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चेतना  का न्यूरो विज्ञान


न्यूरोज्ञान व्याख्यान माला

इतिहास साक्षी है कि एक के बाद एक चमत्कारों का पर्दाफाश विज्ञान ने किया है। तमाम Mythology, अब इतिहास और मनोरंजक कहानियों के रूप में रह गए हैं। 

  • दिन और रात कैसे होते हैं? 
  • मौसम परिवर्तन कैसे होता है? 
  • भूकंप, ज्वालामुखी, सुनामी, आंधी, तूफान क्यों आते हैं?
  • सौरमंडल, धरती गृह आदि कैसे बने? कौन किसकी परिक्रमा करता है? 
  • चंद्र ग्रहण, सूर्य ग्रहण क्यों पड़ते हैं?
  • चंद्रमा की कलाएं कैसे बनती है?
  • बिजली क्या होती है? उसे मनुष्य के उपयोग में कैसे ला सकते हैं?
  • जीवन क्या है? प्राणियों और पौधों की हजारों लाखों स्पीशीज कैसे बनी? 
  • शरीर के तमाम अंग कैसे काम करते हैं?
  • बीमारियां क्यों होती है? उन्हें कैसे ठीक कर सकते हैं और कैसे रोक सकते हैं?

न्यूरोज्ञान व्याख्यान माला – फोटो गैलरी

यह सूची अंतहीन है। लेकिन विज्ञान का काम कभी समाप्त नहीं होता। विज्ञान के सम्मुख हजारों Fronts, हजारों मोर्चे खुले रहते हैं, जहां उसका काम जारी रहता है। मोटे तौर पर दो प्रमुख, अंतिम Frontiers है जो विज्ञान द्वारा जीते जाने बाकी हैं। ऐसा लगता है कि हम गुत्थियों के सुलझने के करीब पहुंच चुके हैं।

  1. ब्रह्मांड की शुरुआत कैसे और क्यों हुई?
  2. मानव चेतना की वैज्ञानिक व्याख्या जो कि आज की चर्चा का विषय है।

चेतना या Consciousness का अध्ययन चिंतन वैज्ञानिकों के अलावा कुछ और लोग भी करते हैं जैसे कि 

  1. Psychologist  फ्रायड जैसे मनौवैज्ञानिकों की भाषा में वर्णित Id, Ego, Super-Ego आदि धारणाएं आजकल नहीं मानी जाती है। 
  2. Theologist धर्म शास्त्री 
  3. Philosophers दर्शन शास्त्री 

चेतना,  Consciousness, होश इन शब्दों को सुनकर, मन मे और कौन-कौन से शब्द आते हैं? क्या विचार आते हैं? कैसी कल्पनाएं पैदा होती हैं? 

[चेतन और अवचेतन]

[Conscious – Subconscious ]

[अचेतन Unconscious] [ Coma बेहोशी]

[जागरूक, सजक] [Awake, Alert]

[Oriented बोथ युक्त] [ Disoriented बोधहीन]

[स्वयं की अनुभूति ][ A sense of Self]

[ ‘खुदी का एहसास’, ‘बेखुदी का नशा’]

गद्य, पद्य, Prose, Poetry, शेरो-शायरी में उपरोक्त शब्दों का बहुत उपयोग होता है। आध्यात्मिकता (Spirituality), रूहानी दुनिया में चेतन की चर्चा अलग-अलग अर्थों में होती है। कहते हैं “कण कण में भगवान”। पूरी प्रकृति की चेतना होती है। Cosmic consciousness। यह हमारा आज का विषय नहीं है। हालांकि अंत में मैं इसका संक्षिप्त उल्लेख करूंगा। 

एक न्यूरोलॉजिस्ट और बायोलॉजी के विद्यार्थी के रूप में मेरा सरोकार है –  मस्तिष्क और उसे धारण करने वाले शरीर से। मेरा दायरा नितांत भौतिक है। Physicalist है।  Materialistic है। Transcendental (इंद्रियातीत, अनुभवातीत) नामक शब्द से मेरा कम नाता है। 

मेरी बातें Gross level लेवल की है। रुढ धरातल की है। 

मै Supernatural को नहीं मानता। प्रकृति या नेचर के नियमों से परे किसी सत्ता या शक्ति में मैं विश्वास नहीं करता। चमत्कार नहीं मानता। 

में अद्वैत मानता हूं। द्वैत नहीं मानता। 

I believe in Monism. Not in Dualism.

अर्थात मानव काया और उसमें स्थापित मस्तिष्क के अंदर और उसी के द्वारा हमें चेतना को समझना है, उसकी व्याख्या करनी है। 

शुरुआत तो ऐसे ही कर रहा हूं। देखते हैं,  बातें करते-करते मै कुछ जमीन छोड़ता हूं या नहीं। 

हम अनेक प्रश्न उठाएंगे और उनके उत्तर ढूंढने की कोशिश करेंगे। 

Q1. चेतना की परिभाषा क्या है? 

Q2. चेतना के स्वरूप, चेतना के स्तर (Level of Consciousness), और चेतना की सामग्री (Content of Consciousness) क्या है? 

Q3. मस्तिष्क में चेतना की Anatomy और  Physiology कहां है? 

Q4. उक्त Anatomy  और  Physiology का अध्ययन /शोध करने की विधियां क्या है? 

Q5. डार्विनियन विकास की गाथा में चेतना का आविर्भाव कब हुआ, किन प्राणियों में हुआ, कैसे हुआ? क्यों हुआ?

Q6. डार्विनियन विकास की दृष्टि से Does Consciousness confer any survival benefit 

Q7. गर्भस्थ शिशु में चेतना कब आती है? 

Q8.  सचेतन अनुभूति के नीचे ढेर सारा अवचेतन मन Subconscious Mind, कैसे एक आइसबर्ग के रूप में आधार प्रदान करता है? 

Q9. Emotions,  भावना का चेतना में क्या योगदान है

Q10. मन क्या है?  What is Mind? मन कैसे काम करता है? मन की न्यूरोलॉजी क्या है? 

Q11. चेतना को महसूस करने वाला, संधारित करने वाला, उसके माध्यम से Free will (स्वतंत्र इच्छा) धारण करने वाला, कर्ता रूपी “स्व” [“Self”] [“खुद”] कौन है? ब्रेन में कहां रहता है? या वहां नहीं रहता है, शायद बाहर कहीं रहता है? 

Q12. क्या ‘आत्मा’ नामक कोई चीज होती है जो जीवन, शरीर, मस्तिष्क और मन से भी परे होती है ? क्या मृत्यु के बाद चेतना रह जाती है?

Q.13 अनेक लोग मानते हैं की आध्यात्मिकता द्वारा ध्यान, साधना, योग, हठयोग, भक्ति, Meditation, Inner Engineering, तांत्रिक विधिया, विपासना द्वारा हमें अपने मन और चेतना को बेहतर और अनूठे तरीके से बुझ सकते हैं? क्या यह सही है?

Q.14 मन मस्तिष्क पर असर डालने वाले पदार्थ शराब, गांजा, भांग, अफीम, LSD आदि से क्या कुछ जानने को मिलता है?

Q.15 What are emergent Properties of Matter? Can consciousness & mind be conceived as emergent property & function of Brain?

क्या मन और चेतना, मस्तिष्क का एक प्रति उत्पन्न गुण और कार्य मात्र है? 

