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ड्रग ट्रायल्स के विरुद्ध दुष्प्रचार


जब टेलीविजन पर बालों के तेल की खूबियों का प्रचार होता है या ऋषिकेश की एक क्लीनिक में स्वनामधन्य आयुर्वैदाचार्य मिर्गी के शर्तिया इलाज के बारे में लाखों रूपयों के विज्ञापन अखबारों व पत्रिकाओं में छपवाते हैं (जो चिकित्सकों के लिये अन्यथा वर्जित है), जब पहलवानी भरा बदन बनाने के लिये शक्तिवर्धक केप्सूल बेचे जाते हैं तो किसी पर कोई जिम्मेदारी नहीं होती।

कौन सा तेल ? क्या औषधि ? क्‍या केमिस्ट्री ? क्या तुलनात्मक अध्ययन ? क्‍या शोध ? कुछ नहीं। ऐलोपैथिक दवाओं के साथ ऐसा नहीं है। उन्हें शोध और सबूत की एक कठिन, लम्बी श्रमसाध्य, महंगी व सटीक प्रक्रिया से गुजरना पडता है जो वर्षों चलती रहती है।

ड्रग ट्रायल्स से प्राप्त शोध के परिणामों को प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नलस में प्रकाशित करना होता है। ऐसे जर्नलल्‍्स जो पीअर रिव्यूड (अन्य विशेषज्ञ रेफरियों द्वारा लेख का पढकर आकलन) हो तथा इन्डेक्स्ड हों। लाईब्रेरी ऑफ अमेरिकन कांग्रेस के पबमेड में मान्यता प्राप्त हों। एक नहीं, एक से अधिक अध्ययन। एक संस्था, एक डाक्टर द्वारा नहीं, बल्कि अधिकाधिक संस्थाओं और अनुसंधानकर्ताओं द्वारा। मरीजों की संख्या दस-बीस में नहीं बल्कि सैकडों हजारों में होनी चाहिये। उसके बिना सांख्यीकीय विश्लेषण की विश्वसनीयता संभव नहीं।

ड्रग ट्रायल्स आवश्यक हैं। नई औषधियों व चिकित्सा विज्ञान का विकास इनके बगैर सम्भव नहीं है। वैज्ञानिक और कानूनी दोनों इष्टियों से ट्रायल्स अनिवार्य हैं। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। इन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिये। ये पूरी दुनिया में तथा पूरे देश में सैकडों संस्थाओं में हजारों डाक्टर्स द्वारा किये जाते हैं। भारत में इस गतिविधि का विकास तुलनात्मक रूप से कम हुआ है।

प्रश्न : क्या ड्रग ट्रायल्स के बिना औषधि विकास नहीं हो सकता ?
उत्तर : मनुष्यों पर ट्रायल्स के बिना औषधि का विकास असम्भव है। वैज्ञानिक और कानूनी दोनों दृष्टियों से ट्रायल्स अनिवार्य हैं।

प्रश्न : ड्रग ट्रायल्स के संदर्भ में भारत शासन की क्या नीति है ?
उत्तर : औषधियों पर शोध तथा उनका लाईसेंसीकरण केन्द्रीय शासन की विषय वस्तु है, राज्यों की नहीं | भारत सरकार क्लिनिकल ट्रायल्स को देश में बढावा देने के लिये प्रयत्नरत है। इस हेतु सरकार ने एक नया विभाग शुरू किया है जो डिपार्टमेंट ऑफ हेल्‍थ रिसर्च कहलाता है। यह मेडिकल स्नातकों तथा चिकित्सकों को इस क्षेत्र में आने के लिये निःशुल्क ट्रेनिंग एवं प्रोत्साहन देता है।
राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने जुलाई 2010 में दिये एक भाषण में भारत को अन्‍तराष्ट्रीय क्लिनिकल ट्रायल्स करने हेतु विश्व स्तर पर महत्वपूर्ण क्षेत्र माना है तथा भारतीय दवा ठोग को नई औषधि अनुसंधान क्षेत्र में आगे आने के लिये आहवान किया है ताकि बीमारियों का कारगर उपचार सर्व सुलभ हो सके।

