मैदान में विरोधी टीम के कप्तान से गुस्से में बहस करते समय और किशोरावस्था में प्रिय लगने वाली सुन्दर लड़की से शर्मा कर बात करते समय।

बड़े भैया के एक डॉक्टर दोस्त से उनके घर पर देवादित्य ने सकुचाते हुए अपनी बात बताई। भैया ने कहा- इसको मजबूत बनने की दवा दो न। हर कभी डर जाता है, गुस्से में होता है तो बस थर-थर कांपता ही रहता है।

डॉक्टर भैया बोले यह तो नॉर्मल है। यह फिजियोलॉजिकल ट्रेमर का अतिरंजित रुप है, जो तनाव पूर्ण परिस्थितियों में थोड़ी देर रहता है, चला जाता है। इसके लिये कोई इलाज की जरुरत नहीं। इसका इलाज है भी नहीं। मन से मजबूत होने के लिये रोज योग और प्राणायाम कर लिया करो। देवादित्य को योगाभ्यास बोर लगता था। मन मान कर एक महीने तक किया। उसे कोई फर्क नजर नहीं आया।

पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद दो बार इन्टरव्यूह में नौकरी से चूक गया। सारी तैयारी की थी, मन को शान्त रखने के लिये। गायत्री मंत्र का जाप किया था। हनुमान चालीसा बुदबुदा रहा था। पिछली रात नींद गहरी आए इसलिए एक गोली भी खा ली थी। इन्टरव्यूह के सवालों के अच्छे उत्तर दिये थे। ऊपरी तौर पर मन में व्यग्रता अधिक प्रतीत नहीं हो रही थी। दिल की धक-धक बढ़ी हुई महसूस नहीं हो रही थी। हथेलियों व ललाट पर पसीना नहीं आया था। फिर भी हाथों का कम्पन ज्यादा हो रहा था। बोर्ड के सदस्यों को अपनी डिग्रियां सौंपते समय, कागज फड़फड़ा रहे थे।

एक अन्डरटेकिंग पर हस्ताक्षर के समय तो इंतिहा हो गये- लिखते बना ही नहीं। पूर्ववर्ती दस्तखतों से मिलान नहीं हो पाया। देवादित्य उदास रहने लगा। माँ और पिताजी हौसला बढ़ाते | माँ ने बोला कि थोड़ा बहुत कम्पन तो तुम्हारे पिताजी को भी होता है, पर वो जैसे तैसे मेनेज कर लेते हैं। मैंने अनेक बार गौर किया था कि चाय कॉफी ज्यादा पीने के बाद उनकी धूजनी बढ़ जाती थी। इसलिये पिछले बीस सालों से हमने घर में चाय-कॉफी रखना बन्द करवा दी थी।

हां, तुम्हारे दादाजी को बुढ़ापे की उम्र में न केवल हाथों में बल्कि पूरे शरीर में लगभग लगातार कम्पन होता रहता था। तुम छोटे थे जब वे गुजर गये थे। इसलिये तुम्हें ध्यान नहीं होगा। दादाजी तो हर काम के लिये मोहताज हो गये थे। खाना, पीना, कुछ देना या लेना, नहाना, कपड़े पहनना- हर पल उन्हें असिस्टेंट लगता था। गांव का पुराना भक्त सेवक मोनू उनका सहारा था। दादी तो बहुत पहले चली गई थी। उस समय गांव के बैदराज ने बताया था कि कम्पवात रोग खानदानी होता है। किसी दवा ने असर नहीं किया था।

बीस के दशक में देवादित्य के कम्पन अब प्रतिदिन नजर आने लगे थे। धीमी गति से ही सही, साल-दर-साल उनकी तीव्रता बढ़ने लगी थी। मोहल्ले के लोकल जनरल प्रेक्टीशनर ने चार माह तक बदल-बदल कर अनेक प्रकार की विटामिन व टॉनिक दिये। शायद कमजोरी के कारण यह तकलीफ है।