Q.16 मस्तिष्क के रोगों से ग्रस्त व्यक्तियों की चेतना, बुद्धि, स्मृति, स्वभाव, भाषा, व्यक्तित्व, विचार, emotions आदि में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करके हमें क्या समझ मिलती हैं?

चेतना और मस्तिष्क के संबन्धो का इतिहास पुराना है | 2500 वर्ष पूर्व हिप्पोक्रेतिज ने कहा था कि “मनुष्यों को जानना चाहिये कि मस्तिष्क, और सिर्फ मस्तिष्क से हमारी खुशियाँ, आनंद, हंसी उठती है और दुःख दर्द, विरह और आंसू भी |”

गिरीश कर्नाड द्वारा लिखित और अभिनीत ‘ह्यवंदन’ की कहानी में नायिक असमंजस है कि उसने दो युवकों के कटे हुए सिर दुसरे के धड़ से जोड़ दिये है| वह जिसे प्यार करती है वह कौन ? देवता बताते है – उसकी पहचान मस्तक से करो |

न्यूरोलॉजी की दृष्टि से चेतना की परिभाषा है “जागृत और सजग अवस्था जिसमें व्यक्ति को अपने आसपास का और शरीर की आंतरिक स्थिति का एहसास रहता है और समस्त परिस्थितियों का सामना करने या उन पर प्रतिक्रिया देने में वह तत्पर व तैयार होता है।” 

साइकोलॉजी व Cognitive Neuroscience (संज्ञानात्मक न्यूरो विज्ञान) के अनुसार चेतन अवस्था को तीन Axis (अक्ष) पर वर्णित करते हैं –  

  1. Level of Consciousness (चेतना का स्तर)
  • नींद में हमें होश नहीं होता लेकिन जगाया जा सकता है
  • Drowsiness (उनिनदापन) में जागे रहने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है 
  • Stupor (अर्ध बेहोशी) में आवाज या अन्य तरीके से क्षणिक जागृति आती है 
  • Coma (कोमा) में जगाया नहीं जा सकता 
  • Delirium (सन्निपात) में चेतना गड़बड़ रहती है, व्यक्ति बड़बड़ता है, भ्रमित रहता है, बोध की कमी होती है, Hallucination होते रहते हैं। 
  • Vegetative State (जड़ अवस्था ) में व्यक्ति जागृत प्रतीत होता है, सोने और जागने का क्रम चलता है लेकिन होश नहीं होता ।
  • Brain Death  (मस्तिष्क मृत्यु) यह  Coma  से भी परे की अवस्था होती है जिसमें व्यक्ति सचमुच में मर चुका होता है, क्लीनिकल दृष्टि से और कानूनी दृष्टि से भी। हृदय की धड़कन जारी रह सकती है। मस्तिष्क को छोड़कर अन्य अंगों को रक्त संचार जारी रहता है।
  1. Content of Consciousness ( चेतना का कलेवर) व्यक्ति की आत्मकथात्मक स्मृति (Autobiographical Memory) उसकी चेतना का मुख्य कलेवर होता है –  उसकी जिंदगी की पहचान, उसका परिवार, इतिहास, दुनिया का ज्ञान। उसका मन Mind जो भावनाएं (Emotions) महसूस करता है  मन जो बुद्धिमान है, सोचता है, निर्णय लेता है विचारधाराओं को अपनाता है, व्यक्तित्व गढ़ता  है, इंसान की पहचान बनाता है ।
  2. The Sense of Self  (स्व का एहसास) वह कौन है अंदर जो जानता है कि यह मैं हूं –  जो इस काया और मस्तिष्क को धारण किए हुए हैं –  जो जानता है कि मैं चेतन हूं और मेरे मन का स्वामी हूं, जिसमें कर्ता भाव है (A sense of Agency), स्वतंत्र इच्छा शक्ति है (Free will), Intentionality अर्थात साभिप्रायिकता और सौद्देश्यता होती है। सेल्फ की न्यूरोलॉजी समझने को The Hard Problem of Consciousness कहते हैं बाकी सब The Easy Problems कहलाती है 

फिलहाल हम यह मानकर चल रहे हैं कि पौधों, वृक्षों वनस्पतियों में चेतना नहीं होती हालांकि उनमें जीवन है। डार्विनियन विकास गाथा में प्राणियों में चेतना के चिन्ह पहली बार कब देखे गए? यूं तो एक कोशिकीय अमीबा भी छेड़े जाने पर अपने आप को सिकोड़ कर दूर हट जाता है, एक कॉकरोच को धमकाओ तो छिप जाता है, केंचुए को सुई चुभोओ तो अपने आप को घड़ी कर लेता है लेकिन इन्हें हम चेतना नहीं मानते। या कुछ वैज्ञानिक मानते भी हैं? 

मछली, मेंढक और छिपकली के बारे में क्या कहा जाए? 

इस स्तर तक के प्राणियों की समस्त हरकतें स्वतः मशीनवत, रिफ्लेक्स एक्शन(प्रतिवर्ती क्रिया) के रूप में होती है। “दिमाग नहीं लगाया जाता।” 

कुछ नया नहीं सीखा जाता। सारा हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर जन्म से तैयार होकर आता है। जिसका कोडिंग जींस मे मौजूद डीएनए द्वारा किया जाता है। 

पक्षियों में और स्तनधारी प्राणियों में चेतना का प्रादुर्भाव होता है। मस्तिष्क का रूप विकसित होने लगता है। अनुवांशिकता द्वारा जितना मिलता है, उससे थोड़ा सा अधिक जीवन में सीखा जाता है। लेकिन एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में अंतरित नहीं होता। सर्कस में प्रशिक्षित जानवरों की संतानों को फिर से ट्रेनिंग देना पड़ती है। एक जानवर अपना हुनर दूसरे को नहीं पढ़ा सकता। चिंपांजी जिन्हें हम बुद्धिमान मानते हैं उनके बारे में जेन गुडाल का कहना है – “वह अपने आपके कैदी हैं – They are trapped inside their body” 

प्राईमेट्स और Apes में आरंभिक स्तर का माइंड होता है लेकिन सेल्फ या “स्व” की पहचान शायद नहीं होती। या कौन जाने होती भी हो ?मालूम करने का क्या तरीका? 

मनुष्य और प्राणियों के मध्य जो खाई है, Gap है वह कितना सकरा/छोटा है या कितना बड़ा-चौड़ा है। कुछ लोग मानते हैं कि Gap कम है। एक निरन्तरता है। इंसान भी अंततः एक Ape है। दूसरे लोग कहते हैं – मनुष्य का दर्जा एकदम अलग है। वह खासमखास है। भगवान ने ऐसा बनाया है या अपने आप बना है, इस बहस में यहां नहीं पड़ेंगे। मानव का एक अपवाद होना दो कारणों  से हुआ  – 

  1. चार पैरों के बजाय दो पैरों पर चलना। हाथ मुक्त हो गए। अनेक बारीक काम सुघड़ता से संभव हुए। औजार बनाना और उन्हें उपयोग करना सीखा । उंगली से किसी व्यक्ति या वस्तु को इंगित करने की मुद्रा ने This and That (यह और वह) का भेद करना सिखाया। जो आगे चलकर मैं और तुम और वह का आधार बना। सेल्फ या स्व की जमीन तैयार हुई। 
  2. भाषा का उद्गम। मुंह से निकलने वाली ध्वनियों में इतनी वैरायटी पैदा हुई कि उनके क्रमिक संयोजन से हजारों शब्दों का जन्म हुआ। शब्द जो संकेत या चिन्ह बने किसी वस्तु, व्यक्ति या अनुभूति के। 

