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मस्तिष्क की कार्यविधि


खोपड़ी की कठोर हड्डियों के भीतरी पोली जगह में सवा किलो वजन का भूरे रंग का, दही जैसा नरम, पर दिखने में अखरोट जैसा, हमारा दिमाग होगा है। उसे ढंकने वाली तीन महीन झिल्लियां होती है । झिल्लियों की दो परतों के बीच पानी भरा रहता है जो रोजमर्रा के धक्कों से मस्तिष्क को बचाता है.” शॉक-एब्जावर का काम करता है। दिमाग तक खून पहुंचाने व वापस लाने वाली नलियां होती है। शरीर के दूसरे अंगों के समान मस्तिष्क भी खून से आक्सीजन, ग्लूकोज व अन्य आवश्यक तत्व ग्रहण करता है।


आक्सीजन की मौजूदगी में ग्लूकोज के रासायनिक प्रज्जवलन से ऊर्जा प्राप्त होती है । ऊर्जा याने शक्ति। काम करने की शक्ति । मस्तिष्क में किस काम में ऊर्जा की खपत होती है ? विद्युत गतिविधि चलाने में। बिजली के महीन तारों का घना जाल है। छोटे-छोटे वोल्टेज में बहने वाली बिजली है । ढेर सारे स्विच है। कम्प्यूटर से तुलना करना उत्तम है। जैसी इन्सान की समझ वैसी उपमा । पहले उदाहरण देते थे टेलीफोन स्विच बोर्ड का, अब सुपरकम्प्यूटर का । मजेदार तथ्य है कि मानव मस्तिष्क द्वारा आविष्कृत अनेक यंत्रों के बाद शरीर के अंगों की कामकाज प्रणाली समझने में मदद मिली। मशीनों को गढ़ा इन्सान के दिमाग ने । उन्हीं मशीनों का विकास करते करते सूझ पड़ने लगा कि “अरे हां, यही विधि हो सकती है, फला फलां अंग के काम करने की।” मस्तिष्क रूपी कम्प्यूटर, ऊर्जा के उपभोग की दृष्टि से इतना किफायती है कि एक छोटे से १०० वाट के बल्ब से भी कम बिजली की खपत होती है।

मस्तिष्क की रचनात्मक व कार्यात्मक इकाई एक विशिष्ट आकार व गुण की कोशिका है जिसे न्यूरान कहते है। शरीर के अन्य अंगों की कोशिकाओं के समान इसके भीतर भी नाभिक, माइटोकान्द्रिया आदि रचनाएं होती है परन्तु विभाजित होकर अपनी संख्या बढ़ाने की क्षमता नहीं होती। इनकी कुल संख्या शायद एक अरब होती है जो बाद की उम्र में घटती जाती है। ऊँचे दर्जे का विशेषज्ञ काम हासिल करने की कीमत चुकानी पड़ती है, विभाजन क्षमता खोकर । प्रत्येक न्यूरान कोशिका की तुलना एक लघु बैटरी से कर सकते है। बिजली के आने व जाने का मार्ग अलग होता है । कोशिका के एक सिरे पर महीन तारों का छोटा सा गुच्छा जुड़ा रहता है जिसे डेन्ड्राइट (पार्श्वतन्तु) कहते हैं। न्यूरान कोशिका में अनेक स्रोतों से आने वाली विद्युत-धाराएं इन्हीं तन्तुओं से प्रवेश करती है । कोशिका से बाहर जाने वाली विद्युत- धारा एक अत्यन्च महीन तार एक्सान (अक्षतन्तु) द्वारा निकलती है । एक्सान अकेला, परन्तु सूब लम्बा (अनेक इन्च या फीट या गजभर का) होता है। उसका दूरस्थ सिरा किसी अन्य न्यूरान कोशिका के पार्श्वतन्तु (इन्द्राइट) के सम्पर्क में रहता है।

प्रत्येक न्यूरान रूपी बैटरौं अनेक दूसरी बैटरियों से विद्युत ग्रहण करती है जिससे खुद की विद्युत सक्रियता घटती बढ़ती रहती है। प्रत्येक न्यूरान रूपी बैटरी, अपनी विद्युतधारा, किसी अन्य न्यूरान तक भेजती है। उसको भी इसी प्रकार प्रभावित करती है। न्यूरान (तंत्रिका कोशिकाओं) के मध्य बहुत जटिल विद्युतीय परिपथ (इलेक्ट्रिकल सर्किट) बने होते हैं । बहने वाली विद्युत इतनी कम शक्ति की होती है कि उसे एक वोल्ट व एक एम्पीयर के हजारवें हिस्से की इकाई से नापा जाता है। लाखों बार बन्द चालू होते है । कभी शान्त नहीं रहते । जगमगाते रहते हैं।