प्रश्न : क्या मरीजों पर ड्रग ट्रायल्स करना गैर कानूनी काम है?
उत्तर : स्वस्थ व्यक्तियों और मरीजों पर ड्रग ट्रायल्न करना कानूनी काम है। भारत सहित दुनिया के सभी देशों में ट्रायल्स पर रोक नहीं है। इन्हें करने की विधियों पर बकायदा नियम बने हुए हैं।

प्रश्न : क्या मरीजों पर ड्रग ट्रायल करना अनैतिक काम है। उनका शोषण है। उन्हें अंधेरे में रखा जाता है।
उत्तर : ड्रग ट्रायल करना शोध की वैज्ञानिक विधि है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मरीजों को पूरी ज़ानकारी बोलकर तथा लिखित में समझाई जाती है। सोचने विचारने का पूरा समय देते हैं। समस्त शंकाओं का समाधान करते हैं। अनपढ मरीज या दिमागी रुप से अक्षम मरीज के मामले में उसके परिवार के जिम्मेदार कानून सम्मत व्यक्ति की सहमति लेते हैं। मरीज पर कोई दबाव नहीं डाला जाता। कोई जानकारी छिपाई नहीं जाती। दवाई के नुकसानों के बारे में भी बताया जाता है। मरीज को स्वतंत्रता रहती है कि अध्ययन को वह जब चाहे बीच में, बिना कारण बताए छोड सकता है। इसके बाद भी मरीज की देखभाल में कोई अन्तर नहीं किया जाता है। मरीजों को यह भी मालूम रहता है कि उन्हें दिये जाने वाली गोली/केप्सूल/इन्जेक्शन आदि में या तो असली औषधि हो सकती है या निष्क्रिय हानिरहित प्लेसीवो

प्रश्न : क्‍या ड्रग ट्रायल करना मरीजों के साथ चूहे जैसा व्यवहार करना नहीं है ?
उत्तर : ड्रग ट्रायल्स संचालित करने वाले चिकित्सकों व अनुसंधान कर्ताओं ने अपने मरीजों को कभी गिनीपिग नहीं समझा। मरीजों के लिये चूहा या जानवर जैसे शब्दों का उपयोग करना न केवल वैज्ञानिकों का अपमान है बल्कि उन हजारों सयाने और समझदार (फिर चाहे वे अनपढ हाँ या पढे लिखे हों, ग्रामीण हाँ या शहरी हों) मरीजों व घरवालों का अपमान है जिन्होंने अपने पूरे होशों हवास में सोच समझकर ट्रायल में शामिल होने के सहमति पत्र पर न केवल हस्ताक्षर किये बल्कि अनेक महीनों या वर्षों तक नियमित रूप से, विश्वासपूर्वक बिना प्रलोभन या दबाव के, परीक्षण हेतु आते रहे।

प्रश्न : ड्रग ट्रायल के बजट में से मरीजों को क्या भुगतान किया जाता है?
उत्तर : क्लीनिकल ड्रग ट्रायल्स में भाग लेने वाले किसी भी मरीज को धन भुगतान या कोई प्रलोभन देना गैर कानूनी है। अतः ट्रायल में भाग लेने वाले मरीजों को इसके लिये कोई भुगतान नहीं किया जाता |उनके आने जाने का खर्च तथा भोजन पर किये गये खर्चे की प्रतिपूर्ति ट्रायल मद से की जाती है।

प्रश्न : मरीजों की सुरक्षा व हितों के लिये क्या उपाय किये जाते हैं ?
उत्तर : ट्रायल्स में भाग ले रहे मरीजों की सुरक्षा तथा हितों की रक्षा के लिये हर स्तर पर जागरूकता रखी जाती है जो कि (जी.सी.पी.) उत्तम क्लीनिकल व्यवहार के मूल सिद्धांतों अनुसार किया जाता है। रिसर्च में भाग ले रहे प्रत्येक मरीज की देखभात्र भ्री-भांति की जाती है तथा उसे रिसर्च को कभी भी स्वैच्छिक रूप से छोडने की स्वतंत्रता दी जाती है। यदि कोई मरीज क्लीनिकल ड्रग ट्रायल हेतु अपनी सहमति वापस लेता है तो उसकी बाद में देखभाल तथा इलाज में कोई भी कमी नहीं रखी जाती है।

