
बूंदी यात्रा शायद वर्ष 1997 में मैं, डॉ अजय सोडानी, डॉ राकेश गुप्ता, न्यूरोलाजिकल सोसाइटी ऑफ इण्डिया की कान्फ्रेन्स में भाग लेकर जयपुर से इन्दौर, मेरी Wagon-R कार में लौट रहे थे। उस जमाने में सड़के बहुत ख़राब हुआ करती थी। कोटा आने के कुछ पहले, एक पहाड़ी हिस्से में सहसा एक भव्य किला और महल दिखा। नीचे घाटी में एक तालाब के किनारे नगीने सा सुन्दर हरा भरा एक शहर दिखा। मुंह से वाह-वाह निकली। मालूम पड़ा बूंदी है। तब से मन में इच्छा थी यहां कभी आने की। अब मौका मिला – 20-21 मार्च 2026 में। यह भी जाना था मिनिएचर पेंटिंग की बूंदी शैली प्रख्यात है।
छोटा शहर है। एक जिला मुख्यालय है। दक्षिणी पूर्वी राजस्थान के हाड़ोती क्षेत्र में आता है। जैसे आम उत्तर भारतीय शहर होते है। भीड़, धूल, गन्दगी, शोरगुल, संकरी गलियां, रेंगता ट्रेफिक।
लेकिन यदि मन में सराहना का भाव हो तो खूबियां दिखने लगती है। मेरा मानना है कि व्यक्ति, संस्था, नगर, लोग, भाषा, किजीन (भोजन), संस्कृति, स्थापत्य – किसी भी नये के प्रति Default शुरुआत कुछ अच्छा ढूंढने की भावना से होनी चाहिये। यदि आरम्भ से ही Cynicism नकारात्मकता का भाव होगा, “बुरा जो मैं देखन चला” की आदत होगी, तो आपके खाते में Frustration अधिक आयेगा।
मेरी सकारात्मकता की इसी दृष्टि से मैंने ढेर सारी अच्छी, सुन्दर, नयी, विशिष्ट चीजें देखीं।
मालवा के इन्दौर, उज्जैन, आगर, मन्दसौर और राजस्थान के झालावाड़, कोटा और बूंदी जिलों में फागुन की बहार थी – इस मौसम का राजा फूल ‘टेंसू / पलाश/ किंशुक के साथ सचमुच जंगल और खेत दहक रहे थे। खाखरे के पत्ते झड़ चुके, डालियों पर चटख लाल/गुलाबी फूल लदे हुए थे। गेहूं की फसल पक चुकी थी या कट रही थी। सुनहरी पीला आभा वाले बड़े-छोटे खेतों के बीचों बीच या बागड़ों पर टेसू के फूल, गजब का कलर काम्बीनेशन रच रहे थे। मन हो रहा था एक ड्रोन आपरेटर बन कर खेत दर खेत मनभवन दृश्यों को सहेजता जांऊ। यदि आर्टिस्ट होऊं तो केनवास और तूलिका और Color pallette लेकर धूनी रमाऊं।
चौरासी खंभों की छतरी

विशाल संरचना का सम्पूर्ण दृश्य, जहां स्थापत्य की भव्यता साफ झलकती है
बूंदी शहर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर बाहर… एक छतरी है, वहां के किसी पुराने राजा की, बल्कि उन्होंने अपने किसी धाय या दत्तक पुत्र की स्मृति में बनाई है… धाय पुत्र। इसमें 84 पिलर्स हैं, हालांकि हमने गिने नहीं। ग्राउंड फ्लोर और ऊपर के फ्लोर के छोटे और बड़े खंभों को गिनो तो 84 होते हैं। अच्छा है, सुंदर शिल्प काम है। नीचे ग्राउंड फ्लोर पर एक शिव मंदिर है, शिवलिंग है। ऊपर बहुत अच्छी हवा आती है। वहां से बूंदी शहर का और महल का दूर का विहंगम दृश्य दिखलाई पड़ता है। A Good Photo-spot.