“कमजोरी” एक लोकप्रिय आसान उत्तर है। नानाबिध लक्षणों के लिये। कौन सा रोग, कौन सा लक्षण, कौन सी मनः स्थिति नहीं है जिसे “कमजोरी” का हवाला देकर समझाया न जा सके | डॉक्टर यदि पशोपेश में हो, पता नहीं क्या रोग है, क्यों है, तो मरीज के घर वाले खुद सुझाव देते हैं, “डॉक्टर साहब लगता है “कमजोरी से है”, “थकान से है“, “सीत (ठण्डक) से है”, “बद्दलों से है”, “मौसम से है“, “टेंशन लेने से है” – डॉक्टर इस छोर को लपक कर पकड़ता है। “हाँ-हाँ, इसी से है”। मरीज भी संतुष्ट। डॉक्टर भी संतुष्ट। क्या सच में संतुष्ट? डॉक्टर के लिये यह एक आसान सा पलायन हैं। उसे तो सत्य अन्वेषक की कठिन डगर पर चलना है।

फेमिली फिजिशियन ने टेंशन कम करने के लिये नींद जैसी गोलियां, लो डोज में लेने को कहा। कम्पन कम नहीं हुए पर साईड इफेक्ट थे। दिन भर सुस्ती बनी रहती थी।

गर्लफ्रेन्ड शैलजा मस्त लड़की थी। धूजने के ऊपर तरह-तरह के जोक बना लेती, देव को चियरअप करने के लिये गाने गाकर सुनाती, पिक्चरें ले जाती। एक दिन बोली, मैंने पांच-छः बार नोटिस किया है कि जब तुम ड्रिंक कर लेते हो तो ज्यादा सोबर दिखते हो, मतलब कि तुम्हारे हाथ स्थिर और सधे हुए रहते हैं। ऐसा करते हैं कि कल के महत्वपूर्ण इन्टरव्यू के लिये दो छोटे पेग लेकर जाना।

सच में कम्पन बन्द थे। परन्तु दुर्भाग्य से इन्टरव्यूह बोर्ड के एक सदस्य को शराब की गन्ध के प्रति बेहद संवेदनशीलता, एलर्जी और घृणा थी। सब कुछ गुड़ गोबर हो गया। देवादित्य को वैसे भी शराब में आनन्द नहीं मिलता था। पता नहीं ये ‘हाय’ क्‍या होता है? उसमें क्‍या “फिल गुड” होता है? शराब का कड़वा स्वाद नहीं भाता, छाती और पेट में गैस और एसिडिटी बढ़ जाती है, खड़े होने, चलने पर असंतुलन महसूस होता है|, चेहरा गरम व् लाल हो जाता है| चाहे मेरे कम्पन कुछ देर के लिये कम हो जावें, इस रास्ते मुझे नहीं जाना। वैसे भी पूरे घर परिवार में अनेक पीढ़ियों से किसी ने शराब को छुआ भी नहीं था। बचपन से वही संस्कार मिले थे। देवादित्य और शैलेजा को अगले सप्ताह राज्य राजधानी में लोक सेवा आयोग की बड़ी परीक्षा में जाना था। सुबह जायेंगे, शाम को लौट आयेंगे। शैलजा ने वहां के प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अक्षय जौहरी से अपाइन्टमेंट ले लिया था।

डॉक्टर के सामने ज्यादातर हिस्ट्री शैलजा ने बताई “सर, इनके हाथ उस समय नहीं कांपते जब ये शान्त, हाथ पर हाथ धरे बैठे हों। जब हाथों को उठाकर कुछ देर हवा से स्थिर रखते हैं तो चालू हो जाते हैं। जब तक बने रहते हैं तब तक कि हाथ ऊपर हों। यदि उनसे कोई काम कर रहे हों तो भी नहीं कांपते। फिर उन्हें टेबल या कुर्सी के हत्थे पर रख दो तो गायब। बिस्तर पर लेटे में या नींद में नहीं रहते। चाय की प्याली, पानी का ग्लास, हाथ में कलम, चाय की केतली, हाथों में अखबार या पुस्तक, मूंछ के बाल काटने की कैंची, पेंटिंग करते समय ब्रुश- इन सब परिस्थितियों में कम्पन रहता है।

और मजेदार बात है कि शराब का असर रहने तक धूजना बन्द। पर इन्हें शराब पसन्द नहीं। सुना है कि इनके दादाजी का 70 वर्ष की उम्र के बाद कम्पन बहुत ज्यादा हो गया था, जबकि पिताजी को 55 की उम्र में इनसे कम है।

