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नकलची हाथ


मोहम्मद सादिक का स्कूटर चलाते समय एक्सीडेन्ट हो गया था। सिर के बल गिरा था। मामूली चोंट आई थी। तब से हल्का सिरदर्द और चक्कर बने रहते थे। लगभग एक हफ्ते पहले की बात थी।

दुर्घटना के मरीजों की हिस्ट्री लेते समय महत्वपूर्ण होता है यह पूछना और जानना कि कैसे हुआ? क्यों हुआ? क्‍या परिस्थितियाँ थीं? वकील डॉक्टर, जासूस और कहानी लेखक के काम में अनेक समानताएँ होती हैं। कोई टक्कर नहीं हुई। स्पीड कम थी। सड़क पर गढडा या टिबड्डा नहीं था। कोई कुत्ता सामने नहीं आ गया था। नशा नहीं किया था।
सादिक ने कहा मैंने बायें हाथ से क्लच जोर से दबाया तो अपने आप दायें हाथ से ब्रेक भी कस कर दब गया। गाड़ी धड़ाम से रुकी, मैंने संतुलन खोया और गिर पड़ा। मेरे कान अगर खरगोश के होते तो सचमुच तन खड़े हो गए होते। एक हाथ से क्लच दबाया तो दूसरे से ऑटोमेटिक ब्रेक लग गया?  मिरर मूवमेन्ट। नकलची हरकत!

न्यूरोलोजी की किताबों और शोधपत्रों में मैंने मिरर मूवमेन्ट (दर्पण गति) के बारे में पढ़ा था परन्तु ऐसी कहानी मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी। सादिक ने बताया कि बचपन से उसने देखा है कि जब भी वह एक हाथ से कोई काम करता है तो दूसरे हाथ में वैसी ही हरकत होती है। सीधे हाथ की नकल उल्टा हाथ करेगा। बायें हाथ की गति का दर्पण-बिम्ब दायें हाथ द्वारा बनेगा।

मैंने पूछा “तुम्हें इससे कोई दिक्कत नहीं होती”?
सादिक ने कहा “कोई खास नहीं। कामकाज तो सब हो जाते हैं।’
“स्कूटर चलाते समय ऐसा पहले कभी हुआ?”
“अभी नया नया चलाना सीखा है। पहले ऐसा कभी नहीं हुआ।“
“तुम्हारे अलावा किसी और को पता है?”
“हाँ, मेरे घर वालों को और दोस्तों को मालूम है। वे हँसते हैं, मजे से देखते है।”
“किसी डॉक्टर को नहीं दिखाया?
“कभी जरुरत ही नहीं समझी।”

जाने क्‍या तूने कही, जाने क्या मैंने सुनी

यह संवाद मेरे साथ रेसीडेन्ट्स भी ओ.पी.डी. में सुन रहे थे। मैंने सादिक को दोनों हाथ सामने सीधे लम्बे रखने को कहा। फिर एक हाथ की मुट्ठी खोलने-बन्द करने को कहा। दूसरे हाथ में भी वैसी हरकत स्वतः, उसी चाल से होने लगी, जो कि उसकी तीव्रता कम थी।
विपरीत दिशा में भी वैसा ही हुआ। एक कागज कलम देकर सादिक को कुछ लिखने को कहा गया। दूसरे हाथ की अँगुलियों में भी हूबहू वही गतियां होने लगी जो लिखते समय होती है।

छात्रों के सामने एक टीचर क्‍या माँगे?

कोई अनूठा ज्ञानवर्धक प्रसंग- जो मुझे अनायास मिल गया। चालीस वर्ष की न्यूरोलॉजी प्रेक्टिस में मैने यह पहली बार डायग्नोसिस किया था।

ऐसा करना सदैव सम्भव नहीं होता। आपकी बुद्धि और स्मृति में ‘मिरर मूवमेन्ट’ के बारे में जानकारी भरी होना चाहिए। समय रहते याद आ जाना चाहिए। कहावत है कि आपके कान वही सुनते हैं जो दिमाग जानता है (या व्यंग्यकार के शब्दों में जो दिमाग सुनना चाहता है)

‘जाने क्‍या तूने कही, जाने क्या मैंने सुनी, बात कुछ बन ही गई ।’ लेकिन सदैव बात बनना इतना आसान नहीं होता।