भाषा के माध्यम से विचारों की अभिव्यक्ति मिली और वह लगातार समृद्ध होते चले गए। भाषा वाहन बनी ज्ञान और कौशल को एक इंसान से हजारों इंसानों तक साझा करने के लिए। चेतना का स्तर ऊंचा उठना गया।

एनाटॉमी –  फिजियोलॉजी –  पैथोलॉजी 

Evolution (बायोलॉजिकल विकास) की दृष्टि से मस्तिष्क का सबसे पुराना भाग है – 

Brain Stem (मस्तिष्क स्तंभ)। यदि गोभी का फूल मस्तिष्क का गोलार्ध हो तो ब्रेन स्टेम उसका डंठल है। शेष शरीर और Brain को स्पाइनल कॉर्ड के माध्यम से जोड़ने वाला हाईवे है, पूल है। आवक और जावक के तंतु मार्ग है। देह से इंद्रिय जन्य जानकारियां प्राप्त होती है। मस्तिष्क से निकलने वाले आदेश नीचे की दिशा में संचारित किए जाते हैं। 

आने वाले संदेश सीधे-सीधे हाई-कमांड  के पास नहीं पहुंचते। बीच में स्टेशन पड़ते हैं। ब्रेन स्टेम पहला पड़ाव है। इसके तीनों खंड है – Medulla Oblongata मेडुला ऑबलोगेटा (नीचे की तरफ), Pons पाँस ( बीच में), Midbrain मिड ब्रेन (ऊपर की तरफ) 

मिडब्रेन के ऊपर हाइपोथैलेमस और थैलेमस होते हैं।

ब्रेन स्टेम के अग्रभाग में (Ventral, Anterior) तंतुओं के उभय मार्गी महापथ होते हैं। पश्च भाग में (Dorsal, Posterior) अनेक नाभिक होते हैं। न्यूक्लियस। न्यूरॉन कोशिकाओं के छोटे-छोटे पुंज या समूह। 

जीवन के लिए अनिवार्य आधारभूत काम यहां से नियंत्रित होते हैं –  सांस लेना, हृदय को धड़कवाना, ब्लड प्रेशर को थामे रखना। हाइपोथैलेमस के साथ मिलकर ब्रेन स्टेम सोने जागने के चक्र का, शरीर के तापमान का और समस्त आंतरिक अंगों (फेफड़े, हृदय, आंतें, लीवर आदि) की मेटाबॉलिक (चयापचयी – रासायनिक) क्रियाओं का संचालन करता है। पांस के ऊपरी पश्च भाग में मिडब्रेन के पश्च भाग में तथा थैलेमस की मध्य रेखा के समीप न्यूरॉन कोशिकाओं के पुंज और भी छोटे तथा छितरे हुए होते हैं – Ascending Reticular Activating System उर्ध्वगामी जालीदार सक्रियात्मक प्रणाली। A.R.A.S.


A.R.A.S. चेतना की प्रथम सीढी है। जागृति और ध्यान का आधार है। Alertness and Attention. ARAS की न्यूरॉन कोशिकाएं पूरे शरीर से संवेदनाएं –  Sensory Information ग्रहण करती है – स्पाइनल कॉर्ड या मेरुरज्जु के माध्यम से। केवल सिर और चेहरा शेष रह जाता है। वहां की  सूचनाएं, पांचवें नंबर की क्रेनियल नाड़ी Trigeminal Nerve द्वारा पांस के मध्य भाग में प्रवेश करती है। 

सूचनाओं संवेदनाएं ग्रहण करके ARAS  के न्यूरोपुंज उद्दीप्त होते हैं और ऊपर की दिशा में Relay संदेश भेजते हैं  – पूरी Cerebral Cortex को दोनों गोलार्धों के Grey Matter या भूरे पदार्थ को जागृत करते हैं। जब हमें नींद आने वाली होती है या बेहोशी और नींद वाली औषधियां का सेवन करते हैं तो ARAS की कोशिकाएं निष्क्रिय हो जाती है, उनका फायरिंग बंद हो जाता है, मस्तिष्क के गोलार्ध की लाइट डिम हो जाती है, हाइपोथैलेमस में नींद वाला तंत्र प्रभावशील हो जाता है।

यदि किसी रोग अवस्था में ऊपरी पांस, मीडब्रेन और थैलेमस का ARAS क्षतिग्रस्त हो जावे तो व्यक्ति Coma में चला जाता है। ब्रेन स्टेम का अग्रभाग में पैथोलॉजी होने से व्यक्ति कोमा में नहीं जाता, भले ही चारों हाथ पांव, गला, जीभ, जबड़ा और चेहरा लकवा ग्रस्त हो जाए। Locked-in-Syndrome तालाबंद अवस्था। 

ऊपर से प्रतीत होता है कि व्यक्ति बेहोश है लेकिन अंदर से होश में रहता है। कृपया इस किताब को पढ़िएगा The Diving Bell and Butterfly  और मेरी इस कहानी को “अरे कोई सुनो में बेहोश नहीं हूं”। 

https://neurogyan.com/main-behosh-nahi-hun

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निम्न स्तर के प्राणियों में केवल ब्रेन स्टेम विकसित होता है – उसके ऊपर के भाग अत्यंत अल्प विकसित रहते हैं। जैसे की अकशेरुकी प्राणी Invertebrates  मछलियां इन प्राणियों में सिर्फ Core-Consciousness रहती है। “मूल चेतना”।

निम्न जाति के प्राणियों में विस्तारित चेतना (Extended Consciousness) नहीं होती। सुन पढ़ कर दुनिया जहान का अतिरिक्त ज्ञान नहीं होता। आत्मकथात्मक  चेतना नहीं होती। क्योंकि Autobiographical Memory का अभाव होता है। इन सबके लिए ब्रेन स्टेम के ऊपर के अंग चाहिए। 

Thalamus थैलेमस (चेतक) 

मस्तिष्क में प्रवाहित अरबों संकेतों के एकीकरण (Integration) से चेतना का उद्भव होता है। ब्रेन स्टेम के साथ-साथ थैलेमस भी जागृति बनाए रखने में योगदान देता है। गंध को छोड़कर तमाम इंद्रियों से आने वाली संवेदनाएं (स्पर्श, गर्म, ठंडा, कंपन, गति, दबाव, दर्द, दृष्टि, सुनना, संतुलन) थैलेमस के रिले स्टेशन से गुजर कर ऊपर गोलार्धों में सेरिब्रल कॉर्टेक्स तक पहुंचती है। मस्तिष्क के अधिकांश यातायात के समान यह ट्रैफिक भी उभय मार्गी होता है। थैलेमस और कॉर्टेक्स का आपसी संवाद सूचनाओं की मॉनिटरिंग करता है, समायोजन करता है। 

सेरिब्रल कॉर्टेक्स

मनुष्य में कॉर्टेक्स का ग्रे मैटर, संख्या और गुणवत्ता दोनों दृष्टियों से सबसे अधिक उन्नत होता है। ब्रेन स्टेम और थैलेमस के साथ मिलजुल कर कॉर्टेक्स ही वे मानचित्र बनाता है जो अंततः माइंड या मन कहलाते है। मूल – स्वनाम (Core-self)  पैदा होता है।  प्रथम Image/बिम्ब, ब्रेन स्टेम में  – दूसरी थैलेमस में, तीसरी कॉर्टेक्स में। प्रत्येक बिम्ब, प्रतिक्षण मस्तिष्क की र​चना में सूक्ष्म परिवर्तन पैदा करता है। इन परिवर्तनो का बिम्ब फिर ऊपर बनता है। कुछ हो रहा है यह एहसास चेतना के रूप में सतह के ऊपर आता है। 

