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मेडिको – फ्रेन्ड सर्कल (एक पुरानी संस्था के बारे में)


“यह लेख 1980 के दशक में लिखा गया था । सन्दर्भ और परिस्थितियां कुछ बदले हैं, कुछ वैसे ही है”

डॉक्टरों की जमात के बारे में आम आदमी के मन में क्या कल्पना उभरती हैं? यही न, कि वे समाज के सम्पन्न वर्ग के सदस्य होते हैं। वे जरुरतमंद गरीबों की मजबूरी का फायदा उठाते हैं! वे निहायत ही व्यक्तिवादी होते हैं और सामाजिक स्तर पर सोचने या जिम्मेदारी उठाने से कतराते हैं।

यह सोच बेमानी नहीं है। इसके पीछे सच्चाई का अंश है। मेडिकल में दाखिला पाने वाले छात्रों में निम्न या निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों के लड़के-लड़कियाँ बहुत कम होतेहैं। आज के सन्दर्भों में इन सफल विद्यार्थियों को मेधावी माना जांता है क्‍यों कि वे पी.एम.टी. जैसी सख्त कसौटियों पर खरे उतरे हैं। यह भी माना जाता है कि बुद्धिमानी या मेधावी व्यक्ति को समाज के ऊपरी तबके में घुसने का हक है। यह ऊपरी तबका चूंकि शहरों में रहता है इसलिये इस बात को स्वाभाविक माना जाता है कि अधिकांश डॉक्टर शहरों में रहें। एक औसत मेडिकल छात्र की मानसिकता आभिजात्य-बोध से भरी रहती है। अपने आप को “समाज की क्रीम” मानने वाले, ये छात्र डॉक्टर बनते ही मलाई की लूट में शामिल हो जाते हैं। प्रिवेण्टिव व सोशल मेडिसिन जैसे उपयोगी विषय में थोड़ा बहुत ध्यान इस ओर आकर्षित जरुर किया जाता है कि स्वास्थ्य के सामाजिक व आर्थिक मुद्दे क्या हैं? पर उस विषय को मेडिकल छात्रों ने बोर घोषित कर रखा है।

तीसरे साल में इस विषय को पास भर कर लेने के बाद डॉक्टरों को कभी सोचने की जरुरत महसूस नहीं होती कि स्वास्थ्य नीति के राजनीतिक पहलुओं का महत्व क्या है? समाज के प्रति उनका कोई दायित्व है भी या नहीं? डॉक्टरों के राष्ट्रीय स्तर के संगठनों व नेतृत्व द्वारा सामु-दायिक व ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावी बनाने की किसी भी विचारधारा या योजना को अधिक महत्व नहीं दिया जाता है। इस सच को स्वीकार नहीं किया जाता कि बड़े पैमाने पर जनता की स्वास्थ्य सम्बन्धी आम जरुरतों को पूरा करने के लिये डॉक्टर के बजाय मझले दर्ज के कर्मचारी (पैरा मेडिकल) काफी है। स्वास्थ्य को अपना एकाधिकार (मोनोपोली) मानने की प्रवृत्ति होती है।

जहाँ कम वहाँ हम

ऐसे हालातों में डॉक्टरों के एक अलग प्रकार के संगठन का परिचय मैं देना चाहता हूँ। यह संगठन रुढ़ीवादी तरीकों से नहीं सोचता। एक छोटा-सा समूह है। दो सौ के लगभग सदस्य! देश भर के विभिन्‍न इलाकों में फैले हुए। सभी प्रमुख सदस्य अपने क्षेत्रों के मेधावी छात्र रहे हैं। परन्तु अनेक स्वान्तःसुखाय, स्वैच्छिक रूप से ग्रामीण इलाकों में खुद के बूते पर काम कर रहे हैं छोटी-छोटी सामुदायिक स्वास्थ्य योजनाएँ। प्रायवेट प्रेक्टिस कमाने वाली नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवा के साथ स्वास्थ्य शिक्षा का मिशन है।

आज बहुत से विचारक यह मानते हैं कि समाज के वर्तमान ढाँचे में परिवर्तन लाने के. लिए शिक्षा का, और विशेषकर विज्ञान शिक्षा का प्रसार एक सक्षम तरीका सिद्ध हो सकता है। लोगों के दैनिक जीवन में विज्ञान सम्मत आदतें शुमार हों और उनमें प्रश्न पूछने का माद्दा पैदा हो, यही इसका उद्देश्य है।

‘मेडिको फ्रेण्ड सर्कल’ नामक इस संगठन का कोई केन्द्रीय कार्यालय या कार्यस्थल नहीं है। इसकी गतिविधि है एक मासिक बुलेटिन का प्रकाशन अनेक सम्बन्धित मुद्दों पर 3 माह में एक बार करते हैं, वार्षिक मीटिंग आयोजित करते है और अनुभवों का आदान-प्रदान करते हैं। यह ग्रुप अब नौ साल पुराना हो चुका है। (1989 में) अनेक पुराने सदस्य पद छोड़ चुके। नये जुड़ते रहे। पर यह वर्ग एक विचार-धारा के रुप में जीवन्त है।

‘वर्तमान स्वास्थ्य सेवाओं में महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह और उपेक्षा।’