न्यूरान कोशिकाओं के मध्य बिछा हुआ तन्तुओं का घना जटिल जाल यूं ही गहुमहु मिश्रण नहीं’ होता। उसमें दिशाएं हैं, नक्शे है, सलीका है, तारतम्य है। मस्तिष्क के किसी खास भाग में अवस्थित न्यूरान कोशिकाओं के समूह का अधिसंख्य सम्बन्ध किसी अन्य खास भाग में स्थित तंत्रिका कोशिकाओं के साथ होना तय रहता है । दिमाग की इस परफेक्ट वायरिंग के नियम सल व पुस्ता है । इसी प्रकार बहने व रुकने वाली विद्युत धारा के अपने कायदे व तौर तरीके है । यूं ही, बन्द चालू नहीं होती रहती। उसके कहने में लय है, संगीत है, संदेश है, ज्ञान है, निश्चयात्मकता व निर्णय है, इच्छा शक्ति है, भाषा है, शब्द है, व्याकरण हैं।

एक सौ वाट के लटू को पूरी पड़ जाए, इतनी सी बिजली, दिमाग की करोड़ों बैटरियों के मध्य संवाद को कैसे संचालित करती है ? एक बात तय है, पार्श्वतन्तु (डेन्द्राइट) व अक्षतन्तु (एक्सान) इतनी ऊंची क्वालिटी के तार हैं कि उनमें बहने वाली विद्युत को कोई प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ता। आसानी से बहती है।

मस्तिष्क में सिर्फ बिजली ही नहीं बहती । न्यूरान कोशिकाएं अनेक प्रकार के रासायनिक पदार्थ भी बनाती हैं जो तन्तुओं में बहते व उनके सिरों पर जमा रहते हैं । इन रासायनिक पदार्थों को न्यूरोट्रान्समीटर (तंत्रिका-प्रेषक) कहते है । तन्तुओं में बहने वाली विद्युत जब अन्य कोशिका के सम्पर्क बिन्दु पर पहुंचती है तो तन्तुओं के सिरे आपस में जुड़े हुए नहीं पाये जाते । उनके मध्य अत्यन्त महीन गेप (अन्तराल) होता है । विद्युत धारा इस गेप को आसानी से कूद नहीं पाती । तन्तु के सिरे पर जमा न्यूरोट्रान्समीटर नामक रसायनों में से किसी एक का रिसाव करवा देती है। उसकी कुछ सूक्ष्म बून्दे अगली कोशिका के तन्तु पर चिपकती हैं, घुसती है व विद्युतीय स्थिति को प्रभावित करती हैं। दो न्यूरान कोशिकाओं के तन्तुओं के मध्य इस संधि को सायनेप्स (अन्तर्ग्रथन) कहते है।

प्रत्येक तंत्रिका कोशिका (न्यूरान) में पैदा होने वाले तथा उससे निकलने वाले विद्युत व रासायनिक पदार्थ दो मुख्य बातों पर निर्भर करते हैं ।
 (१) उक्त कोशिका पर अन्य कोशिकाओं से आने वाले विद्युत व रसायन
(२) उक्त कोशिका का स्वयं का कार्य कलाप ।

किसी भी तंत्रिका कोशिका (न्यूरान) का स्वयं का कार्यकलाप उसकी झिल्ली नुमा दीवारों के भौतिक रासायनिक गुणों पर निर्भर करता है । कोशिका के भीतर ऊर्जा पैदा करने वाली व्यवस्था की भी अपनी भूमिका होती है। आन्तरिक ऊर्जा के बूते पर ही उक्त कोशिका अपनी झिल्लियों की सामान्य विद्युतीय अवस्था बनाए रख पाती है। वरना उसकी उद्दीप्तता (एक्साइटेबिलिटी) प्रभावित होती है ।

तंत्रिका कोशिका की उद्दीप्तता अत्यन्त महत्वपूर्ण गुण है । उद्दीप्तता का अर्थ है, उत्तेजित होना एक्साइट होना । उत्तेजित किस अर्थ में । विद्युतीय व रासायनिक अर्थ में । उत्तेजित हो कर कोशिका क्या कर लेती है ? सुलगती है। विद्युत बहाती है । सुलगने की दर बढ़ाती है। शायद वोल्टेज भी बढ़ता है। इसे ही कहते हैं । “फायरिंग”