डॉ. जौहरी के बारे में प्रसिद्ध था कि वे मरीज व परिजनों से हिस्ट्री सुनते समय कभी टोकते नहीं थे, रोकते नहीं थे, पूछते नहीं थे। बस इतनी आवाज निकलती- हूँ…… हूँ…. हाँ…. और क्या………फिर…..और आगे……] जब मरीज के तरफ से बन्द हो जाये तो कुछ स्पष्टीकरण प्राप्त करते, छूटी हुई रिक्त स्थानों की पूर्ति के सवाल पूछते, उल्टी-पुल्टी कहानी को सिलसिले से जोड़कर मरीज को सुनाते, पुष्टि करवाते कि ऐसा ही हुआ है न। इसके बाद भी मरीज को समय देते कि कुछ और कहना हो तो कह दें। वे शैलजा से बोले काश अधिकांश मरीज और परिजन आप के समान, एक रौ में सारी बातें, बिना अनावश्यक डिटेल के सुना देवें तो हम डॉक्टरों का न केवल समय बचेगा बल्कि निदान और इलाज भी बेहतर होगा ।”

देवादित्य ने अपना डर बताया- मुझे लगता है मैं बूढ़ा होने के पहले ही दादाजी की हालत में पहुंच जाऊंगा।

डॉ. जौहरी- सही है कि यह अवस्था आनुवांशिक है, परन्तु आपके दादाजी का वक्त अलग था। उन्हें कोई इलाज नहीं मिला होगा। अब अनेक औषधियां और दूसरे उपाय है।

शैलजा- कहीं यह पार्किन्सन रोग का कम्पन तो नहीं? मैंने अखबार में पढ़ा था कि पार्किन्सन में ऐसे ही कम्पन होते हैं।

डॉक्टर- पार्किन्सन रोग का कम्पन अलग प्रकार का होता है। उसे रेस्टिंग ट्रेमर कहते हैं। आराम की अवस्था में कम्पन।

आपके पति को …………..

शैलजा- पति नहीं फ्रेन्ड हैं

डॉक्टर- आई एम सॉरी..

देवादित्य- सॉरी की कोई बात नहीं। लगभग फियान्सी ही समझो। इस परीक्षा में पास होकर अच्छी नौकरी लग जावे तो अगले वर्ष शादी की योजना है। पर इस रोग के कारण यदि मैं अपाहिज हो गया तो शैलू की जिन्दगी बर्बाद नहीं करना चाहूँगा।

शैलजा- मेरी जिन्दगी तुम्हारे बिना बर्बाद रहेगी। मैं दुनिया के किसी भी कौने में जाकर तुम्हारा इलाज करवाऊँगी।

पोश्चरल ट्रेमर या इसेन्शियल ट्रेमर

डॉक्टर- आमतौर पर इस अवस्था में- जिसे पोश्चरल ट्रेमर या इसेन्शियल ट्रेमर कहते हैं, व्यक्ति लगभग सामान्य जीवन व्यतीत करता है। इसका कारण जिनेटिक है पर जीन में म्यूटेशन विकृति क्यों आई, इसका उत्तर नहीं है। पोश्चरल ट्रेमर का मतलब है कि कम्पन उन्हीं पोश्चर या उद्रा या अदा में होता है जब हाथ या अन्य अंग गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध ऊपर उठे हुए हो। जहाँ सहारा मिला, ग्रेविटी का जोर खत्म और कम्पन गायब।

देवादित्य- क्या रोग को आगे बढ़ने से रोका नहीं जा सकता?

डॉक्टर- बहुत सारे मरीजों बीमारी खुद ही रुकी रहती है या अत्यन्त धीमी गति से आगे बढ़ती है। हमारे साइन्स में अभी कोई उपाय नहीं है। कम्पन को दबाये रखने के लिये लगातार गोलियां खाना पड़ेगी।

दो मुख्य औषधियाँ है- प्रोप्रेनोलॉल और प्रिमिडान।

शुरु में कोई एक और बाद में शायद दोनों। दैनिक खुराक धीरे-धीरे बढ़ाते हैं। आमतौर पर साइड इफेक्ट कम है। फिजियोथेरापिस्ट ने सलाह दी कि कलाई पर वजनदार कड़ा या वेट-कफ बाँधे रहो तो कम्पन कुछ दब जाते हैं। अपनी कोहनी को सहारा देकर रखोगे तो हाथों का कम्पन कम होगा। चाय की प्याली या अन्य वस्तुएं दोनों हाथों से पकड़ो। बैंक रिकार्ड में नये आसान हस्ताक्षरों का नमूना दर्ज करवाओ। याद रखो कि व्यग्रता, क्रोध, भय जैसी भावनाओं से कम्पन बढ़ेगा। जहां तक बने, उनसे बचो और कंट्रोल करो। चाय, कॉफी, कोकाकोला, वे सभी पदार्थ जिनमें केफीन रहता है, कम्पन को बढ़ाते हैं।