बारीक नक्काशी और संतुलित डिजाइन का उत्कृष्ट उदाहरण
From the ASI-Plaque
बहुत ऊँचे प्लैटफार्म पर निर्मित इस विशाल छतरी का निर्माण राव राजा अनिरुद्ध सिंह द्वारा 1683 ई. में धाय पुत्र देवा की स्मृति में करवाया गया था। छतरी के आन्तरिक भाग में चित्रांकन द्रष्टव्य हैं। छतरी के मध्य भाग में मत्स्याकृतियां एवं अप्सराओं का चित्रण है। नीचे के स्तरों में मल्लयुद्ध, राजपुरुष, घीणा बजाती नायिकाए आदि अद्भुत भित्ति-चित्र चित्रित हैं। ऊपरी सीढियों की दीवार पर भी दो समूह में चित्रांकन हैं । छतरी के नीचे प्लैटफार्म पर शिवलिग प्रतिष्ठापित है। प्लैटफार्म में भी चार लघु खम्भे हैं। छत के ऊपरी भाग के मध्य में भी एक अन्य छतरी व चारों कोण भागों पर चार छतरियां हैं। इन सभी में चौरासी कलात्मक खम्भे हैं। जगती पर पशु-पक्षियों और जन-जीवन संबंधी अद्भुत मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। यह छतरी स्थापत्य कला, मूर्तिकला और चित्रकला की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है ।
सुख महल पैलेस और जैतपुरा तालाब

बूंदी शहर से कुछ बाहर, परिधि पर, आउटस्कर्ट्स पर एक बहुत सुंदर सा तालाब है। जैतपुरा तालाब… उसके किनारे एक छोटा सा भवन है। सुख महल पैलेस। मुझे इंदौर के सुख निवास पैलेस की याद दिलाता है। जहां पर एक झील थी। हम अपने एमबीबीएस के दिनों में पिकनिक मनाने जाया करते थे। अब तो आरआर कैट (RRCAT) का कैंपस है। आउट ऑफ़ बाउंड्स हो गया है इंदौर के नागरिकों के लिए। सुख महल का कैंपस भी बहुत प्यारा है। खूब सारे बंदर थे। यहाँ पर शासन का एक म्यूजियम भी है जिसमें उस इलाके की मूर्तियां,और बहुत सुंदर पेंटिंग्स भी हैं। सुख महल में ऊपर फर्स्ट फ्लोर पर जाकर पूरी झील का, जैतपुरा झील का किनारा बहुत प्यारा दिखता है। इसमें भी बहुत सारे आर्टवर्क्स हैं। ऊपर छत पर एक गेस्ट रूम है। गेस्ट रूम खुलवाया गया हमारे लिए हमारे गाइड के द्वारा। उसके बारे में इतिहास है कि साहित्य में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक रुडयार्ड किपलिंग, [जिनका कि प्रसिद्ध उपन्यास “किम” है और जिनकी प्रसिद्ध रचना “जंगल बुक” है वो यहां पर कुछ दिन उस कमरे में रुका था। इस स्थान के बारे में उसने कुछ-कुछ अच्छी टिप्पणियां भी करी थीं।
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जैत सागर झील पाल पर स्थित, इस महल का निर्माण बूंदी के राजा विष्णु सिंह (1773-1821 ईस्वी) द्वारा उनके दीवान और वास्तुविद्सुखराम की देखरेख में 1776 ईस्वी में करवाया था। अत: इसे सुख महल नाम दिया गया। निचले के भाग में हॉल और ऊपर गुम्बदाकार दो कक्ष निर्मित हैं। हॉल मूलत: बारादरी थी। ऊपरी भाग में एक आयताकार छतरी के द्रष्टव्य है। इस महल से प्रकृति का एक सुंदर नजारा देखा जा सकता है। प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक रूडियार्ड किपलिंग इस महल में दो दिन निवास कर बूंदी की अतुलनीय विरासत एवं नैसर्गिक सौन्दर्य का जो वर्णन किया है, वह उल्लेखनीय है। विदेशी पर्यटक इसे किपलिंग पैलेस के नाम से भी जानते हैं। राजपूत स्थापत्य कला से निर्मित यह महल 17वीं-18वीं शताब्दी का एक अच्छा नमूना है एवं पर्यटन की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण स्मारक है।
कुम्हार के घर का अनुभव