सेरेब्रल कॉर्टेक्स के पास एक और गुण है जो थैलेमस और ब्रेन स्टेम के पास नहीं। स्मृतियां। Treasure Houres of Meomory।  स्मृतियों के ताने-बाने से जीवनी घड़ी जाती है। इंसान को उसकी पहचान या Identity मिलती है। 

स्तनपाई प्राणियों और प्राइमेट्स में सेरेब्रल कॉर्टेक्स के महाविस्तार के बावजूद ब्रेन स्टेम के मूल काम उसी के पास रख रहे। जिंदा रहने के लिए, प्रोटो सेल्फ के लिए, कोर सेल्फ के लिए, सेरेब्रल कॉर्टेक्स थैलेमस के माध्यम से ब्रेन स्टेम से संपर्क में रहता है। 

Localization versus Holism

स्थानिकता विरुद्ध सर्व व्यापकता 

क्या पूरा मस्तिष्क एक समेकित इकाई के रूप में काम करता है? जिसमें प्रत्येक भाग समस्त कार्य समान रूप से करते हो?  इसे होलिस्म कहते है। अर्थशास्त्र मे Gloobalism। या उसमें डिविजन आफ लेबर है। श्रम विभाजन। फला भाग के जिम्मे फलां काम। इसे Localization कहते हैं। अर्थशास्त्र में स्थानिकता और protectionism.

उन्नसवी सदी के पूर्वार्ध में Phrenology के नाम से एक मिथ्या विज्ञानं पनपा था। खूप्दी की हड्डी को हाथों से टटोल टटोल कर नाना प्रकार के छोटे बड़े उभर वर्णित किये जाते थे । व्यक्तित्व के अनेक गुण-अवगुण, कौशल आदि से उनका सम्बन्ध माना जाता था । कुछ दशकों में वह फैशन चला गया ।

स्थानिकता को पहल बड़ा सबूत मिला – पेरिस में 19वीं शताब्दी के मध्य में पाल ब्रोका द्वारा एक मरीज का अध्ययन –  उसे सिर में गोली लगी थी। वह बोल नहीं पाता था। वाचाघात [Aphasia] [बोलने का लकवा]। मृत्यु उपरांत शव  परिक्षण में पाया गया कि मरीज के मस्तिष्क के बाएं गोलार्ध के फ्रंटल खंड के निचले भाग में बुलेट धंस कर एक गहरा घाव बना चुकी थी। ब्रोका ने सोचा और सही सोचा कि जरूर इसी भाग से भाषा बोली का नियंत्रण होता होगा। वाणी केंद्र। स्पीच सेंटर। 

अगले सौ-डेढ़ सौ वर्षो से सिलसिला चल रहा है –  फलां भाग-फलां कार्य। यह सेंटर, वह सेंटर। कौन सा काम बचा है जिसका केंद्र नहीं बताया गया। देखना, सुनना, छूना, सूंघना, चखना, दर्द होना, नींद आना, जागना, कामेक्षा होना, भूख, प्यास, गर्मी लगना, ठंड लगना, प्यार करना, भय, ईर्ष्या, द्वेष, दुख, हर्ष, शांति बेचैनी, शक न जाने क्या-क्या। इंतहा हो चुकी है।  प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। अति सर्वत्र वर्जयेत। 

धीरे-धीरे समझ आया कि सत्य, दो ध्रुवों के बीच में कहीं रहता है। चेतना  या Consciousness के साथ भी कुछ ऐसा ही है। 

मस्तिष्क का कुछ खास, सीमित अंश चेतना को धारण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं लेकिन आइसबर्ग के डूबे हुए 90% भाग का महत्व कम नहीं होता।

एक अफ्रीकी कहावत है – 

It takes a village to raise a child.

It takes the whole brain to execute a function.

वर्तमान समझ को हम Overlapping Network Theory कहते हैं। सीमित Real Estate वाले केन्द्रों के बजाय दूर-दूर तक फैले हुए Network की धारणा मानी जाती है जो एक ही जमीन को साझा करते हैं। मानों एक इमारत में बिजली, पानी, कंप्यूटर केबल, इंटरकॉम केबल आदि के नेटवर्क साथ-साथ बिछे हो। फर्क है कि दिमाग में ये नेटवर्क आपस में संवाद करते हैं, एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। जैसे कि एक से अधिक मकड़ियों के जाले  गुत्थम-गुत्था है। उस संचतन को एक बिंदु पर छेडो तो पूरा का पूरा जाला डोल उठता है

जैसे कोई धूर्त बेईमान प्रोपर्टी एजेंट, एक ही प्लाट को एक से अधिक ग्राहकों को बेच दे वैसे ही ब्रेन का सिमित रियल इस्टेट एक से अधिक जरूरतों | कार्यों के लिए नियत कर दिया जाता है |

मस्तिष्क की भाषा

जैसे समस्त जीव जगत (वनस्पति + प्राणी) में आनुवंशिकता (Genetics) की भाषा डीएनए और उसके चार अक्षर हैं (A-T-C-G) वैसे ही समस्त प्राणियों के नर्वस सिस्टम की कूट भाषा में केवल दो अक्षर हैं शून्य और एक। Computers के समकक्ष 0101010101010 । 

1 -चालू

0 – बंद 

विद्युतीय आवेगों के साथ-साथ अनेक प्रकार के रसायनों (न्यूरोट्रांसमिटर्स) की सूक्ष्म बूंदों का भी रिसाव और संचरण इस संकेत कूट लिपि में होता है।

न्यूरॉन कोशिकाओं के लघु लघु नेटवर्क समूहों में विद्युतीय गतिविधि के लघु लघु Patterns द्वारा Proto-Phenomenon  का उद्भव होता है जो समेकित होकर 

  1. Perceptions(अवबोधन), 2. Fillings (अनुभूतियां) , 3. Emotions (भावनाएं) 4. Consciousness को जन्म देते हैं। 

दर्शन शास्त्र में इन्हें Qualia कहते हैं। लाल रंग का लालपन, दार्जिलिंग की चाय का स्वाद, चमेली की खुशबू, लता मंगेशकर की आवाज, घास का मुलायम स्पर्श यह सब Qualia है। इन सब के अपने-अपने Natural Activity के Pattern है जो अवचेतन मस्तिष्क में उफन उफन कर चेतना की सतह पर बुदबुदाते रहते हैं। 

न्यूरो विज्ञान अभी जूझ रहा है इस प्रश्न से कि यह अनुभूतियां क्यों वैसी लगती है जैसे कि वे लगती है? आश्चर्य की बात है हजार ख्वाहिशों को महसूस करने वाली न्यूरो कोशिकाओं के संजाल की रचना और उनमें जगमग जगमग करने वाली बिजली के पैटर्न ऊपर से एक जैसे लगते हैं। आप पढ़ नहीं सकते कि व्यक्ति इस पल किस सोच किस मूड में है। न्यूरान की रचना सब जगह एक जैसे । शुन्य और एक वाली उनकी कूट भाषा हर समय एक जैसी । और हजारों प्रकार के Qualia?

