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अरे कोई सुनो, मै बेहोश नही हूँ !


पंद्रह दिन के अवकाश के बाद मैं वार्ड में राउण्ड लेने पहुँचा। जूनियर डॉक्टर्स (रेसीडेण्ट्स) एक के बाद मरीजों के बारे में बता रहे थे।

“सर, 26 वर्षीय कपिल, मस्तिष्क ज्वर (एनसेफेलाईटिस) के कारण 40 दिन पहले भर्ती हुआ था। अभी भी होश में नहीं आया है।
मैंने पूछा कि “अचेतन अवस्था की गहराई या तीव्रता नापने की ग्लास्गो पद्धति के अनुसार कपिल का स्कोर कितना है?”

“सर 5/15“ पन्द्रह मे से पाँच।

“कैसा नापा?

“सर हाथ पांव में कोई गति नहीं | चाहे बोलो या सुई चुभाओ | अतः छ: में से एक । कोई आवाज नहीं निकलती, अतः पांच में से एक | केवल आँखें कभी-कभी खोल लेता है। इसलिये चार में से तीन- कुल 15 में से पांच।

कपिल की माँ दिन रात वार्ड में बेटे के साथ बनी रहती है। मैं उनसे हिस्ट्री पूछने लगा। बात करते-करते वे रो पड़ी। फिर कहने लगी- “डॉक्टर साहब मुझे लगता है कि मेरा बेटा अन्दर ही अन्दर होश में है, वह सब सुनता है, समझता है पर बता नहीं पाता, न बोल पाता”।

मैंने सोचा यह एक टिपिकल माँ है जो विशफुल थिंकिंग करती है, उनका ममत्व उनसे कल्पना करवाना है। झूठे दिलासे के झांसे में खुद को डुबो लेती है। फिर भी एक माँ की भावना का सम्मान करते हुए मैंने कहा- “माँ जी, अभी तो कहना मुश्किल है। हम अच्छे से अच्छा इलाज करने की कोशिश कर रहे हैं।”

अगले दिन राउण्ड पर कपिल की माँ ने मुझे फिर रोक कर कहा- डॉक्टर साहब॑ आज कपिल रो रहा था। मैंने सोचा अनेक बेहोश मरीजों में कभी-कभी आँखों का पानी अपने आप बाहर आ जाता है। फिर रुक कर मैंने स्वयं कपिल का शारीरिक परीक्षण दोहराया। मैंने उसके कान के पास अपना मुँह रख कर स्पष्ट, तेज, धीमी गति से बोलना शुरु किया- “कपिल मैं तुम्हारा डॉक्टर हूँ | तुम्हारा इलाज कर रहा हूँ। तुम ठीक हो रहे हो। क्या तुंम मेरी आवाज सुन रहे हो? यदि सुन रहे हो तो एक बार आँख खोल कर बन्द कर दो।”

2-3 सेकण्ड बाद आँखे खुली और बन्द हुई। यूं तो कपिल कुछ-कुछ मिनिटों में अपने आप भी आँख झपक लेता है। केवल संयोग तो नहीं? मैंने वही प्रक्रिया दोहराई। फिर वही उत्तर मिला। अब मैंने पूछा- ‘कपिल क्या तुम रामनगर में रहते हो? यदि हाँ तो पलकें एक बार झपकाना और नहीं तो दो बार झपकाना |

कपिल की आँखें खुली, बन्द हुई, फिर खुली, फिर बन्द हो गई और बन्द रही। एक के बाद एक, ऐसे पाँच प्रश्न पूछे गये और हर बार सही उत्तर मिले। मेरे रेसीडेन्ट्स के चेहरों पर विस्मय और खुशी की मुस्कान थी। कपिल की माँ की आँखों से आँसू बह रहे थे। वह बोली- “डॉक्टर साहब मैं कहती थी न कि कपिल बेहोश नहीं है।” मैंने स्वीकार किया कि हम लोगों से इतने दिनों से चूक हो रही थी। कपिल सच में ही पूरी तरह से चेतन है। फिर मैंने जूनियर डॉक्टर्स और नर्सिंग स्टॉफ की ओर मुखातिब होते हुए कहा- इस अवस्था को ‘लॉक्ड-इन-सरिन्ड्रोम- कहते हैं। लॉक्ड अर्थात्‌ ताला बन्द । इन्सान को अन्दर से पूरा होश है पर बाहर निकलने के रास्ते पर ताला लगा है। पूरे शरीर में लकवा है। चारों हाथ-पांव, धड़, गर्दन, चेहरा, गला, जीभ, जबड़ा- सारी माँपेशियाँ पेरेलाईज्ड है। मन तो चीख-चीख कर चिल्लाना चाहता है- “मेरी सुनो, मैं हूँ, जिन्दा हूँ, होश में हूँ, सब सुनता रहता हूँ, देखता भी हूँ, डरता रहता हूँ, रोता रहता हूँ, छोटी-छोटी चीजें माँगता रहता हूँ- मुझे पीठ में खुजला दो, मेरी नाक पर मक्खी बैठी है उसे उड़ा दो, रात में मच्छर काट रहे हैं, शाम वाली नर्स ने जब इन्जेक्शन लगाया था तो दर्द ज्यादा हुआ था, पर कहूँ, कैसे, इशारा भी नहीं कर पाता, मेरे शरीर पर ध्यान रखा तो जा रहा है पर मेरे मन का क्या?


