
1990 के दशक में मैं एपिलेप्सी (मिर्गी), विशेष रूप से उसकी एडवोकेसी तथा जनशिक्षा के कार्य में सक्रिय था। रोटरी क्लब ऑफ़ इंदौर अपटाउन और रोटरी International के बड़े प्रोजेक्ट किये थे। एक अन्तरराष्ट्रीय पहचान बनी थी। उसी तारतम्य में डाक से एक पत्र मिला। उस ज़माने में ई-मेल नहीं था। क्लीवलैण्ड क्लीनिक, ओहायो, अमेरिका में न्यूरोलाजी के प्रमुख डॉ हॉन्स लुडर्स का। आमंत्रण था। एक प्रतिनिधिमण्डल के सदस्य के रूप में चीन और मंगोलिया जाने का। गतिविधि का नाम था Citizen Ambassador Program, People to People, यह एक पहल थी। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ड्वाइट आईजनहावर की।

एपिलेप्सी विशेषज्ञों के एक अन्तरराष्ट्रीय दल का गठन हुआ था। नामी गिरामी लोग थे। चीन में एक सप्ताह और मंगोलिया में पाँच दिन का कार्यक्रम था। वहां के अस्पतालों में मिर्गी के मरीजों, डाक्टरों से मिलना। Epidemiology, Clinical features तथा Management की जानकारियों का आदान प्रदान करना। खूब चर्चाएं हुईं। लेक्चर हुए। Round table discussions थे। मेरा विषय “विकासशील देशों में मिर्गी की समग्र देखभाल और जन शिक्षा के पहलू।”
मंगोलिया का परिचय
खैर! अब आते हैं मंगोलिया पर। चीन के उत्तर में और रूस के साइबेरिया भाग के दक्षिण में सैंडविच के माफिक फंसा हुआ देश मंगोलिया है। Land locked है। कोई समुद्र तट नहीं है। मंगोलिया धरती के सबसे दूरस्थ या सुदूर देशों में गिना जाता है। बड़ा देश है। भारत का लगभग आधा। उस समय वहां की आबादी सिर्फ 20 लाख थी। अब 35 लाख है। भारत में जहां प्रति वर्ग किलोमीटर 440 लोग रहते हैं वहीं मंगोलिया में केवल 2 । मंगोलिया में मनुष्यों की तुलना में घोड़ों की संख्या दस गुना अधिक है। गरीब पिछड़ा देश था। Mongol Race या मंगोल नस्ल पूरे पूर्वी एशिया में व्याप्त है।
चंगेज खान को अंग्रेजी में Genghis Khan लिखते हैं। 14वीं शताब्दी में विश्व के ज्ञात नक्शे के लगभग एक तिहाई पर मंगोल साम्राज्य का विस्तार था। ऐसा कहते है कि अकेले चंगेज खान का डी.एन.ए. धरती पर जितने लोगों में है उतना किसी अन्य पुरूष का नहीं।
बीजिंग से उलानबटोर की उड़ान
बीजिंग से उलानबटोर की 2 घण्टे की उड़ान में लगातार नीचे ताकता रहा। पहले हरियाली भरे पहाड़ आए, जिनमें सर्पीली Great wall of China बनी हुई है। फिर मंचूरिया व आंतरिक मंगोलिया की नदियां, देहात और सीढ़ीदार खेत दिखे। धीरे-धीरे जमीन सूखती गई। बादल गायब हो गये। कुछ बड़ी नमकदा झीलें दिखी। बाद में गोबी मरुस्थल, लाल रेत, चट्टानी ढूह या घोरे, सपाट एक-रस जमीन, झीने छितरे फाहे बादल। जीवन का नामो निशान नहीं दिखा एक घन्टे तक।