डार्विनियां विकास में चेतना का महत्व 

डार्विनियां विकास में चेतना का महत्व को लेकर विवाद है। अधिकांश बायोलॉजिस्ट मानते हैं कि Consciousness का उद्भव, विभिन्न स्पीशीज के अन्य गुणों के समान एक अप्रत्याशित दुर्घटना रही होगी या सुघटना। पीढ़ी दर पीढ़ी होने वाले म्यूटेशंस में से अधिकांश तटस्थ या मौन होते हैं, कोई फर्क नहीं पड़ता, कुछ नुकसानदायक होते हैं, उन्हें धारण करने वाले लुप्त हो जाते हैं, फायदे वाले म्यूटेशन को वहन करने वाले प्राणियों के नाम लॉटरी खुल जाती है – वे सबसे ज्यादा संताने पैदा करते हैं –  धीरे-धीरे उन्हीं का बोलबाला हो जाता है। 

करोड़ों वर्षों की यात्रा में, हजारों पीढ़ियों में हजारों म्यूटेशंस ऐसे होते गए होंगे जिन्होंने “चेतना” जैसे गुण को कदम-दर-कदम गढ़ा होगा। जरूर “चेतना” नामक गुण की धनी  स्पीशीज को जिंदा रहने और अपना कबीला बढ़ाने का लाभ मिला होगा। 

Common Sense से ऐसा ही लगता है कि Unconscious की तुलना में Conscious प्राणी Survival of the fittest की दौड़ में आगे रहेगा। 

लेकिन कुछ विचारक ऐसा नहीं मानते। उनके अनुसार चेतना, Evolution की यात्रा में महज एक संयोग है, By Product है। 

डार्विनवाद में विश्वास करने वाले Evolutionary Biologists, न केवल मनुष्य की चेतना बल्कि उसकी बुद्धि, सोच विचार, व्यवहार, मानसिकता आदि तमाम गुणों Survival Benefit के रूप में विश्लेषित करने लग गए। विज्ञान की इस शाखा को Evolutionary Psychology कहते हैं। 

Homo Sapiens तक Darwin की थ्योरी लगाना ठीक है। लेकिन Homo Satiens Sapiens तक नहीं। रेमंड टेलिस के अनुसार Humans are not just like a more smart animals. मनुष्य, महज जानवरों के समान नहीं है, ऐसा जानवर जो जरा सा ज्यादा स्मार्ट है। मनुष्य कहीं अलग है। 

शोध की विधियां 

सदियों से मनुष्य कल्पनाएं करता रहा, अनुमान लगाता रहा लेकिन सत्य दूर था। शुरू में तो हृदय को महत्वपूर्ण मानते थे। अरस्तु के अनुसार ब्रेन में पानी से भरे हुए ventricles, खून को ठंडा करने का काम करते थे। 18वीं शताब्दी में रेने देकार्ते ने कहा Pineal gland (पीयूष ग्रंथि) में आत्मा प्रवेश करती है। और बुद्धि को बाहर से ग्रहण करती है। शव परीक्षण एक वैज्ञानिक तरीका था। अनेक मरीजों के जीवन काल में बौद्धिक क्षमताओं और कमियों का विस्तृत क्लीनिकल परीक्षण किया गया था, नोट्स लिखे गए थे, मरणोपरांत मस्तिष्क के डीसेक्शन में जो खराबी मिली, उस आधार पर निष्कर्ष निकाले गए थे। 

फिनीज गेज नाम के एक मजदूर को, लोहे की छड़ दिमाग के अंदर घुस गई थी –  जैसे तैसे बच गया था। उसकी स्मृति, व्यवहार, व्यक्तित्व में आमूल चूल परिवर्तन आए थे। मित्र कहते थे –  “गेज अब गेज नहीं रहा।”

मस्तिष्क के फ्रन्टल खंडों से इन विकृतियों का संबंध जोड़ा गया था। 

मिर्गी या एपिलेप्सी के कुछ खास प्रकार के दौरों में चेतना, बुद्धि, व्यवहार पर लघु अवधि के आसर बार-बार पढ़ते हैं और Consciousness के बारे में हमारी समझ को विकसित करते हैं। 

H.M. नाम के मरीज की कहानी Cognitive Neurology में अहम स्थान रखती है। मिर्गी के कठिन दौरों पर नियंत्रण रखने के लिए उसके दोनों गोलार्धों के मीडिया टेंपोरल खंड काटकर निकाल दिए गए थे। Short Term Memory जाती रही थी, जैसा कि गजनी फिल्म में आमिर खान के साथ हुआ था। 1930-40 में EEG पहली मशीन थी जिसने व्यक्तियों के दिमाग की विद्युत सक्रियता का अध्ययन सिखाया। 

1940-50 के दशक में मांट्रियल, कनाडा में न्यूरो सर्जन विल्डर पेन फील्ड में जागृत मरीजों की खोपड़ी खोलकर ऑपरेशन करते समय मस्तिष्क की सतह के चप्पे चप्पे का नक्शा खींचकर जगह-जगह विद्युतोद/Electrode से बिजली बहाई और मरीज से पूछते गए –  क्या महसूस हो रहा है? 

“बाएं हाथ में झुनझुनी हो रही है

“दाया पांव गर्म लग रहा है

“एक बगीचा दिख रहा है

“मुंह में गाजर का स्वाद आ रहा है

“काफी की गंध आ रही है

“आनंद महसूस हो रहा है

“मेरी चेतना विस्तारित हो रही है”

इन अवलोकनों के आधार पर दिमाग की बाहरी सतह पर मानव शरीर के दो नक्शें गढ़े गये Homonculus – एक सेंसरी, एक मोटर। विकृत सा दिखता है।

1980 के दशक में CT Scan और MRI आने के बाद पोस्टमार्टम तक प्रतीक्षा करना जरूरी नहीं रहा। 

मरीज ‘अ’ अपनी गणितीय क्षमता को बैठा है, MRI में फलां जगह पर घाव है –  साध्य उपन्न [QED] –  गणित का केंद्र यहां है। 

मरीज ‘ब’ गुस्सैल और हिंसा को गया है। MRI में पता चला कि Amygdala नामक भाग में ट्यूमर है। उसकी बेचारे की क्या गलती? वह तो Victim है। 

मरीज ‘स’ को मिर्गी का दौरा आने के कुछ सेकंड पहले एक पूर्वाभास होता था जिसे Aura कहते हैं –  एक अनिर्वचनीय हर्षातिरेक | टेंपोरल खंड के अंदरूनी भाग में मौजूद DNET जाति की गांठ ऑपरेशन द्वारा निकाल दी गई। उसकी मिर्गी ठीक हो गई। लेकिन वह अभी भी Ecstasy के उन पलों को मिस करता है। 

मस्तिष्क की कार्य विधि समझने में Functional Neuroimaging ने क्रांति ला दी है। लोगों को Structural Imaging तो पता है। या “फंक्शनल” किस बला का नाम है?