मैंने अपनी बातें जारी रखी- लॉक्ड-इन-सिन्ड्रोम के कारण अनेक हो सकते हैं। मस्तिष्क के निचले भाग में ब्रेन-स्टेम होता है, यदि दिमाग की कल्पना गोभी के फूल से करें तो ब्रेन स्टेम उसका डण्ठल है, जिसके अन्दर वे तमाम स्नायु या तन्‍्तु गुजरते हैं जो पूरे शरीर, गला, सिर व चेहरे की गतियों को नियंत्रित करते हैं और उन तमाम जगहों से आने वाली संवेदनाओं (सेंसरी परसेप्शन) को दिमाग के दोनों गोलार्धों में प्राप्ति और विश्लेषण के लिये लाते हैं।

अब अजीब बात यह है कि ब्रेन स्टेम में से होकर ऊपर नीचे गुजरने वाले दो हाइवे में से एक बन्द हो जाता है- आवक मार्ग चालू है, शरीर के साथ जो कुछ हो रहा है, पल-पल की खबर रहती है, लेकिन जावक मार्ग बन्द है, तमाम इच्छा के बाद, पूरा जोर लगाने के बाद, चीदूटी ऊंगली भी नहीं हिल सकती। बस एक छूट रह जाती है। आँखों की कुछ सीमित गतियाँ– पलके खोलना, बन्द करना, आँखें ऊपर ले जाना, नीचे लाना। अनेक मरीज इसी के सहारे अपने आप को अभिव्यक्त करते हैं।
ब्रेन स्टेम में रोग अनेक कारणों से आ सकता है- इन्फेक्शन (एनसेफेलाईटिस) स्ट्रोक (रक्‍्ताघात), दुर्घटना में चोंट, रक्‍तप्रवाह व ऑक्सीजन की कमी (हायपॉक्सिया), ट्यूमर-गांठ वउसका ऑपरेशन।
एक सीनियर  रेसीडेन्ट ने मुझे याद दिलाया- सर, पिछले साल आपने एल-जी.बी. सिन्ड्रोम के केस में लॉक्ड-इन-सिण्ड्रोम की डायग्नोसिस बनाई थी।

मैंने कहा – – सही है। ब्रेन स्टेम के अलावा बाहरी तंत्रिका तंत्र (पेरीफेरल नर्वस सिस्टम) के रोगों में भी सम्भव है कि मोटर-मार्ग (प्ररेक तंत्रिकाएँ) काम करना बन्द करके व्यक्ति को पूरा शिथिल, या शक्ति शून्य बना दें।
कपिल की माँ ने पूछा- मेरा बेटा कब ठीक होगा ?
इस सवाल का उत्तर कठिन था।
हमें मजबूरी में अर्धसत्य का सहारा लेना पड़ता है। पूरी बात बताएं तो भी गलत। न बताएं तो भी गलत।