नौकरी लगने और शादी के बाद बीस वर्षों तक दवाइयों और अन्य सावधानियों के बल पर जिन्दगी अच्छी चली। कम्पन था और अन्दर ही अन्दर हौले-हौले बढ़ रहा था। देवादित्य को पेन्टिंग और गिटार का शौक था जो धीरे-धीरे कम करना पड़ रहा था, क्योंकि अच्छे से हो नहीं पाता था। गाने की रियाज बखूबी जारी थी। दो बच्चे हुए। गर्भधारण करते समय प्रश्न उठा था- रोग होने की 50 प्रतिशत आशंका किसी बच्चे में आयेगी या नहीं, क्या उसे भ्रूण की आरम्भिक अवस्था में पता कर सकते हैं कि खराब जीन आई है या नहीं? क्या भ्रूण अवस्था में जीन ठीक कर सकते हैं? क्या उस डिम्ब का गर्भपात करवा लेना चाहिये। देवादित्य उहापोह में था। अन्ततः शैलजा ने अन्तिम निर्णय सुनाया- बच्चे जैसे भी होंगे, हमारे होंगे, प्यारे होंगे, अच्छे होंगे।

साठ वर्ष की उम्र तक आते आते देवादित्य को खड़े रहते समय पैरों में हल्का कम्पन महसूस होने लगा था। दफ्तर में उसने हाई बेकरेस्ट (ऊंची पीठ) वाली की कुर्सी रखी थी, क्योंकि यदि सिर पीछे आहिस्ता से टिका हुआ न हो तो मुन्डी-खोपड़ी भी हिलती दिखती थी। सामने वाला व्यक्ति यदि पहली बार मिले तो सोचता रहे कि ये बन्दा हाँ कर रहा है या ना।

पोश्चरल / इसेन्शियल ट्रेमर मरीजों की सोसायटी

डॉ. जौहरी की सलाह व प्रेरणा से देवादित्य और शैलजा ने शहर और सम्भाग भर के पोश्चरल / इसेन्शियल ट्रेमर मरीजों की एक सोसायटी का गठन किया जिसमें एक वर्ष में सदस्य संख्या 400 के पार पहुँच गई। त्रैमासिक मीटिंग होती, न्यूजलेटर छपता, ऑनलाईन सोशल मीडिया पर समूह बन गये।

एक से एक अनूठी अजीब दास्तानें बयां हुई।

एक डॉक्टर साहब इंग्लैण्ड में बच्चों के हृदय रोग के सर्जन थे। बीमारी के कारण शल्य क्रिया छोड़ना पड़ी। अब भारत आकर वन्य जीवों के संरक्षण हेतु काम करने वाले एन.जी.ओ. के साथ जुड़े हैं। सुरेन्द्र ने संस्था के फेसबुक पेज पर अपनी कहानी, चित्र और वीडियो शेयर किये । ‘मुझे कक्षा 6-7 में समझ आ गया था कि मैं कादूनिस्ट बनना चाहूंगा। मेरा करियर ठीक ठाक चल रहा था कि 30 वर्ष की उम्र में इसेन्शियल ट्रैमर तीव्रता के साथ प्रकट हुई। मेरी कला पर असर पड़ा, लेकिन मैं काम करता रहा। समय ज्यादा लगता, मेहनत बढ़ गई, बार-बार ड्राईंग बनाना पड़ती। गोलियों से लाभ है, मैं सामाजिक कीड़ा हूँ, लोगों के बीच झेंपना कैसा? सीधे-सीधे कह डालो, मुझे यह है और मैं नॉर्मल हूँ। जेब में एक छोसा कार्ड रखता हूँ जिसमें ट्रेमर के बारे में संक्षिप्त जानकारी छपी है। उसे बांटता रहता हूँ। “लो पढ़ लो। कोई बड़ी बात नहीं है। कृपया अब आगे से मेरे कम्पन की तरफ मत घूरना, मैं सुरेन्द्र हूँ, मैं कम्पन नहीं हूँ। यदि मीटिंग के पहले से लोगों को मेरी अवस्था के बारे में बता दूँ तो अच्छा रहता है।

