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ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया (Trigeminal Neuralgia)


ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया का दर्द मनुष्य को ज्ञात सबसे तीव्र दर्दो में से एक है। अनेक मरीज कहते हैं कि उन्होंने और भी दूसरे बहुत से प्रकार के तथा अन्य कारणों के तीखे दर्द महसूस किये हैं, खूब भोगे हैं परन्तु ट्रायजेमिनल नयूरोल्जिया जैसा दर्द उन सबसे अधिक पीड़ादायी है।

विषय सूचि

दर्द कहाँ होता हैं?

दर्द किन परिस्थितियों में होता हैं ?

रोग की स्वाभाविक प्रकृति व नियति

दर्द की तीव्रता एवं प्रकार

रोग की संभावना किन परिस्थितियों में कम होती हैं ?

निदान भेद

प्रयोगशाला जाँचें

औषधियों की भूमिका

उपचार में इंजेक्शन की भूमिका

शल्य उपचार

दर्द कहाँ होता है (दर्द का स्थान)
यह दर्द चेहरे के दायें या बायें भाग में होता है | प्राय: आधे चेहरे के एक तिहाई या दो तिहाई भाग में होता है चेहरे के कितने हिस्से में दर्द होगा, यह ट्रायजेमिनल नर्व की एनाटॉमी पर निर्भर करता है ।
यह दर्द दिन में एक या दो बार से लेकर बीसियों बार हो सकता है। ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया का दर्द रूक-रूक कर होता है, लगातार नहीं होता | कभी-कभी अपने आप या कभी-कभी स्पर्श से /छूने से या हरकत से होता है | चेहरे को छूना दर्द का तात्कालिक कारण बन जाता है।

यह दर्द किन गतिविधियों से होता है ?
अनेक गतिविधियाँ होती हैं जिनसे यह दर्द बार-बार पैदा हो सकता है, जैसे चेहरा धोना, चेहरा पोंछना, दाढ़ी बनाना, कुल्ला करना, ब्रश करना, चेहरे को सहलाना, चेहरे पर हाथ फेरना, मुंह चलाना, चुम्बन करना, हवा का छोंका लगना, भोजन करना, पानी पीना, बोलना, चिल्लाना, गाना, जबड़ा हिलाना या चलाना आदि |
ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया का दर्द प्राय: नींद में नहीं होता । बहुत थोड़े से मरीजों में, जिनमें बीमारी की तीव्रता अधिक होती है, उन्हें दर्द के कारण नींद में खलल पड़ सकता है । नींद लगती ही नहीं या बार-बार खुल सकती है । चेहरे के साथ तकिया या हाथ या चादर छूने से नींद में भी चमक पैदा हो सकती है ।

ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया रोग की स्वाभाविक प्रकृति व नियति
अधिकांश मरीजों में इस रोग का स्थाई इलाज सम्भव नहीं होता । दवाईयों के नियमित सेवन से अधिकतर मरीजों में दर्द कम हो जाता है या गायब हो जाता है । परन्तु रोग अन्दर ही अन्दर बना रहता है। औषधियाँ रोकने पर पुन: दर्द होने लगता है। कुछ मरीजों में रोग की तीव्रता अपने आप कम या ज्यादा होती रहती है । पुराने मरीज अपने अनुभव से औषधि की दैनिक खुराक कम या ज्यादा करना सीख जाते हैं । बीमारी कुछ सप्ताहों या महीनों के लिये क्यों दब जाती है या फिर क्यों बढ़ जाती है, इसकी कोई वजह समझ में नहीं आती, नजर नहीं आती । थोड़े से मरीजों में रोग अपने आप हमेशा के लिये मिट जाता है | अन्य रोगियों में बीमारी की तीव्रता शुरूआत में कम रहती है, दवाईयों से दर्द दब जाता है,परन्तु कुछ महीनों या वर्षों में बढ़ती जाती है, दवाईयाँ बेअसर होती जाती हैं |