उलानबटोर आने के 15 मिनट पूर्व दृश्य बदला। छोटी पहाडियाँ, नदियाँ, घास के मैदान, भूरी नंगी पहाडियां, बीच-बीच में हरे पीले चकत्तों के समान चिपके हुए वृक्ष। गोल सफेद तम्बू वाले घर (मंगोलियन भाषा में गेर) कहीं अकेले-दुकेले, कहीं छोटे समूह, भेडों व गायों के रेवड़। उलान बटोर हवाई अड्डे पर भारतीय वायुसेना का विमान खड़ा देखकर अच्छा लगा। उपराष्ट्रपति के आर. नारायणनन की यात्रा के बारे में मालूम पड़ा। इन्दौर से भी छोटा एयरपोर्ट लगा। खूब उण्ड लगी।
मंगोलिया का प्राकृतिक सौन्दर्य
Landscape या जमीनी परिदृश्य सुन्दर है, नयापन लिये हुए है। ज्यादातर पहाड़, रेगिस्तान या चरागाह (Steppes) हैं। बेहद ठण्डा और सूखा। तापमान शून्य से 40 डिग्री नीचे तक जाता होगा लेकिन बर्फ जमने के लिये न तो जमीन पर और न वायुमण्डल में पानी है। लगातार तेज हवाएं चलती रहती है।

शरद या Autumn या पतझड़ ऋतु चल रही थी। खूब पत्तिया गिर रही थी। हरे पीले, केशरिया, लाल रंग के वृक्षों की छटा निराली थी। वृक्ष कम है, परन्तु वे पहाड़ियों, घास के मैदानों व लघु धाराओं के साथ मिल कर निराले सौन्दर्य की सृष्टि करते हैं। ठोस पुरानी चट्टानों के पहाड़ तथा वादियों के बीच बिखरी हुई मझोले आकार की चट्टानें नाना रूपाकारों को जन्म देती है जो बेहद आकर्षक, सुन्दर व आश्चर्यजनक नजर आते हैं। पत्तियों के झड़ जाने से निर्वस्त्र हो चुके वृक्षों व झाड़ियों के गहरे बैंगनी काले तने एक अलग ही रंग संयोजन में योगदान देते है। ऊपर निरभ्र नीला आकाश व साफ सफेद रुई के फाहों जैसे बादल। लगभग सौ किमी दायरे के हमने बस से भ्रमण किया। कुदरत ने खूबसूरती की नियामत बांटने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन जमीनी हकीकत बेहद कठोर है। कोई फसल नहीं होती। पानी की कमी। साल में नौ महीने बेहद जाड़ा। थोड़े से लोग। बाकी सब सुनसान। अनछुई प्रकृति। बाकी दुनिया से बहुत दूर।

मंगोलिया की खुली-खुली विशालता, निस्सीमत्ता का अनुमान बिना वहाँ गये नहीं लगाया जा सकता। ऐसा लगता है कि धरती और आकाश चले ही जा रहे हैं अनादि और अनन्त – मानो भगवान बुद्ध की फिलासफी से प्रभावित होकर।
गेर मंगोलियन संस्कृति और भोजन
अब अधिकाश लोग नगरों में रहने लगे हैं। अकेले उत्लानबटोर की आबादी 6.5 लाख है। लोग खानाबदोश जीवन छोड़ रहे है। हम उनके गेर देखने गये जो मंगोलियन संस्कृति का प्रतीक है। उनकी आर्थिक समृद्धि नापने के पैमाने है- एक परिवार के पास कितने ‘गेर’ हैं। कितने बड़े आकार के गेर है (पांच खाना, दस ‘खाना’ 15 ‘खाना’। मंगोलियन भाषा में ‘खाना’ का अर्थ वही है जो चौखाना’ में हिन्दी में है। कितने घोड़े, गायें, भेड़े व ऊंट है। भोजन के नाम पर इन्ही चार प्राणियों का मांस तथा इन्हीं चार प्राणियों के दूध व दूध से बने पदार्थ। मुख्यत: पनीर व दही पर जिन्दा रहते हैं। अनाज, दालें, फल या सब्जियां आयात होते हैं और केवल अमीर लोग खा पाते हैं। इन लोगों के गेर ककून जैसे लगते हैं। पुरुष दायीं और महिलाएं बायीं ओर बैठती हैं। गृहस्वामी का आसन उत्तर दिशा में होता है। पूजा की एक वेदी होती है। छोटी बड़ी मूर्तियाँ और थांका स्थापित रहते हैं। परिवार के सदस्यों के फोटोग्राफ लगे हुए थे। सोवियत रूस के सेना में शामिल होकर सैनिकों की पोशाक में पुरुषों के थे। शेमनिज्म की वाल हैंगिंग पिलर्स पर लटकती है। बुद्धिज्म और शेमनिज्म में सह अस्तित्व रहा।