प्रश्न : ड्रग ट्रायल में शामिल होने वाले मरीजों को क्‍या लाभ ?
उत्तर : सहमति पत्र भरवाने के पहले, शुरू में ही मरीजों को बताया जाता है कि अध्ययन में शामिल होने से आपको कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं होगा। जो दवाई दी जावेगी उसमें असली औषधि है या प्लेसीबो यह ज्ञात नहीं | यदि आपको संयोगवश असली औषधि मित्र रही है तो सम्भव है कि कुछ लाभ हो। अंतिम परिणाम, ट्रायल समाप्त होने के बाद ही मिलेगा। ट्रायल्स प्रायः कुछ माह से लेकर एक-दो वर्ष तक चलते हैं। तत्पश्चात्‌ यह औषधि नहीं मिलेगी। बाजार में फिलहाल उपलब्ध नहीं है। कब मिलेगी कह नहीं सकते। जो पुराना इलाज है वह जारी रहेगा। ट्रायल की अवधि में आपको बार-बार आना पडेगा। आवागमन ओर नाश्ते का भत्ता मिलेगा। अन्य कोई राशि नहीं मिलेगी। अनेक उपयोगी जांचें ट्रायल बजट से हो जाती हैं। डाक्टर्स आपके स्वास्थ्य पर ज्यादा बारीकी से ध्यान देते हैं। अनेक मरीज इसी बात से संतोष महसूस करते हैं कि उन्होंने विज्ञान की प्रगति में योगदान दिया।

प्रश्न : मरीजों की सहमति कैसे प्राप्त करते हैं ?
उत्तर : अध्ययन में शामिल करते समय सहमति पत्र भरवाने के पहले, मरीज व घरवालों को ये सारी बातें विस्तार से समझाई जाती है। कहा जाता है – ड्डगआपको जो औषधि दी जावेगी उसमें वास्तविक दवा हो सकती है या बिना असर वाली प्लेसीबो। न आपको ज्ञात होगा न हमें।’ संतोष और सुखद आश्चर्य की बात है कि न केवल शहरी शिक्षित वरन अनपढ व ग्रामीण मरीज भी इस तर्क से वैज्ञानिक पहलू को भल्री भांति समझ जाते हैं और उसके बाद ही अनुमति पत्र पर हस्ताक्षर करते हैं। ट्रायल में भाग लेने वाले संभावित मरीजों को अनुसंधान प्रोटोकॉल तथा औषधि के बारे में सारी जानकारी हिन्दी में देते हैं एवं हिन्दी के सूचित सहमति पत्र पर हस्ताक्षर लेते हैं। हिन्दी में अंकित सूचित सहमति पत्र में दवाई से संबंधित आज तक की पूर्ण जानकारी रहती है, इसको पढने एवं समझने तथा मरीज के प्रश्नोत्तर के बाद संतुष्ट होने पर ही सहमति ली जाती हैं ।

प्रश्न : ट्रायल में शामिल मरीज की कोई पहचान नहीं रह जाती। वह केवल एक नम्बर रह जाता है। गुमनाम हो जाता हैं।
उत्तर : मरीजों की पहचान छिपाकर रखना कानूनी इष्टि से जरूरी है। हर इन्सान को अपनी प्रायवेसी या निजता का हक होता है। मरीज से सम्बन्धित जानकारी एक कोड नम्बर के रूप में संग्रहित रहती है। आवश्यकता पडने पर मरीज से सम्पर्क किया जा सकता है। मरीज गुमनाम नहीं होता। उसकी प्रतिष्ठा और पहचान की रक्षा की जाती है।