दर्द की तीव्रता और प्रकार
ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया का दर्द मनुष्य को ज्ञात सबसे तीव्र दर्दों में से एक है । अनेक मरीजों का कहना है कि और भी दूसरे कई प्रकार के तथा अन्य करणों से होने वाले तीखे दर्द महसूस किये हैं, परन्तु ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया जैसा दर्द उन सबसे अधिक खतरनाक है | सभी मरीजों में प्रत्येक समय पर दर्द का तीखापन एक जैसा नहीं होता । दर्द कम ज्यादा होता रहता है, कभी दवाईयों के असर से, कभी अपने आप | मरीजों द्वारा तरह-तरह से इस दर्द के प्रकार का वर्णन किया जाता है |

* बिजली के करंट जैसा लगता है।
* कील गाड़ दी गई है।
* चमक चलती है।
* चाकू से काटा जा रहा है।
* सुई चुभती है।
* जलन और झुनझुनी होती है।

ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया की सम्भावना इन परिस्थितियों में कम रहती है।

यदि दर्द का प्रकार भारीपन या दबाव जैसा हो | यदि लगातार चौबीस घण्टे एक जैसा बना रहता हो | यदि दर्द चेहरे के दोनों तरफ एक जैसी तीव्रता व एक जैसे प्रकार का हो । यदि दर्द ट्रायजेमिनल नर्व के ग्रहण क्षेत्र के दूर के इलाको में हो रहा हो – जैसे की कान, गर्दन, खोपड़ी का पिछला हिस्सा। विभिन्न प्रकार के स्पर्श व उपर वर्णित गतिविधियों से दर्द के पैदा होने या बढ़ने का सम्बन्ध न हो | यदि कार्बामाजेपिन नामक औषधि की धीरे-धीरे बढ़ाई गई पर्याप्त खुराक का बिल्कुल असर न हो रहा हो |

निदान भेद
ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया रोग कौन सी दूसरी बीमारियों से मिलता जुलता है या कौन सी दूसरी बीमारियों गलती से ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया समझी जा सकती है | कौन सी दूसरी बीमारियों में ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया को गलती से भूला जा सकता है | दांत के दर्द और ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया के दर्द में समानता का एक और कारण है कि दोनों में कार्बामाजेपिन नामक दवाई से लाभ हो सकता है। साईनुसाइटिस, क्लश्चर हेडेक, पोस्ट हर्पेटिक न्यूराल्जिया, माईग्रेन,टेम्पोरल आर्टराईटिस, पेरोक्सिसमल हेमिक्रेनिया, ऐटिपिकल फेशियल पेन |


ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया का निदान

मरीजों के द्वारा चेहने के दर्द का वर्णन सुनकर प्राय: डायग्रोसिस हो जाता है इसीलिये कहते हैं कि ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया का निदान मुख्यतया क्लिनिकल है तथा हिस्ट्री “इतिवृत्त’ पर आधारित है । हिस्ट्री का मतलब है मरीज व उसके परिजनों द्वारा तकलीफ और उनकी कहानी का वर्णन|
वर्णन करने की, कथोपकथन करने की क्षमता लोगों में अलग-अलग होती है |