60 वर्षीय निर्मला जी हायर सेकेण्डरी स्कूल में प्राचार्या हैं। रिटायरमेन्ट के पांच साल बचे हैं। घर में कमाने वाली एक मात्र सदस्य है। उन्होंने बताया कि दिमाग का डी.बी.एस. ऑपरेशन (डीप ब्रेन स्टीम्युलेशन) एक साल पहले श्री चित्रा अस्पताल त्रिवेन्द्रम में करवाया और बहुत लाभ है। महंगा जरुर है (रु. दस लाख)। पर मेरे लिये जरुरी था।

39 वर्षीय सुशील ट्रान्सजेंडर है, जो खुले आम अपना यौन पहलू सबको बताते हैं। उन्होंने मीटिंग में आव्हान किया कि स्थानीय मेडिकल कॉलेज के न्यूरोलॉजी विभाग में बीमारी के इलाज हेतु एक नयी औषधि पर शोध शुरु हुई है। मैं उसमें शरीक हुआ है, आप लोग भी हो सकते हैं। देखते ही देखते दस परिवार खड़े हो गये। शोध के बिना नयी बेहतर औषधियां कैसे विकसित होंगी।

डॉ. जौहरी ट्रेमर सोसायटी के वार्षिक सम्मेलन में इस बार लॉस एंजिलेस के विश्व प्रसिद्ध मूवमेन्ट डिसऑर्डर विशेषज्ञ डॉ. लारेन्स स्मिथ को बुला लाये जो संयोगवश किसी मीटिंग में भारत आये हुए थे। डॉ. लारेन्स ने अद्यानुतन शोध व भविष्य की संभावनाओं के बारे में बताया।

उनके अनुसार सभी प्राणियों के मस्तिष्क में सेरीबेलम, बेसल गेंगलिया, थेलेमस और कार्टेक्स के मध्य एक परिपथ (सर्किट) में 8-42 बार प्रति सेकण्ड के दर से सतत्‌ विद्युतीय तरंग बहती रहती है। यह ताल हमारे अंगों की गति के लिये एक स्थिर आधार बनाती है, संगत देती है। उत्तेजना के क्षणों में यह अनुनाद उभर कर सतह पर आता है और फिर डूब जाता है। इसेन्शियल ट्रेमर के मरीजों में उक्त परिपथ में असन्तुलन आ जाता है और बढ़ता जाता है। डी.बी.एस. ऑपरेशन द्वारा परिपणथ की एक भुजा को आंशिक रुप से काट कर सन्तुलन पुनः स्थापित करते हैं।

डॉ. लॉरेन्स के भाषण का हिन्दी अनुवाद सुनाते-सुनाते, डॉ. जौहरी अपने समूह के सदस्यों से कहने लगे– कितनी अजीब बात है न कि एक तबला या तम्बूरा दिन रात एक चाल से हमारे शरीर में गुप्त रुप से कम्पायमान रहता है। कुछ तार ढीले हो जाते हैं तो कैसा परिणाम मिलता है? शुक्र है विज्ञान का कि इतना कुछ मालूम पड़ा है। इसी के बाद तो उपचार की शोध शुरु हुई है।

डॉ. लॉरेन्स स्मिथ ने देवादित्य को लॉस एंजेल्स आने का एपाइन्टमेंट दिया। बिना खोपड़ी में छेद किये या तार डाले, ध्वनि तरंगों की एक अत्यन्त सटीक (फोकस्ड) बीम (अल्टासाउण्ड) द्वारा दिमाग के केन्द्रीय भाग में थेलेमस नामक रचना में चीरा लगाकर कम्पन ठीक कर दिया गया।

शैलजा शिकायत करती हैं कि ऑपरेशन के बाद में, उनके किचन में बिजली का खर्च बढ़ गया है, क्योंकि पहले मिक्सी का काम देव के दोनों हाथ ही कर देते थे। निर्मलाजी के डीप ब्रेन स्टीमुलेशन ऑपरेशन में खोपड़ी में छेद कर के मस्तिष्क की गहराई में दो तार स्थाई रूप से फिट कर दिये गये थे और बाहर एक छोटी सी पेस मेकर बेटरी से 24×7 लगातार लघु विद्युत प्रवाह जारी रहता था।

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