हमारे गाइड सुख महल के पास ही एक गांव में एक कुम्हार के घर में ले गए। एक बूढ़े बाबा नथमल जी ने अपना चाक चलाया। बिजली से घूमने वाला। वरना पुराने जमाने में तो उसको डंडे से घुमाना पड़ता था। उनका परिवार था, पोतियां थीं जो स्कूल जाती हैं। बहुत ही गरीब घर था।

उन बा-साहब के हाथों पर झुर्रियां थीं पर उनका हुनर… पॉटरी का, चाक बंदी का, बर्तन बनाने का हुनर उत्तम था। उन्होंने हमारे सामने मिट्टी गूंधी जैसे आटा गूंधते हैं। उसको चाक पर बिठाया। ओहो क्या हुनर है! हालांकि उन्होंने बहुत सिंपल चीजें बताईं। इससे भी अच्छे हुनर वाले लोग होते होंगे या ये बाबा खुद करते होंगे। हमारे देखते ही देखते उन्होंने कुल्हड़ सुराही और ऐशट्रे बनाई। उनसे हमने मिट्टी के तवे दो खरीदे जो तपाए हुए थे। उन लोगों ने हमें चाय पिलाई। जैसी कि देसी चाय होती है। खूब मीठी शक्कर वाली, पता नहीं क्यों… हम लोग इतना ज्यादा मीठा डालते हैं।
रानी जी की वाव (बावड़ी)

रानी जी की वाव। रानी जी की बावड़ी। रतलाम में और मध्य प्रदेश के अनेक पुराने गांवों में मैंने बचपन में बावड़ियां देखी हैं। मगर बावड़ियां भी स्थापत्य का, कला का केंद्र हो सकती हैं, ये मैंने पहली बार गुजरात में अडालज नी वाव और राणी की वाव अहमदाबाद के पास और पाटन में देखा था।

सीढ़ियों, स्तंभों और गहराई में उतरती अद्भुत संरचना
उसी का एक छोटा रूप यहां बूंदी में रानी जी की वाव है। और इसमें भी काफी गहराई में जाकर कुआं है। ढेर सारी सीढ़ियां हैं। बहुत सारी नक्काशी है। दशावतारों को उकेरा गया है। बहुत ही सुंदर आर्किटेक्चर है। हमारे गाइड महोदय को केवल फैमिली के फोटोग्राफ्स लेने में शौक था। मेरा बस चले तो मैं अपना फोटो और परिवार के फोटो कम खींचूं और केवल प्रकृति और स्थापत्य के ही फोटो खींचता रहूं। हालांकि एकाध फोटो चाहिए रहता है कि हां ये हम हैं यहां पर। अंदर ठंडक थी और… सुंदर तरीके से उसको संजो कर बचाकर रखा गया है।
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बून्दी शहर के दक्षिण की ओर स्थित रानीजी की यह बावड़ी अत्यन्त अलंकृत तथा तोरणों से युक्त है। इसका निर्माण बून्दी के रावराजा अनिरुद्ध सिंह की पत्नी नाथावत जी ने अपने पुत्र बुद्ध सिंह के कार्यकाल में वि. सं. 1757में करवाया था।
260'लम्बी व 40’,4" चौड़ी इस बावड़ी में अलंकृत द्वार, सुन्दर तोरण, देवी-देवताओं की प्रतिमाएं एवं भित्तिचित्र बने हैं। बावडी में पश्चिम से उतरने वाली सीढ़ियों के निकट दोनों ओर राजपूत शैली की 12 स्तम्भों से युक्त छतरियां हैं। इसके प्रवेश द्वारों की छतें मेहराबदार तथा उनके वितान पर चित्रांकन है। दोनों द्वारों के ऊपर भी आठ स्तम्भों वाली एक-एक छतरी है।
इस बावड़ी में 100 से अधिक सीढ़िया हैं। मध्य की बड़ी सीढी के नीचे दोनों ओर 4' की एक-एक भैरव की स्थानक प्रतिमाएं हैं। 20 सीढ़ियां उत्तरने के बाद खुला मण्डप है, जिसके दोनों ओर तीन-तीन द्वार व कलापूर्ण तोरण है। नीचे उतरने पर दोनों ओर पांच-पांच प्रतिमाएं कच्छपावतार, वराहावतार नृसिंह, गजेन्द्र मोक्ष आदि की हैं। इसके नीचे मेहराबयुक्त द्वार मण्डप में कलापूर्ण कुराई का कार्य तथा गणपति आदि निर्मित हैं। बावडी के प्रवेश द्वार पर 31 पंक्तियों का एक शिलालेख लगा है जिसमें बून्दी के हाड़ा राजाओं की वंशावली है।
हाथी और घोड़े की मूर्तियां