स्वस्थ या रोगी व्यक्ति को MRI की सकरी सुरंग में लेटा देते हैं। मस्तिष्क की रचना के बिम्ब प्राप्त करने के बाद, उसी हार्डवेयर में एक खास सॉफ्टवेयर शुरू करते हैं। दिमाग के चप्पे-चप्पे में बहने वाले रक्त में ऑक्सीजन का Concentration नापते हैं। कहीं कम कहीं ज्यादा। उसे प्रदर्शित करने के लिए एक कलर कोड सब की सहमति से बनाया गया है। कम ऑक्सीजन, कम रक्तस्राव वाले इलाके नीले रंग के, कुछ अधिक वाले क्षेत्र पीले और फिर लाल रंग के। कैसे मालूम पड़ा? बोल्ड से। (Blood Oxygen Level Dependent Signal) द्वारा। MRI स्कैन का शक्तिशाली चुंबक रक्त में मौजूद oxy-hemoglobin और deoxyhemoglobin के अनुपात में सूक्ष्म अंतरों को Capture कर लेता है। जिन रचनाओं में रक्त प्रवाह अधिक है, रक्त में से अधिक मात्रा में ऑक्सीजन निकलकर Tissue में प्रवेश कर रही है, वह सब बिम्बित हो जाते हैं। 

अब मरीज को मशीन में लेटे लेटे, नाना प्रकार के मानसिक और बौद्धिक काम करने को कहा जाता है – 

  • अपने प्रिय गीत को मन में गुनगुनाओ 
  • ऐसे क्षणों को याद करो जब आप किन्हीं Emotions में डूब गए थे – प्यार, क्रोध, भय, घृणा 
  • गणित के इस सवाल को हल करो 
  • स्थान ‘अ’ से स्थान ‘ब’ तक जाने का नक्शा याद करो 
  • किसी प्रिय डिश का स्वाद याद करो 
  • वर्चुअल गागल में जो टेक्स्ट है उसे पढ़ो 

उपरोक्त गतिविधियां करते समय MRI में BOLD Signals बदलते हैं। 

“लो देखो, देखो  फलां विषय के बारे मे सोचते सोचते, दिमाग के फलां फलां इलाके जगमगा उठे। 

“अच्छा यह पैटर्न है, रंगों की यह डिजाइन है, जरूर इस समय व्यक्ति भक्ति भाव में डूब कर भजन सुन रहा होगा”। 

पत्रिकाओं और अखबारों में प्राय ऐसी हेडलाइंस आती रहती है, और साथ में ब्रेन के रंग-बिरंगे चित्र

एक न्यूरोलॉजिस्ट के रूप में मैं पुलकित और गर्वित होता रहता था। मेरे भाषणों में प्रायः इन खोजों के चित्र दिखाता था। न्यूरो प्रत्यय के साथ अनेक उप विद्याओं के नाम रखे जाने लगे – Neuro-law (न्यूरोकानून), Neuro – Aesthetics (न्यूरो – सौंदर्यशास्त्र),  Neuro-economics (न्यूरो अर्थ-शास्त्र), Neurophilosophy (न्यूरो दर्शन शास्त्र)

मेरी सोच को प्रभावित करने वाले अनेक लेखक रहे हैं |

रेमण्ड टैलिस एक ब्रिटिश न्यूरो साइकिएट्रिस्ट रहे हैं और अब फिलासफर हैं। वे इस दावे का खंडन करते हैं कि मनुष्य चेतना और संबंधित उच्च मानसिक कार्य केवल मस्तिष्क के अंदर विद्यमान रहते हैं। वे मानते हैं कि इन कार्यों के  लिए मस्तिष्क एक अनिवार्य अंग है लेकिन पर्याप्त नहीं हैं। कुछ और भी चाहिए। वह कुछ और क्या हैं? रेमण्ड टैलिस के अनुसार यह न तो आत्मा है, न भगवान् और न ब्रह्मांडीय चेतना (cosmic consciousness)। उनके अनुसार इस बात की कोई संभावना नहीं है कि बस थोड़ी और बेहतर तकनीकों व प्रयोगों  पर आधारित बेहतर रिसर्च द्वारा चेतना की Hard Problem का हल जल्द ही निकलने वाला है। रेमण्ड टैलिस मानते हैं कि अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य एकदम जुदा या भिन्न है। उसे चिंपांजी का स्मार्ट वर्जन नहीं कह सकते। 

चार्ल्स डार्विन द्वारा प्रतिपादित बायोलॉजिकल इवोल्यूशन के सिद्धांत से इनकार नहीं है लेकिन होमोसेपियंस के सांस्कृतिक और बौद्धिक विकास को डार्विन की कसौटियों पर नहीं समझा जा सकता है। हालांकि बहुत से वैज्ञानिक ऐसा करने का प्रयास करते हैं। विज्ञान की इस शाखा को Evolutionary cognitive Neuropsychology कहते हैं। रेमंड टेलिस के अनुसार यह गलत है। इस प्रवृत्ति की वह “डार्विनाइटिस” कहकर घोर आलोचना करते हैं। 

अन्य प्राणियों और मानव के बीच गैप बढ़ने की प्रक्रिया पिछले एक-दो लाख वर्षों में परवान पर चढ़ी। हाथों को मुक्ति मिली चलने से। उनसे काम किया जाने लगा। औजार बने। हाथों की और आंखों की गति का संयोजन विकसित हुआ, तर्जनी उंगली से इशारा करके यहां और वहां का भेद समझवाया गया, भाषा से मिली अभिव्यक्ति और ज्ञान का ट्रांसफर एक से दूसरे को। 

श्रोताओं के साथ कुछ विचार प्रयोग
क्या आपके घर में पालतू पशु है? Pets  हैं?
क्या वे conscious है? [हाँ]
क्या वे भावनाएं रखते हैं? [हाँ]
क्या वे स्मृति रखते हैं?? [हाँ]
क्या वे नया कुछ सीखते हैं? [हाँ]
जो नया सीखा, क्या उसे वह दूसरे प्राणी को सिखा सकते हैं? [?]
क्या उनके पास आत्मकथात्मक स्मृति है ?(Autobiographical Memory) [?]
क्या उन्हें ‘स्व’ का एहसास है?  [?]

अब ऐसा ही विचार प्रयोग शिशुओं के साथ कीजिए
नवजात शिश?
एक वर्ष का शिशु?
3 वर्ष का बच्चा?
एक किशोरवय?
कितना अद्भुत साम्य है। 

बायोलॉजिकल जगत में जिस विकास को लाखों वर्ष लगे वही कहानी एक शिशु के संदर्भ में कुछ ही महीनों और वर्षों में द्रुत गति से दोहराई जाती है। 

अब यही प्रश्न चिम्पाजी विशेषज्ञ से पूछ कर देखिए। कुछ अलग उत्तर मिलेंगे। निष्कर्ष यह कि बायोलॉजिकल जगत में विकास के साथ-साथ चेतना का भी विकास हुआ है।


ONTOGENY REPEATS PHYLOGENY

बायोलॉजी के अनेक सूत्र वाक्य में से एक है यह 

Ontogeny = विक्तिवृत्त / भ्रूण-वृत्त / गर्भ में शिशु का विकास, समय काल – कुछ महीने
Phylogeny = जाति वृत्त – किसी स्पीशीज का उद्भव समय काल = कुछ लाख वर्ष

जाति वृत्त की दीर्घकालिक गाथा, भ्रूण वृत्त में कुछ ही महीनों के समय काल में दोहराई जाती है। 

जंगल बुक का मोगली एक काल्पनिक पात्र है। असली जिन्दगी में ऐसा नही होता। 1960 के दशक में उत्तरप्रदेश के जंगलों से एक लड़का मिला था जो जानवरों के बीच पला था। उसकी खबरे खूब छपी थी “भेड़िया बालक रामू नाम से । वह चार पैरो के बल चलता था। हाथों से खाना नहीं खाता था। उसके पास भाषा बोली नही थे। क्योकिं उसे इंसानी वातावरण नहीं मिला था।

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1998 मैं वरिष्ठ न्यूरो वैज्ञानिक क्रिस्टोफ कॉच ने शर्त लगाई थी, युवा दर्शन शास्त्री डेविड चामर्स से की अगले २५ वर्षो में चेतना की नयूरोजिकल व्याख्या विकसित हो जायेगी। जून 2023 में 25 वर्ष पुरे हुए और न्यूरो वैज्ञानिक ने हार मान ली|

क्या Artificial Intelligence में चेतना हो सकती है? 