प्रश्न : ड्रग ट्रायल में गुप्त या गुमनाम दवा का प्रयोग करते हैं जिसकी जानकारी मरीज व डाक्टर को नहीं रहती। ये ट्रायल ब्लाइंड या अन्धे होते हैं।
उत्तर : अन्तरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय नियमों के अनुसार ड्रग ट्रायल का डबल ब्लाईंड या दुहरा अन्धा होना जरूरी है। आधे मरीजों में असली दवा तथा आधे मरीजों में नकल्ली या झूठमूठ की दवा (प्लेसीबो) देना होती है। किसी को मालूम नहीं होना चाहिये- न मरीज को न डाक्टर्स को। वरना सायकोलाजिकल रूप से मरीज व डाक्टर्स दवाई के,असर के बारे में सोचने लगते हैं। उनका निर्णय निष्पक्ष नहीं रह पाता। दवा गुमनाम या गुप्त नहीं होती। उसका नाम, केमिस्ट्री, फार्माकोलाजी आदि की विस्तृत जानकारी डी.सी.जी.आई., अध्ययनकर्ता डाक्टर व एथिक्स कमेटी के सदस्यों को दी जाती है।

प्रश्न : ये ट्रायल्स विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा ही क्यों चलाये जाते हैं ?
उत्तर : बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ प्रायः पुरानी व बडी होती हैं। रिसर्च हेतु उनके पास संसाधन अधिक होते हैं | उनके स्टाफ में उध कोटि के वैज्ञानिक होते हैं | भारतीय कम्पनियाँ भी अब बडी और बहुराष्ट्रीय होने लगी हैं तथा ड्रग ट्रायल्स के क्षेत्र में पदार्पण कर रही हैं।

प्रश्न : ये ट्रायल्स बहुराष्ट्रीय कम्पनियों दूवारा भारत जैसे विकासशील देशों की गरीब जनता पर ही क्‍यों चलाये जाते हैं ? विकसित देशों की जनता पर क्‍यों नहीं ?
उत्तर : आज से एक दशक पूर्व तक समस्त ट्रायल्स केवल विकसित देशों में ही होते थे | आर्थिक विकास से साथ भारत जैसे देशों में शिक्षा, ज्ञान व कौशल का स्तर बढा है तथा उध कोटि के विश्वसनीय ट्रायल यहां तुलनात्मक रूप से कम खर्च में सम्भव है। जन-संख्या अधिक होने से ट्रायल के लिये जरूरी मरीज जल्दी मित्र जाते हैं। ये ट्रायल्स अभी भी मुख्यतया विकसित देशों में ही होते हैं। ड्रग ट्रायल्स में समाज के समस्त वर्गों के मरीज भाग लेते हैं केवल गरीब लोग नहीं। मिथ्या धारणा के विपरीत ट्रायल्स में समाज के मध्यम व उध वर्ग के मरीजों का अनुपात अधिक होता है क्योंकि वे शहरों में, पास ही रहते हैं तथा शिक्षित होते हैं।

प्रश्न : ट्रायल्स में विदेशों में प्रतिबन्धित दवाईयों का उपयोग तो नहीं होता ?
उत्तर : कोई भी औषधि जो अन्य देशों में प्रतिबन्धित हो,, जिसके कारण खतरे व नुकसान होने की आशंकाएं अधिक हो उन्हें डी.सी.जी.आई. कभी ट्रायत्र में प्रयुक्त होने की अनुमति नहीं देता। यह सोचना गलत है कि अमेरिका वाले जिन दवाओं का प्रयोग उनके देश में नहीं करना चाहते, विकासशील देशों की भोली गरीब जनता को शिकार बनाते हैं | यह सम्भव नहीं है। हम इतने गये गुजरे व निरीह नहीं हैं। नाना प्रकार के षडयंत्रों के अंदेशों से हमें अनावश्यक रूप से दुबले होने और डरने की जरूरत नहीं है। भारत अब एक विश्वशक्ति है जिसका रूतबा बढ रहा है। भारत सरकार की नियामक संस्थाओं की अनुमति और सतत्‌ निगरानी के बगैर कोई ट्रायल संचालित नहीं हो सकता।

प्रश्न : जिन दवाओं को एफ.डी.ए. की अनुमति नहीं मित्री है उनका उपयोग ट्रायल में क्‍यों होता है ?
उत्तर : फूड एण्ड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफ.डी.ए.) (खा एवं औषधि प्रशासन) : की अनुमति के बगैर किसी औषधि को बाजार में या अस्पतात्रों में उपलब्ध नहीं कराया जा सकता। लेकिन ड्रग ट्रायल्स में शोध हेतु काम आने वाली औषधियों का सीमित उपयोग किया जा सकता है। बशर्तेडी.जी.सी.आई. ने अनुमति दे दी हो।
उदाहरणार्थ पार्किसोनिज्म के उपचार में आने वाल्री एक नई औषधि रोटीगोटीन को चमडी पर स्टीकर चिपका कर देते हैं। फिलहाल इसे भारतीय बाजार में बेचने का लाईसेंस नहीं मिल्रा है परन्तु डी.सी.जी.आई. में शोध ट्रायल हेतु अनुमति दे दी है जो देश में अनेक केन्द्रों पर चल रहा है।