राजाओं और रजवाड़ों के जीवन में घोड़े और हाथी का महत्व था। वे युद्ध में काम आने वाले होते थे, उन्हें पालतू या पेट (Pet), जैसा प्यार देते थे। राणा प्रताप के महान घोड़े चेतक के बारे में सब जानते हैं। यहां पर ये एक हाथी और एक घोड़े की मूर्ति बूंदी में देखी जिसका कि वर्णन यहां पर लिखा हुआ है।
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हाथी शिव प्रसाद : महराजा शत्रु शल्य जी विक्रम संवत 1688-1715 का प्यारा हठी शिवप्रसाद जिसकी बहादुरी देखकर बादशाह भी प्रभावित था। यह हाथी अपनी सूंड से तलबार चलाता था। हाथी की मृत्यु पर इसकी प्रति मूर्ति को निर्माण करवाया गया।
घोड़ा हुंजा: ईरानी घोडा राव राजा बद्ध सिंह जी के पुत्र राव राजा उम्मेद सिंह जी ने (विक्रम संवत 1805-1827) इस घोड़े पर सवार होकर अनेक युद्ध जीते। उम्मेद सिंह जी ने अपने प्रिय घोड़े की याद में इस पाषाण प्रतिमा का निर्माण बुलबुल चबुतरे पर करवाया।
बूंदी के स्थानीय कलाकार
बूंदी में दो कलाकारों से बात करी। एक का नाम लेखराज था दूसरे का मैं भूल रहा हूं शायद इस वीडियो में हो। इनको हमने चित्र बनाते हुए देखा।

मैंने पूछा कि कितने लोग हैं, बोले पूरे शहर में अब बस दो चार लोग बचे होंगे इस परंपरा के काम करने वाले।