पिछले दिनों आणन्द “गुजरात में इस संगठन की नौंवी वार्षिक बैठक हुई | वहां इस बार चर्चा का मुख्य विषय था – ‘वर्तमान स्वास्थ्य सेवाओं में महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह और उपेक्षा।’ सारी दुनिया में स्त्रियों का स्वास्थ्य उतनी चिन्ता और सावधानी के साथ नहीं सम्हाला जाता जितना पुरुषों का । स्त्रियों की स्वास्थ्य समस्याओं पर भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाया जाता है। हर वर्ष हजार पुरुषों के पीछे महिलाओं का अनुपात घटता जा रहा है। स्त्री शिशु मृत्यु दर पुरुष-शिशु से अधिक है उसकी देखभाल कम होती हैं । परिवार नियोजन के उपायों में स्त्रियों पर अधिक जोर दिया जाता है, जबकि पुरुषों के उपाय जो सरल किस्म के हो सकते हैं छोड़ दिये जाते हैं। पुरुष मर्दानगी की जरुरत से ज्यादा चिन्ता की जाती है। अस्पतालों में महिला वार्डों के पलंग सिर्फ आधे होते हैं। स्त्रियों की ज्यादातर तकलीफों को मानसिक या मनोवैज्ञानिक करार दिया जाता है। नर्सों की उपेक्षा की जाती है।

इस तरह के बहुत सारे उदाहरणों की चर्चा आणन्द में हुई। राष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत कुछ महिला संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी इस बैठक में भाग लिया।

यह महसूस किया गया कि स्वास्थ्य सेवाओं का नारी के प्रति व्यवहार, पूरे समाज में पुरुषों द्वारा स्त्री के शोषण का ही एक प्रतिबिम्ब है, परन्तु साथ ही यह भी माना गया कि इस अवस्था को बदलने में डॉक्टरों से विशेष अपेक्षा की जाती है। क्योंकि डॉक्टर, बायोलॉजी के विद्यार्थी होने के नाते जानते हैं कि स्त्री और पुरुष में उतना अन्तर है नहीं, जितना आम तौर पर माना जाता है। परन्तु दुर्भाग्य से डॉक्टर वर्तमान अन्यायपूर्ण व्यवस्था को बनाये रखने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं।

‘मेडिको फ्रेण्ड सर्कल’ के मंच पर उठने वाले अन्य विषय रहे हैं- डॉक्टर, दवाई उद्योग की जेब में।

दवा का नुस्खा-भलाई किसकी? किस्सा खेसरी (तिवड़ा) दाल का। महिलाओं में कुपोषण-जिम्मेदारी किसकी? वर्तमान चिकित्सा शिक्षा का विकल्प क्या? नर्स स्वास्थ्य सेवाओं की अभिशप्त नारी। सस्ती चिकित्सा महँगी चिकित्सा-स्वार्थ किसका?’ दस्त का घरेलू इलाज-महंगी दवाइयों से बचो। स्वास्थ्य सेवाओं के राजनीतिक आयाम | गाँव की दाई का प्रशिक्षण। गरीबी और बीमारी में चोली दामन का साथ।

मेडिको फ्रेण्ड सर्कल ने पूर्व में अनेक अध्ययन शिविर भी आयोजित किये, जिनमें ठेट ग्रामीण मौकों पर पहुँच कर फील्ड स्टडी करी गयी के जैसे कि तेवड़ा दाल से होने वाले लकवे (लेथिरिज्म) पर या होशंगाबाद जिले में कुपोषण की समस्याओं पर।

मेडिको फ्रेण्ड सर्कल यह मान कर चलता है कि आम जनता के आर्थिक स्तर में सुधार लाये बगैर स्वास्थ्य सुधारने का काम अधूरा है। परन्तु फिर भी हम एक ऐसी चिकित्सा-शिक्षा व एक ऐसा स्वास्थ्य संगठन विकसित करना चाहते हैं, जो भारत की परिस्थितियों व आवश्यकताओं के अनुरुप हो।

बड़े पैमाने पर विज्ञान शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत अन्य संगठनों के प्रतिनिधि भी आणन्द आये थे। उक्त समूहों के अनुभवों को सुनना और जानना उत्साह से भर देता है। दुःख की बात है इन रचनात्मक कामों में देश का युवा वर्ग बड़े पैमाने पर जुड़ा नहीं है। उन्हें जानकारी ही नहीं है। उदाहरण के लिए पाठकों में से कितने लोग जानते हैं कि उनके अपने प्रान्त मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में ‘किशोर भारती’ नामक संस्था ने स्कूलों में विज्ञान शिक्षण का अनूठा सफल प्रयोग कर दिखाया है। महाराष्ट्र में लोक-विज्ञान संघटन, गाँव-गाँव में वैज्ञानिक चेतना व बोध जगाने में लगा है। दिल्ली में विज्ञान और वातावरण केन्द्र महत्वपूर्ण लेखों के वितरण का काम करता है। 

केरल में ‘केरल शास्त्र साहित्य परिषद’ द्वारा मलयालम में प्रकाशित विज्ञान साहित्य बहुत लोकप्रिय हुआ है। दो वर्ष पूर्व इन्दौर में कुछ उत्साही छात्रों ने एक ‘विज्ञान परिषद’ की स्थापना की थी, जिसने नकली भगवान बने एक व्यक्ति के भण्डाफोड़ किया व एक घर में घटने वाली कथित भूत-प्रेत करतबों की असलियत का पता लगाया। ये सारे प्रयत्न अपने स्तर पर छोटे होते हुए भी परिवर्तन के सन्देशवाहक प्रतीत होते हैं।

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