 कुछ मरीज, खुद होकर अपनी पीड़ा और उसकी कथा को इतने अच्छे से, इतने विस्तार से बताते हैं कि जो चाही गई जानकारी आसानी से मिल जाती है। कुछ अन्य मरीज अपनी व्यथा व उसक इतिहास ठीक से नहीं बता पाते । वे अटकते हैं, भटकते हैं, रुक जाते हैं, भूल जाते हैं | उन्हें याद दिलाना पड़ता है । सवाल पूछना पड़ते हैं ताकि सारी बातों का खुलासा हो सके – जैसे कि क्या तकलीफ है, दर्द कहाँ होता है, कहां से शुरू होकर कहां तक फैलता है, कितनी जोर का होता है, दर्द की वजह से दैनिक कामकाज में कितना व्यवधान पड़ता है, कब होता है, कितनी देर होता है, कितनी बार होता है, क्या करने से होता है, क्या करने से कम होता है, कब से हो रहा है, कैसे शुरू हुआ, दर्द के साथ-साथ कोई और तकलीफ भी है क्या ? आदि । यदि मरीज ठीक से हिस्ट्री न बता पा रहा हो तो उपरोक्त में से अनेक प्रश्न पूछने की जरूरत पड़ती है, अन्यथा नहीं | हिस्द्री सुनते-सुनते डाक्टर का दिमाग चलने लगता है| वह फैसला करता है कि मरीज का चेहरे, या गाल या जबड़े या दांत या सिर का दर्द ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया के कारण हो सकता है या नहीं ? कहीं कोई दूसरी मिलती जुलती अवस्था तो नहीं है |

शारीरिक जांच – डाक्टर द्वारा मरीज की शारीरिक जांच का भी महत्व है परन्तु इतिवृत्त ‘हिस्ट्री’ की तुलना में कम | सामान्य शारीरिक जांच में ब्लडप्रेशर आदि देखते हैं। न्यूरॉलाजिकल जांच भी पूरी करते हैं, परन्तु उसमें क्रेनियल नर्वस के परीक्षण पर खास ध्यान देते हैं | पांचवी क्रेनियल नर्व ‘ट्रायजेमिनल” की जांच करते समय चेहरे पर संवेदनाओं को परखते हैं – रुई से या अंगुली से छूकर, सुई चुभाकर, ठण्डी गरम वस्तु को छुआकर, जबड़ों को भींचने व हिलाने वाली मांसपेशियों की शक्ति, मापकर। कार्नियल रिफ्लेक्स देखते हैं – आंख के काले भाग पर रूई का बारीक फाहा छुआने से दोनों पलकों का झपकना ।

ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया के अधिकांश मरीजों में शारीरिक न्यूरोलॉजिकल जांच में कोई कमी नहीं पाई जाती | सब कुछ सामान्य मिलता है | इसका मतलब यह नहीं कि बीमारी नहीं है। बीमारी है इसका फैसला तो हिस्ट्री के दौरान ही हो गया था। शारीरिक जांच में सब कुछ खराबी न मिलने का मतलब है कि ट्रायजेमिनल नर्व में जो खराबी पेथालॉजी /रोग विकृति दर्द का कारण बन रही है, वह बहुत सूक्ष्म है, इसलिये दर्द के अलावा अन्य कोई खराबी दिखाई नहीं पड़ रही है। यदि शारीरिक जांच में खराबी मिले तो इस बात की सम्भावना बढ़ जाती है कि ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया के दर्द के पीछे कोई बड़ी या गम्भीर पेथालॉजी रोग विकृति हो सकती है, जैसे कि ट्यूमर गांठ आदि इस प्रकार के मरीजों में ब्रेन के एम.आर.आई. में कोई खराबी दिखाई पड़ने की आशंका अधिक होती है ।

ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया के निदान में प्रयोगशाला जांचें

चूंकि ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया के अधिकांश मरीज | अधेड़, पौढ़ या वृद्ध होते हैं उनमें कुछ अन्य उम्र दराज | बीमारियाँ संयोगवश हो सकती है | सामान्य जांचें करवाते हैं – हीमोग्लोबिन, डब्ल्यू बी.सी. काउन्ट, ब्लड शुगर, इ.सी.जी., लिपिड्स आदि |
प्रमुख जांच हैं मस्तिष्क का एम.आर.आई./अधिकांश में सामान्य मिलता है। कुछ मरीजों में खराबी मिल सकती है। उदाहरणार्थ – ट्यूमर, ए.वी.मी., इन्फाकर्शन डिमाईलीनेटिंग ब्लाक आदि |