मैंने कहा- ‘अभी बताना मुश्किल है। फिर भी उम्मीद है कि सुधार होगा। अंगों की गतियाँ लौटेगी । आपका बेटा जवान है, सदैव स्वस्थ रहा है, इसलिये अच्छे होने की उम्मीद ज्यादा है। लगभग आधे मरीजों में लाभ नहीं होता, कोई न कोई कॉम्पलीकेशन के कारण जान चली जाती है, कुछ मरीज तो लगभग पूरी तरह ठीक हो जाते हैं (जैसे कि पिछले वर्ष एल.जी.वी. सिण्ड्रोम वाला मरीज तीन माह में काम पर लौट गया था) दवाइयों की भूमिका सीमित है। लाक्षणिक (सिम्पटोमेटिक) और सपोर्टिव (सहारात्मक) इलाज होगा। मुख्य रिकवरी स्वतः, कुदरत से होती है। फिजियोथेरापी, स्पीचथेरापी, ऑक्युपेशन थेरापी की मुख्य भूमिका रहती है।
रोग की गति व नियति का पूर्वानुमान (प्रोग्गोसिस) बताना एक रिस्की बिजनेस है। प्रायः सुनने को मिलता है –  ‘डॉक्टर साहब, आप तो कह रहे थे कि ठीक हो रहा है, घर जाकर पांचवे दिन ही गुजर गये।’

‘सर वहां के डाक्टरों ने तो जवाब दे दिया था कि कुछ ही दिन के मेहमान हैं, पर आज देखो तीन साल गुजर गये हट्टे कटटे हैं।’
मोटर न्यूरॉन रोग के एक मरीज संदीप खण्डेलवाल के केस में मैं गलत सिद्ध हुआ हूं, हालांकि मुझे इस बात की खुशी है। संदीप पिछले दस वर्ष से लाक्ड इन सिण्डोम की अवस्था में जीवित हैं तथा काम धन्धा चला रहे हैं। 45 वर्ष पूर्व मैंने उनके रोग का निदान करके, पूर्वानुमान बताया था कि इस बीमारी में दो से पांच साल की अवधि में मनुष्य लगभग पूरी तरह अपाहिज होकर बिस्तर पर पड़ जाता है, और आयु सीमित रह जाती है। खण्डेलवाल जी एक कुशल और लोकप्रिय चार्टर्ड अकाउण्टेन्ट हैं। उनकी पत्नी ऊषा बी. ए. पास गृहणी है | 42 की उम्र में परिवार पर पहाड़ दूट पड़ा था। सचमुच पाँच साल में सीए महोदय, व्हील चेयर से  स्ट्रेचर और पलंग पर आ गये। ऑफिस जाना नहीं छोड़ा था। सुदृढ़ आत्मविश्वास के धनी थे। हाथों से लिखना व टाइप करना छूटना। आवाज फुसफुसी होकर बंद हो गई| पेट में भोजन नली (पेग-पी.ई जी.) लग गई। अन्ततः श्वांस लेने वाली मांसपेशियां जवाब देने लगी। श्वांस नली में छेद करने का ऑपरेशन (ट्रेकियास्टॉमी) किया गया। घर पर हास्पीटल का स्पेशल बेड, ऑक्सीजन सिलिण्डर और सक्‍्शन मशीन की व्यवस्था करी गई। फिर भी रक्‍त का ऑक्सीजन प्रतिशत घटने लगा, खासकर रात्रि के समय।

मोटर न्यूरॉन रोग या ए.एल.एस. में पूरे शरीर की मांसपेशियों को पृथक पृथक रूप से संचालित करने वाली प्रेरक न्यूरॉन कोशिकाएं (स्पाइनल कार्ड में ऊपर से निचे दोनों तरफ की एण्टीरियर हार्न कोशिकाएं और ब्रेन स्टेम में क्रेनियल नाड़ियों को उद्गम प्रदान करने वाले मोटर न्यूरॉन), न जाने क्यो, अपने आप गलने लगते हैं, नष्ट होने लगते हैं, क्षय होने लगते हैं। लाइलाज बीमारी है जिसे आगे बढ़ने से रोका भी नहीं जा सकता। खण्डेलवाल जी को घर पर वेण्टीलेटर लगा कर रखना पड़ता है। पूरे शरीर में कहीं एक वाल भी नहीं हिलता। केवल आँखें चलती है। ऊपर-नीचे, दायें, बायें। पलके झपकती है। बन्द चालू, बन्द चालू। साल में एक दो बार मैं मिलने जाता हूँ। उनके चेहरे की गर्माहट, स्वागत, खुशी- बखूबी उनकी आँखों में चमकती है। कौन कहता है कि चेहरे पर भावों की अभिव्यक्ति के लिये फेशियल मसलल्‍्स का चलायमान होना जरुरी है।