मिर्गी तथा कुछ अन्य रोगों में “फायरिंग” ज्यादा होने लगता है । एक-दो कोशिकाओं की उद्दीप्तता बढ़कर, फायरिंग ज्यादा होने से कुछ फर्क नहीं पड़ता । थोड़ी सी देर फायरिंग होने से कुछ फर्क नहीं पड़ता । मस्तिष्क के एक सीमित इलाके में फायरिंग होने से कुछ फर्क नहीं पड़ता। गड़बड़ी मचाने वाली कोशिकाओं का फायरिंग अलग-अलग, एक-एक कर के होने से कुछ फर्क नहीं पड़ता। हजारों कोशिकाओं का समूह गड़बड़ी करहने लगे तो बात बिगड़ती है। सबका फायरिंग एक साथ हो तथा काफी देर तक अनेक सेकेण्डस् चलता रहे तो बात बिगडती है । फायरिंग इतनी तीव्रता से हो कि आस-पास की भली-चंगी कोशिकाओं को भी अपनी गतिविधि में समाहित कर ले, बेवजह फायरिंग करने को मजबूर कर दे और कभी-कभी तो लगभग पूरे मस्तिष्क की उद्दीप्तता को बढ़ा कर दावानल सुलगा दे, तब बात बिगड़ती है । वरना कुदरत ने तो बहुत कोशिश कर रखी है मिर्गी रूपी गड़बड़ी को पैदा होने व फैलने से रोकने की।

एक नायाब उपाय है “निरोधी न्यूरान्स” । इनकी तासीर ही नहीं होती उत्तेजित होने की । ये दूसरों को शान्त करती है । फायरिंग पर ठण्डा पानी छीट देती है। इन निरोधी तंत्रिका कोशिकाओं (Inibitory Neurones) द्वारा खास प्रकार के रासायनिक न्यूरोट्रान्समीटर निकलते हैं (एक उदाहरण है “गाबा” नामक अम्ल) जो उत्तेजित होने वाली कोशिकाओं को दमित कर देते है।


दोनों प्रकार की कोशिकाओं में कोई संरचनात्मक भेद नजर नहीं आता । सामान्य परिस्थितियों में दोनों प्रकार के न्यूरान्स द्वारा पैदा किये गये विद्युतीय विभव एक दूसरे को संतुलित रखते हैं। जब उत्तेजित तंत्रिका कोशिकाएं, मस्तिष्क के आस-पास के हिस्से में अपने गुण वाली अन्य उत्तेजक कोशिकाओं को फायरिंग की परेड में शामिल कर लेती हैं तो विद्युतीय विस्फोट का आकार बढ़ते-बढ़ते एक क्रांतिक स्तर (क्रिटिकल । लेवल) पर पहुंच जाता है, और तब मिर्गी का दौरा आता है। फायरिंग की यह परेड कभी दौरे का रूप न ले, तो भी ई.ई.जी. में स्पाइक या शूक के रूप में देखी जा सकती है जो दौरों के मध्य स्वस्थ हालत में भी रेकार्ड किये जा सकते हैं । खैरियत है कि मिर्गी का दौरा कुछ सेकण्ड्स या मिनटों में समाप्त हो जाता है । निरोधी तंत्रिका कोशिकाओं (Inhibitory neurones) की भूमिका के अलावा उत्तेजक कोशिकाओं की थकान से भी दौरा समाप्त हो जाता है। वे अपने न्यूरोट्रान्समीटर-रसायन फटाफट खर्च कर डालती हैं व फिर निढाल हो कर ठण्डी पड़ जाती हैं । बैटरी के सारे केमिकल्स खर्च हो गये तो बिजली कब तक बनेगी ? बाद में धीरे धीरे सारा सामान पुनः जमा होता है।

मस्तिष्क के विभिन्न भागों में मिर्गी रूपी विद्युतीय विस्फोट के पैदा होने की अनेक कार्यविधियां हैं।
१- बहुत से प्रकार के धनायन जैसे कि केल्शियम, पोटेशियम, सोडियम आदि न्यूरान कोशिकाओं की फायरिंग बढ़ाते हैं।
२- विभिन्न बीमारियां, न्यूरान कोशिकाओं में रचनात्मक व कार्यात्मक परिवर्तन द्वारा उन्हें मिर्गी जनिक बना देती हैं। बीमारी के स्वरूप अनेक परंतु यूरान कोशिका पर सर एक उसका उद्दीपनशील बन जाना।
३- न्यूरोट्रान्समीटर (तंत्रिका प्रेषक) नामक रसायनों का असंतुलन ।
४- न्यूरान कोशिकाओं की झिल्लीनुमा दीवारों की रचना में जन्मजात या बाद में आने वाली विकृतियां।
५ – निरोधी या दमनकारी कोशिकाओं की गतिविधि घट जाना।

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