एक गेर में रहने वाली बुढ़िया ने हमें सादर स्टूल पर बिठाया, पनीर, मक्खन व कटोरा भर के दही दिया। दूध से बनी वोदका शराब कड़वी और खट्टी थी। पनीर काफी तक, दार्जिलिंग में खाए गये याक के पनीर जैसा था खूब सुखाया हुआ। अत: ठोस व कठोर। गेर के केन्द्र में कोयले की बड़ी सिगड़ी जलती रहती है। (समोवार) जो पकाने व तापने, दोनों काम आती है। चिमनी का धुआं बाहर निकलता रहता है।
गेर के अन्दर सामान कम व सादा था। अमीर गेर में जमीन पर लकड़ी के पटिये थे अन्यथा चटाई या चमड़ा। दलाई लामा व गौतम बुद्ध की तस्वीरें थी।
घोड़े, ऊँट और मंगोलियन बच्चे
मंगोलियन बच्चे सुन्दर लगे। छ: साल की उम्र से लड़का, लड़की घुड़सवारी सीख जाते हैं। ऐसी कहावत है कि मंगोलियन बच्चे घुड़सवारी की जीन्स पहने हुए जन्म लेते है। पहली बार दो कुबड़ वाले बेक्ट्रियन ऊंट देखे। सुन्दर भव्य व गरिमापूर्ण प्राणी लगा। बड़े आकार के स्वस्थ झबरीले कुत्ते भी थे, जो घुडसवारों के साथ Steppes में मीलों, सरपट दौड़ते जाते हैं। अपनी भेड़ों व गायों के रेवड़ के देखभाल के लिये।

चेहरे चीनियों से भी ज्यादा चपटे, चौकोर पना अधिक, तिकोन पना कम, चौड़ा ललाट, चौड़ा चेहरा, मिचमिची आँखें खूब धंसी हुई।
बुद्ध धर्म और शेमनिज्म
बौद्ध धर्म 16वीं शताब्दी में तिब्बत से आया था। इसके साथ इनका पुराना धर्म ‘शेमनिज्म’ भी चलता है। “Spirits” या शक्तियों की पूजा होती है। पहाड़ का देवता, नदी का देवता, आकाश का देवता अच्छी चुड़ैल, बुरी चुड़ैल ‘काली शक्ति, सफेद शक्ति आदि-आदि। बौद्ध मठ में सुबह का धम्म पाठ सामूहिक समवेत स्वरों में चल रहा था जिसे देखना व सुनना रोमांचकारी था।

पुरानी मंगालियन लिपि व बौद्ध मठों को अब पुनर्जीवित किया गया है। बौद्ध धर्म से समबद्ध जानकारियां, मैंने गाइड तुलना में अधिक बताई।

शापिंग के नाम पर खरीदने को कुछ नहीं है। ऊंट, भेड़, बकरी के चमड़े की वस्तुएं, पारम्परिक कला के कुछ स्मृति चिन्ह। अनेक प्रकार की ऊनी गरम टोपियां खूब बिक रहीं थी।
शीत युद्ध के वर्षो में (1945-1990) में सोवियत संघ के प्रभाव में पूर्वी यूरोप के वारसा संधि वाले देशों के अलावा प्राय: हमारा ध्यान इस बात पर नहीं जाता था कि मंगोलिया भी उसी गुट का हिस्सा था।

नगर की सड़कों इमारतों, स्मारकों पर रूस का बहुत प्रभाव है। 1917 की बोल्शेविक क्रान्ति के बाद 1924 में मंगोलिया दूसरा देश था जिसने सोवियत शैली की कम्युनिस्ट सत्ता प्रणाली अपनाई। रूसी लिपि सिरिलिक लिपि चलती है।

कारों के नाम पर सिर्फ सोवियत मॉडल लाडा दिखती थी। 1970 के ज़माने की। फियाट की पार्टनरशिप में बनी थी। इक्का दुक्का गाज (वोल्गा) दिख जाती थी- उच्च पदस्थ पार्टी नेताओं के लिए।
उलानबटोर की यादें
समीप की एक पहाड़ी पर रूसी सैनिकों के सम्मान में एक स्मारक बना है। वहां से उलानबटोर नगर का विहंगम दृश्य मोहक था परन्तु 2 डिग्री सेल्सियस की तीखी थपेड़े वाली चुभती हुई हया ने शरीर सुन्न कर दिया। अत्यंत अप्रत्याशित रूप से रोटरी क्लब ऑफ उलानबटोर की बैठक में भाग लेने का मौका मिला। जिस होटल में हम ठहरे थे वहीं पर। उनका दूसरा साल है। पहले कम्यूनिस्ट देशों में रोटरी नहीं था? उनका फ्लैग प्राप्त किया। शाम को थिएटर में सास्कृक्तिक कार्यक्रम (गायन, वादन, नृत्य) ने सबको मुग्ध कर दिया।