उनका अकाउंटेंसी कन्सल्टेन्ट का काम बखूबी चालू है। ऊषा जी ने खूब पढ़ा, समझा, अभ्यास करा, पतिदेव से फाईलें और केस के बाद केस समझते गई। इन दस वर्षों में बेटे ने अपना करियर तय कर लिया। सी.ए. की परीक्षा उच्च प्रतिशत में पास करी, मेट्रिमोनियल में चार्टड अकाउण्टेन्ट पत्नी की दरकार रखी जो पूरी हुई। आज पूरा परिवार अपने गृहस्वामी के निर्देशन में कार्यरत्‌ है। खण्डेलवाल जी की मन-वुद्धि-स्मृति-निर्णय क्षमता सब अक्षुण्ण है। मोटी-मोटी फाइलों को पढ़ने और आत्मसात करने की क्षमता वैसी ही है। उनका असिस्‍्टेन्ट आँखों की ओर देखता रहता है और इशारा पाते ही पन्ना उलट देता है। कई बार तो पीछे रह जाता है। और फिर शुरु होता डिक्टेशन। संदीप जी सामने एक स्टेण्ड पर अंग्रेजी वर्णमाला का एक बोर्ड टंगा रहता है। उनकी आँखें बोर्ड के अक्षरों पर ऊपर नीचे दायें-वायें चलती है, ऊषा जी उसे दोहराती है, टी.ए.एक्‍्स, टेक्स? हाँ या ना इशारा पढ़ती है, आगे? टी.ओ. फिर एक क्षणिक ठहराव, मतलब शब्द पूरा हुआ। ‘दू’? “हॉ” आगे- पी.ए.वाय. ‘पेक्स? “नहीं” पे “हाँ”, वाक्यांश बना ‘टेक्स दू पे”। अब नजरें चलती है अंकों पर। “130,00” इतना टेक्स भरना है। न केवल प्रोफेशन बल्कि रोजमर्रा की जरुरतों, मन की भावनाओं (प्यार, इजहार, इन्कार, तकरार, खुशी, दुःख, गुस्सा) और पत्र लेखन तक के कामों का अंजाम दिया जाता है।

मै संदीप खंडेलवाल जी का उदाहरण जगह-जगह देता हूँ। प्रायः नाम व परिचय बदल कर। मनुष्य निजता का  सम्मान रखना हम डॉक्टरों पर बड़ी जिम्मेदारी होती है। हालांकि पूरे परिवार ने मुझे सहर्ष अनुमति दे रखी है कि में उनकी विस्तृत कहानी को मय पहचान के जग-जाहिर कर दूँ।
मैं कहता हूँ आप अपने नगर के स्टीफेन हाकिन्स है। नियति की कृपा आप जैसे लोगों पर ज्यादा रहती है। शायद आपके माध्यम से समाज को भला पहुँचाना चाहते है। स्टीफेन हॉकिन्स का शरीर कैद में था पर मन का विचरण पूरे ब्रम्हाण्ड की भौतिकी को बूझने के लिये होता था। आप भी अपने स्तर पर महान काम कर रहे हैं।

मेरे आग्रह पर खण्डेलवाल परिवार ने एक महंगा इलैक्ट्रानिक स्क्रीन खरीदा- मूल्य 45 लाख रुपये- बैंक से लोन लेकर। अब उनकी पत्नी को सामने नहीं खड़े रहना पड़ता। लेटे-लेटे या बैठे-बैठे, वे डिजिटल पर्दे पर अंग्रेजी अल्फाबेट या हिन्दी वर्णणाला और बारहखड़ी को देखते रहते हैं, इलैक्ट्रानिक केमरे की बाज जैसी नजर, उनकी पुतलियों की लघ्यु-लद्यु गतियों को फूर्ति से भांपती है और संभावित शब्दों के विकल्प सामने रख देती है, जिनमें से एक उचित शब्द का चयन शब्दश: “पलक झपकते” ही हो जाता है। यह साधन उनके कम्यूटस से ब्लूटूथ से जुड़ा है। बड़े-बड़े पत्रों के ड्राफ्ट, ई-मेल, गूगल खोज, सब काम कुशलता से होने के कारण व्यावसायिक आय इतनी बढ़ गई है कि बैंक लोन को समय से पहले पटा देने की योजना है। मनुष्य की जिजीविषा क्‍या कुछ नहीं कर सकती। परन्तु जिजीविषा अकेली काफी नहीं है। एक और मानवीय प्रतिभा जरुरी है– नवोन्मेष तथा नवाचार, विज्ञान और टेक्नालॉजी में सतत्‌ प्रगति।