पेथोफिजियोलॉजी
ट्रायजेमिनल नर्व पांचवी क्रेनियल नाड़ी में रोग विकृतियों के कारण ऐसा क्या हो जाता है कि दर्द होने लगता है | यह एक प्रकार का न्यूरोपेथिक दर्द है। न्यूरोपेथिक दर्द उस समय होता है जब बाह्य नाड़ियों में तथा स्पाईनल कार्ड व मस्तिष्क के अन्दर दर्द की सूचना ले जाने वाले फाईबर्स – धागे/एक्सान/तन्‍्तु क्षतिग्रस्त होकर अति उद्दीपनशील हो जाते. हैं। उनमें अपने आप विद्युतीय तरंगें पैदा होने लगती हैं या सामान्य तरंगों की आवृत्ति प्रति सेकण्ड संख्या तथा तीव्रता बढ़ जाती है। ये विद्युतीय तरंगें जब मस्तिष्क में पहुंचती हैं तो मरीज को लगता है कि शरीर के उक्त भाग से दर्द उठ रहा है, बावजूद इस बात के कि वहां चेहरे पर कोई रोग नहीं है, कोई चोट नहीं लगी है |

न्यूरोवास्क्यूलर कांफ्लिक्ट
पिछले 30 वर्षों में एम.आर.आई. की व्यापक उपलब्धता के बाद जाना गया है कि ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया के अनेक मरीजों में खून की एक महीन धमनी ट्रायजेमिनल नर्व से चिपटी या लिपटी रहती है । धमनियाँ झपकती हैं | हृदय की प्रत्येक धड़कन के साथ पूरे शरीर की धमनियाँ झपकती हैं | हृदय की प्रत्येक धड़कन के साथ पूरे शरीर की धमनियों में रक्त प्रवाह की लहर बनती है | झपकती हुई धमनी से चिपके रहने के कारण ट्रायजेमिनल नर्व के तन्‍्तुओं में धीरे-धीरे नुकसान पहुंचता है। उसके क्षति ग्रस्त एक्सान अति उद्दीपनशील हो जाते हैं | जरूरत से ज्यादा, अनावश्यक करन्ट पैदा होता है ।

औषधियों की भूमिका
कार्बामाजेपिन नामक औषधि जो मिर्गी के उपचार में पहले से तथा बहुतायत से उपयोग में लाई जाती थी, ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया के उपचार में बहुत कारगर है। परन्तु यह इलाज केवल लाक्षणिक/सिम्प्टोमेटिक है – अर्थात्‌ रोग के लक्षण दर्द को कम करता है, दबाता है, शान्‍्त करता है । यह असर अस्थाई है | परमानेन्ट/स्थाई इलाज नहीं है। मूल बीमारी जड़ से नहीं जाती | केवल उसके लक्षणों पर नियंत्रण किया जाता है। औषधि का असर समाप्त होने पर पुन: वही तकलीफ वैसी की वैसी उभर आती है।
कार्बामाजेपिन की दैनिक खुराक कम से शुरू करते हैं, धीरे-धीरे बढ़ाते हैं। 100 मि ग्रा. सुबह शाम से शुरू करके 400 मिग्रा. सुबह दुपहर शाम तक देना पड़ सकती है। अधिकांश मरीज में 200 मि.ग्रा. दिनः में दो या तीन बार पर्याप्त होता है। कार्बामाजेपिन औषधि है जो पिछले पचास वर्षो से चलन में हैं| सुरक्षित हैं। मिर्गी के करोड़ों मरीजों में लम्बे समय तक अनेक सालों तक सफलतापूर्वक दी गई है।


कुछ अन्य औषधियाँ भी उपयोगी हैं जिन्हें कार्बामाजेपिन के साथ या विकल्प के रूप में दिया जा सकता है।