प्रश्न :  किन संस्थाओं की अनुमति व निगरानी की व्यवस्था रहती है |
उत्तर : (अ.) भारत शासन की ओर से भारत के महा औषधि नियंत्रक (डी.सी.जी.आई.)
(ब.) भारत शासन की ओर से खाद्य एवं औषधि प्रशासन
(स.) भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा बायोमेडिकल रिसर्च के सन्दर्भ में तथा संस्थागत एथिक्स कमेटी के गठन व कार्यकलाप के सन्दर्भ में दिशा निर्देश
(द.) संयुक्त राज्य अमेरिका तथा यूरोपियन युनियन के एफ.डी.ए. क्योंकि अनेक बहुराष्ट्रीय दवा कम्पनियों के मुख्यालय वहां स्थित हैं तथा वे कम्पनियाँ वहां के एफ.डी.ए. के प्रति उत्तरदायी हैं, भले ही ट्रायन्न अन्य देशों में भी चल रहा हो ।

प्रश्न : क्या एथिक्स कमेटी की निष्पक्षता सन्देह से परे है ?
उत्तर : एक ही ट्रायल का प्रोटोकॉल एक साथ अनेक देशों में अनेक केन्द्रों की एथिक्स कमेटी के पास अनुमति हेतु भेजा जाता है। सारी की सारी समितियाँ कमजोर नहीं होती। दिल्‍ली, मुम्बई, न्यूयार्क, लंदन आदि शहरों में भी यही प्रोटोकॉल भेजा जाता है।

प्रश्न : ड्रग ट्रायल्स का बजट कहां से आता है ?
उत्तर : नई औषधि का आविष्कार या विकास करने वाली फार्मास्यूटिकल कम्पनी ड्रग ट्रायल्स का बजट प्रदान करती है। प्रायोजक ड्रग कम्पनी, अनुसंधानकर्ता चिकित्सक तथा संस्था के मध्य त्रिपक्षीय अनुबंध होता है। संस्था के डीन व एथिक्स कमेटी के अध्यक्ष को इसकी प्रति दी जाती है। प्रस्तावित बजट इस बात पर निर्भर करता है कि कितने मरीजों को कितनी बार आना पडेगा, कितना स्टाफ रखना पडेगा, प्रत्येक विजिट में और उसके बाद समस्त रेकार्ड कीपिंग में अनुसंधानकर्ता का कितना समय खर्च होगा आदि। यह बजट एक देश के सभी केन्द्रों पर एक जैसा होता है। प्रायोजक कम्पनी की ओर से इस हेतु कोई निर्देश नहीं होते कि बजट में से चिकित्सक को कितना हिस्सा बचा पाने की पात्रता है।

प्रश्न : शोध के दौरान मरीज पर औषधि के प्रभावों का आकलन कैसे करते हैं ?
उत्तर : कुछ सप्ताहों के अन्तराल पर मरीज को अनेक बार विजिट्स पर आना पडता है। कुछ घण्टों तक चलने वाली विजिट में विस्तार से बातचीत होती है, शारीरिक परीक्षण होता है, प्रयोगशाला जांचें होती है। सब कुछ प्रोटोकॉल के अनुसार होता है जो समस्त देशों के सभी केन्द्रों पर एक जैसा लागू होता है। रेकार्ड कीपिंग पर खूब जोर होता है । प्रत्येक आकलन नाप तौल कर होता है। ऐसी बातचीत नहीं होती कि डड्गहाँ, मुझे अच्छा लग रहा है’ या डड्गआप कुछ कमजोर नजर आ रहे हैं