उन्हीं दिनों, शायद वर्ष 4997 रहा होगा एक पतला सा उपन्यास छपा और बाद में उस पर आधारित फिल्म देखी (2007)। एक फ्रेन्च पत्रकार जीन डामिनीक बॉबी, 43 वर्ष, गम्भीर ब्रेन अटैक के बाद लॉक्ड-इन-सिण्ड्रोम (ताला-बन्द अवस्था) में चले गये। केवल बायीं आँख व उसकी पलक हिला पाते थे। दो वर्ष में उनकी मृत्यु हो गई। परन्तु इस अवधि में अपनी स्पीच थेरापिस्ट की मदद से उन्होंने अपनी कहानी लिखवा डाली |
फ्रांसीसी वर्णमाला, अंग्रेजी जैसी है- ए से जेड तक छब्बीस अक्षर।| अब उनका क्रम अलग तरह से जमाया गया। फ्रेंच भाषा में कौन सा अक्षर सबसे ज्यादा उपयोग में आता है? शायद ई’ (E) उसके बाद दूसरा, तीसरा…… से लेकर सबसे कम प्रयुक्त होने वाला शायद जेड (z) स्पीच थेरापी सहायक इस नये क्रम से अक्षर बोलना शुरु करती। जो अक्षर चुनना होता उस पर पलक  झपकाई जाती। उसे लिख लिया जाता। फिर दूसरा, फिर तीसरा। शब्द पूरा होने पर कुछ चिन्ह (कोड) अलग था। अनेक घण्टे प्रतिदिन, अनेक महीनों की थका देने वाली, बोरियत भरी मशक्कत के बाद रचना पूरी हुई।

नाम रखा गया “द डाइविंग बेल एण्ड द बटरफ्लाय”।
गोताखोर लोग जब गहरे पानी पैठ करते हैं तो मोती पाने के लिये सागर तल तक उतरना पड़ता है। पानी आपके शरीर को ऊपर फेंकता है। नीचे जाने के लिये पीठ पर एक भारी वजन बाँधते हैं जिसे डाइविंग बेल (गोताखोरी का घण्टा) कहते हैं। जीन डामिनिक को ताला-बन्द अवस्था में ऐसा ही लगता था कि उनके शरीर पर भारी भरकम वजन रख दिया गया है, उनका दम घुट रहा है, वह छटपटा रहा है, उसका हल्का सा मन एक तितली के समान छूट कर उड़ जाना चाहता है।

मेरे सुधी पाठकों में से कुछ से उम्मीद करूँगा कि वे छोटे से उपन्यास को अंग्रेजी में पढ़ें और फिल्म देखें।
उस दिन वार्ड राउण्ड से बाहर आकर अपने कक्ष में मैंने डॉक्टर्स और नर्सेस को अन्दर बुलाया और कहा- हम सच में नहीं जानते कि कपिल कितने दिनों मे कितना ठीक होगा, ठीक होगा या नहीं, कितने दिन जियेगा। ये बातें मैं कपिल और उसे परिजनों के सामने नहीं कर सकता। अर्धसत्य (अश्वत्थामा हतः नरो वा कुंजरो वा) (अश्वत्थामा मारा गया- हाथी या आदमी?) का सहारा लेना पड़ता है। सत्य को टुकड़े-टुकड़े में, सीरियल के माफिक अनेक पायदानों में बताना पड़ता है- कितना बताना, कैसे बताना, कब बताना, किसे बताना, यह एक कला ज्यादा है और विज्ञान कम। जो आते आते ही आती है।
एक और बात ध्यान रखना।

पिल के पास रहो तो सदैव इस बात का ध्यान रखना कि वह पूरी तरह होश में है और सयाना है। उसे बेहोश मानकर ऐसी-वैसी बातें न करना, उसके शरीर की देखभाल करते समय अहसास रहे कि उसे पीड़ा हाती है, बहुत आहिस्ता से ओर सावधानी से नर्सिंग करना।

मेट्रन नर्स तब अपनी नर्सिंग छात्राओं को बोली (जो मेरे रेसीडेन्ट्स पर भी उतनी सच्चाई से लागू होता है) कपिल चूँकि बेहोश नहीं है, इसलिये ये सारी सावधानियाँ रखो, इसका मतलब यह नहीं कि जो बेहोश हैं उनके सामने हम चाहे जो बोले, चाहे जैसे शरीर को सम्हाले। हमारे लिये तो सब मरीज समान है- क्या बेहाश, क्या होश वाले और क्या लॉक्ड-इन।

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