रेसीडेन्ट डॉक्टर्स को काम मिल गया था। इन्टरनेट-गूगल के जमाने में ढेर सारा पढ़ डाला। सादिक के हाथों की गति के अनेक वीडियो रिकार्ड कर लिए। सादिक के मन में कौतूहल था “मेरे अन्दर ऐसा क्‍या खास है जो डॉक्टर साहेबान इतनी खोज खबर कर रहे हैं। वरना हम गरीबों की कहाँ पूछ-परख होती है।

हमारा मस्तिष्क पूरे शरीर की गतियों को संचालित करता है। जैसा आस्तिक लोग मानते हैं कि ईश्वर की इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता, वैसे ही मस्तिष्क के माध्यम से हम फुटबाल पर जोर से किक मारते हैं या एक अँगुली से हल्का सा इशारा करते हैं।

हमारा शरीर दो समरूप आधे-आधे भागों में बंटा होता है, दायां और बायां, लेफ्ट और राइट । अधिकांश भाग डबल होते हैं। दो-दो आँख, कान, हाथ, पाँव। दिमाग की अंदरूनी रचना में भी एक जोड़ा होता है। दो गोलार्ध्द- दायां और बायां।

मजेदार बात यह है कि दायां गोलार्ध्द (हेमीस्फीयर) शरीर के बायें भाग की गतियों को संचालित करता है। तथा बायां गोलार्ध्द दाहिने साइड के हाथ पैरों को।

कुछ करने की, कुछ हिलाने की इच्छा या निर्णय (फ्री विल) सेरीब्रल गोलार्ध्द के मोटर कार्टक्स (प्रेरक क्षेत्र) में पैदा होती है| अभी हम नहीं जानते कि इसे ‘इच्छा’ या हमारी ‘चेतना’ के अधीन माने|
हमारी चेतना” जिसके बारे में हम सोचते हैं कि हम उसके मालिक हैं। कौन जाने हम महज पुतले या पपेट हैं, जिनको कोई अदृश्य डोर द्वारा एक अबूझ प्रणाली द्वारा संचालित करती है। खैर इस विषय पर किसी अन्य लेख में |

यह अजीब बात है कि दिमाग के दो अर्ध्द-गोलों के दूसरे अर्धांगों को कण्ट्रोल करने का जिम्मा दिया गया है | प्राणियों के नर्वस सिस्टम के डार्विनियन विकास की गाथा में इस व्यवस्था के बीज पड़ने और पुख्ता होने का ब्यौरा मिलता है। दिमाग के कण्ट्रोल एरिया से जो वायरिंग नीचे की दिशा में निकलती है, वह कुछ दूरी तक अपनी ही लेन में रहती है| फिर अचानक नोटिस बोर्ड आता है की पथ बदलना है क्योंकि तुम्हे शरीर के विपरीत भाग को चलायमान रखने का जिम्मा दिया गया है|

इस वायरिंग के तारो को एक्सान तंतु कहते है| कण्ट्रोल एरिया अर्थात मोटर कोर्टेक्स से निकलने वाले सन्देश विद्युत् तरंगो के रूप में होते हैं| दोनों ओर का क्रोसिंग आपस में नहीं टकराता मानो फ्लाय ओवर बना हो|

दिमाग की एम.आर.आई. जाँच 30 वर्षों से ऊपर । पिछले पाँच वर्षो में एम.आर.आई. जाँच में एक नया साफ्टवेयर विकसित हुआ है जिसके नीचे रीढ़ की हड्डी के अन्दर स्थित मेरुतंत्रिका (स्पाइनल कार्ड) तक, आने और जाने वाले तंतु बण्डलों के रंगीन चित्र प्राप्त किए जा सकते हैं। ब्रेन ट्यूमर के न्यूरोसर्जरी उपचार में तथा अन्य अनेक शोध प्रकल्पों में एम.आर.आई. की इस नवीन विधि, डी.टी.आई. ट्रेक्टाग्राफी का उपयोग होने लगा है।

इन्दौर नगर में शायद पहली बार इसको काम में लिया गया। मोहम्मद सादिक को एक छोटी सकरी सुरंगनुमा एम.आर.आई. मशीन में लेटा दिया गया। 45 मिनिट तक धड़-धड़ करने वाली आवाजो के अनेक क्रम के बाद, जाँच पूरी हुई। कन्द्रोल या तुलना के रूप में एक अन्य/व्यक्ति का एम.आर,आई. भी इस विधि से करा गया जिसे मिरर मूवमेन्ट नहीं थे। इस स्वस्थ व्यक्ति के ब्रेन के मेड्यूला नामक भाग में स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि ऊपर से नीचे की ओर, स्पाइनल कार्ड को जाने वाले तन्तुओं के दोनों तरफ के बण्डल क्रासिंग करके विपरीत दिशा में जा रहे हैं।