इनसे मैंने एक सरस्वती जी का चित्र खरीदा। एक और मजेदार चीज लगी कि जिस कागज पर ये लोग चित्र उकेरते हैं वो उन्होंने एंटीक फीलिंग देने के लिए पुराने स्टांप पेपर या रियासत के जमाने के बही खातों के पुराने पेपर के ऊपर चित्र को उकेरते हैं। लेकिन खैनी या तंबाकू खाने की आदत तो भारत में बहुत बुरी है। ये बंदा बात नहीं कर पा रहा था उसके मुंह में पीक भरी हुई थी। उसको उठके जाना पड़ा पीक को थूकने के लिए और फिर वो आके चलकर मुझसे बात कर पाया।
देव निवास होटल और मोरक्को के रियाद की यादें
अनेक तरह के होटल होते हैं, फाइव स्टार से लेकर नॉन-स्टार तक, होम स्टेज़ होते हैं। बूंदी में जहाँ हम रुके वो एक अच्छी होटल थी, थ्री स्टार-फोर स्टार के बीच कह सकते हैं। मगर उसमें एक खासियत थी। ये होम स्टे तो नहीं था लेकिन हेरिटेज होटल जैसा भी नहीं था, हालाँकि उसका कुछ-कुछ लुक वैसा था, पुरानी इमारत थी, पुरानी साज-सज्जा थी। और यहाँ रुककर मुझे मोरक्को में मराकेश नामक शहर में रियाद (Riad) की याद हो आई।

रियाद… मोरक्को में, मराकेश के अलावा कुछ और शहरों में, बड़े सुंदर रिहायशी स्थान होते हैं टूरिस्ट लोगों के लिए। इनमें पुराने घर होते हैं जिन्हें रेट्रोफिट करके आधुनिक बनाया जाता है। पुरानी शैली, पुराना वास्तुशिल्प… इन सब में एक सेंट्रल कोर्टयार्ड होता है, जहाँ पानी होता है, फव्वारा होता है। घरेलू वातावरण होता है। इस तरह के रियाद मोरक्को में प्राय: परिवार वाले चलाते हैं। छोटे-छोटे होते हैं। दो-तीन मंजिल संकरी सीढ़ियां चढ़ के रूम्स होते हैं रूफटॉप पे बहुत बढ़िया शहर का दृश्य दिखाई पड़ता है, रूफटॉप पर डाइनिंग होता है। वैसा ही कुछ-कुछ अनुभव हमें यहाँ पर देव निवास नामक होटल बूंदी में हुआ।
होटल की लाइब्रेरी
किसी भी होटल या होम स्टे को अगर पांच में से नंबर देना हो तो दो-तीन दशमलव पॉइंट तो मैं बढ़ा देता हूँ यदि वहाँ पर मुझे लाइब्रेरी मिल जाए। वैसा ही आनंद मुझे यहाँ पर मिला।

एक छोटी सी लाइब्रेरी थी। 100-150 किताबें होंगी। और उनको खाली समय में बैठकर पलटने में बहुत मजा आ रहा था। ‘गॉन विद द विंड’ (Gone with the Wind) उपन्यास मार्गरेट मिशेल (Margaret Mitchell) का, 40 साल-50 साल पहले पढ़ा होगा। उसको फिर से पलटा। उपन्यास तो नहीं पढ़ा, लेकिन उसके ऊपर एक भूमिका और एक लिटरेरी क्रिटिक, साहित्यिक समालोचना पढ़ी, जिसमें उन्होंने ये दर्शाने की कोशिश की थी कि कैसे यह उपन्यास, जिस काल के लिए लिखा गया है और जिस लेखिका के द्वारा लिखा गया है, वो कितनी अस्वीकृत है आज के जमाने में… उसमें जातिवाद है, नस्लवाद है, सफेद-गोरे लोगों की उत्कृष्टता का दंभ है, और अश्वेत लोगों के प्रति तिरस्कार और हीन भावना है। लेकिन उसके बाद भी यह उपन्यास अच्छा क्यों है, वो भूमिका, वो संपादकीय टिप्पणी पढ़कर मुझे बहुत आनंद आया।
रुडयार्ड किपलिंग की एक कविता “If”