प्रश्न : मरीज को दुष्परिणामों से कैसे बचाते हैं ?
उत्तर : दुष्परिणाम किसी भी नई या पुरानी दवा से और यहां तक कि प्लेसीबो से भी हो सकते हैं। प्रत्येक दुष्परिणाम का तत्काल निदान करते हैं, उपचार करते हैं, रिपोर्ट करते हैं, ई.ती. और सी.आर.ओ. को। अन्य केंद्रों से रिपोर्ट होने वाले दुष्परिणामों की सूचना समस्त दूसरे केन्द्रों को भेजते हैं। प्रायोजक ड्रग कम्पनी द्वारा स्थापित डाटा व सेफ्टी मानिटरिंग बोर्ड लगातार एक कण्ट्रोल रूम के रूप में दुनियाभर की रिपोर्ट्स पर नजर रखता है। यदि यह निष्कर्ष निकलता है कि मरीज उक्त औषधि को सहन नहीं कर पा रहा है तो उसे अध्ययन में से बाहर करते हैं। यदि यह निष्कर्ष निकलता है कि दुष्परिणाम या हानि औषधि के कारण हुई तो उपचार व क्षतिपूर्ति की व्यवस्था बीमा द्वारा रहती है। यदि यह निष्कर्ष निकलता है कि अनेक केन्द्रों पर अनुमान से अधिक दुष्परिणाम उन मरीजों में देखे जा रहे हैं जिन्हें सक्रिय औषधि मिल रही है न कि प्लेसीबो, तो समस्त केन्द्रों पर चेतावनी जारी करते हैं या ट्रायल बन्द कर देते हैं |

प्रश्न : एथिक्स कमेटी का गठन कॉन करता है? केन्द्रीय शासन या राज्य शासन या संस्था (अस्पताल) के डीन व वरिष्ठ प्राध्यापक ?
उत्तर : एथिक्स कमेटी, दुनिया भर में परम्परानुसार विकेन्द्रीकृत होती है, संस्था के स्तर पर होती है। केन्द्रीयकृत एथिक्स कमेटी (राज्य या भारत के स्तर) कहीं नहीं होती। कोई भी अस्पताल, जहां के प्रशासक या चिकित्सक अपने यहाँ ड्रग ट्रायल संचालित करना चाहते हैं, इंडियन काउन्सिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के दिशानिर्देशों पर एथिक्स कमेटी का गठन करते हैं।

प्रश्न : एथिक्स कमेटी की कार्यप्रणाली क्‍या होती है ?
उत्तर : इसके सदस्य अवैतनिक व स्वैच्छिक होते हैं। अगली बैठक में विचारार्थ प्रस्तुत होने वालेट्रायज्न – प्रोटोकॉल पढ कर आते हैं। बैठक में प्रश्न पूछते हैं, चर्चा करते हैं, बहस करते हैं, सुझाव देते हैं और निर्णय लेते हैं। किसी सदस्य से सम्बन्धित ट्रायल होतो उसे निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखते हैं। एथिक्स कमेटी को ट्रायत्ल प्रोटोकॉल में यदि संशोधन हो तो उसकी सूचना व सहमति दी जाती है। दुष्परिणामों की तथा प्रोटोकॉल वायलेशन रिपोर्टिंग करते हैं| वार्षिक रिपोर्टिंग में कुल मरीज व परिणाम आदि बताते हैं। एथिक्स कमेटी का ट्रायल बजट से सम्बन्ध नहीं होता हालाकिं अवलोकन कर सकते हैं। सभी ट्रायल के सभी मरीजों की सभी विजिट्स की विस्तृत जानकारी एथिक्स कमिटी का विषय नहीं हैं| यह उनके लिये सम्भव नहीं | यह काम सी.आर.ओ व प्रायोजक कम्पनी का है।

प्रश्न : क्‍या यह सम्भव नहीं है कि बहुराष्ट्रीय दवा कम्पनी द्वारा भारत के महाऔषधि नियंत्रक को प्रभावित करके खराब किस्म के ड्रग ट्रायल को संचालित करने की अनुमति प्राप्त कर ली जावे?
उत्तर : इसकी सम्भावना नगण्य है। ड्रग कन्ट्रोलर का प्रत्येक निर्णय सार्वजनिक रूप से वैज्ञानिकों की टीका टिप्पणी आलोचना का पात्र हो सकता है। औषधि कम्पनी द्वारा एक ही प्रोटोकॉल एक से अधिक देशों के ड्रग कन्ट्रोलर के सम्मुख अनुमति के लिरू प्रस्तुत किया जाता है। एक साथ सभी को प्रभावित करना सम्भव नहीं।