पहला सोच तो यही आता है कि चाहे कितनी ही उन्नत क्यों ना हो जावे, एक मशीन में मानव जैसी चेतन कभी नहीं आ सकती। लेकिन इस क्षेत्र में काम करके, कुछ वैज्ञानिक और दर्शन शास्त्री अब यह मानने लगे हैं कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता(A.I.) संभावित रूप से जागरूक हो सकती है यदि वह स्वयं के Algorithms के बारे में जागरूकता बनाए रख सके। यदि मनुष्य अपने परिप्रेक्ष्यों और संदर्भों के बारे में जागरूक हो सकता है तो मशीन क्यों नहीं? यदि A.I का समस्त व्यवहार और कार्यकलाप मनुष्यों जैसा हो जाए, तरह-तरह की जटिल चुनौतियां देकर भी आप एक मनुष्य की तुलना में उसमें कोई कमी या अंतर ना पकड़ पायें तो मान कर चलो की “स्व” की चेतना की उत्पत्ति मशीन में हो चुकी होगी।

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पहली बार नीव पड़ी मस्तिष्कों के समुदाय में “साझी चेतना” की
Shared Consciousness In the Community Minds

इस तरह की क्षमता किसी अन्य स्पीशीज में नहीं थी और ना है क्योंकि उनके हाथ स्वतंत्र नहीं है, उनके पास भाषा नहीं है। 

विज्ञान पर प्राय आरोप लगता है Reductionism का। न्यूनकरण का।
जटिल रचनाओं और कार्यों की व्याख्या करने और समझने के लिए उन्हें छोटे-छोटे हिस्सों में बांटना पड़ता है। 

अणु का सिद्धांत हमारे यहां महर्षि कणाद ने दिया था। Reductionism बुरी बात नहीं है। उसी के लाभों का आनंद हम ले रहे हैं। कोरोना का टीका केवल एक वर्ष में कैसे बना? वायरस की सूक्ष्म रचना डीएनए स्तर पर जानना जरूरी था। क्या यह काम किसी समग्र या हॉलिस्टिक अप्रोच से हो सकता था? कतई नहीं। दोनों दृष्टियों का अपना महत्व है। 

न्यूटन ने इन्द्रधनुष की भोतिकी समझाई थी कि कोई आकाश में टंगी हुई पानी की बूंदों में से गुजरने वाली सूर्य की किरणें सात रंगों में छितर जाती है । तत्कालीन महा कवि जान कीट्स ने न्यूटन की हंसी उड़ाई और धिक्करा “इन्द्रधनुष कितना सुन्दर, कितना मोहक, उसे निहारों, चित्र बनाओं, कविता लिखों।” तुमने उसे Reduce करके मजा किरकिरा कर दिया । मेरे अनुसार दोनों जरुरी हैं। कला भी और विज्ञान भी । दोनों एक दुसरे के पूरक हैं।

अंग्रेजी में दो जुड़वा कहावतें हैं – 
“Missing Tree for forest”
“Missing forest for tree”
““जंगल को समग्र रूप में निहारो तो वृक्ष की इकाई को नहीं पा सकते।”
“एक वृक्ष को विस्तार से जानने की कोशिश करो तो पूरे जंगल पर से आपका फोकस हट है जाता है। 

न्यूरोवैज्ञानिक, चेतना को समझने, समझाने, के लिए न्यूरो कोशिकाएं, उनकी विद्युतीय सक्रियता, अनेक रसायन, न्यूरोट्रांसमीटर आदि की बात करते हैं। 

आध्यात्मिकता वाले इस विधि को हिकारत की नजर से देखते हैं। वे बाह्य जगत, सूक्ष्म जगत, वृहद जगत, सबको तुच्छ मानते हैं। उनके अनुसार प्रत्येक इंसान अनेक दिनों के अभ्यास द्वारा स्वयं के मन की अंदरूनी यात्रा पर जा सकता है, स्वयं को खोजता है, सत्य और ईश्वर के दर्शन करता है, उसे परम आनंद की अनुभूति होती है, जब वह पाता है कि उसके अंदर की चेतना और ब्रह्मांड की चेतना एकाकार है। 

मेरी ओर से उन्हें मुबारकबाद। वह मेरे लिए दुःख मनाते हैं। अपूर्व तुम इस मार्ग पर क्यों नहीं चलते। मैंने कोशिश करी। मजा नहीं आया। कुछ खास सफलता नहीं मिली। केवल प्राथमिक अवस्था तक पहुंच पाया। जब आंखें बंद करके, लेट कर, सारा ध्यान अपने शरीर के अंगों पर, आती जाती श्वास पर, स्पर्श अनुभूतियों पर, आसपास की ध्वनियों पर केंद्रित करता हूं। Here and Now में रहने की कोशिश करता हूं। “यहां और अभी में।” सच में अच्छा लगता है। मन को शांति मिलती है। स्वयं की चेतना से लघु साक्षात्कार होता है। पहुंचे हुए “ज्ञानी-ध्यानी” मुझसे बहुत आगे की, बहुत उच्च स्तर की अनुभूतियों को प्राप्त करते होंगे। उन्हें बधाई। मैं अपने रूढ़ स्तर पर प्रसन्न हूँ। विज्ञान की Reductionist approach के द्वारा जब जीवन के हजारों रहस्यों पर से एक-एक करके उत्तर मिलता है, मेरे लिए वही खुशी पर्याप्त है। 

हो सकता है कि Consciousness की Hard Problem – (खुदी का एहसास – A sense of self- स्व की अनुभूति) या कोई सा भी अहसास (रंग, गंध, दृश्य, स्वाद, स्पर्श, स्मृति) की अंतिम व्याख्या, विज्ञान ना कर पाएं। मैं उसे हार नहीं मानूंगा। प्रयत्न जारी रहेगा। चूँकि हल नहीं मिल रहा, इसलिए किसी अपुष्ट मिथ्या विज्ञान को मान लें, यह मुझे मंजूर नहीं। मैं इस कथन से सहमत नहीं हूं कि जहां विज्ञान की सीमा समाप्त होती है वहां धर्म और आध्यात्म का क्षेत्र शुरू होता है। विज्ञान की सीमाएं विस्तारित होती रही हैं और होती रहेंगी। अज्ञान रूपी रिलिजन का दायरा कम होता रहा है, कम होता रहेगा।

ज्ञान ही चेतना है। अज्ञान बेहोशी है। 

महर्षि अरविंद के अनुसार चेतना का उत्तरोत्तर विकास होता जा रहा है। उनके अनुसार इंसान का मन एक बहुत ही अधूरे प्रकार की ‘चेतना’ है और प्रकृति की यात्रा का अंतिम बिंदु नहीं हो सकती। 

श्री अरविंद वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते थे। वे मानते थे कि ‘जीवन’ पदार्थ से विकसित हुआ है और ‘मन’ जीवन से विकसित हुआ है। उनके अनुसार “चेतना” के और भी उच्चतर रूप विकसित होने बाकी है। 