IF: If you can keep your head when all about you Are losing theirs and blaming it on you, If you can trust yourself when all men doubt you, But make allowance for their doubting too; If you can wait and not be tired by waiting, Or being lied about, don't deal in lies, Or being hated, don't give way to hating, And yet don't look too good, nor talk too wise:
If you can dream-and not make dreams your master; If you can think-and not make thoughts your aim; If you can meet with Triumph and Disaster And treat those two impostors just the same; If you can bear to hear the truth you've spoken Twisted by knaves to make a trap for fools, Or watch the things you gave your life to, broken, And stoop and build 'em up with worn-out tools:
If you can make one heap of all your winnings And risk it on one turn of pitch-and-toss, And lose, and start again at your beginnings And never breathe a word about your loss; If you can force your heart and nerve and sinew To serve your turn long after they are gone, And so hold on when there is nothing in you Except the Will which says to them: 'Hold onl'
If you can talk with crowds and keep your virtue, Or walk with Kings-nor lose the common touch, If neither foes nor loving friends can hurt you, If all men count with you, but none too much; If you can fill the unforgiving minute With sixty seconds' worth of distance run, Yours is the Earth and everything that's in it, And-which is more-you'll be a Man, my son!
बंदरों की क्रीड़ा

होटल की छत पर से बहुत देर तक बहुत दिनों बाद बंदरों को खेलते हुए, मस्ती करते हुए, अठखेलियां करते हुए देखा। रतलाम में बचपन में हमारे पुराने घर के आसपास खूब बंदर आते थे। पेट (pet) जैसे हो गए थे। पालतू जैसे हो गए थे। उनमें से कोई एक डाकी बंदर होता था जो ‘खी-खी’ करके डराता था, हम उसको छेड़ते नहीं थे। ऐसे ही यहाँ काफी देर तक मैं बंदरों की क्रीड़ा को देखता रहा और मज़े लेता रहा। छलांग लगा रहे हैं, लटक रहे हैं, जूँ निकाल रहे हैं पीठ के अंदर से।
बूंदी का मध्ययुगीन आकर्षण
यूरोप में अनेक शहरों को ‘मेडिवल चार्म’ (Medieval charm) के लिए जाना जाता है। मध्ययुगीन मकान, गलियां, काबल-स्टोन स्ट्रीट्स, [पत्थर जड़ी गलियां] कवेलू वाले मकान। टूरिस्ट लोग उसको बड़ा महत्व देते हैं।
बूंदी आकर मुझे ऐसा ही लगा कि यह भी एक मध्ययुगीन नगर हो सकता है। 17वीं शताब्दी, 18वीं शताब्दी। बहुत सारे पुराने भवन हैं यहाँ पर। बीच-बीच में नए मकान आ गए हैं। खंडहर वाले मकान हैं। उनका काला, पीला, गहरा, गाढ़ा रंग है। उस पर थोड़ी-थोड़ी काई लगी हुई, कहीं-कहीं घास उगी हुई… चारों दिशा में नयें मकानों के बीच में से अपनी उपस्थिति का अहसास कराते रहते हैं। बहुत सुंदर लगते हैं।
दरवाजों वाली गली





पुराने एवं नये भवन




सुझाव: रंगों से पहचान
मेरे मन में सुझाव देने की इच्छा हो रही है कि नगरपालिका या राज्य पर्यटन विभाग द्वारा कुछ ऐसा मुहीम चलाया जाए कि सभी मकानों को उसी से मिलते-जुलते रंग से पोत दिया जाए। जैसे कि जयपुर गुलाबी शहर है, जोधपुर नीला (ब्लू) शहर है। वैसे ही बूंदी में भी ब्लू की प्रधानता है। ऐसा कहते हैं कि ब्राह्मणों के घर नीले होते हैं, गहरे नीले। यहाँ पर मुझे पुराने भवनों का काला और गहरा पीला का मिश्रण जो दिखा, मेरे मन में कल्पना उठती है कि अगर शेष घरों में भी कुछ इसी तरह की आभा कर दी जाए, डिज़ाइन कर दी जाए, तो एक अलग ही आकर्षण पैदा होगा।
मूर्तिशैली और चित्र कला






गढ़ महल और तारागढ़ किला

स्थानीय निवासी रहन सहन

नवल सागर झील

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