प्रश्न : ड्रग ट्रायल से किस-किस को लाभ ?
उत्तर : विज्ञान की प्रगति में सहायक, पूरी मानव जाति को लाभ होता है। वरिष्ठ व कनिष्ठ चिकित्सकों को ज्ञान, अनुभव, शोध की विधियों की समझ, वृहत्तर संसार में सम्पर्क, प्रतिष्ठा प्रकाशन में नाम तथा आर्थिक लाभ। संस्था व विभाग की अघोसंरचना में सुधार हेतु अतिरिक्त संसाधन व प्रतिष्ठा, रोजगान के नये अवसर मिलते हैं। भारत में विदेशी मुद्रा का प्रवाह होता है।

विज्ञान के विकास के लिये जरूरी है नई खोज में अपना दिमाग, बुद्धि और कौशल, समय और पैसा लगाने वाले व्यक्तियों और कम्पनियों को न्यायपूर्ण प्रतिफल मिले। वरना कोई क्‍यों शोध करेगा? इसलिये पेटेन्ट कानून का विकास हुआ। भारतीय मीडिया में पेटेन्ट को खलनायक की तरह वर्णित किया जाता है। 1991 के बाद डॉ. मनमोहनसिंह के नेतृत्व में भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार हुए तो पेटेन्ट कानूनों को अन्तरराष्ट्रीय मानदण्डों के अनुसार परिवर्तित किया गया। उसके अच्छे परिणाम नजर आने लगे हैं। अब भारतीय कम्पनियाँ शोध व विकास में बढ रही हैं और अधिकाधिक पेटेन्ट्स के लिये आवेदन करने लगी हैं।

ड्रग ट्रायल के कारण रोजगार के नये अवसर प्राप्त होते हैं | बिजनेस वीक में प्रकाशित एक आकलन के अनुसार वर्ष 2015 तक भारत में प्रतिवर्ष 10000 रिसर्च असिस्‍टेंट की जरूरत होगी। ड्रग ट्रायल्स अनुभव प्राप्त करने वाले अध्येता धीरे धीरे गुणवत्ता और कौशल की ऊंची पायदानों पर चढते हैं। किसी अन्य वैज्ञानिक द्वारा परिकल्पित व प्रस्तावित ट्रायल्स में अपने केन्द्र द्वारा थोड़े से मरीजों का डाटा प्रदान करने की तुलनात्मक रूप से आसान प्रक्रिया के बाद अब वे स्वयं नई औषधियों के नये ट्रायल की डिजाईन/योजना बनाने का उधतर कोटि का काम करने लगते हैं।

ऐसा नहीं है कि ड्रग ट्रायल्स की दुनिया में सब कुछ दूध का धुला है, कुछ अनियमितताएं और अनैतिक काम होते रहे हैं। सुधार और विकास एक सतत्‌ प्रक्रिया है। विश्व समुदाय अब बहुत सजग और चोक्कना है फिर भी विवाद उठते रहते हैं, उठते रहेंगे और उठना चाहिये। लेकिन इमानदारी के साथ, जिम्मेदारी, परिपक्वता, खोज, अध्ययन ‘और संतुलन के साथ।

अनेक प्रतिष्ठित अन्तरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नलस जैसे लेन्सेट, न्यू इंग्लैण्ड मेडिकल जर्नल आदि में समय-समय पर ड्रग ट्रायल्स के वैज्ञानिक, नैतिक, सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक पहलुओं पर विद्वत्तापूर्ण लेख छपते रहते हैं। इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल एथिक्स आरत में ड्रग ट्रायल्स के नकारात्मक पक्ष पर प्रायः लिखता रहता है। कुछ हद तक एक पक्षीय फिर भी विचारोत्तेजक तथा ज्ञानपूर्ण। हिन्दी व भारतीय भाषाओं में उक्त ऊंचे स्तर का कवरेज देखने को नहीं मिलता।

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