मोहम्मद सादिक के एम.आर.आई. के चित्र में साफ नजर आ रहा था कि यह लेन-परिवर्तन नहीं हो रहा है। दोनों ओर के बण्डल में मौजूद अधिकांश तंतु बिना मार्ग बदले, अपनी ही दिशा में नीचे की ओर उतरते जा रहे थे। बहुत  थोडा-सा क्रासिंग हो रहा था |
सोचने की बात है – दाहिने हाथ की अँगुलियों को चलाने वाला जो आदेश दिमाग के बायें गोलार्द्ध से निकलता है वह न केवल दायें हाथ को बल्कि बायें हाथ को भी चलाने लगता है। आदेश की एक प्रति के बजाय दो प्रतियाँ डिस्पेच हो कर दो जगह पहुँच जाती है।

भ्रम की स्थिति बनती है पर ज्यादा नहीं। मोहम्मद सादिक जैसी दुर्घटना का वाकिया पहले पढ़ने में नहीं आया। आमतौर पर ये दर्पण गतियाँ छोटे आकार की होती है। नकल का आभास होता है। हूबहू कॉपी नहीं होती। हाथों के अलावा अन्य भागों में ये मूवमेन्ट और भी बिरले ही देखे जाते हैं। क्या यह सम्भव है कि एक आँख मारने की कोशिश की तो दूसरी भी बन्द हो गई। शायद नहीं। या मुँह एक दिशा में बिचकाया तो दोनों तरफ से ओंठ खिचकर बत्तीसी दिख गई। या एक पाँव से थप-थप किया तो दूसरा भी करने लगा। मोहम्मद सादिक के साथ ऐसा कुछ नहीं था।

यदि हम जानबूझ कर दोनों हाथों या पैरों की एक जैसी गतियाँ करना चाहें तो कुछ थोड़ी-सी सामान्य किस्म की कर सकते हैं जैसे ताली बजाना, मुट्ठी बनाना। अभ्यास के बाद नर्तक या अभिनेता अनेक जटिल किस्म की एक जैसी गतियां एक साथ दोनों हाथ से कर पाते हैं।

हमारे जमाने में एनाटॉमी के एक प्रोफेसर ब्लेकबोर्ड पर चाक से दोनों हाथों से समरूपी (सिमिद्रीकल) चित्र बनाते थे।

उपरोक्त सभी उदाहरणों में दोनों गोलार्ध्दों को दीर्घ अभ्यास के साथ हुनर हासिल करना पड़ता है। अपने आप नहीं होता। इसके विपरीत किसी नृत्य या अभिनय में यदि दोनों हाथों की अँगुलियों से बिल्कुल अलग प्रकार की जटिल गतियाँ करना हों तो कभी दोनों हाथ एक जैसा करने लगते हैं। उसे रोकने के लिये भी अभ्यास चाहिए।

DCC नामक जीन द्वारा एक विशेष प्रोटीन की रचना निर्देशित की जाती है जो न्यूरॉन कोशिकाओं से निकलकर लम्बाई में बढ़ने वाले और नियत दिशाओं में जाने वाले एक्सान तंतुओं के लिए गाइडेन्स प्रणाली का काम करता है। मस्तिष्क के दोनों फ्रोन्टल खण्डों (दायां व बायां) में स्थित मोटर कॉर्टेक्स से “पिरामिडल ट्रेक्ट” (तन्तुओं के बण्डल) निकलता है और गर्भावस्‍था के दौरान तथा जन्म के बाद के आरम्भिक महीनों और वर्षों में विकसित होता है। शुरू में ये तार नंगे होते हैं, उन पर कोई आवरण नहीं होता। धीरे-धीरे माईलिन नाम के प्रोटीन व वसायुकत पदार्थ. की सर्पिलाकार परत चढ़ने लगती है। विद्युत विज्ञान की भाषा में हम इसे तारों का इंसुलेशन कहते हैं। इंसुलेशन का मतलब है बिजली के लिये असंचालक (नॉन-कन्डटिंग) पदार्थ द्वारा (2) इंन्सुलेटेड तारों में विद्युत का प्रवाह तीव्र गति से और ज्यादा सुचारु |

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