महर्षि अरविंद वेदांत के साधक हैं और मानते हैं कि “चेतना” समस्त जगत में व्याप्त है जिसके उन्नत स्वरूप धीरे-धीरे विकसित हो रहे हैं। 

अजीवित पदार्थ में चेतना पूरी तरह से अदृश्य रहती है और पदार्थ के भौतिक स्वरूप और नियमों के रूप में अभिव्यक्त होती है। पौधों और फिर पशुओं में यह चेतना थोड़ी-थोड़ी मुक्त होने लगती है। आदान-प्रदान, क्रिया प्रतिक्रिया, भावनाएं – Emotions,  सुखी होना, दुखी होना, पीड़ित होना आदि लक्षण प्रकट होने लगते हैं। 

मनुष्य के मस्तिष्क में चेतना की उन्नति के नए द्वार खुलते हैं। हम विचारों के साथ खेलते हैं। वर्तमान से ऊपर उठकर भूत और भविष्य के बारे में सोचने और करने की क्षमता रखते हैं। इंसान का मन अपनी तमाम बौद्धिक क्षमताओं के बावजूद एक कट्टर विभाजक भी है – जो मेरा तेरा, विषय और वस्तुओं के बीच अंतर करता है। 

श्री अरविंद कहते हैं “हमारी चेतना इंद्रियों के वशीभूत और अहंकार युक्त है। आध्यात्मिक साधना द्वारा हमारे “प्रबुद्ध मन” में विचारों के स्थान पर “सत्य” के दर्शन होते हैं। “सहज मन” में सत्य “अपरिहार्य” परिपूर्ण और दिव्य चेतना से युक्त है। अंत में ब्रह्मांडीय मानस (Cosmic Consciousness) देवताओं का मन है जो सर्वव्यापी है। ब्रह्मांड को कायम रखने वाली चेतना से हमें एकाकार होता है।

श्री अरविंद के दर्शन से मेरा परिचय नवीं-दसवीं कक्षा में (1967-68) हुआ था। मेरे हिंदी के शिक्षक श्री स्वयं प्रकाश जी उपाध्याय पांडिचेरी आश्रम के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। उस समय मेरे किशोर मन को अधिक कुछ समझ नहीं आया था। 

अब पीछे मुड़कर देखता हूं तो बातें सही प्रतीत होती है। बहुत कुछ पढ़ने के साथ धीरे-धीरे समझ विकसित होती है। 

मेरे प्रिय लेखक स्टीवेन पिंकर की पुस्तक Our Angels of Better Nature की थीम यही है कि कैसे पिछले 10,000 वर्षों में मानव जाति की चेतना में उन्नयन द्वारा हमारे नैतिक और आदर्श मूल्य में निरंतर सुधार हुआ है। 

लेकिन मेरे अंदर का जिद्दी Reductionist न्यूरोलॉजिस्ट फिर भी अपनी राह नहीं छोड़ना चाहेगा। वह प्रयोग करना चाहेगा। आइए कुछ उच्च कोटि के साधकों को MRI मशीन में लेटाते हैं। और तुलना करते हैं कि “ध्यान” की विभिन्न अवस्थाओं के क्षणों में उनके मस्तिष्क का कार्यकलाप कैसा चल रहा है? 

क्या मिलेगा?

कुछ रंग-बिरंगे चित्र। 

उससे क्या फायदा? 

फायदा तत्काल नहीं मिलता। माइकल फैराडे की डायनेमो मशीन देखकर रानी विक्टोरिया ने पूछा था – “इससे क्या फायदा”। फैराडे ने रानी की गोद में नन्हे शिशु की और इशारा करके पूछा था –  “इससे क्या फायदा”। 

नोबेल पुरस्कार विजेता इरिक कांडेला ने पानी में रहने वाले घोंघे को आने वाले महज दो कामों का अध्ययन करने में अनेक वर्ष लगा दिए –  सुई चुभोओ तो कैसे अपनी खोल में घुस जाता है। या काली स्याही छोड़कर स्वयं को घुंघ में छुपा लेता है। 

परिणाम क्या मिला – “स्मृति का न्यूरो विज्ञान”।

मुझे विश्वास है की चेतना का न्यूरो विज्ञान समझने के लिए हमारे प्रयास ऐसे ही छोटे-छोटे कदमों के रूप में होंगे। कदम जो भटकेंगे, जो ठहरेंगे, जो लुड़केंगे। उसका गम नहीं। संतोष है कि हमने हमारा कर्म किया। फल की चिंता नहीं करी। 

मेरे मित्र कहते हैं क्यों इतनी मेहनत व्यर्थ करते हो। बाह्य जगत की यात्रा छोड़ो, आध्यात्म की आंतरिक यात्रा पर चलो। 

मैं कहता हूं धन्यवाद, आपको आपकी यात्रा मुबारक जो कम से कम 2000 वर्षों से आप जैसे लोग कर रहे हैं। उससे समाज को क्या मिला। व्यक्तिगत आनंद और संतोष मिला होगा लेकिन समग्र मानव जाति को क्या मिला? 

बाह्य जगत की खटपट में लगे हुए विज्ञान ने हमें वह सब दिया जिसे हम उपयोग कर रहे हैं। अब यह मत कहना कि तथाकथित विकास, महज विनाश का रूप है या यह मत कहना कि विकास एक माया है – Illusion हैं। यदि सच में ऐसा मानते तो कृपया हिमालय की गुफाओं में या अमेजन के जंगल में चले जाइए, यहां जाल सभागृह में बैठकर बौद्धिक चर्चा में भाग न लीजिए। 

न्यूरोज्ञान व्याख्यान माला के आगामी संभावित विषय

1. विज्ञान के समर्थन में 

2. मिथ्या विज्ञान की पहचान कैसे करें?

3. विज्ञान की विधियाँ

4. पुस्तक समीक्षा Rationality तर्कपरकता – स्टीवेनपिकर

5. पुस्तक समीक्षा : Selfish Gene रिचर्ड डाकिंन्स

6. पुस्तक समीक्षा : Innovation – मेट रिडली

7. रिलिजन : समाज को लाभ अधिक या नुकसान?

8. एक को घांस या सबको? विशेषज्ञता का नफा – नुकसान

9. राष्ट्रवाद : लाभकारी अधिक या हानिप्रद 

10. स्वतंत्रता और समानता : कौने अधिक जरुरी?

11. ईश्वर है या नही?

12. मानव जाति का भविष्य : उज्जवल या अंधकारमय?

13. पुस्तक समीक्षा : Factfulness तथ्यपरकता

14. भाषा का नयूरोविज्ञान

15. पढ़ने लिखने और लिपि का नयूरोविज्ञान

16. स्मृति का नयूरोविज्ञान

17. शाकाहार – मांसाहार कौन कितना अच्छा, कितना बुरा?

18. स्त्री – पुरुष भेद : नगण्य या अधिक : Binary or Graded?

19. मनुष्य का कृत्रिम जिनेटिक उन्नयन : स्वागत या तौबा तौबा?

20. प्रकृति या परवरिश : कोरी पट्टी या लिखी हुई?

21. अपराध – का न्यूरोविज्ञान

22. नशों का नयूरोविज्ञान

23. विज्ञान और कलाएं – द्वन्द या साझा ?

24. मानव और पशु – निरंतरता या गहरी खाई?

25. जीवन की सांध्य बेला और गरिमा मय मृत्यु

26. सपनों का नयूरोविज्ञान

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