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क्या आज के राजनेता देश की प्रगति में बाधक हैं ?


पुरानी संस्कृत कहावत है- यथा राजा, तथा प्रजा। जैसा राजा, वैसी जनता। जैसे नेतृत्व, वैसे लोग। गांधी तिलक और सुभाष जैसे नेता जब थे, तो देश उनके पीछे चल पड़ा था। मर मिटने की भावना थी। त्याग था। आदर्श थे। गुलामी से मुक्ति दिलाई थी।

और आज के नेता- आया राम, गया राम। बोफार्स काण्ड। चारा काण्ड। यूरिया काण्ड। कैसे-कैसे कारनामे। विधानसभा में युद्ध, गालीगलौच, मारपीट। भ्रष्टाचार द्वारा पैसा कमाना एक मात्र उद्देश्य रह गया है। कोई सिद्धान्त नहीं। कोई स्थिर विचारधारा नहीं।

पारे की बूंद के समान कभी यहां फिसले कभी वहां। बिना पेंदी के लोटे के समान कभी यहां लुढ़के कभी वहां।

घोर अवसरवादिता। सिर्फ मतलब की राजनीति। देश की कोई चिन्ता नहीं। आपसी खींचतान व दावपेंच में सारा वक्‍त खर्च | कोई रचनात्मक काम नहीं।

सिर्फ भाषणबाजी। जबानी जमा खर्च। कोरी लफ्फाजी। ऊँची-ऊँची बातें। मगरमच्छ के आंसू। लोगों को झांसा देने के लिये तरह-तरह के झुनझुने और नौटंकी। सादा जीवन उच्च जीवन की जगह आडम्बर भरा जीवन और छिछले विचार। कानून के रखवाले कानून के भक्षक बने हैं। जब बागड़ ही खेत खाने लगे तो खेत का क्या होगा?

देश के लोगों की बची-खुची ऊर्जा, मेधा, ईमानदारी को ये नेता नष्ट कर रहे हैं। ऐसा वातावरण नहीं बनने दे रहे जिसमें प्रतिभावान, मेहनती युवक-यवतियां देश का नाम ऊंचा करे। जो कर पाते हैं, सिर्फ खुद की लगन व किस्मत से। वरना नेताओं. ने कोई कसर नहीं छोड़ी है देश का बेड़ा गर्क करने की (या देश की लुटिया डुबोने की |)

नेतृत्व का काम क्या है?

नेतृत्व का काम है, स्वयं के आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करना। ताकि दूसरे उससे प्रेरित हो। आज हमारे सामने क्या उदाहरण है? अपराधियों से घिरे हुए, मालामाल नेता जो हर नियम तोड़ना जानते हैं। जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं। राजनीति धन्धा हो गया है। कम समय में ज्यादा पैसा कमाने का। समाजसेवा गई भाड़ में।

नेतृत्व का काम है राष्ट्र की संस्थाओं की मर्यादा बनाए रखना। इसके विपरीत आज के नेता विधायिका कार्यपालिका न्यायपालिका पुलिस, शिक्षा हर क्षेत्र में गलत दखलअंदाजी कर रहे हैं।

नेताओं की भूमिका होती है। समाज को आगे ले जाने की। बुरी परम्पराओं को मिटाने की। समाज सुधार करने की। आज के नेता वोटों की खातिर समाज में व्याप्त बुराईयों को पालते पोसते हैं। अलग-अलग जाति, धर्म, भाषा के नाम पर समाज को बांटा जाता है ताकि वोटों की बन्दरबांट में बड़ा हिस्सा अपने को मिल जावे।

नेताओं का काम होता है राष्ट्र के विकास के लिये नयी नीतियां बनाने का। आज के नेताओं को इसकी फुर्सत कहां।

जो करना है वह कर नहीं रहें। जो दूसरे कर सकते हैं उन्हें करने नहीं दे रहे। फिर भला देश कैसे प्रगति करे। काश मेरे देश को राजनीति की इस अतिवादिता से छुटकारा मिले। काश भारतमाता इन तथाकथित नेताओं के शिकंजे से मुक्त हो पाए। काश देश की जनता अपनी जागरुकता का परिचय देते हुए नेताओं को उतार फेंके। इन्हीं आशाओं के साथ मैं अपनी बात समाप्त करती हूँ |

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