यहां का राष्ट्रीय ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संग्रहालय देखा। संग्रहालय साधारण था। कुछ मूर्तिया व चित्र निःसन्देह प्राचीनतम् दुर्लभ व बहुमूल्य थे।
यहां की भूमि बनस्पति वन्यप्राणी आदि के रोचक माडल चित्र आदि थे। डायनोसोर के सम्पूर्ण कंकाल व बड़े अण्डे देखना रोमांचक था। पेलेन्टोआलॉजी की दृष्टि से डायनोसोर के बारे में सर्वाधिक महत्वपूर्ण अवशेष मंगोलिया के गोबी मरुस्थल से ही मिले हैं।
अस्पताल विजिट
वहां के अस्पताल विजिट किये। OPD के Waiting hall में मरीजों और परिजनों के चेहरे मोहरे और टोपियां या Headgear पर गौर करता रहा। युवा न्यूरोलाजिस्ट उलिज़ीबायार से अच्छी मित्रता हो गई।

भगवान बुद्ध की एक Wall Hanging उसे भेंट करी। वह गद्-गद् हो गई।
“ओह, आप हमारे भगवान लेकर आये हैं।”
मन्दिर की चौखट पर संस्कृत – देवनागरी में लिखा मंत्र
“ओम मणि पद्मे हम”
मैंने पढ़ा तो वह आश्चर्य से भर उठी। मिर्गी के बारे में जागरूकता हेतु मेरे द्वारा किये गये प्रयासों से वह स्वयं को Relate कर पा रही थी। चार दिन उसके साथ खूब घुटी। प्रतिनिधिमण्डल के अन्य सदस्य मुझे छेड़ने लग गये थे। बाद में एक वर्ष तक पत्र व्यवहार जारी रहा।
युवा गाईड एन्ख बायार, ओवो और प्राचीन मान्यताएँ
हमारा युवा गाईड एन्ख बायार बहुत प्यारा था। खूब बातें करता था। सहयोगी था। अनन्त तक विस्तारित वीरान पहाड़ियों और Steppes में छोटे बड़े ढूहों पर पत्थरों के ढेर देखे। राह चलते पत्थरों की ढेरियाँ बढ़ती जाती हैं। आने जाने वाले देवताओं को प्रसन्न रखने के लिये एक एक पत्थर चढ़ाते जाते हैं। इन्हें Cairns या Ovoo कहते हैं। इन पर झंडे गड़े रहते हैं। गाइड ने बताया कि प्राचीन काल में मृतकों शरीर ऐसे ही यहाँ प्रकृति में गलने के लिए छोड़ दिये जाते थे। कम्यूनिस्ट शासन में रोक थी। जंगली जानवर क्षत विक्षत अंग मानव बस्तियों तक ले आते थे। कम्यूनिस्ट की समाप्ति के बाद प्राचीन परम्परा को जीवित करने के नाम पर कुछ लोग फिर से ऐसा करने लगे थे।

टूर के आखिरी दिन एन्ख बायार एक गेर में हमें बैठा कर मंगोलिया का इतिहास सुना रहा था। चंगेज खान के प्रति अगाध श्रद्धा और प्रशंसा का भाव था। उसने यह नहीं बताया कि चंगेज खान की सेनाओं ने कितनी लूटपाट की। उसके अनुसार वह तो पूरी दुनिया को एक करना चाहता था। शान्ति चाहता था। मैंने पूछा कि वह भारत क्यों नहीं आया। उसे इतिहास की परतों का बोध नहीं था। अपने मन से बोल पड़ा – भारत ने उसके संधि प्रस्तावों को मान लिया था। हालांकि वह सिन्धु नदी तक आ चुका था। उसकी कहानी का सबसे रोमांचक भाग था – 1990 के दशक में सोवियत संघ के टूटने के बाद मंगोलिया में कम्युनिस्ट शासन की समाप्ति। खूब उत्साह से भर उठा था। कह रहा था मैंने इस इतिहास को जिया है। ओह, वो भी क्या दिन थे!
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