“न नींद नैनो, न अंग चैनों, न आप आवे, न भेजे पतियाँ| सखी पिया को जो मैं न देखू तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ|” अमीर खुसरों
Author Archives: न्यूरो ज्ञान
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“पानी की खोहें और थाहे सब सुख गयी| तले सब फट गये| दरारों में प्यास भर गई हैं| भूख भरी गहराई खुली पड़ी कब से| जाने कब से|” मुक्तिबोध
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अब तक अथाह जो भरी-पूरी नहीं थी| वहां आज अपनी घाटी में डूब मरी” अज्ञात
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“ज्यों कोई चीटी शिलालेख पर चढ़ती हैं अक्षर-अक्षर रेंगती वही कुछ पढ़ती हैं| त्यों मन| भीतर के लेखों को छु लेता हैं…. बेचैन भटकता हैं, बेकार ठिठकता हैं…पर पकड़ नहीं पाता उसके अक्षर….” मुक्ति बोध
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“मुझे लगता हैं कि मन एक रहस्यलोक हैं| उसमें अँधेरा हैं| अँधेरे में सीढ़िया हैं| सीढियाँ गीली हैं| सबसे निचली सीढि पानी में डूबी हैं| वहाँ अथाह काला जल हैं| इस अथाह काले जल से स्वयं को ही डर लगता हैं| वह शायद मै ही हूँ|” मुक्तिबोध
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“एक संगित को छोड़, अन्य सब कलाओं से अधिक अमूर्त हैं|” मुक्तिबोध
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“ज्ञात से अज्ञात की ओर जाने का कार्यक्रम बना डालों, डरों नहीं| ज्ञात से अज्ञात की ओर जाने से ही ज्ञान की विवशताएँ टूटती रहेंगी|” मुक्तिबोध
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“शरीर से पृथक, मानव की भावनाओं का अस्तित्व संभव नहीं” William James
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“ऐसा भी कभी हो सकता हैं कि आगे बढ़ने का सबसे अच्छा उपाय, एक कदम पीछे लेना हो” चाणक्य
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“व्याग्रता, स्वतंत्रता होने की भन्नाटी हैं तथा वह रचनात्मकता को बाधा पहुँचाने के बजाय बढ़ावा देती हैं|” Kirkegaard
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