मरीजों और परिजनों को इस बात पर दु:ख नहीं मनाना चाहिये कि उन्हें लम्बे समय तक रोज औषधियाँ लेना पड़ रही है । बहुत सी बीमारियों का इलाज ऐसे ही चलता है। शुक्र है कि इतना तो है, वरना तो अन्य दूसरी बीमारियों में इतना भी उपलब्ध नहीं है । हाईब्लडप्रेशर ‘उच्च रक्तचाप” के मरीजों को रोज गोलियाँ खाना पड़ती हैं तभी रक्तचाप नियंत्रित रहता है |
डायबिटीज के मरीजों को प्रतिदिन इन्सुलिन इन्जेक्शन लगाना पड़ता है वरना ब्लड शुगर बढ़ जायेगी |
मिर्गी का रोगी अपनी औषधियाँ रोक दे तो उसे पुन: पुन: दौरे आयेंगे ।

ट्रायजेमिनल न्यूरेल्जिया के उपचार में इन्जेक्शन की भूमिका

कुछ मरीजों में औषधियों की खूब ऊंची खुराकें देने के बाद भी दर्द कम नहीं होता | बल्कि दवाईयों के दुष्प्रभाव होने लगते हैं जैसे कि सुस्ती, नींद, नशा, डगमगपन आदि। अनेक मरीजों को औषधि से एलर्जी होती है या वे उन्हें सहन ही नहीं कर पाते | ऐसे मरीजों में ट्रायजेमिनल नर्व को सुन्न करने का इंजेक्शन लगाया जा सकता है। अनुभवी सर्जन या निश्चेतना विशेषज्ञ चेहरे पर, गाल की हड्डी के नीचे से एक लम्बी सुई द्वारा खोपड़ी की हड्डी के पेंदे में उस छेद तक पहुंचाते हैं जहाँ से ट्रायजेमिनल नर्व बाहर आ रही है। नाड़ी या नर्व पर लम्बे समय तक स्थाई रूप से सुन्न करने की दवा का इंजेक्शन लंगाते हैं । दर्द चंला जाता है या बहुत कम हो जाता है या औषधि की कम खुराक से काम चल जाता है| दर्द के साथ-साथ चेहरे की अन्य सेवंदनाएं जैसे – स्पर्श, गरम-ठण्डे का अहसास भी सुन्न हो जाता है | इंजेक्शन का असर स्थाई या जीवन पर्यन्त नहीं होता | कुछ महीनों के बाद फिर दर्द शुरू हो जाता है। इंजेक्शन दोबारा लगाया जा सकता है, परन्तु सम्भव है कि उसका प्रभाव अब अच्छा न हो |


शल्य उपचार
एम.आर.आई. जांच में यदि न्यूरोवास्क्यूलर कान्फिलिक्ट हो तो उसका शल्य उपचार सफल होता है।
खोपड़ी के टेम्पोरल भाग को खोलकर मस्तिष्क की पेंदी में पहुंचते हैं। पांचवे नम्बर की क्रेनियल नर्व ट्रायजेमिनल मस्तिष्क के पान्‍्स नामक भाग से निकलती कम कि है। आपरेटिंग माईक्रोस्कोप से सूक्ष्म रचनाएं कुछ बड़ी दिखती हैं। नर्व के साथ लिपटी हुई खून की धमनी को धीरे से अलग हटा कर दोनों के मध्य मांसपेशीया फेशिया के नरम उत्तक का फाहा रख देते हैं ताकि वे पुन: न लिपट जावे | आपरेशन लगभग 50-70 प्रतिशत में सफल होता है। 100 प्रतिशत मरीजों में दर्द पुन: लौट सकता है। कुछ मरीज करीब पांच प्रतिशत में आपरेशन से काम्प्लीकेशन भी हो सकते हैं। खर्च ज्यादा लगता है। एम.आर.आई. जांच में न्यूरोवास्क्यूलर कान्फिलिक्ट नाड़ी नलिका उलझाव के अलावा कभी-कभी दूसरे किस्म की खराबी दिख सकती है। इनमें से ट्यूमर गांठ, ए.वी.एम. रक्तनलिकाओं का गुच्छा आदि को आपरेशन द्वारा निकाला जा सकता है |

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